Sunday, April 6, 2008

जड़ समाज में बदलाव कब !

उमेश चतुर्वेदी
सन 2000 की बात है। दीपावली के ठीक पहले मैं जनता दल यूनाइटेड अध्यक्ष शरद यादव के एक कार्यक्रम की कवरेज के लिए मैं आज़मगढ़ गया था। उस वक्त मैं दैनिक भास्कर के दिल्ली ब्यूरो में बतौर संवाददाता काम करता था। अपना काम खत्म करने के बाद हम पत्रकारों की टोली सड़क मार्ग के जरिए वाराणसी लौट आई। वहां से बाकी लोग आज के कांग्रेस के राष्ट्रीय प्रवक्ता मोहन प्रकाश के साथ दिल्ली लौट आए। लेकिन मैं बलिया जिले के अपने गांव जाने का लोभ संवरण नहीं कर पाया। वाराणसी से सुबह करीब पौने पांच बजे एक पैसेंजर ट्रेन चलती है। उसमें सवार होने स्टेशन पहुंचा तो भारी भीड़ से साबका हुआ। किसी तरह खड़े होने की जगह मिली। ट्रेन में भीड़ इतनी की पैर रखने को जगह नहीं...हर स्टेशन पर रूकते –रूकाते ट्रेन करीब दो घंटे बाद गाजीपुर पहुंची। वहां भी भीड़ का एक रेला ट्रेन में चढ़ने के लिए उतावला। इसी बीच एक औरत छठ का डाली-सूपली लिए हमारे डिब्बे में चढ़ी। उसे चढ़ाने उसके दो किशोर उम्र से युवावस्था की ओर बढ़ रहे बेटे आए थे। उन्हें अपनी मां को ट्रेन में सम्मानित जगह दिलानी थी और अपनी ताकत भी दिखानी थी। इसका मौका उन्हें मिल भी गया- सामान रखने के रैक पर एक लड़का किसी तरह सिमटा-लेटा दिख गया। उसे लड़कों ने खींच कर नीचे गिरा लिया और बिना पूछे-जांचे उसकी लात-जूतों और बेल्ट से पिटाई शुरू कर दी। इस बीच जगह बन गई और अपनी मां को बिठा कर वे चलते बने। ट्रेन खुलने के बाद पता चला कि मां तो अकेले ही छपरा में अपने मायके जा रही है। अब पिट चुके लड़के और उसके साथ चल रहे बड़े भाई ने कहा कि अब मां जी अगर आपको हम ट्रेन से फेंक दें तो ...उस औरत के पास कोई जवाब नहीं था। थोड़ी देर पहले तक अपने बेटों की वीरता पर बागबाग होने वाली उस औरत को मानना पड़ा कि उसके बेटों ने गलती की थी।
दरअसल ऐसे नजारे पूरे पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार में दिख जाएंगे। जहां दिखावे के लिए अपनी ठसक बनाए और बचाए रखने की कोशिश की जाती है। लोगों को परीक्षाओं में नकल कराने से लेकर लाइन से पहले टिकट लेने तक ये ठसक हर जगह दिखती है। इसके लिए मार-पिटाई भी करने से लोगों को गुरेज नहीं होता। ठसक और भदेसपन का ये नजारा इन दिनों पूर्वांचल में बैंकों के एटीएम में भी दिख रहा है। आमतौर पर एटीएम में एक आदमी के अलावा दूसरे के जाने की मनाही है। लेकिन बलिया और गाजीपुर ही क्या – जो इस नियम पर अमल कर सके। वहां लोग एटीएम के एयरकंडिशनर की हवा खा रहे होते हैं और पैसा निकालने वाला पसीने से तरबतर होते हुए पैसा निकाल रहा होता है। इस खतरे के साथ कि कभी –भी उसका पैसा कहीं छीना जा सकता है या उसका पिन चुराया जा सकता है। पूर्वांचल और बिहार के रेलवे स्टेशनों पर आपको एक और नजारा दिख सकता है। यहां महिलाओं के लिए बने वेटिंग रूमों में पुरूष बाकायदा आराम फरमाते दिख जाते हैं। रेलवे प्रशासन भी उन्हें नहीं रोकता। वहां आने वाली महिलाओं पर इन पुरूषों की नजरें कैसी रहती होंगी – इसका अंदाजा लगाना आसान होगा। बलिया में जब भी मैं खुद अपनी पत्नी के साथ रेलवे स्टेशन पर पहुंचा हूं तो यही नजारा मिला है और हर बार रेलवे वालों को धमका कर महिला वेटिंग रूम खाली कराना पड़ा है।
पढ़ाई-लिखाई से तो इस इलाके के अधिसंख्य छात्रों का साबका लगातार दूर होता जा रहा है। ऐसे में बीए और एमए करके ये लोग पिता और भाई की सहायता से नकल के सहारे पास होकर दिल्ली-मुंबई पहुंचते हैं तो उनके हाथ ज्यादातर दरवानी और सिक्युरिटी गार्ड की ही नौकरी लगती है। लोगों को सलाम करते जिंदगी गुजर जाती है। लेकिन तुर्रा ये कि जब ये ही लोग अपनी माटी की ओर लौटते हैं तो उनकी ठसक और अकड़ वापस लौट आती है। उनकी ये ठसक देख दिल्ली-मुंबई का आईएएस भी शरमा जाए।
क्रमश:

4 comments:

  1. बलीया का ब्लोग देख कर बहुत अच्छा है। मै भी वहीं का हुं(बासडीह से चार की.मी दुर)
    अभी दील्ली मे हुं करीब आठ साल से।
    बलीया और गांव की बहुत याद आती है ईसी लीये ऎसे लींक ढूंढता रहता हुं

    मन मे,दील मे,हर पल,पल पल, अपने गांव की याद आती है। जब भी जाता हुं वहां तो मन मे बलीया स्टेसन याद आता रहता है। बलीया स्टेसन का पुरा नक्सा याद है।

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  2. बहुत अच्छा ब्लाग है। पहली बार लफ्फाजी के इतर किसी ब्लाग में जिंदगी दिखी है। आप जम कर लिखिए मैं आपके ब्लाग की सदस्य बनना चाहती हूं। अमेरिका में पढ़ाती हूं मालदा (बंगाल) की रहने वाली हूं और जो भी जानकारी चाहें मुझसे बेझिझक मांग सकते हैं।

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  3. उमेश चतुर्वेदीJune 8, 2008 at 3:24 AM

    नीलोफर जी, आपकी हौसलाअफजाई से मैं अनुग्रहीत हुआ हूं। आपसे भी लिखवाना चाहता हूं। अपना ईमेल आईडी भेजें तो इसका सदस्य बनाना आसान होगा।

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  4. aaj pehli baar apke blog ko dekha maine......padh kar jitni khushi hui soch kar utni hi taklif.sach to yeh hai ki ballia ke logon me ab baagi pravriti nahi dikhti....shayad wahan ke log samjhautawadi ho gaye hain ...aur nirantar hote jaa rahe hain ..
    bijli ki kami jaisi samasya , jo ki wahan ek aam(balki aam se bhi kuchh kam hi baat hai)baat hai ke liye bhi log yeh kar shant ho jate hain ki koi kuchh nahi kar raha ...bina is baat per dhyan diye ki we khud bhi kuchh nahi kar rahe hain.
    abhi ballia me us 'baagi ballia'ko wapas le kar aana hi ek badi uplabdhi hogi....
    lekin iske baad bhi ballia me aur ballia ke logon me apekshayen badhi hain..shayad ye badlaw ki taraf badhte kadmon ka agaz ho...kash yehi ho.
    upasana pathak,korba(multah ballia)

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