Friday, April 25, 2008

पुरोहित जी हुए `हाईटेक´

आपको याद होगा एक मोबाइल कंपनी का विज्ञापन – जिसमें एक पुरोहित जी काफी व्यस्त नजर आ रहे हैं। उनके पास शादियां कराने का इतना ठेका होता है कि कुछ शादियां वे एक मंडप में बैठे-बैठे मोबाइल फोन के जरिए ही करा देते हैं। पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार में इन दिनों विज्ञापन की तरह हूबहू नजारा तो नहीं दिख रहा है- लेकिन उसके जैसी हालत तो दिख ही रही है। इन दिनों लग्न का जोर है – सिर्फ अप्रैल महीने में ही शादी-विवाह का मुहूर्त है, लिहाजा एक ही गांव में एक ही दिन तीन-तीन, चार-चार शादियां हो रही हैं। जाहिर हैं इससे नाई और पुरोहित की मशरूफियत बढ़ गई है। लेकिन विकास की बाट जोह रहे पूर्वी इलाके में अभी – भी बिजली की जो हालत है , उसमें नेटवर्क मिल जाए तो गनीमत ही समझिए। लेकिन नाई और पुरोहित जी के हाथ में पंडोरा बाक्स ( पूर्व प्रधानमंत्री अटलविहारी वाजपेयी ने बीएसएनएल की मोबाइल सेवा का उद्घाटन करते वक्त इसे पंडोरा बॉक्स ही कहा था ) आ गया है। लिहाजा आप को दुआ करनी होगी कि आपके सात फेरे लेने से पहले तक मोबाइल का नेटवर्क दुरुस्त रहे। अगर कोई परेशानी हुई तो तय मानिए विवाह का मुहूर्त पंडित और हज्जाम को खोजने में ही गुजर जाएगा। संचार सुविधाओं के बढ़ते पांव का ही असर है कि विवाह मंडप में वैदिक मंत्रोंचार के बीच मोबाइल की घंटी घनघनाते लगती है। कोई कहीं रुककर इंतजार करने के चक्कर में नहीं रहा। सब अपने काम में मगन, जब जरूरत पड़े तो काल कीजिए। छोटे-मोटे रस्म तो मोबाइल पर ही पूरे हो रहे हैं। बदले मौसम में हर कोई बदला-बदला नजर आ रहा है। पवनी हाईटेक हो गए हैं, तो पुरोहित आनलाइन उपलब्ध है। पंडित लोगों की हालत यह है कि छोटे-मोटे रस्म मोबाइल पर ही पूरे कराए जा रहे हैं। आसानी से दो-तीन जगह का काम देख लेते हैं। यजमान भी हर छोटी-बड़ी मुश्किल पर पंडितजी की सलाह तुरंत लेते हैं। पहले पूजा-पाठ से घंटों पहले पंडित पहुंच जाते थे लेकिन अब ऐसा नहीं है। शादी-विवाह के मौके पर नाई से संपर्क बनाए रखते हैं और हमेशा तैयारी करते रहने के लिए निर्देश देते रहते हैं। सीताकुंड निवासी पंडित अक्षयवर नाथ दूबे बताते हैं कि मोबाइल के कारण काफी आसानी हो गई है। समय-समय पर सूचना मिलने के कारण ठीक वक्त पर पहुंच जाते हैं। विवाह मंडप में वे सारी तैयारी पहले से ही कराए रहते हैं और पंडितजी की `इंट्री´ बालीवुडिया फिल्मों के `मेन हीरो´ की तरह होती है। चौका पर बैठते ही इस बात की चिंता नहीं रहती कि तैयारी क्या हुई है। दनदनाते हुए मंत्रोच्चार शुरू कर देते हैं।

Thursday, April 24, 2008

बढ़ती जा रही है धड़कन ...

