Tuesday, August 5, 2008

भोजपुरी-मैथिली अकादमी का उद्घाटन

उमेश चतुर्वेदी
दिल्ली विधानसभा की चुनावी आहट के बीच आखिरकार भोजपुरी मैथिली अकादमी का शुभारंभ हो ही गया। दिल्ली के श्रीराम सेंटर में पांच अगस्त की शाम जिस तरह पूरबिया लोग जुटे, उससे साफ है कि राजधानी की सांस्कृतिक दुनिया में अब भदेसपन के पर्याय रहे लोग अपनी छाप छोड़ने के लिए तैयार हो चुके हैं। राजधानी में चालीस लाख के करीब भोजपुरी और पूरबिया मतदाता हैं। जाहिर है दिल्ली सरकार की इस पर निगाह है। एक साथ मतदाताओं के इतने बड़े वर्ग को नजरअंदाज कर पाना आसान नहीं होगा। लिहाजा उन्हें भी एक अकादमी दे दी गई है। इस अकादमी के उद्घाटन समारोह की सबसे उल्लेखनीय चीज रही संजय उपाध्याय के निर्देशन में पेश विदेसिया की प्रस्तुति। भोजपुरी के भारतेंदु भिखारी ठाकुर की इस अमर रचना को संजय की टीम ने जबर्दस्त तरीके से पेश किया। खासतौर पर प्राण प्यारी की भूमिका में शारदा सिंह और बटोही की भूमिका में अभिषेक शर्मा का अभिनय शानदार रहा।
लेकिन इस उद्घाटन में खटकने वाली बात ये रही कि पूरी तरह सांस्कृतिक इस मंच को सियासी रंग देने की पुरजोर कोशिश की गई। दिल्ली की मुख्यमंत्री शीला दीक्षित अपने निर्धारित वक्त से करीब तीन घंटे देर से पहुंचीं। और आखिर में मंच पर वे ही वे रहीं। अगर किसी ने उनका साथ दिया तो अकादमी के सदस्यों और उपाध्यक्ष ने। सांस्कृतिक मंच को सियासी को सियासी रंग देने मे आगे रहे अकादमी के सदस्य अजित दुबे - उन्होंने एक तरह से मौजूद दर्शकों से अपील ही कर डाली कि जो लोग आपके मान सम्मान का खयाल करते हैं - उनका खयाल आप भी रखिए। यानी शीला दीक्षित को नवंबर के विधानसभा चुनावों में वोट दीजिए।
उद्घाटन समारोह में एक बात और बार-बार खटकी। इस समारोह को भोजपुरी या मैथिली से ना जोड़कर बिहार से जोड़ दिया गया। भोजपुरी भाषा संस्कृति सिर्फ बिहार में नहीं है - बल्कि बस्ती से लेकर गोरखपुर, बलिया होते हुए बनारस तक उत्तर प्रदेश का एक बड़ा इलाका भोजपुरी भाषी है और राजधानी में वहां के बाशिंदे भी बहुत हैं। भोजपुरी का पर्याय बिहार नहीं है। अकादमी को ये सोचना होगा - अन्यथा आने वाले दिनों कई तरह की समस्याएं उठ खड़ी होंगी।

Friday, August 1, 2008

चला गया गठबंधन राजनीति का चाणक्य


उमेश चतुर्वेदी
राजनीति की दुनिया में शिखर पर हों और अदना से पत्रकार के फोन पर भी सामने आ जाएं - कम से कम आज की सियासी दुनिया में ऐसा कम ही नजर आता है। लेकिन हरिकिशन सिंह सुरजीत इनसे अलग थे। उनके गुजरने के बाद भी उनके घर के फोन की घंटी तो बजेगी - लेकिन खास अंदाज में ये..स की आवाज सुनाई नहीं देगी। सुरजीत जब तक स्वस्थ रहे, अपना फोन खुद ही उठाते थे। खास ढंग से येस की आवाज सुनाई देते ही एक आश्वस्ति बोध जागता था कि दार जी इंटरव्यू के लिए तैयार हो जाएंगे। ऐसे कई मौके आए भी - जब उन्होंने इंटरव्यू देने से इनकार कर दिया, लेकिन कभी बुरा नहीं लगा।
दैनिक भास्कर के राजनीतिक ब्यूरो में काम करते वक्त सबसे जूनियर होने के नाते सीपीएम और सीपीआई मेरी ही बीट थी। आज का तेज बढ़ता अखबार जब तक मध्यप्रदेश और राजस्थान की ही सीमा में रहा,सीपीएम और सीपीआई से जुड़ी खबरों पर उसका न तो ज्यादा ध्यान था, ना ही उसकी जरूरत थी। नब्बे के दशक के आखिरी दिनों में इस बीट में कोई ग्लैमर भी नहीं था, लिहाजा तब के दैनिक भास्कर के वरिष्ठ और नामी रिपोर्टर शायद ही कभी दोनों पार्टियों की ओर रूख करते थे। ऐसे में नया होने के चलते मुझे ही ये बीट मिली। तभी मैंने जाना कि जिसे भारतीय राजनीति का चाणक्य कहा जाता है, वह निजी जिंदगी में कितना सहज है। ये स्थिति सीपीआई के महासचिव एबी वर्धन के भी साथ है। भारतीय राजनीति का चाणक्य उन्हें ऐसे ही नहीं कहा जाता था। गैर कांग्रेसवाद की लहर पर सवार विपक्ष को जब 1996 के चुनावों में बहुमत नहीं मिला तो यह सुरजीत ही थे, जिनकी वजह से देवेगौड़ा की अगुआई में कांग्रेस और वाम समर्थित सरकार बनी। जब देवेगौड़ा से नाराज होकर कांग्रेस अध्यक्ष सीताराम केसरी ने संयुक्त मोर्चा की सरकार से समर्थन वापस ले लिया, तब भी सुरजीत ने हार नहीं मानी और इंद्रकुमार गुजराल की अगुआई में दूसरी सरकार बनाई। तब उनका एक उद्देश्य सांप्रदायिकता के नाम पर किसी भी कीमत पर भारतीय जनता पार्टी को सत्ता में नहीं आने देना था। कहना न होगा , सुरजीत इसमें कामयाब रहे।
लेकिन दुर्भाग्यवश इंद्रकुमार गुजराल की भी सरकार नहीं टिक पाई। 1998 में मध्यावधि चुनाव हुए और भारतीय जनता पार्टी की अगुआई में एनडीए को बहुमत मिला। सुरजीत की तमाम कोशिशों के बावजूद अटल बिहारी वाजपेयी प्रधानमंत्री बने। लेकिन 1999 में जब एक वोट से वाजपेयी सरकार गिर गई तो गैर कांग्रेसवाद का झंडा बुलंद करने वाले सुरजीत ने सोनिया गांधी को प्रधानमंत्री बनवाने की पुरजोर लेकिन नाकामयाब कोशिश की। दरअसल उनके ही चेले मुलायम सिंह ने कांग्रेस का साथ देने से इनकार कर दिया था। तब सुरजीत की सोनिया लाइन की सीपीएम में भी जमकर मुखालफत हुई। कई सांसदों ने खुद मुझसे सुरजीत की इस लाइन का विरोध जताया था। यहां यह ध्यान देने की बात है कि इन्हीं सुरजीत ने पार्टी के तेजतर्रार सांसद सैफुद्दीन चौधरी को 1996 में पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया था। उनका गुनाह सिर्फ इतना था कि 1995 में हुए पार्टी के चंडीगढ़ कांग्रेस में उन्होंने सांप्रदायिकता से लड़ने के लिए सीपीएम को कांग्रेस की लाइन पर चलने का सुझाव दिया था। तब पार्टी सैफुद्दीन चौधरी के इस सुझाव को पचा नहीं पाई और उनका टिकट तक काट दिया था। आज जब सोमनाथ चटर्जी को सीपीएम से निकाल दिया गया है – एक बार फिर सैफुद्दीन चौधरी की लोगों को याद आ रही है। लेकिन तीन ही साल में सुरजीत बदल गए।
तब सुरजीत भले ही कामयाब नहीं रहे। लेकिन उनकी बनाई नींव पर ही 2004 में एनडीए का इंडिया शाइनिंग का नारा ध्वस्त हो गया और संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार बनी। तब सुरजीत ही थे कि सांप्रदायिकता विरोध के बहाने सोनिया गांधी के घर डिनर पर समाजवादी पार्टी के महासचिव अमर सिंह को लेकर गए थे। यह बात दीगर है कि तब सोनिया ने सुरजीत की उपस्थिति के बावजूद अमर सिंह से सीधे मुंह बात भी नहीं किया था। यह संयोग ही है कि सुरजीत की पार्टी अब सोनिया की अगुआई वाली कांग्रेस से अलग हो गई है और अमर सिंह पूरी पार्टी समेत कांग्रेस के साथ हैं।
वामपंथी राजनीति के इस महायोद्धा से मैंने मार्च 2000 में जो इंटरव्यू किया था, वह बंगला और मलयालम के पत्रकारों तक को आज भी याद है। दैनिक हिंदुस्तान में 26 मार्च 2000 को यह इंटरव्यू छपा था। इसी इंटरव्यू में उन्होंने बतौर सीपीएम महासचिव पहली बार स्वीकार किया था कि बुद्धदेव भट्टाचार्य ही ज्योति बसु के उत्तराधिकारी होंगे। इस इंटरव्यू में मैंने उनसे कई तीखे सवाल पूछे थे। जिसमें एक सवाल था कि आपके यहां जब तक भगवान नहीं हटाता, तब तक सीपीएम महासचिव के पद से कोई नहीं हटता। ऐसे तीखे सवाल का जवाब भी उन्होंने हंसते हुए दिया था। लेकिन उन्होंने मेरे इस सवाल को दो हजार पांच में ही झुठला दिया। जब प्रकाश करात को सीपीएम की बागडोर थमा दी गई।
अब सुरजीत हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन गठबंधन राजनीति के इस चाणक्य की याद हमेशा आती रहेगी।