Monday, May 19, 2008

आम भागीदारी से गांवों की तस्वीर बदलता युवा तुर्क


उमेश चतुर्वेदी
चौरासी साल की उम्र में आम आदमी थककर जिंदगी के आखिरी वक्त को रामनाम के सहारे काटने लगता है। पिछली सदी के साठ और सत्तर के दशक में युवा तुर्क के नाम से भारतीय राजनीति में विख्यात रहे मोहन धारिया उनमें से नहीं हैं। उम्र के इस पड़ाव पर भी वे पूरी शिद्दत से जुटे हुए हैं। ये उनकी सक्रियता और कुशल नेतृत्व का ही असर है कि इस समय ग्रामीण भारत के स्वयं सहायता समूहों के परिसंघ में छह हजार से ज्यादा एनजीओ एक छतरी के नीचे काम कर रहे हैं। राजधानी दिल्ली में 25 अप्रैल को जब इसी संगठन सीएनआरआई का तीसरा राष्ट्रीय सम्मेलन हुआ तो उसके उद्घाटन सत्र में ग्रामीण विकास मंत्री रघुवंश प्रसाद सिंह को कहना पड़ा कि अब सरकारी मशीनरी और सरकार को गांवों में विकास कार्य कराने के स्वयं सहायता समूहों के पास आना पड़ेगा।
ग्रामीण भारत के स्वयं सहायता समूहों के परिसंघ की स्थापना तीन साल पहले कुरूक्षेत्र विश्वविद्यालय के गुरूकुल में मोहन धारिया ने की।
इस देश में करीब 29 लाख एनजीओ हैं जो ग्रामीण से लेकर शहरी भारत में अपनी-अपनी तरह से विकास का काम कर रहे हैं। वैसे भी एनजीओ का नाम आते ही आम लोगों के सामने सहायता के नाम पर पैसा बनाने वाले जेबी संगठनों की ही तस्वीर उभरती है। इसके लिए स्वयं एनजीओ का गोरखधंधा ही जिम्मेदार है। राजनीति और अफसरशाही में कई ऐसे लोग मिल जाएंगे- जिन्होंने एनजीओ के नाम पर जेबी संगठन बनाकर मलाई काट रहे हैं। मोहन धारिया का नाम उसूलों की राजनीति के लिए जाना जाता रहा है। ऐसे में उनके सामने ये चुनौती है कि उनके संगठन पर ऐसे दाग ना लगें। इसके लिए उन्होंने चाकचौबंद व्यवस्था करने की कोशिश की है। उनका कहना है कि सीएनआरआई के गठन के दिन ही ये तय कर दिया गया कि इसका सदस्य बनने वाले एनजीओ को पारदर्शी तरीके से काम करना होगा और अपने आय-व्यय और काम करने का ब्यौरा हर साल पेश करना होगा। इस संगठन के छह हजार से ज्यादा सदस्य होने से साबित होता है कि अब भी देश में काम करने वाले और उसूलों वाले लोग कम नहीं हैं। सीएनआरआई के लिए उन्होंने तय कर दिया है कि एनजीओ का काम ठेकेदारी करना नहीं है- बल्कि उसका मानिटरिंग करना है। राजधानी दिल्ली में 25 अप्रैल से 27 अप्रैल तक चले इसके तीसरे सालाना सम्मेलन में इसकी बार-बार चर्चा हुई। ग्रामीण विकास मंत्री रघुवंश प्रसाद सिंह ने अपने उद्घाटन भाषण में इससे जहां सहमति जताई- वहीं पूर्व ग्रामीण विकास मंत्री वेंकैया नायडू तक ने एनजीओ को ये भूमिका देने की जोरदार वकालत की।

साठ और सत्तर के दशक में भारतीय राजनीति में युवा तुर्क के तौर पर विख्यात पांच नेताओं में से अब सिर्फ मोहन धारिया ही सक्रिय हैं। अपनी समाजवादी सोच के साथ कांग्रेस के अंदर काम करने वाले बाकी चार युवा तुर्क रामधन, ओम मेहता, कृष्णकांत और चंद्रशेखर इस दुनिया में नहीं हैं। इंदिरा गांधी ने जब देश पर आपातकाल थोप दिया तो उसका विरोध करने वाले लोगों में ये युवा तुर्क ही थे। लेकिन इंदिरा गांधी ने उनके विरोध को तवज्जो नहीं दी और उन्हें भी जेल के सींखचों के भीतर पहुंचाने में देर नहीं लगाई। जबकि इसके ठीक पहले इन युवा तुर्कों की ही रिपोर्ट पर उसी इंदिरा गांधी ने राजाओं के प्रिवीपर्स खत्म किए, 14 बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया था। जब जनता पार्टी बनी तो ये युवा तुर्क कांग्रेस को छोड़ जनता पार्टी में शामिल हो गए। चंद्रशेखर तो अध्यक्ष ही चुने गए। मोहन धारिया उसके महासचिव थे। लेकिन जनता पार्टी का प्रयोग जब असफल हुआ तो मोहन धारिया को बहुत चोट पहुंची। इसके बाद से ही उन्होंने राजनीति की दुनिया को अलविदा कह दिया और बनराई नाम का संगठन बना कर पर्यावरण के लिए जागरूकता फैलाने के काम में जुट गए। जनता पार्टी का प्रयोग असफल रहने की पीड़ा उनके चेहरे अब भी उभर आती है। उन्हें ये कहने से गुरेज नहीं है कि उन्होंने यानी जनता पार्टी के नेताओं ने जनता से धोखा किया।
1972 में स्वीडन की राजधानी स्टॉकहोम में पहला पृथ्वी सम्मेलन हुआ था। जिसमें धरती के लगातार बदल रहे पर्यावरण को लेकर दुनियाभर के नेताओं और संगठनों ने चिंताएं जताईं थीं। उस सम्मेलन में बतौर सरकारी प्रतिनिधि मोहन धारिया भी शामिल हुए थे। तभी से सृजनशीलता की राजनीति का बीज उनके मन में पड़ गया था। आपातकाल के दिनों की 16 महीने के जेल प्रवास के दौरान इसे लेकर खासा विचार-मनन किया। और जनता पार्टी की सरकार जब गिर गई तो उन्होंने पर्यावरण को लेकर नई जागरूकता फैलाने और उसे जमीनी हकीकत बनाने में जुट गए। इसे स्वयं सहायता समूह वनराई का 1982 में गठन करके मूर्त रूप दिया। आज ये संगठन 250 गांवों के लोगों को गांधी के सपने के मुताबिक आत्मनिर्भर बना चुका है। जहां आधुनिक तरीकों से खेती होती है, पशुपालन का पूरा फायदा उठाने के लिए वैज्ञानिक तरीकों को अख्तियार किया गया है। इन गांवों की गलियां इनके ही मानव मल और गोबर गैस के जरिए बनाई गई बिजली के जरिए रात को रौशन होती रहती हैं। मोहन धारिया कहते हैं कि दादरा नागर हवेली की राजधानी सिलवासा के आसपास के गांवों की पूरी तस्वीर बदल गई है। धारिया का दावा है कि वनराई का काम इतना सफल रहा है कि पूना के आसपास के कई गांवों के वे लोग अपने घरों को वापस लौट आए हैं – जो मुंबई की झुग्गियों में बदतर जिंदगी गुजार रहे थे। उनका काम महाराष्ट्र के बाहर भी फैलता जा रहा है। हाल ही में उन्होंने हरिद्वार के बगल में पांच गांवों की तस्वीर बदलने का जिम्मा उठाया है।
दुनिया में पर्यावरण को लगातार हो रहे नुकसान को रोकने और बंजर भूमि को उपजाऊ बनाने के लिए आज साझा वन प्रबंध को अपनाया जा रहा है। योजना आयोग का उपाध्यक्ष रहते मोहन धारिया ने इस विचार को मूर्त रूप दिया था। उनका ये विचार कितना सफल है – इसी का असर है कि 1992 में राष्ट्रीय बंजर भूमि विकास बोर्ड ने इसे अपना लिया। धारिया कहते हैं कि भले ही अभी-भी पेड़ों और जंगलों की गैरकानूनी कटाई हो रही हो- लेकिन इस प्रबंध का ही असर है कि एक करोड़ तिहत्तर लाख हेक्टेयर से ज्यादा जमीन पर वन लगाए जा चुके हैं। जिसका फायदा एक लाख 64 हजार 63 गांवों को फायदा हुआ है। इसी के जरिए करीब नौ लाख आदिवासी परिवारों की आय बढ़ी है और उनका जीवन स्तर ऊंचा उठा है। धारिया कहते हैं पंद्रह साल की ये कोई कम बड़ी उपलब्धि नहीं है।
आज भी देश की पैंसठ फीसदी आबादी गांवों में रहती है। बिना इनके विकास के देश की की तरक्की की कोई मुकम्मल तस्वीर नहीं उभर सकती। शहरी मध्य वर्ग को लुभाने वाली बड़ी-बड़ी कंपनियों की गांवों के विकास में कोई सीधी भूमिका नहीं है। लेकिन वनराई के प्रयासों से जुआरी ग्रुप और हिंदुस्तान लीवर जैसी कंपनियां भी कुछ गांवों के विकास में दिलचस्पी ले रही हैं। लेकिन ये कोशिशें ऊंट के मुंह में जीरे के समान हैं। तकलीफ तो इस बात की है कि युवा तुर्क के ग्रुप के तीन नेता उत्तर भारतीय ही थे। लेकिन चंद्रशेखर इनमें सबसे ज्यादा असरदार रहे। लेकिन मोहन धारिया को ये कहने में गुरेज नहीं है कि उनके दोस्त ने अपने इलाके के गांवों के विकास में उनके अनुरोध के बावजूद कोई दिलचस्पी नहीं ली। अन्यथा बदहाली और भ्रष्टाचार के लिए बदनाम उत्तर भारत – खासतौर पर उत्तर प्रदेश और बिहार की बदहाली की तस्वीर बदलने में ये प्रयास सकारात्मक भूमिका निभा सकता था।
इतिहास के इस युवा तुर्क का मानना है कि सरकार साथ ना दे तो भी लोगों के चेहरे पर मुस्कान लाई जा सकती है। बस जरूरत है लोगों को भरोसा दिलाने की। लोगों को एक बार भरोसा हो गया कि सामने वाला सचमुच उनके साथ काम करेगा – उनके सुखदुख का ख्याल रखेगा, वे गोवर्धन पर्वत में टेक लगाने के लिए साथ खड़े होने में देर नहीं लगाएंगे।

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