वाराणसी खंड निर्वाचन क्षेत्र से स्नातक विधायक के चुनाव को लेकर जिले में चहलकदमी तेज हो गई है। वक्त के साथ ही समर्थकों की धड़कने बढ़ती जा रही हैं। भाजपाई इस सीट पर अपना कब्जा बरकरार रखने के लिए कटिबद्ध है, तो कांगे्रस और सपा के लोग भी सीट हथियाने के लिए कोई कसर छोड़ने को तैयार नहीं।28 अप्रैल को होने वाले स्नातक एमएलसी चुनाव को लेकर तैयारियां तेज हो गईं हैं। सभी प्रत्याशियों के समर्थक मतदाताओं तक अपनी पहुंच बनाने में जुटे हैं। जीत-हार के दावों के साथ जोड़-तोड़ भी चल रही है। भारतीय जनता पार्टी ने निवर्तमान विधायक केदार नाथ सिंह को ही मैदान में उतारा है। पिछले चुनाव में वे द्वितीय वरीयता के मत से विजयी हुए थे। पार्टी के वोट बैंक के सहारे भाजपाई अपनी जीत सुनिश्चित मान रहे हैं। गत चुनाव में दूसरे स्थान पर रहे पूर्व स्नातक एमएलसी और वाराणसी के सांसद डा. राजेश मिश्र के भाई बृजेश मिश्रा उनको इस बार भी कड़ी टक्कर दे रहे हैं। बैंक यूनियन के नेता श्री मिश्रा को बैंककर्मियों के सहयोग की भी उम्मीद है। कांगे्रस कार्यकर्ता भी लगातार जनसंपर्क में लगे हुए हैं। कांगे्रस के सूचना का अधिकार टास्क फोर्स ने बाबा हरदेव सिंह के पक्ष में हवा बनाना शुरू कर दिया है। पूर्व प्रशासनिक अधिकारी बाबा हरदेव के साथ नौकरशाहों का समर्थन भी मिल रहा है। प्रबुद्ध तबका उनके साथ लगा हुआ है। वहीं एससी कालेज छात्र संघ के पूर्व अध्यक्ष राम अवध शर्मा को छात्र-नौजवानों का सहयोग मिल रहा है। पूर्वांचल छात्र संघर्ष समिति के कार्यकर्ता भी राम अवध के पक्ष में हवा बनाने के लिए कई जनपदों का भ्रमण कर चुके हैं। समाजवादी पार्टी ने अबकी बार मोहरा बदल कर मैदान मारने की कोशिश की है। पार्टी कार्यकर्ता सूबेदार सिंह की जीत सुनिश्चित करने में लगे हुए हैं।

Wednesday, April 23, 2008

तो ये है बलिया की शिक्षा व्यवस्था !

बलिया को लोग बागी का उदाहरण देते हैं। उन्नीस सौ बयालिस की क्रांति और आजादी का ढिंढोरा पीटते -पीटते 66 साल बीत गए। लेकिन बलिया में भ्रष्टाचार इन दिनों जोरों पर है। पहले तो यहां के इंटर कालेजों के मैनेजरों और प्रिंसिपलों ने घूस लेकर लोगों को अध्यापक बनाने का वादा कर दिया। जिले के नामी-गिरामी नेता और पूर्व मंत्रियों के कब्जे वाले कॉलेजों और स्कूलों तक में ऐसा हुआ। अध्यापक तैनात भी कर दिए गए। उन्हें तनख्वाह दी भी गई- लेकिन ये तनख्वाह पहले से काम कर रहे अध्यापकों की भविष्यनिधि से गैरकानूनी तरीके से निकाल कर दी गई। जब इसका भंडाफोड़ हुआ तो गोरखधंधा रूका। अवैध तरीके से काम कर रहे सैकड़ों प्रशिक्षित बेरोजगार अध्यापक फिर से बेरोजगार हो गए और उनकी घूस दी हुई रकम भी डूब गई। लेकिन घूस लेने वाले अब भी अपनी चमकदार टाटा सूमो या बलेरो से बलिया का चक्कर लगाते नजर आ रहे हैं। अब ऩई बात ये है कि प्राइमरी स्कूलों में भी ऐसा ही कुछ गोरखधंधा चल रहा है। सूत्रों से पता चला है कि जिले भर में कम से कम पंद्रह प्राइमरी स्कूल अध्यापक बिना काम किए वेतन ले रहे हैं। कोई दिल्ली में पढ़ाई या रिसर्च कर रहा है तो कोई महिला अध्यापक अपने पति के साथ दूसरे राज्य में है। लेकिन उन लोगों का वेतन हर महीने मिल रहा है। सूत्रों का कहना है कि बेसिक शिक्षा अधिकारी के दफ्तर की मिली भगत से ये सारा गोरखधंधा जारी है। कहा तो ये जा रहा है कि इसके लिए जिला बेसिक शिक्षा अधिकारी को हर महीने पगार की एक निश्चित रकम दी जाती है।

Sunday, April 6, 2008

जड़ समाज में बदलाव कब !

उमेश चतुर्वेदी
सन 2000 की बात है। दीपावली के ठीक पहले मैं जनता दल यूनाइटेड अध्यक्ष शरद यादव के एक कार्यक्रम की कवरेज के लिए मैं आज़मगढ़ गया था। उस वक्त मैं दैनिक भास्कर के दिल्ली ब्यूरो में बतौर संवाददाता काम करता था। अपना काम खत्म करने के बाद हम पत्रकारों की टोली सड़क मार्ग के जरिए वाराणसी लौट आई। वहां से बाकी लोग आज के कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता मोहन प्रकाश के साथ दिल्ली लौट आए। लेकिन मैं बलिया जिले के अपने गांव जाने का लोभ संवरण नहीं कर पाया। वाराणसी से सुबह करीब पौने पांच बजे एक पैसेंजर ट्रेन चलती है। उसमें सवार होने स्टेशन पहुंचा तो भारी भीड़ से साबका हुआ। किसी तरह खड़े होने की जगह मिली। ट्रेन में भीड़ इतनी की पैर रखने को जगह नहीं...हर स्टेशन पर रूकते –रूकाते ट्रेन करीब दो घंटे बाद गाजीपुर पहुंची। वहां भी भीड़ का एक रेला ट्रेन में चढ़ने के लिए उतावला। इसी बीच एक औरत छठ का डाली-सूपली लिए हमारे डिब्बे में चढ़ी। उसे चढ़ाने उसके दो किशोर उम्र से युवावस्था की ओर बढ़ रहे बेटे आए थे। उन्हें अपनी मां को ट्रेन में सम्मानित जगह दिलानी थी और अपनी ताकत भी दिखानी थी। इसका मौका उन्हें मिल भी गया- सामान रखने के रैक पर एक लड़का किसी तरह सिमटा-लेटा दिख गया। उसे लड़कों ने खींच कर नीचे गिरा लिया और बिना पूछे-जांचे उसकी लात-जूतों और बेल्ट से पिटाई शुरू कर दी। इस बीच जगह बन गई और अपनी मां को बिठा कर वे चलते बने। ट्रेन खुलने के बाद पता चला कि मां तो अकेले ही छपरा में अपने मायके जा रही है। अब पिट चुके लड़के और उसके साथ चल रहे बड़े भाई ने कहा कि अब मां जी अगर आपको हम ट्रेन से फेंक दें तो ...उस औरत के पास कोई जवाब नहीं था। थोड़ी देर पहले तक अपने बेटों की वीरता पर बागबाग होने वाली उस औरत को मानना पड़ा कि उसके बेटों ने गलती की थी।
दरअसल ऐसे नजारे पूरे पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार में दिख जाएंगे। जहां दिखावे के लिए अपनी ठसक बनाए और बचाए रखने की कोशिश की जाती है। लोगों को परीक्षाओं में नकल कराने से लेकर लाइन से पहले टिकट लेने तक ये ठसक हर जगह दिखती है। इसके लिए मार-पिटाई भी करने से लोगों को गुरेज नहीं होता। ठसक और भदेसपन का ये नजारा इन दिनों पूर्वांचल में बैंकों के एटीएम में भी दिख रहा है। आमतौर पर एटीएम में एक आदमी के अलावा दूसरे के जाने की मनाही है। लेकिन बलिया और गाजीपुर ही क्या – जो इस नियम पर अमल कर सके। वहां लोग एटीएम के एयरकंडिशनर की हवा खा रहे होते हैं और पैसा निकालने वाला पसीने से तरबतर होते हुए पैसा निकाल रहा होता है। इस खतरे के साथ कि कभी –भी उसका पैसा कहीं छीना जा सकता है या उसका पिन चुराया जा सकता है। पूर्वांचल और बिहार के रेलवे स्टेशनों पर आपको एक और नजारा दिख सकता है। यहां महिलाओं के लिए बने वेटिंग रूमों में पुरूष बाकायदा आराम फरमाते दिख जाते हैं। रेलवे प्रशासन भी उन्हें नहीं रोकता। वहां आने वाली महिलाओं पर इन पुरूषों की नजरें कैसी रहती होंगी – इसका अंदाजा लगाना आसान होगा। बलिया में जब भी मैं खुद अपनी पत्नी के साथ रेलवे स्टेशन पर पहुंचा हूं तो यही नजारा मिला है और हर बार रेलवे वालों को धमका कर महिला वेटिंग रूम खाली कराना पड़ा है।
पढ़ाई-लिखाई से तो इस इलाके के अधिसंख्य छात्रों का साबका लगातार दूर होता जा रहा है। ऐसे में बीए और एमए करके ये लोग पिता और भाई की सहायता से नकल के सहारे पास होकर दिल्ली-मुंबई पहुंचते हैं तो उनके हाथ ज्यादातर दरवानी और सिक्युरिटी गार्ड की ही नौकरी लगती है। लोगों को सलाम करते जिंदगी गुजर जाती है। लेकिन तुर्रा ये कि जब ये ही लोग अपनी माटी की ओर लौटते हैं तो उनकी ठसक और अकड़ वापस लौट आती है। उनकी ये ठसक देख दिल्ली-मुंबई का आईएएस भी शरमा जाए।
क्रमश: