Friday, November 13, 2009

बलिया के चारबज्जी रेल की याद


उमेश चतुर्वेदी
1984 के जुलाई महीने की उमस भरी गर्मी में राहत की उम्मीद लेकर मैं अपने एक सहपाठी मित्र की दुकान पर पहुंचा। बलिया स्टेशन पर सर्वोदय बुक स्टाल नाम की आज भी ये दुकान वैसे ही खड़ी है – जैसी अस्सी के दशक में थी। तब मैं ग्यारहवीं कक्षा का छात्र था और जिला मुख्यालय से रोज ब रोज के साबका ने किशोर आंखों में साहित्य और पत्रकारिता के लिए अनजान से सपने रोपने शुरू कर दिए थे। ऐसे में मेरे सहपाठी की दुकान मेरे लिए ज्यादा मुफीद थी। रोजाना छोटी लाइन की छुकछुक करती भाप इंजन से चलने वाली ट्रेनों के सहारे हमें अपने इंटर कालेज में आना होता था और वापसी भी ट्रेन से करनी होती। ऐसे में स्टेशन की भीड़भरी गर्मी में ये दुकान मुझे दो तरह की राहत देती थी- पंखे के नीचे सुकून से बैठने और मुफ्त में मनचाही किताबें पढ़ने की..यहां मैंने न जाने कितनी किताबें पढ़ी, साहित्य, ज्ञान-विज्ञान, पत्रकारिता और सेक्स...सबकुछ खैर....इसकी चर्चा फिर कभी .....

इसी दौरान किताबों के नए आए सेट की एक किताब पर नजर गई ...कोहबर की शर्त..किताब के लेखक के बारे में पढ़ा, बलिया जिले के बलिहार गांव के ही निवासी थे केशव प्रसाद मिश्र। इस किताब ने मुझे इसलिए भी आकर्षित किया – क्योंकि इसकी पहली ही लाइन की शुरूआत उसी चार बजे की ट्रेन की चर्चा से होती है – जिससे रोजाना शाम को हम अपने घरों के लिए लौटते थे। कोहबर की शर्त में आपको ये लाइन कुछ ऐसे मिलेगी – चारबज्जी ट्रेन हांफती हुई सी खड़ी थी। कोहबर की शर्त की जब-जब मेरे सामने चर्चा होती है – मेरी स्मृतियों में भाप इंजन वाली वह चार बजे वाली ट्रेन आ जाती है। जिसे हम पहली ट्रेन भी बोला करते थे। तो कुछ इस नास्टेलजिक अंदाज में मेरा कोहबर की शर्त से परिचय हुआ।
ये तो बहुत बाद में जान पाया कि 1982 में जिस गाने - कवन दिसा में लेके चला रे बटोहिया - को सुनकर मैं अपनी मां से उस फिल्म को देखने की जिद्द करता था, वह फिल्म नदिया के पार इसी उपन्यास पर बनी थी। लेकिन दुर्भाग्य देखिए कि अपनी ही माटी की कहानी पर बनी इस फिल्म को मैं बहुत बाद में देख पाया – क्योंकि तब मेरे परिवार की नजर में फिल्म देखना उतना ही खराब काम था – जितना शराब पीना। 1982 में बनी ये फिल्म सुपरडुपर हिट रही। हालत ये थी कि लोग किरासन तेल वाला स्टोव और खाना बनाने का बर्तन तक लेकर सिनेमा हाल जाते थे कि अगर उस शो का टिकट नहीं मिला तो बाद वाले शो में जरूर देखेंगे। लेकिन दुर्भाग्य देखिए....बलिया के पढ़े-लिखे लोगों तक को ये पता नहीं चला कि जिस चौबेछपरा, बलिहार और छेड़ी से वे रोजाना गुजरते हैं – उन्हीं गांवों की ये कहानी है। फिल्म की ज्यादातर शूटिंग जौनपुर में हुई थी। लिहाजा लोग इसे जौनपुर की ही कहानी मानते रहे। मजे की बात ये कि जिस लेखक की कहानी पर ये जबर्दस्त फिल्म बनी – उस लेखक को लोग जान भी नहीं पाए।
केशव प्रसाद मिश्र बलिया जिले के बलिहार गांव के ही निवासी थे। पढ़ाई-लिखाई के बाद उन्होंने इलाहाबाद के मशहूर एजी ऑफिस यानी ऑडिटर जनरल के दफ्तर में नौकरी कर ली। और इलाहाबाद के ही होकर रह गए। कोहबर की शर्त जैसा भावुकता पूर्ण उपन्यास लिखने वाले इस लेखक को वह चर्चा भी नहीं मिली – जिसके वे हकदार थे। उपन्यास पढ़ने के बाद अगर आपकी आंखों से आंसू ना गिरे – ऐसा हो ही नहीं सकता। फिल्म देखकर लोग भावुक तो होते ही रहे हैं। आखिर क्या वजह रही कि उन्हें वह चर्चा नहीं मिली – जिसके वे हकदार थे। इसे समझने के लिए वरिष्ठ पत्रकार अरविंद कुमार सिंह का एक अनुभव ही काफी रहेगा। 1982 में नदिया के पार के सुपर-डुपर हिट होने के बाद अरविंद , इलाहाबाद में केशवप्रसाद मिश्र का इंटरव्यू लेने जा पहुंचे। तब अरविंद इलाहाबाद में ही रहते थे। केशव प्रसाद मिश्र ने अरविंद की आवभगत तो की, लेकिन पहले नदिया के पार फिल्म देख आने का सुझाव दे डाला। बातचीत के लिए तैयार नहीं हुए। आज के दौर में जब किताबें आने से पहले ही चर्चाओं और गोष्ठियों के जरिए हंगामा बरपाने और खुद को चमकाने की कोशिशें तेज हो जाती हैं – केशव प्रसाद मिश्र इन सबसे दूर थे। हिंदी के बड़े-बड़े लेखकों से उनका साबका पड़ता रहा। उसी बलिया के दूधनाथ सिंह और अमरकांत से लेकर शेखर जोशी, उपेंद्र नाथ अश्क, भैरव प्रसाद गुप्त आदि से संपर्क रहा। लेकिन केशव जी चर्चाओं से दूर भागते रहते थे। पूर्वांचल की माटी के ही एक और मूर्धन्य कलमकार विवेकी राय उन्हें एक अच्छे इंसान के तौर पर शिद्दत से याद करते हैं। उनका कहना है कि केशव प्रसाद मिश्र में आधुनिक दौर का बड़बोलापन नहीं आ पाया था। इसलिए वे खुद की चर्चाओं से हमेशा दूर रहा करते थे। साहित्यिक गोष्ठियों और सेमिनारों में जाते तो थे – लेकिन खुद बोलने से बचते थे। कुछ वैसे ही जैसे उनके उपन्यास कोहबर की शर्त की नायिका गूंजा की बड़ी बहन चुपचाप सबकुछ खुद पर ही झेलती रहती है। कुछ – कुछ कोहबर की शर्त की वैद्य जी की तरह वे थे, जो अपनी जिम्मेदारियों को चुपचाप निभाते रहे।
1936 में - देहाती दुनिया - के जरिए आंचलिक उपन्यास की दुनिया में जो बिरवा आचार्य शिवपूजन सहाय ने रोपा था, नागार्जुन ने बलचनमा, रतिनाथ की चाची और वरूण के बेटे के जरिए उसे आगे बढ़ाया। लेकिन आंचलिक लेखन में नई क्रांति मैला आंचल और परती परिकथा के जरिए फणीश्वर नाथ रेणु लाने में सफल रहे। विवेकी राय ने भी नमामि ग्रामं, सोनामाटी और समर शेष है जैसे उपन्यासों के जरिए आंचलिक उपन्यासों की दुनिया में सार्थक हस्तक्षेप किया है। केशव प्रसाद मिश्र इसी कड़ी के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर रहे। हैरतअंगेज समानता आचार्य शिवपूजन सहाय के देहाती दुनिया, मैला आंचल और कोहबर की शर्त – तीनों में है। जहां पहले और आखिरी उपन्यास में भोजपुरी इलाके की महिलाओं के दर्द को आवाज देने की कोशिश की गई है, वहीं यही काम मैला आंचल के जरिए रेणु जी पूर्णिया और कटिहार के आसपास की महिलाओं और लड़कियों की संवेदना को नए सुर देते हैं। मैला आंचल की कमली और कोहबर की शर्त की गूंजा की हालत में आज भी खास बदलाव नहीं आया है। लेकिन सबसे बड़ी बात ये है कि दोनों ही नायिकाएं अपने मनचाहे साथियों को पा लेती हैं। इसके लिए उन्हें भले ही चाहे जितना संघर्ष करना पड़ता है। लेकिन हकीकत में ये आज भी दूर की कौड़ी है। आज भी भोजपुरी इलाके की लड़कियों को वह स्वतंत्रता हासिल नहीं है। लेकिन इन लेखकों ने अपनी रचनाओं के जरिए एक क्रांति लाने की कोशिश जरूर की। फिल्म और टेलीविजन माध्यमों पर आकर इन नायिकाओं का दर्द घर-घर की महिलाओं का दर्द बन गया। फिल्म माध्यम में आने के बाद रेणु को लेकर चर्चाओं का विस्तार ही हुआ – उनकी कहानी लालपान की बेगम पर बनी फिल्म तीसरी कसम के जरिए भी लोग रेणु को जानते हैं। मैला आंचल को टीवी पर जब पेश किया गया - तब भी उन्हें ढंग से याद किया गया। लेकिन केशव प्रसाद मिश्र यहीं पर पिछड़ गए। 1982 में आई नदिया के पार के लेखक के तौर पर उन्हें उस बलिया के लोग भी कायदे से नहीं जान पाए – जिनके बीच के केशव जी थे। जहां रहकर उस चारबज्जी ट्रेन की उमस और दुर्गंधभरी कितनी यात्राएं बलिया से रेवती स्टेशन के बीच की थी। ( उपन्यास की भूमिका में इसका भी जिक्र है। ) राजश्री वालों ने 1982 में नदिया के पार बनाने के बाद केशव जी को सम्मान तो दिया था। लेकिन 1994 में जब सूरज बड़जात्या अपनी इसी फिल्म का शहरी संस्करण – हम आपके हैं कौन – बनाई तो उस समय इस लेखक को कायदे से याद नहीं किया गया। लेकिन माधुरी दीक्षित और सलमान खान की इस फिल्म से बड़जात्या परिवार की तिजोरी कितनी भरी – ये सबको पता है।
केशव प्रसाद मिश्र की एक और महत्वपूर्ण रचना है उनका उपन्यास, देहरी के आरपार । कोहबर की शर्त की नायिका गूंजा को उसकी चाहत तो मिल गई – लेकिन ममता की देहरी को पार करने की इच्छा पूरी ही नहीं होती। कभी उसके पिता रामाधार कौशिक की कृपणता तो कभी उनकी भोगवादी दृष्टि ममता की राह में आड़े आ जाती है। बिन मां की ये बच्ची अपनी चाहतों – अपने सपनों को रोजाना टूटते हुए देखती है। पूरबिया बाप इलाहाबाद के पढ़े-लिखे माहौल में खुद को आधुनिक दिखाने की कोशिशों में जुटा रहता है। लेकिन अंदर से वह अपनी दकियानूसी सोच को छोड़ नहीं पाता। मां नहीं है – लिहाजा अपना दर्द ममता किससे बांटे। इसी बीच उसकी हेमंत से भेंट होती है। कुछ ऐसा संयोग बनता है कि हेमंत से शादी के लिए रामाधार कौशिक तैयार हो जाते हैं। ममता हेमंत से बंध जाती है। लेकिन उसकी कसक बाकी रह जाती है। ममता जो ममता के तौर पर जाना जाना चाहती है – उसकी वह पहचान नहीं बन पाती। अब उसकी नई पहचान हेमंत बन जाते हैं। ममता का दर्द कुछ कम तो होता है – लेकिन कसक के साथ। उसकी कसक को केशव जी ने जो शब्द दिए हैं – भावुक आंखों में आंसू लाने के लिए काफी हैं। आप भी गौर फरमाइए –
“ आज रात के साढ़े दस बजे तक , परिचय के लिए डॉ. रामाधार कौशिक एमबीबीएस की बेटी ममता हूं , उसके बाद हेमंत से जुड़ जाउंगी। उस हेमंत से, जिन्होंने मुझे नई जिंदगी दी है। जिंदगी का अर्थ दिया है, जीने की रूचि जगाई है- इस थके –हारे, निराश मन में, आस और विश्वास भरा है। ”
इस ममता में मुझे आज भी बलिया, गाजीपुर, छपरा, बनारस जैसे इलाके की ढेरों ममताएं नजर आती हैं। इस उपन्यास के प्रकाशित हुए करीब तीन दशक बीत गए हैं – लेकिन ममता की हालत में कोई सुधार नहीं हुआ है।
आज के दौर के महत्वपूर्ण कवि हैं केदारनाथ सिंह। केदार जी का गांव चकिया , केशव जी के गांव बलिहार से चार-पांच किलोमीटर की ही दूरी पर है। दोनों ने रचनात्मकता के नए प्रतिमान बनाए। केदारजी को सभी जानते हैं। केशव जी की उतनी पूछ और पहुंच नहीं रही। लेकिन मेरी स्मृतियों में दोनों की रचनाओं का एक-एक बिंब टंगा हुआ है। केदार जी की एक कविता है – मांझी का पुल। बलिया-छपरा रेलमार्ग पर यूपी-बिहार सीमा पर घाघरा पर बने इस रेलवे पुल की धमक रात के गहरे सन्नाटे में दूर-दूर तक सुनाई देती है। केदार जी अपनी कविता में कहते हैं – दूर कहीं स्मृतियों में टंगा है मांझी का पुल।
बलिया की रचनात्मकता की जब भी चर्चा होती है – मेरे भी अंदर कहीं न कहीं मांझी का ये पुल फांस की तरह टंगा नजर आता है। इसके साथ ही याद आती है हांफती सी खड़ी चारबज्जी ट्रेन, जिसे इसी मांझी के पुल से रोजाना गुजरना होता है।
केशव जी हमारे बीच नहीं हैं – लेकिन उनकी रचनाधर्मिता की कीर्ति को कभी हम मांझी के पुल के पार भी ले जा सकेंगे। जवाब हम सबको ढूंढ़ना है।

Saturday, November 7, 2009

कोड़ा अभी क्यों नजर आ रहे हैं भ्रष्टाचारी



उमेश चतुर्वेदी

झारखंड में जारी चुनावों और पूर्व मुख्यमंत्री मधु कोड़ा के खिलाफ छापेमारी के बीच कोई संबंध है...ये सवाल इन दिनों बड़ी शिद्दत से उठ रहा है। सवाल उठने की वजह भी है। झारखंड जैसे छोटे और प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर राज्य का पांच साल तक मधु कोड़ा बेरहमी से शोषण करते रहे और अकूत संपति बनाते रहे – इसकी जानकारी आयकर विभाग, प्रवर्तन निदेशालय और इंटेलिजेंस ब्यूरो को एक दिन में तो मिली नहीं होगी। जाहिर है- इसकी खबर पहले भी अपनी इन दमदार एजेंसियों के जरिए केंद्र सरकार को रही ही होगी। लेकिन तब तो केंद्र सरकार ने मधु कोड़ा के खिलाफ कोई कदम उठाया नहीं। उनके ठिकानों पर छापे भी नहीं मारे गए। लेकिन जैसे ही झारखंड में चुनावों का ऐलान हुआ- मधु कोड़ा अचानक ही केंद्र सरकार की नजर में इतने बड़े खलनायक बन गए कि उनके खिलाफ जांच में केंद्र सरकार को इंटरपोल की मदद लेनी पड़ रही है। इन विधायकों की अकूत कमाई के जो राज खुल रहे हैं, वे चौंकाने वाले हैं।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये है कि जो मधु कोड़ा आज झारखंड के अब तक के सबसे बड़े घोटाले और निर्मम अवैध कमाई के चलते खलनायक बन चुके हैं, अब तक उनकी 1450 करोड़ की कमाई का पता चल चुका है, उसमें क्या कांग्रेस की कोई भूमिका नहीं है। कांग्रेस गांधी जी के बताए रास्ते पर चलने का दावा करती है। गांधी जी ने कहा था कि अन्याय करने से ज्यादा अन्याय सहने वाला भी होता है। पता नहीं कांग्रेस ने अन्याय सहा या नहीं या फिर उसके विधायकों ने कोड़ा न्याय में हिस्सेदारी की या नहीं...लेकिन ये सच जरूर है कि इस भ्रष्टाचार में वह भी बराबर की भागीदार है। क्योंकि सांप्रदायिकता को सत्ता से दूर रखने के नाम पर अपने 11 विधायकों के सहयोग से उसने मधु कोड़ा की 2007 में सरकार बनवाई थी। इतना ही नहीं, उसने अपने विधायक आलमगीर को विधानसभा का अध्यक्ष भी बनवाया। सरकार की वह महत्वपूर्ण सहयोगी रही है। यह कौन भरोसा करेगा कि राज्य सरकार के आठ हजार करोड़ के बजट में से चार हजार करोड़ का घोटाला होता रहे। इतना बड़ा घोटाला कि राज्य के टटपूंजिए ठेकेदार और पत्रकार तक मालामाल होते रहे और सरकार की महत्वपूर्ण सहयोगी को पता तक नहीं चल पाया। शायद पंजाब के बाद ये झारखंड पहला राज्य है, जिसके राज्यपाल और उनके दफ्तर तक पर खुलेआम भ्रष्टाचार का आरोप लगा। तब कांग्रेस या केंद्र सरकार ने चुप्पी साधे रखी। उसे अपने राजधर्म के निर्वाह की याद नहीं आई।
झारखंड में चुनावी बिगुल बज चुका है। लोकसभा चुनावों को बीते अभी छह महीने भी नहीं बीते हैं। तब भारतीय जनता पार्टी ने इस राज्य में अपनी दमदार उपस्थिति दर्ज कराई थी। केंद्रीय सरकार की अगुआई कर रही कांग्रेस को पता है कि भाजपा को जनसमर्थन का वह उफान अभी कम नहीं हुआ है। हरियाणा, महाराष्ट्र और अरूणाचल प्रदेश में कांग्रेस ने सत्ता की सीढ़ी को एक बार फिर पार कर लिया है, लेकिन झारखंड में एक बार फिर इन तीनों राज्यों का इतिहास दोहराया जाता नहीं दिख रहा है। कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी कांग्रेस को हिंदी पट्टी में जिंदा करने के अभियान में शिद्दत से जुटे हुए हैं। उनकी कोशिशों का फायदा पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान उत्तर प्रदेश में तो दिखा, लेकिन बिहार और झारखंड की धरती पर उनकी कोशिशें कामयाब होती नहीं दिख रही हैं। ऐसे में सत्ता की ताकत का सहारा लिया जा रहा है और ऐन चुनावों के वक्त ही मधु कोड़ा, एनोस एक्का और हरिनारायण सिंह समेत भ्रष्ट पूर्व मंत्रियों और विधायकों के खिलाफ छापेमारी का अभियान शुरू कर दिया गया है।
इस पूरी कवायद का मकसद जितना झारखंड की भ्रष्टाचार मुक्त करना नहीं है, उससे कहीं ज्यादा राज्य की चुनावी बयार में फायदा उठाना है। अगर ऐसा नहीं होता तो केंद्र की ओर से इस भ्रष्टाचार पर नकेल कसने के लिए पहले से ही प्रयास किए जा रहे होते। मधु कोड़ा के भ्रष्टाचार के किस्से तो रांची के सियासी गलियारों से लेकर राजधानी दिल्ली के राजनीतिक चौराहों तक चटखारे लेकर सुनाए जा रहे थे। आम लोगों तक को पता था कि प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर झारखंड की माटी का किस कदर दोहन हो रहा है। पत्रकारीय गलियारे भी इन चटखारों से भरे पड़े थे। तब किसी सरकारी एजेंसी या जिम्मेदार विभाग को इसके खिलाफ कार्रवाई करने की क्यों नहीं सूझी।
मधु कोड़ा हों या एनोस एक्का, उनके पास इतनी सियासी ताकत और कौशल नहीं है कि वे अपने पर हो रहे सरकारी अमले की छापेमारी को भी खुद के पक्ष में साबित कर दें। देश के दलित और पिछड़े वर्ग के कई नेताओं ने अपने खिलाफ छापेमारी और सरकारी कार्रवाई को पूरी कुशलता के साथ अपने वोटरों के खिलाफ भावनात्मक तौर पर उभारने में कामयाब होते रहे हैं। लेकिन झारखंड में ऐसा होता नहीं दिख रहा है। कांग्रेस को झारखंड के इन नेताओं की इस कमजोरी की पूरी जानकारी है। शायद यही वजह है कि कांग्रेस इसका भी चुनावी फायदा उठाने की तैयारी में है।
सन 2000 में जब छोटे राज्यों का गठन हुआ था तो उसकी सबसे बड़ी वजह ये बताई गई थी कि राजनीतिक आकाओं की उपेक्षा के चलते उस खास क्षेत्र का वह विकास नहीं हुआ, जिसके वे हकदार थे। तब तर्क दिया गया कि छोटे राज्यों की कमान उनके अपने बीच के नेताओं के हाथ होगी और वे अपनी माटी और अपने लोगों की समस्याओं को ध्यान में रखकर इलाके का समुचित विकास करेंगे। लेकिन दुर्भाग्य ये कि छोटे होने बाद ये राज्य भ्रष्टाचार के और बड़े भंवर में फंस गए। रही-सही कसर छोटे-छोटे ग्रुपों की राजनीतिक और चुनावी सफलता ने पूरी कर दी। झारखंड इस गिरावट का बेहतर उदाहरण बन गया है। उससे भी बड़ा दुर्भाग्य ये कि इस गिरावट में राष्ट्रीय पार्टियां - रहा किनारे बैठ - की तर्ज पर भागीदार रहीं। इससे भी बड़े दुर्भाग्य की बात ये कि भ्रष्टाचार पर रोक लगाने की असल वजह टैक्स चुकाने वाली माटी के असल हकदार लोगों को फायदा पहुंचाना नहीं रहा, बल्कि इसका भी इस्तेमाल सियासी फायदे के लिए किया जा रहा है। ये बात नंगी आंखों से सबको नजर आ रही है। इससे बड़े दुर्भाग्य की बात और क्या होगी कि झारखंड के भूखे-नंगे मूल निवासियों के हितों की बात दिल से कोई नहीं कर रहा है। यहां के माटी पुत्रों को आज भी छोटी नौकरियों के लिए बाहर जाना पड़ रहा है। दिल्ली- मुंबई की घरेलू नौकरानियों के तौर पर झारखंड की बच्चियों को अपने दिन काटने पड़ रहे हैं। आए दिन उनसे यौन दुर्व्यहार की खबरें महानगरीय अखबारों की सुर्खियां बनती रहती हैं। साफ है इसके लिए जिम्मेदार मधु कोड़ा, एनोस एक्का और हरिनारायण जैसे राजनेता ही हैं। वहीं उनका साथ देने के चलते शिबू सोरेन, कांग्रेस और आरजेडी भी इस जिम्मेदारी से बच नहीं सकती। ऐसा नहीं कि इस कुचक्र को झारखंड की जनता-जनार्दन नहीं समझ पाई है। देखना ये है कि वह चुनावी बयार में इसका हिसाब नेताओं से चुका पाती है या नहीं।

Wednesday, October 28, 2009

हिंदी वाले बिग बॉस


उमेश चतुर्वेदी
11 अक्टूबर को अमिताभ बच्चन ( सहस्राब्दी के महानायक कहने वाले लोग माफ करेंगे ) के जन्मदिन पर उनकी ब्रांड वैल्यू से लेकर सिनेमा में उनके योगदान की जयगाथा के गुणगान की जैसे परिपाटी ही चल पड़ी है। इस परिपाटी को चलाने वाले हर साल इसी प्रशस्तिगान को घुमा-फिराकर पेश करके इतिश्री कर लेते हैं। जाहिर है इस बार भी यही हुआ। लेकिन अमिताभ के उस योगदान की ओर प्रशस्तिगान की परिपाटी चलाने वाले लोगों का ध्यान शायद ही गया, जिसके सहारे कथित तौर पर क्लिष्ट मानी जाने वाली हिंदी को लोकप्रिय बनाने में वह योगदान दे रहे हैं।
हिंदी मीडिया में आने वाले छात्रों और प्रशिक्षार्थियों को पहले ही दिन से गांधीजी की हिंदुस्तानी के नाम पर ऐसी हिंदी लिखने-पढ़ाने की ट्रेनिंग दी जाने लगती है, जिसे आम आदमी यानी पान- चाय वाले से लेकर खेत-खलिहान में काम करने वाला आम मजदूर भी समझ सके। शावक पत्रकार को ये घुट्टी इस तरह पिला दी जाती है कि वह बेचारा हिंदी के उन आमफहम शब्दों के इस्तेमाल से भी बचने लगता है – जिसे वह अपने कॉलेज के दिनों में नहीं- बल्कि स्कूली पढ़ाई के दौरान सीखा और समझा होता है। जब टेलीविजन चैनलों का प्रसार बढ़ा और निजी चैनलों का दौर बढ़ा तो इस घुट्टी पर कुछ ज्यादा ही जोर दिया जाने लगा। किशोरीदास वाजपेयी के लिए भले ही अच्छी हिंदी कभी भारत की भावी भाषाई अस्मिता का प्रतीक रही होगी – अच्छी हिंदी आज के मीडिया के लिए उपहास का पात्र बन चुकी है। हिंदी का उपहास सबसे ज्यादा हिंदी के ही खबरिया चैनलों में हुआ। इसके लिए मीडिया की लानत-मलामत भी खूब होती रही है।
लेकिन मुख्यधारा के हिंदी मीडिया में एक बदलाव नजर आ रहा है। अब वहां किशोरीदास वाजपेयी की तराशी अच्छी हिंदी भी परोसी जा रही है और मजे की बात ये है कि क्लिष्टता के नाम पर उसे अब तक नकारते रहे लोग भी इस हिंदी पर न्यौछावर होते नजर आ रहे हैं। कहना ना होगा कि बुद्धू बक्से पर इस हिंदी के सबसे बड़े पैरोकार के तौर पर अमिताभ बच्चन ही सामने आए हैं। जरा सोचिए...अगर बिग बॉस का तीसरा संस्करण कोई शिल्पा शेट्टी या फिर सामान्य टेलीविजन एंकर पेश कर रहा होता तो क्या वह उतनी सहजता से बिग बॉस तृतीय बोल पाता, जितनी सहजता से अमिताभ बोलते हैं। या फिर वह बोलने की कोशिश करता तो उस चैनल के प्रोड्यूसर और कर्ता-धर्ता ऐसी हिंदी को पचा पाते। अब तक हिंदी के साथ जो कुछ भी होता रहा है, कम से कम मीडिया में जो होता रहा है, उसका खयाल रखते हुए इसका जवाब निश्चित तौर पर ना में होगा। बिग बॉस कोई पहला कार्यक्रम नहीं है, जिसमें अमिताभ ऐसी हिंदी बोल रहे हैं। याद कीजिए – इसके पहले कौन बनेगा करोड़पति के दूसरे संस्करण को पेश करते वक्त भी अमिताभ कौन बनेगा करोड़पति सेकंड की बजाय कौन बनेगा करोड़पति द्वितीय बोलने में नहीं झिझकते थे।
कुछ लोगों को लग सकता है कि अमिताभ कुछ अलग दिखने के चक्कर में ऐसा बोल रहे हैं। कुछ लोगों की नजर में ये उनकी और संबद्ध चैनल की मार्केटिंग रणनीति का हिस्सा भी हो सकता है। लोगों को इसमें भी बाजारवाद का हमला दिख सकता है। ये तथ्य अपनी जगह सही हो सकते हैं। लेकिन ये भी उतना ही बड़ा सच है कि आज बाजारवाद और उपभोक्तावाद के दौर में बाजार से बचना नामुमकिन है। ऐसे में अपनी कथित क्लिष्ट हिंदी भी मार्केटिंग का हथियार बन सकती है तो इसे लेकर हम खुश भले ना हों, लेकिन संतोष का भाव तो दे ही सकते हैं।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये है कि क्या वजह है कि हमारी अपनी अच्छी हिंदी हमारे ही लोगों के लिए गंवारूपन और पिछड़ेपन का प्रतीक मानी जाती रही है। वह प्रगति में बाधक समझी जाती रही है। लेकिन अमिताभ के मुंह से निकलते ही वह इतनी ताकतवर बन जाती है कि उसे भी यूएसपी बनाकर पेश किया जाने लगता है। हकीकत तो ये है कि अब तक चाहे मीडिया के चलाने वाले ज्यादातर लोग रहे हों या फिर देश के प्रशासन के, वे खांटी और खालिस हिंदी वाले नहीं रहे हैं। खुद उनके लिए हिंदी उतनी ही बेगानी रही है, जितनी आम भारतीय के लिए अंग्रेजी। ऐसे में उन्हें लगता है कि वे जितनी हिंदी जानते हैं, उनका पाठक और दर्शक भी उतनी ही हिंदी जानता और समझता है और जैसे ही उनके सामने हिंदी के कम परिचित आम शब्द आते हैं तो वह हिंदी उन्हें कठिन लगने लगती है। हां उसकी जगह पर अंग्रेजी के शब्द चल पड़ें तो कोई बात नहीं। उनकी नजर में खेत में काम करने वाला और पनवाड़ी भी अंग्रेजी के आम शब्दों को जानता-समझता है। दुनिया के किसी और देश की भाषा के लिए भले ही ये चलन चिंता का सबब हो, अपने यहां यह प्रगति और बुद्धिवादी होने का बेहतरीन सबूत है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का एक बड़ा वर्ग इसी उटोपिया से प्रभावित रहा है। लिहाजा हिंदी के खबरिया से लेकर मनोरंजन के चैनलों पर भी आम फहम के नाम पर ऐसी हिंदी परोसी जाती रही है, जिसका जमीनी हकीकत से दूर-दूर तक का वास्ता नहीं रहा है। अमिताभ बच्चन ने इसी परिपाटी और इसी जड़ता को अपनी सहज और कथित तौर पर क्लिष्ट हिंदी का प्रयोग करके तोड़ा है। बिग बॉस में गालियां और अंदरूनी खींचतान के बाद हफ्ते में जब दो दिन अमिताभ बच्चन सामने आते हैं तो दर्शक उनका इंतजार करते हैं। उनकी हिंदी को सुनने के लिए अपने टेलीविजन चैनलों का ट्यून नहीं बदलते। अगर यह हिंदी इतनी ही लोगों के लिए कठिन होती तो बिग बॉस के प्रस्तुत कर्ता शमिता शेट्टी को हिंदी बोलने की सजा नहीं सुनाते। बिग बॉस के दूसरे सीजन में ऐसी सजा पूर्व मिस वर्ल्ड डॉयना हेडन को भी सुनाया जा चुका है।
उन्नीसवीं सदी के आखिरी दिनों में कहा जाता है कि देवकीनंदन खत्री की ऐयारीपूर्ण रचनाएं -चंद्रकांता और चंद्रकांता संतति पढ़ने के लिए लोगों ने हिंदी सीखी थी। हिंदी का विस्तार इसी तरह हुआ है। लेकिन आज ये मान्यता पूरी तरह बदल गई है। कथित क्लिष्ट हिंदी के इस्तेमाल को लेकर टीआरपी या सर्कुलेशन गिरने की चिंताएं जताई जाती रही हैं। लेकिन बिग बॉस तृतीय या फिर कौन बनेगा करोड़ पति द्वितीय के टीआरपी के आंकड़े इस मान्यता को झुठलाने के लिए काफी हैं। बिग बॉस तृतीय की टीआरपी 400 अंकों के स्तर पर पहुंच गई है। निश्चित तौर पर अमिताभ के इस हिंदी प्रेम के पीछे उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि का बड़ा योगदान रहा है। उनके पिता हरिवंश राय बच्चन हिंदी के मशहूर कवि थे। हिंदी के प्रति उन्हें बचपन से एक खास संस्कार मिला है। इसका असर बिग बॉस के तीसरे सीजन की उनकी प्रस्तुति पर भी दिख रहा है। ऐसे में मीडियाघर में हिंदी की इस नई प्रतिष्ठा को लेकर आशावान बनने में कोई हर्ज नजर नहीं आ रहा है। भले ही इसका जरिया अमिताभ ही क्यों ना बन रहे हों।

Sunday, October 25, 2009

किसे जरूरत है न्यूडिटी की


उमेश चतुर्वेदी
साल - 1995
मिलिंद सोमण और मधु सप्रे की न्यूड जोड़ी का एक फोटो एक पत्रिका के कवर पेज पर छपा है..टफ शूज के विज्ञापन में ये जोड़ी बिल्कुल नंगी नजर आ रही है। उनके शरीर के गोपन अंगों को अजगर के जरिए ढांप रखा गया है।
साल – 2009
मॉडलिंग बिल्कुल वैसी ही है। इस बार भी जूते ही हैं। बस किरदार बदल गए हैं। इस बार मधु की जगह पर हैं बॉलीवुड की अभिनेत्री शौर्या चौहान और उनका साथ दे रहे हैं बन्नी आनंद। इस बार शरीर के गोपन अंगों को एक ही कपड़े के जरिए ढंका गया है।
1995 और 2009 के बीच महज चौदह साल का फासला है, लेकिन सोच के धरातल पर हमारी दुनिया कितनी बदल गई है, इसका जीवंत उदाहरण है शौर्या और बन्नी के विज्ञापन का नोटिस भी नहीं लिया जाना। 1995 में जब ये विज्ञापन पहली बार एक फिल्मी पत्रिका के कवर पृष्ठ पर छपा था तो जैसे हंगामा बरप गया था। शिवसेना ने इसका ना सिर्फ जोरदार विरोध किया था, बल्कि इसके खिलाफ कोर्ट भी गई थी। लेकिन आज ना तो शौर्या पर कोई सवाल उठ रहा है और ना ही उसका साथ दे रहे बन्नी आनंद पर...1991 में मनमोहनी मुस्कान के सहारे जब अपनी अर्थव्यवस्था उदार हो रही थी, तब वामपंथी और दक्षिणपंथी- दोनों तरह की विचारधारा के लोग कम से कम एक मसले पर एक विचार रखते थे। विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार को समर्थन देने के अलावा कम ही मौके ऐसे रहे हैं- जब वैचारिकता के दो विपरीत ध्रुव एक राय रखते हों। दोनों का मानना था कि उदारीकरण हमारी अर्थव्यवस्था को ही नहीं, संस्कृति को भी बदलेगी। उदारीकरण की करीब डेढ़ दशक की यात्रा के बाद ये अंदेशा बिल्कुल सच साबित होता दिख रहा है। दिलचस्प बात ये है कि इसके समर्थकों की भी संख्या बढ़ती जा रही है। इसी साल के शुरूआत में जब फ्रांस के राष्ट्रपति सरकोजी की पत्नी कार्ला ब्रूनी के न्यूड फोटो के करीब नौ लाख रूपए में बिकने की खबर आई तो इस पर सवाल उठाने वालों की लानत-मलामत करने वालों की फौज जुट आई थी। बदलाव की बयार का इससे बड़ा और क्या उदाहरण होगा !
1996 में दिल्ली की एक वकील अंजलि ने एक सेमी पोर्न पत्रिका के कवर पृष्ठ के लिए सेमी न्यूड मॉडलिंग की थी। तब दिल्ली समेत देश के तमाम बार एसोसिएशनों ने उनकी सदस्यता रद्द करने की मांग रखी थी। बार एसोसिएशन का मानना था कि न्यूडिटी का प्रचार करने वाली वकील की साख कैसे बन सकती है। उसके प्रति लोग आदर का भाव कैसे रख सकते हैं। पता नहीं उसके बाद कोई महिला वकील न्यूडिटी के ऐसे प्रचार के साथ बाजार में उतरी कि नहीं..लेकिन ये साफ है कि इस कृत्य के जरिए वकील बिरादरी ने अपने लिए एक लक्ष्मण रेखा जरूर खींच दी, जिससे लांघना आसान नहीं होगा।
हिंदी के प्रचार-प्रसार में अपनी अहम भूमिका निभाने वाले बॉलीवुड ने न्यूडिटी के प्रसार में भी कम भूमिकाएं नहीं निभाई हैं। राजकपूर के जमाने में बैजयंती माला सेमी न्यूड यानी बिकनी में संगम होगा कि नहीं गाते नजर आईं थीं। हिंदी सिनेमा के ग्रेट शो मैन राजकपूर ने बाद की फिल्मों में कला और कहानी के नाम पर सेमी न्यूडिटी का जमकर इस्तेमाल किया। सत्यम शिवम सुंदरम की जीनत अमान हों या फिर राम तेरी गंगा मैली की मंदाकिनी...कहानी की जरूरत और कला के नाम पर आपको सेमी न्यूडिटी दिख ही जाती है। सबसे बड़ी बात ये है कि फिल्मी अर्थशास्त्र को सफल बनाने में महिला न्यूडिटी का ही ज्यादा इस्तेमाल होता रहा है। बॉलीवुड में कदम रखने वाली हर अदाकारा पहले न्यूडिटी से इनकार करती रही है, फिर कहानी की जरूरत और मांग के मुताबिक सेमी न्यूडिटी की नुमाइश करने से पीछे नहीं रही है। लेकिन माया मेम साहब के जरिए केतन मेहता ने पुरूष न्यूडिटी को भी नया आयाम दे दिया। माया मेम साहब फिल्म की नायिका केतन की पत्नी दीपा मेहता थीं। इस फिल्म के एक अंतरंग दृश्य में शाहरूख खान और दीपा दोनों नंगे नजर आए थे। यह न्यूडिटी भी कला और कहानी की जरूरत के नाम पर फिल्मी दर्शकों को पेश की गई थी। शेखर कपूर ने दस्यु सुंदरी फूलन देवी की जिंदगी पर आधारित फिल्म बैंडिट क्वीन बनाई तो उसमें बलात्कार का खुलेआम सीन भी कहानी और जरूरत के तर्क के आधार पर ही पेश किया था। मीरा नायर की फिल्म कामसूत्र हो या फिर सलाम बांबे....उसमें भी न्यूडिटी कला के नाम पर जमकर परोसी गई।
पुरूष न्यूडिटी को हाल के दिनों में नया आयाम दिया है राजकपूर के पोते रणवीर कपूर ने। भारतीय कानूनों के मुताबिक बेशक वे पूरी तरह से निर्वस्त्र नहीं दिख सकते थे, लेकिन सांवरिया के निर्देशक ने उन्हें निर्वस्त्र तो कर ही दिया। अब इस कड़ी में नया नाम अपने सुरीले गीतों के लिए मशहूर मुकेश के पोते नील नितिन मुकेश का जुड़ गया है- जो जेल फिल्म में पूरी तरह निर्वस्त्र नजर आ रहे हैं। रानी मुखर्जी अब तक न्यूडिटी और अंग प्रदर्शन से बचती रही हैं- लेकिन अपना बाजार भाव बढ़ाने के लिए उन्हें भी सेमी न्यूडिटी पर ही आखिर में जाकर भरोसा बढ़ा नजर आ रहा है। अगर ऐसा नहीं होता तो बिकनी में वह हड़िप्पा बोलती नजर नहीं आतीं।
न्यूडिटी फिल्मों के जरिए टेलीविजन के पर्दे पर भी जमकर दिख रहा है और इसका सबसे बड़ा जरिया बन रहे हैं रियलिटी शो। बिग बॉस में जिस तरह भारतीय जनता पार्टी के चेहरा रहे प्रमोद महाजन के बेटे राहुल महाजन ने स्वीमिंग पूल में पायल रोहतगी और मोनिका बेदी के सीन दिए- उसे क्या कला के नाम पर पेश किया गया। टेलीविजन की एक सुशील बहू के तौर पर अपनी पहचान बना चुकी श्वेता तिवारी ने हाल के दिनों में प्रसारित हुए रियलिटी शो इस जंगल से मुझे बचाओ में जिस तरह झरने के नीचे नहाते हुए पोज दिए या फिर बाद में आई निगार खान और कश्मीरा शाह ने बिकनी बीच स्नान किया – सबके लिए कला की ही दुहाई दी जाती रही है।
बात इतनी तक ही रहती तो गनीमत थी...फैशन शो में कपड़ों के बहाने जिस तरह देह की नुमाइश की जाती है, उसे भी कला ही माना जाता है। पश्चिमी देशों में न्यूडिटी के नाम पर ऐसे फैशनेबल कपड़ों का चलन बढ़ रहा है – जिसके जरिए न्यूडिटी का ना सिर्फ प्रचार होता है, बल्कि ये कपड़े नैकेडनेस को रोकने का भी दावा करते हैं। अभी तक इस परिपाटी का प्रचार तो भारतीय बाजारों में नहीं हुआ है। लेकिन जिस तरह के कपड़े पहने लड़के-लड़कियां महानगरों में नजर आने लगे हैं, उसे अगर वैधानिक दर्जा देने के लिए पश्चिम के इस विचार को उधार ले लिया जाय तो हैरत नहीं होनी चाहिए।
महिला न्यूडिटी को विजय माल्या जैसे रसिक रईसों ने नई ऊंचाई ही दी है। हर साल वे दुनिया के खूबसूरत लोकेशनों पर न्यूडिटी के नाम पर हॉट बालाओं की तस्वीरें प्रोफेशनल फोटोग्राफरों के जरिए खिंचवाते हैं। इससे तैयार कैलेंडर रईस और रसूखदार लोगों के पास भेजे जाते हैं। जिन्हें ये कैलेंडर नहीं मिलते- वे खुद को कमतर करके आंकते हैं। न्यूडिटी के नाम पर तैयार इस कैलेंडर को कथित हाईप्रोफाइल सोसायटी में जिस तरह सम्मान हासिल हुआ है, उससे साफ है कि कथित हाई प्रोफाइल सोसायटी का जिंदगी के प्रति नजरिया पूरी तरह बदल गया है। चूंकि इस वर्ग के पास ना सिर्फ पैसा है, बल्कि रसूख भी है, लिहाजा इन्हें लुभाने के लिए अब न्यूडिटी को परोसने वाली कला दीर्घाएं भी खुलने लगी हैं।
दरअसल अपना देश दो हिस्सों में साफ बंटा नजर आ रहा है। एक तरफ बहुसंख्यक गरीब और बदहाल जनता है, जिसमें से ज्यादातर लोग गांवों या फिर शहरी स्लम में रहने को मजबूर हैं, वहीं उदारीकरण के बाद एक नव धनाढ्य वर्ग तेजी से उभरा है, जिसकी जिंदगी में मानवीय संवेदनाओं से कहीं ज्यादा पैसे की चमक भरी पड़ी है। रिश्तों की गरमाहट और संस्कारों से उनका कम ही नाता है। ऐसे में अपनी जिंदगी के खालीपन को भरने की जितनी वजहें समझ में आती हैं, उसमें न्यूडिटी भी एक है। उनकी ये भूख कला को प्रश्रय देने के नाम पर पूरी होती है। ऐसे में कलाकार भला क्यों पीछे रहते। हालत ये देखिए कि इस प्रवृत्ति के विरोध के भी अपने खतरे हैं। अगर आपने विरोध किया तो आपको दक्षिणपंथी या प्रतिक्रियावादी घोषित किए जाने का खतरा बढ़ सकता है। करीब डेढ़ दशक पहले मध्य प्रदेश के एक पत्रकार ओम नागपाल ने ऐसे सवाल उठाए थे तो उन्हें ऐसे लांछनों का भरपूर उपहार मिला था।
नव दौलतिया वर्ग को छोड़ दें तो आज भी भारतीय समाज के लिए जीवन मूल्य कहीं ज्यादा जरूरी हैं। लिहाजा अभी तक न्यूडिटी के मार्केट का आकलन नहीं हो पाया है। लेकिन ये भी सच है कि ये अरबों का कारोबार तो है ही। अकेले अमेरिका में ही पोर्न उद्योग करीब 13 अरब डॉलर का है। वहां बाकायदा इसे कानूनी मान्यता भी मिली हुई है। यही वजह है कि वहां कौमार्य बेचकर जब एक लड़की ने अपनी पढ़ाई की फीस जुटाया तो अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने उस पर कोई सवाल नहीं उठाया। दरअसल अमेरिकी समाज व्यक्तिगत आजादी का हिमायती है, लेकिन तभी तक- जब तक समाज को इससे कोई नुकसान नहीं पहुंचता। वहां भी कुछ मूल्य हैं। ये मूल्यों के प्रति अमेरिकी समाज का आग्रह ही है कि वहां की कोई अहम शख्सियत नैतिकता के पहरे और सीमा रेखा से खुद को बाहर नहीं रख पाती। भयानक मंदी के दौर में जब पिछले साल 700 अरब डॉलर के सहायता पैकेज का ऐलान किया तो पोर्न उद्योग खुद के राहत के लिए भी सहायता पैकेज की मांग को लेकर उतर गया। लेकिन खुलेपन के हिमायती अमेरिका के प्रथम नागरिक ने इस मांग पर सिरे से ही ध्यान नहीं दिया।
ऐसे में ये सवाल उठता है कि आखिर हम न्यूडिटी के प्रचार के नाम पर किस तरह की दुनिया बसाना चाहते हैं। भारत की सबसे बड़ी जरूरत अब भी भूख और अशिक्षा से निबटारा पाने की है। गांधी जी के हिंद स्वराज लिखे पूरे सौ साल हो गए हैं। उनका सपना था कि आजादी के बाद ना सिर्फ हमारी सरकार अपनी होगी, बल्कि सामाजिक ढांचा भी हमारे जीवन मूल्यों और महान परंपराओं पर आधारित होंगे। गांधी जी की न्यूडिटी दया और गरीबों के लिए कुछ कर गुजरने, उनके जीवन में नई रोशनी लाने का सबब बनती थी। लेकिन आज की कथित न्यूडिटी में सेक्सुअल फैंटेसी और रोमांच के साथ भोग की इच्छा ज्यादा है। गांधी ने कहा था कि जब तक आखिरी एक भी आदमी दुखी है, राज्य और समाज को चैन से नहीं बैठना चाहिए। काश कि हम न्यूडिटी की दुनिया में खर्च होने वाली करोड़ों की रकम को गांधी के सपनों को पूरा करने में लगाते।

Tuesday, September 15, 2009

लालकालीन पर बूढ़ा शेर


उमेश चतुर्वेदी
लाल कालीन पर सांसद के तौर पर चहलकदमी जार्ज फर्नांडीस को हमेशा उसूलों के खिलाफ लगती रही है। लेकिन हालात का तकाजा देखिए कि अभी दो-तीन महीने पहले तक इसी उसूल के चलते राज्यसभा में जाने का विरोध करते रहे जार्ज को लाल कालीन पर खड़े होकर शपथ लेनी पड़ी। यहां जानकारी के लिए ये बता देना जरूरी है कि लोकसभा में ना सिर्फ हरे रंग की कालीन बिछी हुई है, बल्कि उसकी सीटें भी हरे रंग की ही हैं। जबकि राज्यसभा में लाल रंग का बोलबाला है। बहरहाल समाजवाद के इस बूढ़े शेर को जनता की ही राजनीति सुहाती रही है। राज्यसभा उनके लिए राजनीति का पिछला दरवाजा ही रहा है। उनके इस समझौते को लेकर उनके पुराने साथी चाहे जितने सवाल उठाएं, लेकिन एक चीज साफ है कि उनके राज्यसभा में जाने के साथ ही बिहार की राजनीति में एक नया अध्याय बनते-बनते रह गया है।
नीतीश कुमार की ओर से अपने गुरू को मिली इस गुरू दक्षिणा ने जार्ज के कई पुराने साथियों को भौंचक कर दिया है। आखिर जार्ज ने ये कदम क्यों उठाया, इसका जवाब उन्हें नहीं सूझ रहा है। आपसी बातचीत में जार्ज के ये पुराने दोस्त उनके इस कदम के लिए आसपास के लोगों को जिम्मेदार ठहरा रहे हैं। उनके इस तर्क के लिए सबूत मुहैया करा रही है जार्ज की खराब सेहत। जिस जार्ज के संसद में घुसते ही खबर बन जाती थी, समाजवाद का वही बूढ़ा शेर कायदे से शपथ भी नहीं ले पाया। यही वजह है कि जार्ज के पुराने दोस्तों को ये कहने का मौका मिल गया है कि जार्ज साहब की सोचने-समझने की शक्ति भी चूक गई है और उनके आसपास के लोगों ने उन्हें ये कदम उठाने के लिए मजबूर किया है।
ये सच है कि साठ के दशक में जार्ज फर्नांडिस युवाओं के हीरो थे। मजदूर आंदोलन से लेकर बड़ौदा डायनामाइट कांड तक जार्ज के संघर्ष को देखकर समाजवादी युवाओं की एक पूरी पीढ़ी राजनीति में उतरी थी। व्यवस्था विरोधी जार्ज की यह छवि ही थी, उन्होंने 1967 में कांग्रेस के दिग्गज एस के पाटिल को मुंबई में भारी मतों से हराकर सनसनी फैला दी। कांग्रेसियों ने सोचा भी नहीं था कि जिस मुंबई की जनता एस के पाटिल को अपने सर आंखों पर बैठाती रही है, उसकी आंखों का नूर जार्ज बन जाएंगे। संसद की हरी कालीन पर कदम रखने के बाद जार्ज ने जो इतिहास रचा, इंदिरा गांधी की सर्वशक्तिमान सत्ता से संसद और संसद के बाहर जो लोहा लिया, वह इतिहास बन चुका है। अगर जयप्रकाश नारायण 1942 की जनक्रांति के हीरो थे तो जार्ज इमर्जेंसी के हीरो बने। जार्ज की वही छवि एक पूरी की पूरी पीढ़ी के दिलों में बसी हुई है, यही वजह है कि उसे उसूलों से समझौता करता जार्ज पसंद नहीं आता। जब पिछले लोकसभा चुनाव में जार्ज को नीतीश कुमार ने टिकट देने से मना कर दिया तो उनके चाहने वालों की एक पूरी की पूरी जमात ही नीतीश के खिलाफ जार्ज को मैदान में उतारने के लिए कूद पड़ी। मुजफ्फरपुर के चुनाव में जार्ज भले ही हार गए, लेकिन अपने चहेतों के हीरो बने रहे। नीतीश तब भी उन्हें खराब सेहत का हवाला देते हुए राज्यसभा में भेजने की बात कर रहे थे। लेकिन उसूल वाले बूढ़े समाजवादी शेर को यह गवारा नहीं हुआ। ऐसे में वही शेर जब सिर्फ तीन महीने पुरानी बात से ही पलट जाए तो चाहने वालों को निराशा तो होगी ही।
जार्ज को राज्यसभा में भेजकर नीतीश कुमार की छवि एक ऐसे शिष्य के तौर पर उभरी है, जिसके लिए मौजूदा उठापटक की राजनीति में भी भलमनसाहत के लिए जगह बची हुई है। निश्चित तौर पर नीतीश कुमार इसमें सफल रहे हैं। पिछले लोकसभा चुनाव में जार्ज साहब का पत्ता काटने के बाद उनकी आलोचना भी हुई थी। क्योंकि ये जार्ज ही थे, जिनकी अगुआई में पहली बार 1993 में लालू यादव से विद्रोह के बाद बिहार में अलग से समता पार्टी का गठन किया। तब लालू अपने पूरे शवाब पर थे। मीडिया का एक वर्ग जार्ज के कदम की आलोचना भी कर रहा था। तब जार्ज के साथ नीतीश कुमार ही थे। समता पार्टी को लालू विद्रोह का चुनावी मैदान में कोई फायदा भी नहीं हुआ। इसके बाद जार्ज ने रणनीति बदली और बाबरी मस्जिद के ध्वंस के बाद भारतीय राजनीति में अलग-थलग पड़ी भारतीय जनता पार्टी का हाथ थामकर नई शुरूआत की। जार्ज के इस कदम की तब भी आलोचना हुई थी। लेकिन बीजेपी को मिले उनके साथ ने नया इतिहास रचा। समता पार्टी के साथ के बाद ही भाजपा से दूसरे दलों के मिलने का रास्ता खुला, जिसकी परिणति एनडीए के सरकार के रूप में आई। नीतीश तब से जार्ज के साथ हैं। यही वजह है कि पिछले लोकसभा चुनाव के दौरान जार्ज को टिकट ना देने के लिए नीतीश एक वर्ग के कोपभाजन बने।
जार्ज भले ही पिछला लोकसभा चुनाव हार गए, भले ही खराब सेहत के चलते वे खड़े होने और बोलने में असमर्थ हो गए हों, लेकिन उनके जरिए व्यवस्था की मुखालफत की राजनीति करने वाले एक वर्ग की आस जिंदा रही। जार्ज को टिकट से इनकार उन्हें नीतीश विरोध का हथियार मुहैया कराता रहा है। पिछले महीने रामजीवन सिंह की अगुआई में जार्ज के पुराने साथियों ने दिल्ली में एक बैठक करके नीतीश विरोध की नई रणनीति बनाई थी। इसमें जार्ज की चुनावी राजनीति की कमान संभालते रहे कई पुराने समाजवादियों की शिरकत के बाद नीतीश विरोधियों को लग रहा था कि उनका विरोध जार्ज के बहाने परवान चढ़ जाएगा। यहां ध्यान देने की बात ये है कि टिकट से इनकार के बाद दिग्विजय सिंह भी नीतीश के विरोध में खड़े हैं। विद्रोह के बावजूद दिग्विजय सिंह की जीत के बाद से ही नीतीश विरोधी खेमे के नेता उनसे उम्मीद लगाए हुए हैं। वैसे भी जार्ज से दिग्विजय सिंह की नजदीकी कोई छुपी हुई बात नहीं है। इसके बावजूद दिग्विजय सिंह जार्ज के पुराने साथियों की इस बैठक में शामिल नहीं थे। नीतीश को पता है कि उनके सुशासन की चाहे जितनी अच्छी-अच्छी चर्चा हो, ये सच है कि उनके भी विरोधी कम नहीं हैं। और उनके विरोधी मौके की ताक में हैं। लेकिन नीतीश कुमार ने जार्ज को राज्यसभा में भेजकर अपने इन विरोधियों के दांव को पूरी तरह से पलट दिया है। यही वजह है कि जार्ज का राज्यसभा में जाना उनके साथियों को भले ही नहीं पच रहा है, लेकिन नीतीश के इस दांव के आगे वे चुप बैठने के लिए मजबूर हो गए हैं। शपथग्रहण के दिन के अखबारों में छपे फोटो जिन्होंने देखे हैं, उन्हें पता है कि जार्ज के साथ एक अरसे बाद उनकी पत्नी लैला कबीर दिखी हैं। उनके साथ छाया की तरह रहने वाली जया जेटली इस परिदृश्य से गायब हैं। जनता परिवार को करीब से जानने वाले जानते हैं कि जया का समता पार्टी में अलग ही वजूद था। मुजफ्फरपुर के चुनाव में भी वे जार्ज के साथ थीं। लेकिन वे इस बार गायब हैं। समझने वाले समझ सकते हैं कि जार्ज के साथी उनके बदलते आभामंडल को भी लेकर परेशान हैं।
सियासी अंत:पुर के तमाम खेल के बावजूद जार्ज की संसद में उपस्थिति के अपने खास मायने हैं। लेकिन अफसोस की बात ये है कि समाजवाद का ये बूढ़ा शेर संसद में फिलहाल निर्णायक उपस्थिति जताता नहीं दिख रहा।

Monday, September 7, 2009

नीतीश विरोध में कितना कामयाब हो पाएगा लोकमोर्चा


उमेश चतुर्वेदी
अंग्रेजों की वादाखिलाफी से परेशान होकर गांधीजी ने मुंबई के ग्वालिया टैंक मैदान से भारत छोड़ो का नारा दिया था। इस ऐतिहासिक ऐलान के ठीक 67 साल बाद समाजवादी नेताओं ने एक बार फिर नई लड़ाई के ऐलान के लिए मुंबई की को ही चुना। निश्चित तौर पर समाजवादी नेताओं के इस निशाने पर इस बार उनके अपने ही साथी और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार हैं। कहावत है कि समाजवादी छह महीने साथ नहीं बैठ सकते तो दो साल दूर भी नहीं रह सकते। समाजवादी आंदोलन का यह पसोपेश मुंबई की इस पूरी बैठक के दौरान दिखता रहा। जहां दूसरी पंक्ति के नेता बाकायदा नाम लेकर नीतीश कुमार पर निशाना साधते रहे, लेकिन जिन दिग्विजय सिंह को इसकी निर्णायक लड़ाई की कमान सौंपी गई, उनके समेत किसी भी बड़े नेता ने ना तो नीतीश का नाम लिया, ना ही उन पर सीधा हमला किया।
मुंबई की धरती पर एक बार फिर समाजवादियों के पसंदीदा शब्द लोक को लेकर लोकमोर्चा बना, जिसकी अगुआई दिग्विजय सिंह को सौंपी गई है। चूंकि इसे अभी विधिवत राजनीतिक पार्टी नहीं बनाया गया है, यही वजह है कि इस मोर्चे के राष्ट्रीय संयोजक की जिम्मेदारी दिग्विजय सिंह को सौंपी गई है। इस लोकमोर्चा को उन सभी समाजवादी नेताओं का साथ मिला है, जो ना तो नीतीश कुमार के साथ हैं, ना ही लालू और मुलायम सिंह के साथ। मुंबई में इस मोर्चे के ऐलान के बाद जिस तरह बिहार से आए गैर नीतीश और गैर लालू समाजवादी नेताओं ने हुंकार भरी, उससे साफ है कि आने वाले दिनों में ये मोर्चा एक राजनीतिक दल का गठन जरूर किया जाएगा और इसके संघर्षों के निशाने पर रहेंगे नीतीश कुमार। यानी साफ है कि बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार को अब विधिवत अपने एक और पुराने साथी दिग्विजय सिंह की अगुआई वाले मोर्चे का विरोध झेलना होगा। इस विरोधी खेमे में उनके कभी के साथी रहे रामजीवन सिंह और गजेंद्र हिमांशु के साथ ही इंद्रकुमार के साथ ही पूर्व विधायक शिवनंदन सिंह और मौजूदा निर्दलीय विधायक किशोर कुमार मुन्ना भी शामिल हैं।
बहरहाल नीतीश कुमार के विरोध की पूर्वपीठिका उसी दिन बन गई थी, जिस दिन उन्होंने बांका से चुनाव लड़ने की तैयारी में जुटे अपने पुराने साथी और पूर्व केंद्रीय मंत्री दिग्विजय सिंह का टिकट काट दिया। दिग्विजय ने बिना देर लगाए राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया और चुनावी मैदान में कूद पड़े। निश्चित तौर पर इसके लिए उन्हें अस्वस्थ ही सही उनके नेता जार्ज फर्नांडिस का समर्थन रहा ही, नीतीश की मौजूदा सोशल इंजीनियरिंग में किनारे किए जा चुके बिहार के तमाम नेताओं का भी साथ मिला। हिंदी पत्रकारिता के शलाका पुरूष प्रभाष जोशी, अनुराग चतुर्वेदी और क्रांति प्रकाश समेत तमाम शुभचिंतकों की सलाह के बाद चुनावी मैदान में उतरे दिग्विजय ने जीत हासिल की तो उनका वैसे ही स्वागत हुआ, जैसा उस अभिमन्यु का होता – जो चक्रव्यूह तोड़ कर बाहर आता। दिग्विजय इस तथ्य को जानते हैं, शायद यही वजह है कि हर मौके पर वे अभिमन्यु को याद करना नहीं भूलते। मुंबई में भी उन्होंने कहा कि अभिमन्यु तो चक्रव्यूह नहीं तोड़ पाया था, लेकिन उन्होंने जनता के सहयोग से ऐसा कर दिखाया। इस जीत के बाद से ही दिग्विजय सिंह पर बिहार में अलग से नई पार्टी बनाने का दबाव बढ़ने लगा था। उम्मीद तो ये भी थी कि समाजवाद का बूढ़ा शेर यानी जार्ज भी उनका साथ देंगे। लेकिन नीतीश ने दांव लगाकर जार्ज साहब को राज्य सभा में भेज कर उन्हें दिग्विजय से दूर कर दिया है।
लालू यादव और राम विलास पासवान जैसे नीतीश विरोधियों की चुनावी मैदान में दुर्गति ने दिग्विजय समर्थकों ने उन पर नई पार्टी बनाने का दबाव बढ़ा दिया। उनकी इस मुहिम में पुराने समाजवादी रघु ठाकुर और विजय प्रताप भी शामिल हो गए और बीते 12 और 13 अगस्त को मुंबई में समाजवादियों को जुटाने का माध्यम बना एक संवाद, जिसका विषय था - वर्तमान राजनीतिक संकट और लोकतांत्रिक समाजवाद का भविष्य। मुंबई की इस संवाद चर्चा पर बिहार की राजनीति की पैनी निगाह लगी हुई थी। लोगों में उत्सुकता इस बात को लेकर थी कि इस बैठक में जार्ज फर्नांडिस शामिल होते हैं या नहीं। लेकिन ऐसे लोगों की उम्मीदों पर पानी फिर गया। क्योंकि जार्ज शामिल नहीं हुए। वैसे इस संवाद चर्चा के प्रमुख आयोजक अनुराग चतुर्वेदी के मुताबिक जार्ज को बुलाया भी नहीं गया था।
इस संवाद में बड़े वक्ताओं ने जहां देश की मौजूदा हालत पर जहां तीखे सवाल उठाए, वहीं राजनीतिक सत्ता की चारदीवारी और चिंताओं से लगातार दूर होते जा रहे आम लोगों की हालत पर चिंता जाहिर की। वरिष्ठ पत्रकार प्रभाष जोशी ने जब ये कहा कि देश की राजनीति के लिए विद्यावती और कलावती पोस्टर ब्वाय बन गई हैं। लेकिन हकीकत में आज देश की करीब 120 करोड जनता उनकी ही तरह जिंदगी गुजारने के लिए मजबूर है। तो मौजूद लोग सोचने के लिए बाध्य हो गए। प्रभाष जी इतने पर ही नहीं रूके। उन्होंने घराना राजनीति के वर्चस्व को तोड़ने की आवश्यकता जताते हुए कहा कि आज हर पार्टी का सुप्रीमो तानाशाह हो गया है। उन्होंने इस प्रवृत्ति को राजनीतिक संस्कृति के लिए खतरनाक बताते हुए कहा कि इससे देश को निजात दिलाने के लिए मोर्चे को नई भूमिका निभानी होगी।
संवाद चर्चा में समाजवादियों ने अपने साथियों की भी कम लानत-मलामत नहीं की। संवाद में लालू यादव और नीतीश कुमार के तानाशाही रवैये को लेकर जमकर सवाल उठे। लेकिन रघु ठाकुर ने इसके लिए अपने पुराने साथियों को ही जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने कहा कि जब समाजवाद का दावा करने वाली पार्टियों में तानाशाहों का जन्म हो रहा था तो हममें से तमाम लोग चुप थे। लेकिन रघु ठाकुर को मौजूदा दौर से उम्मीद कम नहीं हैं। उन्होंने कहा कि मीडिया जिस तरह नकारात्मक चीजों को उछाल रहा है, उसके असर से राजनीतिक दल भी नकारात्मक चीजों की ही ओर ध्यान दे रहे हैं। उनकी बातों से विजय प्रताप भी मुतमईन नजर आए। दलितों की सत्ता में बढ़ती भागीदारी और उनमें बढ़ रहे आत्मसम्मान के भाव का जिक्र करते हुए उन्होंने उम्मीद जताई कि मोर्चा जरूर सकारात्मक भूमिका निभाएगा।
संवाद चर्चा के ही बहाने जिस तरह अपने ही पुराने साथी और जनता दल यू की झारखंड इकाई के पूर्व अध्यक्ष इंदर सिंह नामधारी को दिग्विजय अपने साथ लाने में कामयाब हुए हैं, उससे लोकमोर्चा को लेकर उनके समाजवादी साथियों की उम्मीदें परवान चढ़ रही हैं। नामधारी और दिग्विजय दोनों ही सांसद हैं, लेकिन दोनों में एक अंतर है। दिग्विजय को जनता दल यूनाइटेड ने टिकट नहीं दिया तो पार्टी से विद्रोह करके बांका के चुनावी मैदान में उतरे और जीत हासिल की, वही नामधारी ने पार्टी टिकट को इनकार करके चतरा से निर्दलीय प्रत्याशी के तौर पर लोकसभा पहुंचने में कामयाब रहे हैं। लोकमोर्चा में उनकी मौजूदगी से निश्चित तौर से दिग्विजय और उनके समर्थकों को राहत मिली है। दिग्विजय के लोक मोर्चा का ये कारवां यहीं नहीं रूका। महाराष्ट्र विधान परिषद के सदस्य कपिल पाटिल ना सिर्फ इस मोर्चे में शामिल हुए, बल्कि मोर्चे के नेताओं का स्वागत भी किया। उन्हें मोर्चा में लाने का श्रेय निश्चित तौर पर अनुराग चतुर्वेदी को जाता है। इस संवाद चर्चा में शामिल तो राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के महासचिव डी पी त्रिपाठी भी हुए। लेकिन उन्होंने मोर्चे से दूरी बना रखी है। लेकिन उनकी मौजूदगी से साफ है कि बिहार की राजनीति में राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी दिग्विजय सिंह के लोकमोर्चा के साथ कंधा मिला सकती है।
बिहार में नीतीश कुमार की सरकार की इन दिनों जो लोकप्रियता है, उससे साफ है कि लोकमोर्चा को शुरूआती कामयाबी मिलना आसान नहीं होगा। इसे मोर्चा में शामिल बिहार के पूर्व कद्दावर नेता भी स्वीकार करते हैं। इन पंक्तियों के लेखक ने संवाद चर्चा में शामिल एक नेता से नीतीश की लोकप्रियता के दौर में मोर्चे की सफलता को लेकर जानना चाहा तो उनका जवाब बड़ा मौजूं था। नाम ना छापने के बिना पर उन्होंने कहा कि बिहार में कुर्ता पाजामा वालों यानी नेताओं का काम नहीं हो रहा है, जबकि आम लोगों का काम हो रहा है। ऐसे में नीतीश से निबटना आसान नहीं होगा। इसे रामजीवन सिंह ने यूं नकारा। उनका कहना था कि जब चिलचिलाती गर्मी के बाद हल्की भी बारिश होती है तो वह लोगों को राहत भरी लगती है। रामजीवन सिंह के मुताबिक लालू के पंद्रह साल के कुशासन के बाद आया नीतीश का राज उस हल्की बारिश के ही समान है। लेकिन इससे अच्छी खेती की उम्मीद नहीं की जा सकती। उन्होंने कहा कि इसी तथ्य को आम लोगों को समझाना होगा।
नीतीश कुमार ने अपने राजनीतिक आधार को बढ़ाने के लिए महादलित का जो फार्मूला दिया है, उसे लेकर रामविलास पासवान परेशान हैं। लेकिन उनके पुराने साथी और अब लोकमोर्चा में शामिल हुए नेताओं को परेशानी इस बात की है कि जिस सवर्ण वोटरों के सहारे नीतीश सत्ता में आए हैं, उन्हें लगातार किनारे पर रखा जा रहा है। मोर्चे के नेताओं का तर्क है कि पिछले लोकसभा चुनाव में एक भी ब्राह्मण को टिकट नहीं दिया गया। ठाकुरों और भूमिहार नेताओं को भी नीतीश कोई तवज्जो नहीं दे रहे हैं। लिहाजा अगर जोरदार कोशिश हो तो इन जातियों को गोलबंद करके नीतीश के खिलाफ ताकतवर मोर्चा बनाया जा सकता है।
नीतीश विरोधी ये मोर्चा कितना कामयाब होगा, इसकी परख होनी अभी बाकी है। लेकिन इस मोर्चे को जिस तरह लालू यादव की पार्टी से लेकर जनता दल यू के पुराने नेताओं तक का बिहार में समर्थन मिल रहा है, उससे साफ है कि नीतीश के सामने एक और मोर्चा खुल गया है। इसकी कामयाबी को लेकर मोर्चे में शामिल एक पूर्व मंत्री के बेटे की बातों पर गौर फरमाना ज्यादा मौजूं होगा। उनका कहना था कि 1995 में लालू के खिलाफ जब जार्ज और नीतीश ने मोर्चा संभाला था, तब भी उनका मजाक उड़ाया गया था। किसी ने सोचा भी नहीं था कि लालू की सत्ता को भी चुनौती मिल सकती है। लेकिन लालू हवा हो गए। नीतीश हवा होंगे या नहीं...इसका जवाब तो भविष्य ही बताएगा।

Thursday, August 6, 2009

बाबूजी नहीं आएंगे दिल्ली


उमेश चतुर्वेदी
दक्षिण पूर्वी मानसून महाराज ने दगा दे दी है। वर्षारानी के इंतजार में आंखें पथरा गईं हैं। कभी-कभार हो रही हल्की फुहारों से ही सब्र करना पड़ रहा है। खेती का काम चौपट हो गया है। लिहाजा इस बार गांव में काम कम ही रह गया है। बारिश की खुशखबरी के लिए गंवई मन फोन किए बिना नहीं रहता। लेकिन रोज निराशा ही हाथ लगती है। मानसून नहीं तो खेती नहीं...लिहाजा एक दिन बाबू जी को दिल्ली आने के लिए इसरार कर बैठा। दिल्ली की भागमभाग के बीच गांव कहीं पीछे छूट गया है। अगर कहीं है भी तो सिर्फ मन में..रोज घर लौटते वक्त गांव को जीने की इच्छा बलवती हो उठती है। मन ही मन रोजाना योजनाएं बनती हैं..कि कुछ ऐसा किया जाय को महीना-दो महीना में गांव का चक्कर लग ही जाए। लेकिन अगले दिन सूरज की किरणों के साथ जैसे अंधेरा गायब हो जाता है, गांव को जीने की ये लालसा फुर्र हो जाती है और नून-तेल की चिंता में शुरू हो जाती है एक अंतहीन दौ़ड़..लेकिन मन तो ठहरा गंवई...अंतर्मन में शायद माई और बाबूजी के ही बहाने गांव को जी लेने की इच्छा कहीं दबी हुई है। लिहाजा मैं बाबूजी और माई पर दिल्ली आने के लिए जोर डालने लगा। मोबाइल फोन के उस पार से आ रही आवाज से लगा कि मां हम लोगों से मिलने के लिए उत्सुक तो है...लेकिन बाबूजी की आवाज ठंडी और टाल-मटोल वाली लगी।
इसके साथ ही मुझे बाबूजी की पिछली दिल्ली यात्रा की याद आ गई। आंख का इलाज कराने के लिए उन्हें दिल्ली लाया गया था। यहां के आकर पता चला कि उन्हें सेहत से जुड़ी कई और समस्याएं भी हैं। लिहाजा उनका लंबा इलाज चला। चूंकि इलाज लंबा था, इसलिए उन्हें यहां देर तक ठहरना पड़ा। सुबह तो जैसे उनकी ताजगी में अखबार और चाय के साथ उत्फुल्लता से कट जाती। लेकिन शाम होते ही वे कुछ असहज हो जाते। लगता, वे उदास हैं और अपनी उदासी छुपाने की कोशिश करते वे प्रतीत होते। मैं उनकी परेशानी समझता था। पूरी जिंदगी अध्यापक के तौर पर गांव में गुजार चुके बाबूजी का अपना वहां भरा-पूरा समाज है। शाम को काम से फारिग होने के बाद वे अपने दोस्तों के साथ अड्डेबाजी में जुट जाते हैं। उनके दोस्तों में हर जाति के लोग हैं। ब्राह्मणत्व को किनारे रख कर अड्डेबाजी करने के लिए उनकी अपनी बिरादरी में आलोचना भी होती रही है। लेकिन वे कभी अपने दोस्तों से दूर नहीं हुए। लेकिन दिल्ली में वह समाज मिलने से रहा। फ्लैटों के बंद दरवाजे के पीछे टेलीविजन के सहारे चलती जिंदगी उन्हें रास नहीं आई। मुझे याद है जिस दिन वे दिल्ली से गांव लौटे तो उन्होंने पीछे मुड़कर देखना भी गवारा नहीं हुआ। उनका जाना ऐसे प्रतीत हो रहा था, मानो लंबी यातना से छूटा कैदी भाग रहा हो ।
हमारा दावा है कि आने वाले दिनों में शहरी आबादी में तेजी से विस्तार होगा। आजादी के बाद तकरीबन अस्सी फीसदी अपनी आबादी गांवों में रहती थी। अब ये आंकड़ा 67 के नजदीक पहुंच गया है। सच है कि गांवों के मुकाबले शहरों में जिंदगी गुजारने के लिए तमाम तरह की सुविधाएं हासिल हैं। इसके बावजूद एक पूरी की पूरी पीढ़ी ऐसी है, जिसे ये सुविधाएं नहीं लुभा पातीं। कवि शमशेर के शब्दों में कहें तो वह पीढ़ी गाती फिरती है-
अच्छी अपनी ठाठ फकीरी, मंगनी के सुखसाज से। शहर में सुखसाज तो है, लेकिन ठाठ नहीं है और मानवीयता और रिश्तों की उष्मा का तो खैर कम ही दर्शन होता है। मानव ही क्यों, जानवर भी अगर अपना समाज बनाता है तो उसमें इस उष्मा का ही बड़ा योगदान होता है। बाबूजी जैसे लोगों की पीढ़ी ने अपनी पूरी जिंदगी इसी उष्मा के सहारे गुजारी है। लिहाजा उन्हें जीवन की सांध्य बेला में सुखसाज से ज्यादा ठाठफकीरी में लिपटा अपना जीवंत समुदाय ही ज्यादा मुफीद लगता है। लिहाजा उनके लिए अपना गांव छोड़ना और दिल्ली में रहना...नरक भोगने जैसा है। इसीलिए वे दिल्ली या मुंबई का रूख करने से बचते हैं।
हमने अपने गांव में देखा है। एक दंपत्ति के सभी बच्चे उंची तालीम हासिल कर मोटी पगार और रसूख वाली नौकरियों में चले गए। सभी बच्चे माता-पिता को जोर देकर गांव से अपने साथ ले जाते रहे, लेकिन माता-पिता साल-छह महीने बाद लौटते रहे। उनके लिए गांव छोड़ना अपनी माटी से दगाबाजी करने जैसा रहा। हमारे एक और मित्र हैं। उनकी मां का देहांत हो गया है। प्रोफेसर पिता रिटायर हो गए हैं। मित्र अपने भाई के साथ दिल्ली में अच्छी तरह सेटल हैं। लेकिन उनकी रोजाना की सांझ पिता की चिंता में ही गुजरती है। क्योंकि पिता भी दिल के मरीज हैं। लेकिन पिता हैं कि दिल्ली रहने को तैयार नहीं। जोर देने पर दिल्ली आते हैं तो दस – पंद्रह दिन में ही उबकर वापस लौट जाते हैं।
आजादी के आंदोलन या नेहरू के स्वप्नवादी दौर में पैदा हुई इस पीढ़ी के ही सहारे गांवों का वजूद बचा हुआ है। जहां तमाम पेंचीदगियों के बावजूद जिंदगी की एक धार अब भी बह रही है। दुर्भाग्य ये कि अब ये पीढ़ी अपनी विदाई की बेला में है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये है कि हमारे जैसे लोग क्या दिल्ली या मुंबई की कथित जिंदगी को कभी अपनी इस पूर्ववर्ती पीढ़ी की तरह निर्ममता पूर्वक छोड़ पाएंगे। या फिर जिंदगी की धार में डूबने का सिर्फ सपना ही देखते रह जाएंगे।

Monday, July 20, 2009

डंडे का धंधा


उमेश चतुर्वेदी
बुढ़ापे का सहारा, विकलांगों का साथी रही छड़ी का धंधा तो हम में से शायद ही कोई होगा, जिसने नहीं देखा होगा। लेकिन डंडे का धंधा...पहली बार सुनकर आपको हैरत होनी स्वाभाविक है। लेकिन हमने तो डंडे का धंधा जब अपनी नंगी आंखों से देखा तो हमें कितनी हैरानी हुई होगी, इसका अंदाजा लगाना आसान होगा। डंडे के इस धंधे से हमारा साबका पड़ा शिमला की जाखू पहाड़ियों पर विराजमान हनुमान मंदिर पर। सैलानियों की पसंदीदा जगहों पर स्थित मंदिरों पर जाते ही सबसे पहले साबका पड़ता है प्रसाद और पूजा की सामग्री बेचने वाले लपका किस्म के दुकानदारों से। पूरे शहर में प्रसाद और पूजा की सामग्री भले ही सस्ती होगी, लेकिन क्या मजाल कि मंदिर के ठीक दरवाजे पर स्थित इन दुकानों पर पूजा का सामान सस्ता मिले। लेकिन जाखू मंदिर पर दूसरी हैरत हमारा इंतजार कर रही थी। यहां वैसी महंगाई नजर नहीं आई, जिसके हम दूसरे तीर्थस्थलों पर आदी रहे हैं।
लेकिन यहां प्रसाद बेचते वक्त दुकानदार पास पड़े बेंत के तीन से पांच फीट लंबे डंडे के ढेर की ओर इशारा करना नहीं भूलता था। चूंकि किसी तीर्थ स्थल पर पूजा सामग्री के साथ पहली बार डंडा बिकते देखा तो हमने पहले तो कोई टोटका सोचा। हमें लगा कि शायद यहां हनुमान जी को डंडा भी चढ़ाया जाता होगा। लेकिन हमारा ऐसे टोटकों में कोई भरोसा नहीं रहा, लिहाजा हमने डंडा खरीदने से मना कर दिया। लेकिन प्रसाद लेकर जैसे ही हमने मंदिर की चढ़ाई की ओर पहला कदम रखा, हमें डंडे की वकत और जरूरत समझ में आ गई। हनुमान जी का मंदिर हो और बंदरों की फौज वहां ना हो, ऐसा आपने कहीं नहीं देखा होगा। तो जाखू भला इससे कैसे दूर रहता। बंदरों की फौज ने हमें घेर लिया। कई तो दो-दो पैरों पर खड़े होकर हमारे हाथ में लटके थैले की ओर लपक पड़े। डर के मारे मेरी छोटी बेटी मुझसे चिपक गई तो बड़ी श्रीमती जी का हाथ थामे आगे बढ़ने लगी। इसी बीच एक बंदर ने झपट्टा मारा और पॉलिथीन के बैग का हत्था ही श्रीमती जी के हाथ में रह गया, बाकी पूरा बैग हनुमान जी के जीते-जागते गणों के हाथ। डर के मारे बच्चे चिल्लाने लगे। इसके बाद तो मैंने सारी श्रद्धा एक किनारे रखी और मेरा गंवई अनुभव बंदरों पर पिल पड़ा। मेरे हाथ में लकड़ी का एक गिफ्ट आइटम था। उसके ही आगे बंदरों की फौज भाग खड़ी हुई। अभी हम इनसे निबटे ही थे कि आगे चल रहे एक दंपति की चीख-पुकार ने वहां फैली शांति में खलल डाल दी। दरअसल उस ग्रुप की महिला की आंखों से चश्मा ही बंदर महाराज छीन ले गए। इस दौरान महिला की आंख में बंदर का नाखून चुभते रह गया। हालांकि चेहरा लहू-लुहान जरूर हो उठा था।
बाद में मंदिर से लौटने के बाद पता चला कि प्रसाद के साथ बिक रहा डंडा दरअसल हनुमान जी को चढ़ाने के लिए नहीं, बल्कि उनके आक्रामक हो चुके गणों को दूर रखने में मदद करता है। जो ज्यादा चालाकी दिखाने की कोशिश करता है, उसके आंख से चश्मा गायब हो जाता है या फिर हाथ से बैग। मंदिर प्रशासन इन बंदरों को भगाने के लिए कोई मुकम्मल इंतजाम नहीं करता। उसने जगह – जगह बंदरों को खाना ना देने और सावधान रहने की चेतावनी देकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली है। लिहाजा डंडे का धंधा पूरी शिद्दत से जारी है। आप अगर डंडा खरीदना ना चाहें तो आपको दुकानदार किराए पर भी डंडा दे सकता है। किराया भी महज पांच रूपए। शिमला की पहाड़ियों पर स्थित इस हनुमान की दूर-दूर तक प्रसिद्धि इसलिए है, क्योंकि कहा जाता है कि लक्ष्मण को बचाने के लिए संजीवनी बूटी लाते वक्त हनुमान जी कुछ देर तक यहां सुस्ताने के लिए रूके थे। जाहिर है यहां सैलानियों की भारी भीड़ रोजाना जुटती है। ऐसे में आप अंदाजा लगा सकते हैं कि डंडे का ये धंधा कितनी बड़ी कमाई का स्रोत बन पड़ा है।
यूं तो बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के लोग डंडे के धंधे के लिए बदनाम रहे हैं। लेकिन उनका धंधा डंडा बेचने की बजाय डंडे के दम पर काम कराना या काम निकालना रहा है। पिछले कुछ वक्त से महाराष्ट्र में यही काम राज ठाकरे की महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना कर रही है। लेकिन उनका डंडे का धंधा सीधे पैसे कमाने के लिए नहीं , बल्कि वोटों की फसल काटने के लिए है। एक बार वोटों की फसल तैयार हो गई तो पैसे की भला कहां कमी रहती है। पिछले आम चुनावों में शिवसेना - बीजेपी के वोट बैंक में जिस तरह सेंध लगाई, उससे साफ है कि राज ठाकरे का धंधा कामयाब रहा। वैसे एक मुहावरा भी प्रचलन में है – डंडे के दम पर काम कराना। ये मुहावरा चलन में इतना है कि बंदूक और पिस्तौल के दम पर अच्छा चाहे बुरा, जैसा भी काम कराएं, कहा तो यही जाता है कि डंडे के दम पर काम हुआ। सही मायने में ये भी डंडे का धंधा ही है। ये बात और है कि जाखू में डंडे का धंधा, बाकी जगहों के व्यवसाय से तो अलग है ही।

Friday, June 26, 2009

ऐसे भी होते हैं लोग ....

उमेश चतुर्वेदी
जेठ की तपती दोपहरी के बीच शिमला जाकर इच्छा तो एक ही होती है... किसी पहाड़ी चोटी पर जाकर ठंडी हवाओं के बीच दूर-दूर तक पसरी वादियों का दीदार करें। लेकिन ऐसा कहां हो पाता है। मैदानी इलाके में रहने के आदी मानव मन को तपती गर्मी से निजात मिली नहीं कि पैरों में जैसे पंख लग जाते हैं और शुरू हो जाता है घूमने का सिलसिला...ठंडे मौसम के बीच पसरी खूबसूरत वादियों में फैले यहां के माल रोड और रिज इलाके का चप्पा-चप्पा छान मारने के लिए जी उछल पड़ता है।
जून की तपती गरमी मे दिल्ली से निकलकर शिमला पहुंचा हमारा मन भी कहां मानने वाला था। पूरा दिन कभी अंग्रेजों की ग्रीष्मकालीन राजधानी रही शिमला को अपने पैरों तले नापने में गुजर गया। शाम होते – होते पैरों ने जवाब देना शुरू कर दिया, लेकिन मन भला कहां मानने वाला था। लेकिन थकान और आंखों में तिर रही नींद के आगे पहले दिन हमें झुकना ही पड़ा। जाहिर है इसके बाद होटल में अपना बिस्तर ही सबसे बड़ा साथी नजर आया।
लेकिन शिमला आएं और लार्ड डफरिन के बनवाए भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान का दर्शन ना करें..ये कैसे हो सकता था। अंग्रेजों की गर्मी की राजधानी में कभी वायसराय का ये निवास हुआ करता था। ब्रिटिश और बेल्जियन वास्तुकला का बेहतरीन नमूना ये भवन आजादी के बाद भारत के राष्ट्रपति का ग्रीष्मकालीन निवास बना। तब सिर्फ गरमियों में कुछ दिनों के लिए राष्ट्रपति यहां रहने आते थे। पढ़ाई-लिखाई के शौकीन रहे दूसरे राष्ट्रपति डॉ.एस. राधाकृष्णन को इस खूबसूरत और विशाल भवन का बाकी समय खाली रहना खलता रहा, लिहाजा उन्होंने इसे 1965 में भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान को दान दे दिया। तब से यहां पोस्ट डॉक्टरल रिसर्च और अध्ययन मनन जारी है। बहरहाल आधुनिक भारत के इस बेहतरीन विद्यास्थान को देखने की इच्छा पढ़ने – लिखने में दिलचस्पी रखने वाले हर इंसान को होती है। लिहाजा सपरिवार हम भी माल रोड से भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान जा पहुंचे। पहले तो काफी देर तक टैक्सियों का इंतजार किया। साझे में चलने वाली इन टैक्सियों का कुछ ही महीनों से हिमाचल प्रदेश पर्यटन विभाग ने शुरू किया है। लेकिन उस दिन पता नहीं क्या वजह रही..घंटों इंतजार के बाद भी टैक्सियों के दर्शन नहीं हुए। तिस पर तुर्रा ये कि उनकी इस गैरहाजिरी के बारे में जानकारी देने की जरूरत भी कोई नहीं समझ रहा था। मजबूरी में हम बाल-बच्चों समेत पैदल ही उच्च अध्ययन संस्थान की ओर चल पड़े। उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में लार्ड डफरिन द्वारा बनवाए इस भवन को देखने का लुत्फ उठाने के बाद जब होटल लौटने का वक्त हुआ तो सारा उत्साह काफूर हो चुका था। दरअसल लौटते वक्त की चढ़ाई के लिए पैर साथ नहीं दे रहे थे। लेकिन मजबूरी में पैदल लौटना ही था। घिसटते हुए हम अभी कुछ सौ कदम ही चले होंगे कि अचानक हमारे बगल में एक जिप्सी आकर रूकी। सेना पुलिस के जवानों की इस जिप्सी को देखकर हैरत होना स्वाभाविक था। हम अभी कुछ समझ पाते कि जिप्सी में से एक सवाल उछला – कहां जाना है?
जैसा कि सुरक्षा बलों की आवाज में जैसी तल्खीभरी कड़क होती है, वैसा कुछ नहीं था। हमें चूंकि माल रोड लौटना था, लिहाजा हमारा जवाब भी वही था। जिप्सी में सवार सेना पुलिस के दोनों जवान जवाब सुनकर कुछ देर ठिठके। दरअसल उन्हें कहीं और जाना था। लेकिन उन्होंने हमारे साथ छोटे बच्चों को देखा। इसके बाद उनका कर्तव्यबोध जाग गया। उन्होंने गाड़ी में बैठने का इशारा किया। इसके बाद हमने कब माल रोड की चढ़ाई पूरी कर ली, हमें पता ही नहीं चला। इस बीच उनसे हमारी निजी बातचीत भी हुई। मैं उनका नाम पूछते ही रह गया...लेकिन उन्होंने नाम नहीं बताया। बस उनका यही जवाब था, दूर-देश से आए लोगों के हम इतना भी काम आ सकें..बस यही काफी है। जब तक हम गाड़ी से उतरते, वे लोग जिस तेजी से आए थे, उसी तेजी से अपनी राह लौट गए।
जो हिमाचल सरकार सैलानियों के ही दम पर जमकर कमाई कर रही है..उसे भी ये आवाज सुननी चाहिए। टूरिस्ट स्थलों पर ठगी और लूट की घटनाएं देखते रहने के लिए आदी रहे हमारे मन के लिए तो ये अपनापा सुखद हैरत में डालने के काफी है।

Monday, June 8, 2009

ये हिंदी की जीत है....

उमेश चतुर्वेदी

ज्योतिरादित्य सिंधिया, जितिन प्रसाद, सचिन पायलट और अगाथा संगमा में अपने पिताओं की विरासत की राजनीति के अलावा क्या समानता है..ये सवाल कुछ लोगों को अटपटा जरूर लग सकता है। लेकिन जिन्होंने 28 मई को केंद्रीय मंत्रिमंडल का शपथ ग्रहण समारोह देखा है, उन्हें इस सवाल का जवाब मालूम है। अभिजात्य माहौल में पले-बढ़े, महंगे कान्वेंट और विदेशी विश्वविद्यालयों में पढ़े-लिखे इन नौजवानों के लिए अंग्रेजी वैसी ही है, जैसे छोटे-शहरों और गांवों के पिछड़े स्कूलों में पढ़े लोगों की सहज जबान हिंदी है। लेकिन इन नौजवान नेताओं ने राष्ट्रपति भवन के गरिमामय माहौल में जिस तरह हिंदी को अपनाया और देश की अहम भूमिका निभाने की शपथ इसी जबान में ली, उससे साफ है कि नए भारत को समझने का उनका नजरिया मनमोहन मंत्रिमंडल में शामिल उनके दूसरे साथियों से कुछ अलग है।
22 मई को जब मनमोहन मंत्रिमंडल की पहली खेप के 19 मंत्रियों में से महज चार ने ही हिंदी में ही शपथ ली थी। तब इसे लेकर खासकर हिंदी क्षेत्रों में हैरतनाक प्रतिक्रिया हुई थी। गैर हिंदीभाषी मंत्रियों को एक बारगी माफ भी कर दें तो ठेठ हिंदीभाषी इलाके के नेताओं का अंग्रेजी में शपथ लेना कम से कम हिंदीभाषी क्षेत्रों के लोग पचा नहीं पाए। वैसे कोई हिंदी में मंत्री पद की शपथ ले या फिर अंग्रेजी में, इसे वह नेता विशेष अपना निजी मामला बता सकता है, क्योंकि संविधान ने उसे ये छूट दे रखी है। लेकिन क्या सार्वजनिक जीवन में आए लोगों को इस आधार पर माफ किया जा सकता है। कम से कम उनके ज्यादातर वोटर इससे शायद ही सहमत हों। इसकी वजह ये नहीं है कि हमारी राष्ट्रभाषा हिंदी है और एक आम भारतीय अपने नुमाइंदे से उसका भाग्यविधाता बनने की शपथ हिंदी में ही लेना पसंद करता है। दरअसल पूरे देश में वोट मांगने का जरिया भारतीय भाषाएं ही हैं। जहां हिंदी बोली-समझी जाती है, वहां नेता अपने वोटरों से हिंदी में ही वोट मांगते हैं। जहां हिंदी नहीं है, वहां के नेता अपने वोटरों से उर्दू, बंगला, गुजराती, मराठी, तमिल, मलयालम जैसी स्थानीय भारतीय भाषाओं में ही अपील करते हैं। अहिंदीभाषी इलाकों को छोड़ दें तो हिंदी भाषी इलाकों से चुनकर आए नेताओं का ये फर्ज नहीं बनता कि जिस भाषा में उन्होंने वोट मांगा है, उसी भाषा में अपने लोगों की नुमाइंदगी करें। कपिल सिब्बल, अजय माकन या श्रीप्रकाश जायसवाल ने शायद ही किसी से अंग्रेजी में ही वोट मांगा होगा। लेकिन उन्होंने जिस तरह अभिजात्य अंग्रेजी में शपथ ली, उससे लोग हैरत में पड़े। ऐसे लोगों के लिए पूर्वोत्तर के राज्य मेघालय से चुनकर आई अगाथा संगमा करारा जवाब ही मानी जाएंगीं, जिन्होंने गैरहिंदी भाषी होते हुए भी हिंदी में पूरे आत्मविश्वास से शपथ लेकर लोगों का मन मोह लिया, तालियां तो खैर सबसे ज्यादा बटोरी हीं।
आजादी के बाद हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के सवाल पर पूरा देश एकमत था। लेकिन हिंदी को लेकर तत्कालीन नेहरूवादी व्यवस्था के दिल में क्या था, इसका उदाहरण है कि अंग्रेजी में सरकारी कामकाज करने को पंद्रह साल तक के लिए छूट दे दी गई। ऐसा माना गया कि इस दौरान हिंदी अपना असल मुकाम हासिल कर लेगी। लेकिन हुआ ठीक उलटा। सरकारी स्तर पर हिंदी आजतक अपना मुकाम हासिल नहीं कर पाई। लेकिन बाजार ने वह काम कर दिखाया, जो अंग्रेजी वर्चस्व वाली केंद्र सरकार की उपेक्षा के चलते नहीं हो पाया। जिस तमिलनाडु में हिंदी के खिलाफ हिंसक आंदोलन हुए, साठ से दशक में पूरा राज्य जलता रहा। उसी तमिलनाडु के लोग भी अब अपने बच्चों को खुशी-खुशी हिंदी पढ़ा रहे हैं। कभी अंग्रेजी अखबारों के लिए हिंदी की खबरें दोयम दर्जे की मानी जाती थीं। अब अंग्रेजी के ही अखबार चेन्नई में आ रहे इस बदलाव को खुशी-खुशी छाप रहे हैं। ये कोई मामूली बदलाव नहीं है।
एक दौर तक हिंदी फिल्में हिंदी भाषा के राजदूत की भूमिका निभा रही थीं। लेकिन नब्बे के दशक में आई टेलीविजन क्रांति ने इसमें और इजाफा ही किया है। इस दौरान टेलीविजन चैनलों ने हिंदी के प्रसार में जबर्दस्त भूमिका निभाई। कभी बंगाल, तमिलनाडु और कर्नाटक के लोग हिंदी के नाम पर नाकभौं सिकोड़ते थे, लेकिन ये टेलीविजन क्रांति का ही असर है कि अब इन गैर हिंदीभाषी इलाकों के बच्चों की पहली पसंद बंगला, तमिल या मलयालम टेलीविजन चैनल की बजाय हिंदी चैनल में ही काम करना है। इसके लिए उनका एक ही तर्क होता है, हिंदी टेलीविजन चैनल में काम करने से उनकी अखिल भारतीय पहचान बनती है। बंगला या मराठी में काम करने से उनकी दुनिया सिमट जाती है। और उन्हें ये सिमटी हुई दुनिया पसंद नहीं है। उदारीकरण में कई बुराइयां हैं। लेकिन ये भी सच है कि उसने मशहूर अंग्रेजी समालोचक ई एम फास्टर की उस अवधारणा को सच साबित किया है, जिसके मुताबिक अंतरराष्ट्रीय होने की पहली शर्त स्थानीय होना है। उदारीकरण और भूमंडलीकरण के जरिए स्थानीयता का जो महत्व बढ़ा है, उसके चलते हिंदी की ताकत बढ़ी है। मजे की बात ये है कि आज उदारीकरण के दौरान पली-बढ़ी पीढ़ी हिंदी की ताकत समझ रही है। लेकिन जिस मनमोहन सिंह ने इस उदारीकरण को बढ़ावा दिया, उनके ही मंत्रिमंडल के ज्यादातर मंत्री हिंदी और उसकी स्थानीयता की ताकत को नहीं समझ रहे हैं। मनमोहन मंत्रिमंडल के 56 सदस्यों ने अंग्रेजी में ही शपथ ली है, जबकि हिंदी में शपथ लेने वाले महज 22 लोगों ने ही देश की असल राष्ट्रभाषा हिंदी में शपथ ली।
मनमोहन मंत्रिमंडल के ज्यादातर मंत्रियों के इस रवैये से ये मान लिया जाय कि हिंदी अब भी गंवारों और जाहिलों की भाषा है। अंग्रेज हिंदी समेत समस्त भारतीय भाषाओं के लिए वर्नाक्युलर विशेषण का इस्तेमाल करते थे। जो आजाद भारत में भी चलन में है। वर्नाक्युलर लैंग्वेज का मतलब होता है दासों की भाषा। कहना ना होगा आजाद भारत में भी कम से कम हिंदी को लेकर ये मानसिकता शासक वर्ग के एक बड़े हिस्से में अब भी बनी हुई है। तभी हिंदी भाषी इलाके के भी राजनेता को भी सरकारी कामकाज अंग्रेजी में ही करने में गर्व का अनुभव होता है। कई के लिए तो अंग्रेजी का इस्तेमाल अमेरिका और यूरोप तक अपनी पैठ और पहुंच बनाने का माध्यम भी होती है। हालांकि वे अपने उभार को जनतंत्र का नतीजा बताते नहीं थकते। ये बात और है कि भाषा को लेकर उनका ये रवैया कम से कम उनके लोकतांत्रिक दावे को खोखला ही साबित करता है। लेकिन हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि ये पीढ़ी अब धीरे-धीरे बीते दिनों की बात बनती जाएगी। राहत की बात ये है कि हमारे पास अभिजात्य में रचे-पगे और अंग्रेजी माध्यम से पले-बढ़े ज्योतिरादित्य, सचिन, अगाथा या फिर जितिन प्रसाद जैसे नई पीढ़ी के लोग हैं। जो कम से कम अपनी पहली वाली पीढ़ी से भाषा के नाम पर प्रगतिशील और ठेठ देसी समझ जरूर रखते हैं। उम्मीद बनाए रखने के लिए उन पर भरोसा न करने का फिलहाल कोई कारण नजर नहीं आता।

Thursday, May 21, 2009

लोकतंत्र में बहिष्कार बना हथियार

उमेश चतुर्वेदी
हाल में संपन्न हुए आम चुनावों में कम मतदान को लेकर उठते सवालों का दौर अभी तक थमा नहीं है। गरमी के चलते मतदान कम हुआ या फिर वोटरों की उदासीनता इसकी बड़ी वजह बनी, इसे लेकर बहस-मुबाहिसे और चर्चाओं का दौर जारी है। लेकिन इन्हीं चुनावों का जिस बड़े पैमाने पर बहिष्कार हुआ..उस पर अभी लोगों का ध्यान कम गया है। देश के लोकतांत्रिक इतिहास में ये पहला मौका है, जब लोगों ने खुलकर इतने बड़े पैमाने पर वोटिंग का बहिष्कार किया। अब तक लोग या तो वोट डालते रहे हैं या फिर मतदान केंद्र पर जाते नहीं रहे है। लेकिन इस बार जिस तरह तमाम लोकसभा सीटों के खासकर ग्रामीण इलाकों से मतदान के बहिष्कार की खबरें आईं...उससे लोकतांत्रिक भारत की नई तस्वीर उभरती है।
1973 में जयप्रकाश नारायण ने पीपुल्स फॉर डेमोक्रेसी का जो अभियान शुरू किया था, उसका मकसद था निचले पायदान तक लोकतंत्र को पहुंचाना। आज से करीब साढ़े तीन दशक पहले जब जेपी ने ये आंदोलन शुरू किया था..तो उसका मतलब साफ है कि उस वक्त भी देश की रहनुमाई करने वाले सफेदपोश लोगों का ध्यान मजलूम और कमजोर लोगों तक उस शिद्दत से नहीं पहुंच पाया था..जितनी की उम्मीद की जा रही थी। अगर 1952 के पहले आमचुनाव को छोड़ दें, तो बाद के तकरीबन सारे चुनावों में मतदाताओं को वायदों का लंबा पिटारा थमाया जाता रहा है और चुनाव बीतने के बाद उन्हें तबियत से भुलाया जाता रहा है। जयप्रकाश नारायण इसके लिए मौजूदा लोकतांत्रिक ढांचे को ही जिम्मेदार मानते थे। यही वजह है कि जब उन्होंने पीपुल्स फॉर डेमोक्रेसी का आंदोलन छेड़ा तो उसमें उनकी एक मांग जनप्रतिनिधियों को वापस बुलाने की भी थी। उनका मानना था कि देश के लोकतांत्रिक ढांचे में जनप्रतिनिधि, चाहे वह सांसद हो या विधानसभा का सदस्य..उसे तभी जिम्मेदार बनाया जा सकेगा, जब लोगों को उसे वापस बुलाने का अधिकार हो। स्विटजरलैंड जैसे कुछ देशों में ये नियम है भी। जेपी के आंदोलन में राइट टू रिकाल को भी अहम स्थान दिया गया था।
1973 के बाद से लेकर अब तक देशभर की नदियों में ना जाने कितना पानी बह गया है। राजनीति की दुनिया में भी ना जाने कितने बदलाव हो चुके हैं। लेकिन जयप्रकाश नारायण का ये सपना पूरा नहीं हो पाया। लेकिन लोग अब जागरूक होने लगे हैं। अब लोगों को लगने लगा है कि संसद और विधानसभा में हरे-लाल कालीनों पर पहुंचने वाले नेताओं की वकत उनके वोटों की ही बदौलत है। लोगों को ये भी पता चल गया है कि जब तक वे दबाव नहीं बनाएंगे, उनके ये नेता उनकी मांगों पर ध्यान नहीं देंगे। और एक बार जीत गए तो फिर जनता के दरबार में उनकी वापसी संभव नहीं होगी। रही बात उनकी जरूरी सुविधाएं भी पूरा करने की ...तो नेता शायद ही याद रखें। लिहाजा लोग पहले भी वोट के बहिष्कार का रास्ता अख्तियार करते रहे हैं। लेकिन बीते चुनावों में इस बार ये चलन कुछ ज्यादा ही दिखा। हरियाणा के जींद जिले के झांझकला के लोग पानी की गुहार लगाते- लगाते थक गए। लेकिन उनकी आवाज से उनके प्रतिनिधियों के कानों पर जूं नहीं रेंगीं। लिहाजा इस बार उन्होंने वोट के बहिष्कार का ऐलान कर दिया। उनके ऐलान ने हर पार्टी के नेताओं को मुश्किल में डाल दिया। शायद ही किसी बड़े दल का नेता था, जो वोटरों के दरबार में हाजिरी लगाने नहीं पहुंचा। उत्तर प्रदेश के झांसी जिले के सिमरिया के लोग जहां विकास को लेकर वोटिंग के बहिष्कार पर आमादा हो गए तो टिकरा तिवारी, भारौनी, मजरा कंचनपुरा के लोगों ने कंचनौधा बांध में अधिग्रहीत की गई अपनी जमीनों के मुआवजे को पूरा करने की मांग को लेकर वोटिंग का बायकाट किया। औरैया जिले के गोपालपुर, चिरैयापुर और नवलपुर के लोगों का नारा ही था, विकास नहीं तो वोट नहीं। वोटिंग बहिष्कार की ये लिस्ट सिर्फ उत्तर प्रदेश से ही इतनी लंबी रही कि पूरा पेज ही भर जाय।
ऐसा नहीं कि उनके बहिष्कार को तुड़वाने और मतदान केंद्रों पर लाने के लिए उन्हें दबाव-धमकियां नहीं दी गईं। लेकिन गांधी की राह पर चलते हुए लोगों ने हर दबाव का मुकाबला किया और वोट डालने नहीं पहुंचे। फतेहपुर जिले के जुनैदपुर, सीतापुर के बिजनापुर, उन्नाव के बैरी रसूलपुर, बांगड़मउ, बिशनपुर, लढ़पुर के लोगों ने भी कुछ ऐसी ही हुंकार भरी कि नेताओं को दिन में ही तारे नजर आने लगे। मिश्रिख के गोंदरामऊ और गपोली इलाकों में भी लोगों ने कह रखा था कि वे इस बार नेताओं के झांसे में नहीं आने वाले हैं। फिरोजाबाद जिले के दलियापुर, नगला दुहिली और नसरीपुर के कुछ लोगों को पुलिस और अफसरों का कोपभाजन भी बनना पड़ा। लेकिन वे वोटिंग बहिष्कार के अपने फैसले से टस से मस नहीं हुए।
ऐसी खबरें तकरीबन देश के हर उस हिस्से से आईं, जो आजादी के बासठ साल बाद भी बुनियादी सहूलियतों से महरूम हैं। लोगों को लग गया है कि उनके वोट में कितनी ताकत है। अगर ऐसा नहीं होता तो नेताओं के मान-मनौव्वल का दौर बुनियादी सुविधाओं से दूर इन गांवों की धूल भरी गलियों के बीच नहीं चल पाता। कई जगह नेताओं को मुंह छुपाने के लिए मजबूर नहीं होना पड़ता। लोगों में आई इस तबदीली को लोकतांत्रिक प्रक्रिया में लोगों की भागीदारी और उनकी बढ़ती जागरूकता के तौर पर देखा जाना चाहिए। अगर ऐसे लोगों को जेपी द्वारा शुरू किए गए राइट टू रिकॉल का अधिकार मिल जाए तो सोचना पड़ेगा कि देश की लोकतांत्रिक दशा और दिशा क्या होगी।

Sunday, May 10, 2009

संजय दत्त को अब क्यों याद आ रहा है मुसलमान का बेटा होना


उमेश चतुर्वेदी
अपनी जादू की झप्पी से फिल्मी पर्दे पर लोगों की समस्याएं दूर करने में मुन्नाभाई भले ही सफल रहे हों, लेकिन राजनीति के अखाड़े में उनकी ये झप्पी उन्हीं पर भारी पड़ती नजर आ रही है। उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती को जादू की झप्पी देने की उनकी कोशिश को चुनाव आयोग ने सही नहीं माना और आखिरकार प्रतापगढ़ के जिलाधिकारी और जिला निर्वाचन अधिकारी को उन्हें लिखित में माफी मांगनी पड़ी। चूंकि चुनाव आयोग और अधिकारियों ने इस बयान का संज्ञान लिया, इसलिए कम से कम चुनाव प्रचार में अब संजय दत्त की इस झप्पी पर रोक तो लगती नजर आ रही है।
लेकिन इससे भी कहीं ज्यादा वे एक और खतरनाक बयान देते फिर रहे हैं। लेकिन इसकी तरफ किसी का ध्यान नहीं जा रहा है। संजय दत्त कहते फिर रहे हैं कि जब वे टाडा के तहत जेल में बंद थे तो उन्हें पुलिस वाले मुसलमान का बेटा कहकर पिटाई किया करते थे। संजय कहते फिर रहे हैं कि चूंकि उनकी मां मुसलमान थीं, इसलिए उन्हें पुलिस वाले जेल में उत्पीड़ित करने का कोई मौका नहीं छोड़ते थे। संजय दत्त ये बयान जिस समाजवादी पार्टी के मंचों से देते फिर रहे हैं, सियासी और वोटरों की दुनिया में माना जाता है कि वह मुसलमानों की रहनुमाई करती है। लिहाजा मुन्नाभाई के इस बयान पर जगह-जगह तालियां जमकर बज रही हैं और इस पर कोई सवाल नहीं उठ रहा है। अव्वल तो भारतीय जनता पार्टी को ये सवाल उठाना चाहिए था, हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण की उसकी कोशिशों में एक कोशिश और भी जुट जाती। लेकिन उसे भी संजू बाबा का ये बयान भड़काऊ और सवालिया घेरे वाला नहीं लग रहा है। बहुजन समाज पार्टी और कांग्रेस इस बयान पर इसलिए सवाल नहीं उठा पा रहे हैं, क्योंकि उन्हें लग रहा है कि चुनावी दौर में जो भी मुस्लिम मतदाता उसकी ओर आकर्षित हो रहे हैं, वे कहीं विदक नहीं जायं।
लेकिन इससे इस बयान पर सवाल उठाने की गुंजाइश खत्म नहीं हो जाती। ये सच है कि संजय दत्त की मां नरगिस दत्त भले ही मुसलमान थीं, लेकिन उनका नाम सामने आते ही इस देश के जेहन में मदर इंडिया, श्री चार सौ बीस, आवारा जैसे ढेरों फिल्मों की नायिका की छवि उभरती है। बुर्के में ढंकी और लदी-फदी कोई आम मुसलमान महिला का अक्स नहीं उभरता। शायद ही किसी को याद है कि संजय दत्त को इसके पहले किसी ने किसी मुसलमान के बेटे के तौर पर याद किया हो। सब उन्हें सुनील दत्त के बेटे के ही तौर पर जानते रहे। अगर मुसलमान और हिंदू के खांचे में उन्हें बांटकर देखा जाता रहता तो नाम, राकी और साजन से लेकर खलनायक और मुन्नाभाई एमबीबीएस जैसी फिल्में सफलता का परचम नहीं लहरातीं। जिनके दम पर वे लोकप्रियता के उंचे पायदान पर खड़े हैं और उनकी ये लोकप्रियता ही है कि समाजवादी पार्टी और उसके कर्ता-धर्ता अमर सिंह ने उन्हें प्रचार मैदान में उतार रखा है।
संजय दत्त को सचमुच पुलिस वालों ने कितना उत्पीड़ित किया, इसे उन दिनों के टीवी फुटेज को ही देखकर समझा जा सकता है, जब वे टाडा कोर्ट में अपनी हाजिरी बजाने के लिए जाते थे। अदालत के बाहर सिक्युरिटी चेक के पहले उन्हें देखते ही जिस तरह पुलिस वालों की बांछें खिल उठती थीं, इसे पूरे देश ने देखा है। कुछ पुलिस वाले उत्साह में ये भूल भी जाते थे कि लोकप्रियता के पायदान पर जो शख्स खड़ा है और अदालत में पेशी के लिए आ रहा है. वह आरोपी है। इसी झोंके में वे संजय दत्त से हाथ तक मिला बैठते थे। क्या आपको लगता है कि दाऊद इब्राहीम या बबलू श्रीवास्तव कोर्ट में पेश करने के लिए लाया जाएगा तो लोग उससे हाथ मिला बैठेंगे। अदालतों में रसूखदार और ताकतवर ना जाने कितने तरह के अपराधी रोज आते हैं। लेकिन कितने पुलिस वालों की हिम्मत है कि वे सरेआम कैमरे के सामने उनसे हाथ मिला लें। लेकिन संजय दत्त से पुलिस वाले हाथ मिलाने से नहीं हिचकते थे। जिन्होंने ये फुटेज देखे हैं, उन्हें याद है कि जब संजय दत्त आते थे तो महिला सिपाहियों के चेहरे पर वैसी ही मुस्कुराहट और उत्साह नजर आता था, जैसे किसी लोकप्रिय अभिनेता को नजदीक से देखने के बाद आता है। अब जबकि संजय दत्त ये बयान देते फिर रहे हैं और समाजवादी पार्टी इसे जगह-जगह भुनाने की कोशिश कर रही है, ऐसे में ये सवाल उठना लाजिमी है कि कोर्ट के बाहर संजय दत्त से हाथ मिलाने वाले सारे या अधिकतर सिपाही मुसलमान थे...निश्चित तौर पर इसका जवाब ना में होगा। जब सिपाही कोर्ट में पेश होने जाते वक्त संजय दत्त से हाथ मिला सकते हैं तो क्या वे जेल में उन पर अत्याचार कर सकते हैं। ऐसा नहीं कि संजय दत्त जेल जाने से पहले सुपरहिट फिल्में नहीं दे सके थे। राकी और नाम उनके जेल जाने से पहले की सुपर हिट फिल्में हैं। क्या तब जेल कर्मचारियों को ये पता नहीं होगा कि संजय दत्त हिंदी रजतपट के कामयाब हीरो हैं। साफ है कि इन सब सवालों का जवाब ना में होगा।
अब संजय दत्त समाजवादी पार्टी के नेताओं के समझाने से खुद को मुसलमान का बेटा बताते फिर रहे हैं या फिर अपनी मनमर्जी से...ये तो गहन शोध का विषय है। लेकिन ये भी सच है कि संजय दत्त की असल दुनिया हिंदी सिनेमा का रजतपट ही है। जहां जाति और धर्म की बेड़ियों के खांचे में बांधकर अभिनेताओं के काम पर तालियां नहीं बजाई जातीं। वहां मधुबाला, तब्बू और माधुरी दीक्षित पर सीटियां धर्म और जाति को देखकर नहीं बजतीं। वहां उनका काम और उनका अभिनय देखा जाता है। सियासी मैदान में प्रचार से जाने के पहले काश संजय दत्त इस पर भी ध्यान देते।

Thursday, April 23, 2009

ऐतिहासिक मंदी से जूझ रहा जर्मनी

अंजनी राय
जर्मन चांसलर श्रीमती अंगेला मर्केल ने बुधवार को अपने दफ़्तर में आर्थिक शिखर सम्मेलन की मेजबानी की.सरकार ने इस बात को स्वीकार किया कि यूरोप की अर्थव्यवस्था नाटकीय ढंग से सिकुड़ रही है.जर्मन वित्त मंत्री पीर इस्तैन्ब्रुक ने कहा की हम वैश्विक अर्थव्यवस्था के मंदी की दौर से गुजर रहे हैं और पहली तिमाही में 3.3 प्रतिशत तक गिरने की उमीद है.ज्ञात हो की इस वर्ष की पहली तिमाही के लिए सरकारी आंकड़े 15 मई तक प्रकाशित नहीं हो रहे हैं.इस भयावह आंकड़े 2008 की चौथी तिमाही में और 2009 की पहली तिमाही दोनों को देखते हुए इस्तैन्ब्रुक ने कहा कि इस वर्ष की पूरी अर्थव्यवस्था पाँच प्रतिशत तक जा सकती है. "एक पांच से पहले दशमलव बिंदु की संभावना कम की नहीं है,". इस्तैन्ब्रुक की टिप्पणी अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष द्वारा जारी उस पूर्वानुमान को सही ठहराती है कि 2009 की जर्मनी की अर्थव्यवस्था 5.6 प्रतिशत तक जा सकती है.
29 अप्रैल को बर्लिन में 2009 के लिए नये आर्थिक अनुमानों का विवरण जारी होगा; पहले से ही यह तेजी 2.25 प्रतिशत के अपने मौजूदा अनुमान को संशोधित करने का संकेत दिया है. पर ये भी जर्मनी के आधुनिक इतिहास में सबसे बड़ी मंदी होगी.उस दौरान सम्मेलन में संघ और व्यापार अधिकारियों के साथ आर्थिक शिखर सम्मेलन के बाद बोलते हुए आर्थिक मंत्री कार्ल- थिएओदोर जू गुत्तेंबेर्ग ने कहा: "मुझे लगता है कि हम सब इस बात से सहमत है की हमारे आगे एक बहुत ही मुश्किल साल है."
ज्ञात हो की श्रीमती मेर्केल ने यह शिखर सम्मेलन बुधवार को कारोबार और व्यापार संघ के नेताओं के साथ बैठक के लिए बुलाई थी की उरोप की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था को कैसे वापस पटरी पर लाया जाये.
करीब 40 उद्योगपतियों ने जर्मनी के दो आर्थिक प्रोत्साहन पैकेज के प्रभाव का विश्लेषण किया जो करीब 80 बिलियन है - हालांकि अभी ऐसे तीसरे पैकेज की कोई योजना नहीं है.
मर्केल ने शिखर सम्मेलन के बाद संवाददाताओं से कहा कि"आज यह बहुत स्पष्ट था कि हम एक तीसरे प्रोत्साहन पैकेज के बारे में, (जो उपाय है कि वे आगे विकसित किया जाना चाहिए कुछ क्षेत्रों में,)" काम कर रहे हैं, उस पर बात नहीं होनी चाहिए. "दूसरा प्रोत्साहन पैकेज ने हमें आगे सही दिशा में काम करने के साधन दिए हैं, और हमारी कोशिश होगी कि इसका प्रभाव सही दिशा में दिखे.
बर्लिन में उच्चस्तरीय बैठक भी बुलाई गयी है, जिसमें सरकार और व्यापारी समुदाय और ट्रेड यूनियनों के बीच बेहतर तालमेल और इस आर्थिक संकट में जर्मनी की प्रतिक्रिया में सुधार लाने की विषयों पर चर्चा होगी .
लेकिन यह तय है की ये आर्थिक मंदी आने वाले चुनाव में मुख्या मुदा होगा और शायद यह श्रीमती मेर्केल के दुबारे सरकार बनाने के सपने पे पानी फेर सकता है। अब तक, एक सरकारी योजना के तहत कंपनियां कर्मचारियों की छंटनी तो नहीं कर रही हैं लेकिन उनके काम के घंटे कम किये जा रहे हैं, मसलन जैसे आमतौर पर लोग हफ्ते में 40 घंटे यहाँ काम करते हैं, वे अब 25-30 घंटे करेंगे, लेकिन जैसे हालत दिख रहे हैं, उसके हिसाब से ये योजना ज्यादा दिन तक नहीं कारगर साबित हो पायेगी और जल्द ही छंटनी शुरु होगी.
हालांकि जर्मन ट्रेड यूनियन के शीर्ष नेता माइकल सोम्मर ने कहा है कि अगर छंटनी बड़े तौर पर शुरु होगी तो इसे हम एक आम आदमी के खिलाफ युद्ध के रूप लेंगे, जिसका नतीजा बहुत गहरा होगा और उसके लिए सरकार जिम्मेदार होगी। इतना ही नहीं, अशांति से इंकार नहीं किया जा सकता है!

Sunday, April 19, 2009

सियासी ड्राइंगरूम के गुलदस्ते

उमेश चतुर्वेदी
चुनावी माहौल में इन दिनों नेता बने अभिनेता बेहद चर्चा में हैं। दोनों हिंदी फिल्मों के नामी-गिरामी सितारे हैं। दोनों का नाम उस फिल्म की सफलता की गारंटी होती है। लेकिन दोनों अपनी इस फिल्मी लोकप्रियता को सियासी मैदान में भुनाने के लिए मैदान में नहीं उतर सके। इनमें से एक को जहां सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव लड़ने की अनुमति नहीं दी तो दूसरे को उसकी पार्टी ने ही इस काबिल नहीं समझा। जी हां, ठीक फरमाया। यहां चर्चा संजय दत्त और गोविंदा की हो रही है।

चुनाव लड़ने और ना लड़ने की खींचतान के बीच एक सवाल पूरी तरह से गायब है। वह सवाल है कि इन राजनेताओं की क्या कोई सियासी वकत भी है, जनता के प्रति उनकी कोई जवाबदेही भी है या फिर ये राजनीति के ड्राइंग रूम में सजाने के लिए सिर्फ गुलदस्ते की ही भूमिका निभाते हैं। गोविंदा की मुंबई के कांग्रेसी मैदान से विदाई से साफ है कि फिल्मी पर्दे पर ये राजनेता जनता की चाहे जितनी सेवा कर लें, जनता के हकों की लड़ाई चाहे जितनी कामयाबी से लड़ लें – लेकिन अगर उनमें सचमुच जनता की सेवा करने का जज्बा नहीं है तो सियासी मैदान में उनकी उपयोगिता खत्म हो जाती है और संसद में एक-एक वोट के जुगाड़ में लगी पार्टियां उन्हें चुनावी मैदान से निकाल बाहर करने में भी देर नहीं लगातीं। सिर्फ कांग्रेस ही नहीं, ये हालत राष्ट्रवाद के मुद्दे को जिंदा रखने वाली बीजेपी और डॉक्टर लोहिया और नरेंद्रदेव की चिंता करने वाली समाजवादी पार्टी सबके साथ है। डॉक्टर लोहिया के चेले मुलायम सिंह को तो जहां भी थोड़ी उम्मीद दिखती है, वहां उनके पास फिल्मी मैदान से उतारने के लिए एक नेता मिल जाता है। जयाप्रदा, जया बच्चन, संजय दत्त और राजबब्बर के अलावा उसे कोई दिखता ही नहीं है। ये बात और ही राजबब्बर आजकल कांग्रेस की बहियां थाम बैठे हैं। वैसे राजबब्बर सियासी अभिनेताओं से कुछ अलग जरूर हैं। उन्होंने समाजवादी युवजन सभा से छात्र राजनीति शुरू की थी। पुलिस की लाठियां भी खाईं थीं। लेकिन जया बच्चन हों या जया प्रदा या फिर संजय दत्त...उनका ऐसा क्या इतिहास रहा है।

1984 के आम चुनावों में राजीव गांधी ने कुछ वैसे ही अभिनेता-अभिनेत्रियों पर भरोसा जताया था, जैसे आज अमर सिंह कर रहे हैं। तब इलाहाबाद से अमिताभ बच्चन, चेन्नई से बैजयंती माला और ऐसे ही ना जाने कितने रजत पटी चेहरे मैदान में उतार दिए गए। उनकी फिल्मी लोकप्रियता बैलेट बॉक्स में भी जमकर बरसी और वे देश की सबसे बड़ी पंचायत में जा पहुंचे। लेकिन वहां उनका प्रदर्शन कैसा रहा, ये संसद की कार्यवाही के इतिहास में दर्ज है। अमिताभ को तो जल्द ही मैदान छोड़ना पड़ा और बैजयंती माला बाली भी राजनीति को बॉय-बॉय बोल चुकी हैं। गोविंदा उसी की अगली कड़ी हैं। 2004 के आम चुनावों में उन्होंने राम नाइक जैसे कद्दावर नेता को हरा तो दिया – लेकिन जनता से उनका वैसा संवाद नहीं बना, जैसी की उनसे बतौर एक राजनेता और सांसद अपेक्षा पाली गई थी। अकेले कांग्रेस की ही ये कहानी नहीं है। बीजेपी ने भी अपनी स्टार प्रचारक हेमा मालिनी के पति धर्मेंद्र को बीकानेर की सीट से दिल्ली के दरबार में दाखिल करा दिया- लेकिन जिस जनता के वोटों से जीतकर वे संसद की सपनीली पंचायत में पहुंचे, उसके प्रति वे अपना कोई फर्ज नहीं निभा सके। परिणाम ये हुआ कि उनके वोटरों को धर्मेंद्र के लापता होने का पोस्टर लगाना पड़ा।

ये सच है कि आज के दौर में बहुत सारे राजनेता ऐसे हैं – जो अपनी जनप्रतिबद्धता को सही तरीके से निभा नहीं पा रहे हैं। उन पर पैसाखोरी और अंधाधुंध कमाई के साथ ही भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहते हैं। उनकी तुलना में अभिनेता-अभिनेत्रियों की एक सामाजिक छवि होती है। फिल्मी पर्दे पर वे जनता की लड़ाई करते हुए दिखते-दिखाते कम से कम औसत मतदाताओं में उनकी ये सामाजिक छवि विकसित होती है। यही वजह है कि आम लोग टूट कर उन्हें वोट देते हैं। लेकिन जब यही अभिनेता उसकी समस्याओं को दूर कराने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाता, उसे लेकर कोई प्रतिबद्धता नहीं जताता तो जनता उसके लापता होने का पोस्टर लगाने लगती है। फिर जो पार्टी उसे धूमधाम से संसद में अपना एक वोट बढ़ाने के लिए टिकट देकर जिता कर लाई होती है – वही उससे किनारा करने लगती है। लेकिन सबसे बड़ी परेशानी उस जनता को होती है, जो बड़े अरमानों के साथ उस नेता को जिता कर संसद के गलियारे में भेजती है। पार्टी भले ही बाद में उसका टिकट काट दे – लेकिन नुकसान उस जनता को ही भुगतना पड़ता है, जिसने अपना कीमती वोट उस राजनेता बने अभिनेता को दिया होता है। उसका पांच साल बरबाद हो जाता है। डॉक्टर लोहिया कहते थे कि जिंदा कौमें पांच साल तक इंतजार नहीं कर सकतीं – लेकिन मजबूरी देखिए कि इस जिंदा कौम को पूरी सजगता के बावजूद पांच साल तक अपनी बदहाली दूर कराने , अपनी समस्याएं निबटवाने वाले राजनेताओं की खोज के लिए पांच साल तक इंतजार करना पड़ता है।

ऐसे में ये कहा जाय कि सियासी स्वार्थ के लिए पार्टियां ऐसे अभिनेताओं को अपने साथ लेकर आती हैं, उन्हें जिताती भी हैं। लेकिन उनकी भूमिका राजनीति के ड्राइंग रूम में सजे गुलदस्ते से ज्यादा की नहीं होती। ऐसे में ये सवाल उठना लाजिमी है कि सियासी ड्राइंगरूम में इन अभिनेताओं को गुलदस्ते की तरह सजाने की जरूरत क्या है। क्या संसद के गलियारे में अपना एक वोट बढ़ाने के लिए जनता के प्रति जवाबदेही को पांच साल तक स्थगित रखा जाना चाहिए। अभी तक तो जनता ये सवाल नहीं पूछ रही है। लेकिन देर-सवेर राजनीतिक पार्टियों से ये सवाल पूछे जाएंगे। तब शायद कोई मुन्नाभाई या विरार का छोकरा महज गुलदस्ता बनने राजनीति के आंगन में नहीं उतरेगा। लेकिन इससे वे पार्टियां भी अपनी सामाजिक भूमिका से बच नहीं सकतीं, जिनके हाथ इन गुलदस्तों को सजाने के लिए आगे बढ़ते रहे हैं।

Sunday, April 5, 2009

मुन्नाभाई से नहीं, लोकतंत्र से हुआ इंसाफ


राजकुमार पांडेय
संजय दत्त को चुनाव लड़ने से रोक कर न्यायपालिका ने अपना काम बेहतर तरीके से निभाया है। न्यायपालिका ने इस तरह से साफ संदेश दे दिया है कि वो किसी को भी बख्शने वाली नहीं है। चाहे उसका पारिवारिक बैकग्राउंड कितना भी देशभक्ति वाला हो। न्यायपालिका के इस फैसले के बाद अब व्यवस्थापिका और उसके नुमाइंदों को सोचना होगा। हमारे देश के कानून ऐसे हैं जिसके तहत संजय दत्त को तो चुनाव लड़ने से रोका जा सकता है, लेकिन दाऊद भाई अगर भारत के जेल में बंद भी हो तो उनको कोई चुनाव लड़ने से नहीं रोक सकता। अबू सलेम छोटा राजन या फिर और दूसरे तमाम अपराधी चाहे जितना राष्ट्र विरोधी काम कर रहे हों उन्हें तब तक चुनाव लड़ने से नहीं रोका जा सकता, जब तक कि उन पर मुकदमा चला कर उन्हें सज़ा न दे दी जाय। शाहबुद्दीन को चुनाव लड़ने से कोर्ट ने रोका तो उन्होंने अपनी पत्नी को मैदान में उतार दिया। और तो और लालू प्रसाद यादव बाकायदा उनके प्रचार में भी लगे हुए हैं।
नाम फौरी तौर पर एक समुदाय विशेष से आ रहे हैं इसका कत्तई ये मतलब नहीं निकालना चाहिए कि सिर्फ उसी समुदाय के लोग ही अपराधी है। दरअसल ऐसे तमाम हिंदू अपराधी हैं जो जरायम की अपनी दुकान के साथ साइ़ड बिजनेस के रूप में राजनीति का धंधा भी चला रहे हैं। उन्हें चुनाव लड़ने बिल्कुल नहीं रोका जा सकता। बल्कि राजनीतिक दल भी उन्हें चुनाव में उतार कर अपनी एक सीट पक्की कर लेते हैं। जनता से अपेक्षा की जाती है कि उनके बीच कोई भगत सिंह पैदा हों और वे ही इन गुंडे और बदमाशों को वोट न दे।
जब बात जनता की चली तो इसे भी समझ लेना जरूरी है कि जनता क्यों इस तरह के लोगों को वोट दे देती है। ग़ाज़ीपुर इलाके से मुख्तार अंसारी जनप्रतिनिधि रहे। अब वहां किसी के भी घर में शादी व्याह हो, या किसी दूसरे मौके पर बिजली की जरूरत होती थी तो बिजली नहीं कटती थी। वजह ये थी कि मुख्तार भाई सीधे इंजीनियरों को फोन कर देते थे, फला तारीख को इतने से इतने बजे तक बिजली नहीं जानी चाहिए। किसकी मजाल कि भाई का हुक्म टाल दे। किसी को पानी के टैंकर की जरूरत पड़ती थी तो भी भाई का हाथ उसके साथ होता था। आम आदमी को इससे ज्यादा की जरूरत नहीं और दूसरी तबीयत वालों के तो भाई लोग मसीहा हैं ही। फिर साधारण आदमी से ले कर असाधारण बदमाश तक को मुख्तार भाई का नेतृत्व शूट करता है।
अब नेताजी की बात कर लें। नेता जी नेता बनने से पहले किसी तरह दो जून रोटी का जुगाड़ करते थे। अब वे पांच तारा सुविधाओं के हक़दार हो गए हैं। उनका क्लास बदल गया है। उन्हें किसी भी आम आदमी से बात करने की फुर्सत नहीं। अगर वे मंत्री हो गए तो फिर कमीशन के दलालों के साथ मीटिंग करने से उन्हें फुर्सत ही कहां हैं जो वे किसी साधारण आदमी की बेटी की शादी में एक टैंकर दिला सकें। या फिर किसके घर फेरे अंधेरे में हो रहे हैं, इसकी जानकारी भी वो ले पाएं।
तो इस हालत में किसी आम आदमी को जरूरत क्या है कि उसे मुख्तार भाई या शाहबुद्दीन की जगह छात्र संघ में उत्पात मचा कर राजनीति में आए किसी व्यक्ति को वोट दे।
फिर भी ऐसा नहीं कि देश में अब संजीदा राजनीतिज्ञ न रह गए हों। हैं तभी तो जो भी सही व्यवस्था चल रही है। उन्ही संजीदा लोगों को सोचने की जरूरत है कि अपराधियों को किस तरह से चुनाव में उतरने से रोका जा सके। संजय दत्त चुनाव लड़ें या न लड़े इससे देश को कुछ भी फर्क नहीं पड़ता। अलबत्ता इस फैसले के जरिए जो संदेश सुप्रीम कोर्ट ने दिया था, उसे समझने की जरूरत है। सुप्रीम कोर्ट भी मुख्तार और अतीक जैसे या फिर काल्पनिक हालात में जाएं तो दाऊद भाई जैसों को फिलहाल तो चुनाव लड़ने से नहीं रोक सकता। इन्हें रोकने के लिए नए सिरे से कानून बनाने होंगे। वो भी कानून ऐसे हों जिनका किसी भी तरह से दुरुपयोग न हो सके। क्योंकि आज कोई भी कानून बनने के पहले ही उसके दुरूपयोग के रास्ते खोजे जाने लगते हैं। पहले भी कानून बनाने वालों ने ऐसा ही भोलापन किया। उन्हें अंदेशा कम ही था कि आने वाले वक्त में राजनीति और समाज की ये दशा होगी। उन्हें इसका इल्म नहीं हो पाया था कि कोई राज्यपाल भी अपने पद का किस हद तक दुरुपयोग कर सकेगा। भाई महावीर से ले कर रमेश भंडारी और भी बहुत से कांग्रेसी राज्यपालों ने इसके नए रिकॉर्ड बनाए। सबब ये है कि अब बहुत सोच समझ कर उन कानूनों को बनाने का वक्त आ गया है कि दागदार लोग लोकतंत्र के यज्ञ से दूर रहे और इसकी पवित्रता बरकरार रहे।

Monday, March 30, 2009

ख्याल रहे कि,रोशनी में कुछ घर भी जल रहे हैं

अंजनी राय हैं तो वैसे एमबीए पास, लेकिन प्रबंधन का काम मीडिया हाउसों में करते रहे हैं। फिलहाल जर्मनी में हैं और वहीं से उन्होंने भारत में जारी मौजूदा चुनावों को लेकर अपनी प्रतिक्रिया भेजी है। पेश है उनका नजरिया-
चुनाव आयोग की ओर से तारीखों की घोषणा के साथ ही पंद्रहवीं लोकसभा के चुनाव पूरे शबाब पर हैं.... सभी पार्टियां अपने झंडे और डंडे लेकर मैदान में उतर गई हैं। चुनावी समर में जीत हर हाल में जरुरी हैं ... और जनता को रिझाने का कोई भी मौका नेता छोड़ना नहीं चाहते..... चुनाव आचार संहिता को ताक पर रखकर कहीं वादों की पोटली खोली जा रही है... तो कहीं भड़काऊं भाषण दिए जा रहे है..... नोट के जरिए वोट बटोरने वालों की भी यहां कोई कमी नहीं...... कोई नजराने के नाम पर पैसा लुटा रहा है... तो कोई त्यौहार और परंपराओं की दुहाई देकर लोगों की जेब मोटी कर रहा है......... मसकद साफ है..... लोकतंत्र के महापर्व में किसी भी तरह जनता का प्रसाद हासिल करना........ लेकिन एक बात चौंकाने वाली है कि किसी भी पार्टी ने अब तक उस मुद्दे को उतनी मजबूती से नहीं उठाया है जिसमें पूरी दुनिया पीस रही है.....यही नहीं इसकी भयावहता के छिंटे भारत पर भी पड़े हैं...... मुद्दा है आर्थिक मंदी का........ जिसने पूरी दुनिया को अपने शिकंजे में ले लिया है..... लेकिन हैरानी की बात कि इसमें कोई भी पार्टी अपना हाथ नहीं डालना चाहती........

आर्थिक मंदी के दुष्परिणाम अमेरिका और युरोपीय देशों में साफ देखा जा सकता है....... जर्मनी जैसे विकसित देश में कई संस्थाओं में देखते ही देखते ताले लग गये.... लाखों लोगों को नौकरी से हाथ धोना पड़ा.......ये तो बात रही विकसित देशों की...... भारत जैसे विकासशील और तीसरी दुनिया के देशों का तो और भी बुरा हाल है...... बावजूद इसके यहां कोई भी राजनैतिक दल सच्चाई से रू-ब-रू होना नही चाहता........ ज्यादा दुःख तो तब होता है जब नेता सदन की सीढ़ीयां चढ़ने के लिए समाज में जातिगत विद्वेष और मजहबी उन्माद का बीज बोते हैं.......
वरुण गांधी के मसले को ही ले लें..... हजारों लोगों के बीच कुछ उतेजक बयान ने..... अचानक वरुण को एक वर्ग विशेष को लोगों के बीच हीरो बना दिया है..... वरुण के मुंह ने निकले चंद जहरीले शब्द समाज में किस तरह का जहर घोल सकते हैं इस बात कि किसी को परवाह नहीं...... बीजेपी जहां वरुण के सहारे यूपी में खोते जा रहे अपने हिंदुत्व वोट को फिर से तुनीर में डालने की कोशिश कर रही हैं वहीं कांग्रेस को चिंता है कि अक्रामक वरुण कहीं अपने तीखे तेवर से उनके युवराज राहुल को हाशिये पर न धकेल दे........ सो कांग्रेस वरुण को साम्प्रदायिक ठहराने पर तुली हुई है..... इस बात की चिंता किए बगैर की कई राज्यों में उसने ऐसे दलों से गठबंधन करने में गुरेज नहीं किया है जो अल्पसंख्यक हितों के नाम पर ही सही एक सम्प्रदाय विशेष की बात करने में कभी नहीं गुरेज करते.......सवाल है कि राजनीतिक दलों को समुह विशेष की चिंता चुनाव के वक्त ही क्यों होता है..... क्या वे इस तरह की राजनीति कर एक धर्मनिरपेक्ष देश की आत्मा को तार तार नहीं कर रहे हैं..........

मकसद साफ है ये कर्मयुद्द है और इसमे जीत के लिए धर्म और इंसानियत की बलि भी देनी पड़े तो राजनेताओं को इसका कोई परवाह नहीं..........कभी कभी तो हंसी आती है इन खदरधारियों की कुर्सी के प्रति आसक्ति को सुनकर........ पूर्व रक्षामंत्री जार्ज फर्नांडिस अपने उम्र के आखिरी पड़ाव पर है..... शरीर साथ नहीं दे रहा है बावजूद इसके चुनाव लड़ने से गुरेज नहीं है.... खुद को तो संभाल नहीं पा रहे हैं चुनाव जीतकर वे कौन सा देश को संभाल लेंगे.......

इस वेब पोर्टल के माध्यम से हमारा सभी राजनीतिक दलों से अनुरोध हैं कि आपसी रंजिश भुलकर सभी दल देश के बारे में सोचें.......... एक अरब दस करोड़ आंखों में आपसे कई उम्मीदे हैं.........

खूब जोर से पटाखे जलाओ यारो
बस इतना ख्याल रहे कि
रोशनी में कुछ घर भी जल रहे हैं

Thursday, March 26, 2009

एडमिशन का चक्कर

अब एक ऐसे लेख की चर्चा, जिसे कई अखबारों में छपने के लिए भेजा गया, लेकिन ये रचना या तो संपादक जी लोगों को पसंद ही नहीं आई या फिर छपने लायक ही नहीं रही। अब आपकी अदालत में है कि ये छपने लायक है भी या नहीं - उमेश चतुर्वेदी
एडमिशन कराना इतना भी कठिन होगा ...ये मुझे तब पता चला- जब मेरी बेटी स्कूल जाने लायक हो गई। मशहूर शिक्षाविद् कृष्ण कुमार और प्रोफेसर यशपाल के लेखों को पढ़ते – गुनते रहे मेरे मन ने ठान लिया था कि मुझे शहराती जिंदगी की धारा में नहीं बहना है। यानी खेलने-कूदने की उम्र में अपने बच्चों को स्कूल का रूख करने के लिए मजबूर नहीं करना है। लेकिन दुनियादारी और समाज के दबाव ने ऐसा कर दिया कि मेरी सारी पढ़ाई- गुनाई धरी की धरी रह गई। रही-सही कसर पूरी कर दी श्रीमती जी की ओर रोजाना आसपड़ोस की महिलाओं के उछाले जाते रहे सवालों ने...हर किसी का दावा होता था कि उनके बेटे का एडमिशन डी अक्षर से शुरू होने वाले एक जाने – माने स्कूल में ही होगा। उन्होंने सारी जोड़जुगत लगा रखी है।
बहरहाल दबाव में हमने भी उसी स्कूल में आवेदन फॉर्म डाल दिया। ऐसा किए महीनों बीत गए। उनकी शर्तों के मुताबिक हम पति-पत्नी भी काफी पढ़े-लिखे थे। लेकिन बुलावा नहीं आना था – सो नहीं आया। महानगर में बनते होंगे लोग बड़े पत्रकार और लेखक ...डी अक्षर वाले उस स्कूल ने कम से कम मुझे तो इतना रसूखदार तो माना ही नहीं। ऐसे में गांव के बोरा-टाट वाले स्कूल में नंगे पांव जाकर पढ़ाई कर चुका मेरा मन थोड़ा निराश जरूर हुआ। फिर हमने दक्षिण दिल्ली के बी अक्षर से शुरू होने वाले एक स्कूल में आवेदन डाला। वहां से बुलावा तो आया – लेकिन बच्चे और हमारे इंटरव्यू का। बच्चे का अलग से इंटरव्यू और हमारा अलग। बच्चे से पता नहीं क्या पूछा , अलबत्ता हमसे अंग्रेजी में जरूर पूछा गया तो आप क्या काम करते हैं। जिंदगी में सैकड़ों इंटरव्यू ले चुके मुझ जैसे शख्स के पसीने छूटते नजर आए। मैंने अपना काम बताया – लेकिन शायद इंटरव्यू लेने वाली मैडम के पल्ले ही नहीं पड़ा या फिर कुछ और ...उन्होंने एक बार फिर वही सवाल दागा। मैंने फिर समझाया कि मैडम हम लिखने-पढ़ने का काम करते हैं। खबर लाते हैं और उसे छापते हैं। पता नहीं मैडम को फिर समझ में नहीं आया या फिर हम उन्हें समझा ही नहीं पाए और हमें थैंक्स बोल दिया गया। बोलने का लहजा इतना चाशनी में पका था कि लगा कि हम तो सफल रहे। लेकिन जब रिजल्ट आया था तो हमारे बच्चे का नाम लिस्ट से वैसे ही गायब था – जैसे गदहे के सिर से सींग।
स्कूल-स्कूल धूल फांकने के बाद हमारा बच्चा भी एक ठीकठाक स्कूल में जगह पाने में कामयाब रहा। लेकिन इसके लिए हमें अपनी कितनी नींद गंवानी पड़ी और कितना चैन खोना पड़ा – इसका कोई मोल नहीं है।
एक बार फिर स्कूलों में एडमिशन का चक्कर शुरू हो गया है और हमारे ही तरह लोग अपने मासूम नौनिहालों के एडमिशन के चक्कर में चक्कर पर चक्कर लगाने को मजबूर हो गए हैं। बहरहाल हर साल जब एडमिशन का ये चक्कर शुरू होता है तो मेरे सामने एक सवाल बार-बार उठ खड़ा होता है। क्या जिसके मां-बाप पढ़े – लिखे ना हों तो उसे पढ़ने का हक नहीं होना चाहिए। अगर सृष्टि में शुरू से ही ऐसा नियम होता तो क्या होता। जीव विज्ञानी कहते हैं कि हम बंदरों की संतान हैं। आज के पब्लिक स्कूलों का नियम शुरू से ही होता तो क्या हम आज चांद पर पहुंचने में कामयाब होते ...बंदरों से आदमी बनते हुए इंसान तक की हम यात्रा पूरी कर पाते ...इस सवाल का जवाब हर शहरी – देहाती ढूंढ़ना चाहता है। लेकिन वह अवश है और जिस सरकार को इसका जवाब तलाशना चाहिए ..उसे इसके लिए फुर्सत ही नहीं है।

Wednesday, March 4, 2009

गांव पहुंचे सरकार, पर कितना बदला बिहार



उमेश चतुर्वेदी

बेगूसराय जिले के बरबीघी गांव में नीतीश कैबिनेट की बैठक ने देशभर में एक नया संदेश दिया है। हकीकत में ऐसा पहली बार हुआ है कि सरकार सचमुच गांव पहुंची है। अब तक सिर्फ सरकार के गांव पहुंचने का दावा ही किया जाता रहा है। नीतीश सरकार ने अब तक दावा तो नहीं किया है कि गांव में पहुंचकर उनकी सरकार ने गांधी जी के सपनों को साकार करने की दिशा में ठोस कदम उठाया है। लेकिन ये भी सच है कि देर-सवेर ऐसा होना शुरू हो ही जाएगा। नीतीश कुमार ने बीती दस फरवरी को राजधानी पटना से करीब डेढ़ सौ किलोमीटर दूर स्थित बरबीघी में पूरी कैबिनेट को उतार कर एक नई परंपरा की नींव डाल दी है।
पता नहीं मंत्री हलकान हुए या नहीं ..लेकिन नीतीश कुमार के इस कदम से अफसर जरूर हलकान हैं। वे कुछ वैसे ही परेशान हैं, जैसे नायक फिल्म में एक दिन के लिए मुख्यमंत्री बने अनिल कपूर के त्वरित फैसले से अधिकारी परेशान नजर आए थे। परेशान नीतीश कुमार के विरोधी भी नजर आ रहे हैं। लोकसभा चुनावों की दस्तक के बीच नीतीश के इस कदम से सत्ताधारी जनता दल यूनाइटेड के नेताओं और कार्यकर्ताओं में उत्साह नजर आ रहा है। लेकिन ये कहना पूरा सच नहीं होगा। बिहार जनता दल के कई नेता ऐसे भी हैं, जो नीतीश कुमार के शुभचिंतक हैं। दिल और पार्टियां टूटने के लिए मशहूर जनता दल यू के इन नेताओं को नीतीश की अगुआई से कोई शिकवा भी नहीं है। लेकिन उनके गांव-गांव पहुंचने और आम लोगों के सामने ही अफसरों की खिंचाई के नजारों से वे संतुष्ट नहीं हैं।
याद कीजिए उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती का पिछला कार्यकाल। जहां भी जातीं, वहां के अफसरों की मानो शामत ही आ जाती। सड़क निर्माण में धांधली उन्हें नजर आई नहीं कि सार्वजनिक निर्माण विभाग के तमाम इंजीनियर सरेआम सस्पेंड। पिछले कार्यकाल में उन्होंने मंडल स्तर पर कानून-व्यवस्था की समीक्षा बैठकें लेनी शुरू की थीं। समीक्षा बैठक में अफसर की कोताही पाई गई नहीं कि उसे सस्पेंशन का आर्डर तत्काल थमा दिया जाता। अफसरों पर सार्वजनिक तौर पर गिरती इस गाज को लेकर जनता की तालियां तेज होती गईं। लेकिन इससे उत्तर प्रदेश के प्रशासन में कोई साफ-सफाई नजर नहीं आई। कुछ ही वक्त बीतते ना बीतते अफसर भी बहाल हो जाते। मायावती जनता में ये संदेश देना चाहती थीं कि उनके इस कदम से प्रदेश की पूरी व्यवस्था पटरी पर आ जाएगी। लेकिन व्यवस्था कितनी पटरी पर आ पाई है, इसे देखने के लिए उत्तर प्रदेश के सुदूरवर्ती इलाकों का दौरा करना पड़ेगा। इसका मूल्यांकन करने के लिए हमें ये भी ध्यान रखना होगा कि अब मायावती अपने दम पर पूरी बहुमत की सरकार चला रही हैं। जबकि उन्होंने जब ये लोकलुभावन फैसले लिए थे – तब वे भारतीय जनता पार्टी की बैसाखी पर सवारी करके सरकार की कमान संभाले हुए थीं।
लेकिन ये भी सच है कि नीतीश कुमार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री जैसे नहीं हैं। ये भी सच नहीं है कि वे जनता के बीच लोकप्रिय होने के लिए इस टोटके का इस्तेमाल कर रहे हैं। ये तो दबी जबान से उनके विरोधी भी मान रहे हैं। लेकिन असल सवाल ये है कि क्या उनके इस कदम से सचमुच अफसरशाही में गुणात्मक बदलाव आ रहा है। उपरी तौर पर कई लोगों को ये बदलाव बखूबी नजर आ रहा है। कई ऐसे भी लोग हैं – जिन्हें लगता है कि नीतीश की अगुआई में बिहार में नई राजनीतिक संस्कृति का विकास हो रहा है, जिसका प्रशासन पर गुणात्मक असर पड़ रहा है। इसे लेकर फिलहाल जनता भी गदगद नजर आ रही है।
तो आखिर क्या वजह है कि जनता दल के कई नेता इसे लेकर परेशान हैं। मुख्यमंत्री अपने जनता दरबार में लोगों से सीधे मुखातिब होते हैं और उनकी समस्याओं को सुनते भी हैं। लगे हाथों उसका समाधान करने का आदेश भी थमा देते हैं। लेकिन सबसे बड़ी बात ये है कि ये सारी कवायद उन्हीं अफसरों को करनी है, जिनके खिलाफ जनता मुख्यमंत्री के दरबार पहुंच रही है। ऐसा इक्के-दुक्के मामलों में ही हो रहा है। लेकिन ये भी सच है कि मुख्यमंत्री के जनता दरबार में पेश ज्यादातर अर्जियां उन्हीं अफसरों के पास भेज दी जाती हैं। अफसर तो ठहरे अफसर..इतनी जल्दी बदल गए तो फिर अफसर कैसा। वे फिर से मामले को लटकाने में ही अपनी पूरी ताकत लगा देते हैं। परेशान शख्स कितनी बार पूर्णिया और रक्सौल से पटना तक जनता दरबार तक की दौ़ड़ लगा सकता है।
समाजवादी आंदोलन और सोच के लिए मशहूर बिहार के लोगों में इन दिनों दो वाक्य जमकर चर्चा में हैं। इनमें से एक कहावत उस देवीलाल की देन है, जिनके लोकदल के साथ नीतीश कुमार ने विधिवत राजनीति की शुरूआत की थी। देवीलाल ने कहा था – लोकराज, लोकलाज से चलता है। दूसरी कहावत है – राज इकबाल से चलता है। दिलचस्प बात ये है कि जनता दल के ज्यादातर कार्यकर्ता ही इन दिनों इन कहावतों को दोहराते फिर रहे हैं। हो सकता है, इसके पीछे कई लोगों की कुंठा भी काम कर रही होगी, जो अपने राज के बावजूद कमाई करने के मौके से महरूम हैं। लेकिन ये भी पूरा सच नहीं है। लोगों का तर्क है कि मुख्यमंत्री का काम बीडीओ और डीएम के स्तर के मामले सुलझाना नहीं है, बल्कि ऐसी व्यवस्था करना है, जिसके तहत अफसरशाही खुद ब खुद ऐसे फैसले ले सके। लोगों का तर्क है कि परेशान जनता पहले बीडीओ को अपनी शिकायत देती है। उसकी सुनवाई नहीं होती तो उसे भरोसा होता है कि डीएम उसकी परेशानी जरूर दूर करेगा। जब वह भी ध्यान नहीं देता तो वह मुख्यमंत्री या मंत्री के दरबार पहुंचती है। उसे अपने नेता पर सबसे ज्यादा भरोसा होता है।
जनता परिवार के नेताओं का असल डर ये है कि यहां मामला सीधे मुख्यमंत्री के दरबार का है। जिस पर कार्रवाई नहीं हुई तो ना सिर्फ नीतीश कुमार, बल्कि पूरी पार्टी की साख पर ही सवाल उठ खड़े होंगे। क्योंकि अफसरशाही वही कर रही है, जिसकी वह आदी रही है। पंद्रह-सोलह साल तक बदहाली और भरोसा खिलाफी के दौर में जीती रही बिहार की जनता को इन दिनों राहत मिली भी है। त्वरित न्यायालयों के जरिए अब तक करीब 28 हजार अपराधियों को निचली अदालतें सजा सुना चुकी हैं। घूसखोरी पर लगाम के लिए नीतीश कुमार पचास हजार रूपए का इनाम तक घोषित कर चुके हैं। इसके बावजूद जनता दल के नेता और कार्यकर्ता प्रसन्न नहीं हैं। हाल ही में राजगीर में संपन्न चिंतन बैठक में कई कार्यकर्ताओं और निशाने पर नीतीश सरकार के ये लोकलुभावन फैसले भी रहे। कुछ राजनीतिक जानकार इसे नेताओं और कार्यकर्ताओं की कमाई पर लगी लगाम के खिलाफ निकली भड़ास बता रहे हैं। लेकिन उनकी भी शिकायतों और सवालों को नकारा नहीं जा सकता। ये सच भी है कि अगर मुख्यमंत्री के दरबार में शिकायत के बाद भी जनता को राहत नहीं मिलेगी तो वहां कहां जाएगी। वह किस पर इकबाल करेगी। ये सच है कि फिलहाल नीतीश कुमार को इन सवालों का जवाब देने की जरूरत नजर नहीं आ रही है। लेकिन अधिकारियों का रवैया ऐसा ही रहेगा तो इसका भी उन्हें जवाब देना पड़ेगा ही। अगर वक्त रहते प्रशासन को कसा नहीं गया तो बरबीघी जैसी जगहों में कैबिनेट की बैठक करने जैसी घटनाओं को जनता देर तक झेल नहीं पाएगी।

Tuesday, February 3, 2009

तो पोर्न उद्योग को भी चाहिए राहत का पैकेज !

उमेश चतुर्वेदी
क्या आप उम्मीद कर सकते हैं कि किसी एशियाई मुल्क में पोर्न उद्योग को बचाने के लिए खुलेआम मांग उठे। आपको सुनने में ये हैरतनाक भले ही लग रहा हो – लेकिन अमेरिका में ऐसी मांग उठने लगी है। दरअसल एशियाई मुल्कों में सेक्स और इससे जुड़ा पोर्न उद्योग भले ही ढके-छुपे चलता हो, लेकिन यूरोपीय और अमेरिकी समाज के लिए सेक्स और नैतिकता कोई दबी-छुपी बात नहीं है-लिहाजा यहां पोर्न साहित्य और सेक्स से जुड़ी चीजों के व्यापार ने भी बाकायदा एक उद्योग की शक्ल अख्तियार कर ली है। यही वजह है कि अब इस उद्योग को बचाने के लिए अमेरिका में मांग भी उठने लगी है। इस साल के दूसरे हफ्ते में अमेरिका की मशहूर पोर्न मैगजीन हसलर के मालिक लैरी फ्लिंट और टीवी पर प्रसारित किए जाने वाले मशहूर पोर्न कार्यक्रम गर्ल्स गॉन वाइल्ड के प्रोड्यूसर जो फ्रांसिस एक साथ प्रेस के सम्मुख अवतरित हुए। उन्होंने अमेरिकी सरकार से मांग की कि अमेरिका के पोर्न उद्योग को मंदी से बचाने के लिए पांच अरब डॉलर की सहायता दी जानी चाहिए।
वैश्विक मंदी का सामना कर रहा अमेरिकी समाज इन दिनों तरह-तरह की चिंताओं से परेशान है। मंदी ने आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर अमेरिकी समाज के सामने ढेरों चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। इनके बीच एक और परेशानी से अमेरिकी समाज दो-चार हो रहा है। जाहिर तौर पर ये चिंताएं बेहद निजी और पारिवारिक हैं। चूंकि अमेरिकी समाज बेहद खुला है, लिहाजा ये निजी चिंताएं भी इन दिनों मीडिया में चर्चा और बहस का विषय बनी हुई हैं। ऐसी ही चिंताओं में से एक है अमेरिकी लोगों की सेक्स लाइफ की समस्या। मंदी का अमेरिकी लोगों की सेक्स लाइफ पर क्या असर पड़ रहा है, इसे लेकर भी इन दिनों वहां अध्ययनों और निष्कर्षों की बाढ़ आई हुई है। अमेरिकी मीडिया इन दिनों ऐसे अध्ययन रिपोर्टों से भरा पड़ा है।
ऐसा नहीं कि सबको यही चिंता सता रही है कि मंदी के चलते अमेरिकी लोगों की सेक्स लाइफ कम हो रही है या होगी। अभी हाल ही में एक अध्ययन रिपोर्ट अमेरिकी अखबारों में छपी। जिसे भारत के भी कुछ बड़े अखबारों ने प्रकाशित किया। अमेरिका के कुछ जाने-माने नृतत्वशास्त्रियों ने साल दो हजार नौ को सेक्स वर्ष घोषित किया है। उनका मानना है कि मंदी के चलते जीवन में आई नीरसता से बचने के लिए अमेरिकी लोग इस साल अपने बेडरूम का सहारा लेंगे। अगर ऐसा ही रहता तो अमेरिकी लोगों को कम से कम अपने इस बेहद निजी मसले पर चिंतित होने की कोई वजह नहीं होनी चाहिए थी। सरकार को भी परेशान होने की कोई वजह नहीं होनी चाहिए थी। लैरी फ्लिंट और जो फ्रांसिस की मांग के बाद अमेरिकी सरकार की ओर से अभी तक कोई प्रतिक्रिया नहीं आई है। लेकिन माना जा रहा है कि इस मांग से सरकार परेशान जरूर है।
अमेरिका में यूं तो मंदी की छाया पिछले साल जुलाई में ही दिखने लगी थी। लेकिन सितंबर में जब लीमैन ब्रदर्स ने खुद को दिवालिया घोषित किया तो मंदी की ये मार सतह पर आ गई। इसके साथ ही अमेरिकी अर्थव्यवस्था के डांवाडोल होने की खबरें तेज हो गईं। अमेरिकी अर्थव्यवस्था की तर्ज पर विकसित हो रही दुनिया की तमाम अर्थव्यवस्थाएं भी इस मंदी की मार से बच नहीं सकीं। भारत के शेयर बाजार, प्रॉपर्टी और ऑटोमोबाइल उद्योग की भी हालत छुपी नहीं है। इस पर काफी-कुछ लिखा और पढ़ा जा रहा है। चुनावी साल में अमेरिकी अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए राष्ट्रपति जार्ज बुश ने अक्टूबर में 700 अरब डॉलर के पैकेज का ऐलान किया। जिसे तीन अक्टूबर को सीनेट की मंजूरी भी मिल गई। लेकिन अमेरिकी अर्थव्यवस्था अभी तक पटरी पर लौटती नहीं दिख रही है। वैसे अमेरिका में मंदी का सबसे ज्यादा असर बैंकिंग, बीमा और ऑटोमोबाइल उद्योग पर पड़ा है और 700 अरब डॉलर का ये पैकेज भी इन्हीं उद्योगों के लिए घोषित किया गया है। इसके बावजूद ऑटोमोबाइल उद्योग खुद के लिए अलग से 25 अरब डॉलर के पैकेज की मांग भी कर रहा है। जिसके लिए पिछले साल सीनेट की समिति के सामने ऑटोमोबाइल उद्योग के प्रतिनिधियों ने अपना मांग पत्र पेश भी किया। जॉर्ज बुश जाते-जाते अलग से 350 अरब डॉलर का पैकेज देना चाहते थे। हालांकि सीनेट ने इसे मंजूर नहीं किया और जॉर्ज बुश का ये सपना अधूरा ही रह गया।
बहरहाल पोर्न उद्योग का तर्क है कि जब इतना भारी-भरकम पैकेज बैंकिंग, बीमा और ऑटोमोबाइल उद्योग को देने के लिए मंजूर किया जा सकता है तो उसे बचाने के लिए पैकेज क्यों नहीं दिया जा सकता है। वैसे भी अमेरिका में पोर्न उद्योग कोई छोटा-मोटा उद्योग नहीं है। इसका सालाना टर्न ओवर करीब 13 अरब डॉलर है। इससे हजारों लोगों की रोजी-रोटी जुड़ी है। भारतीय उपमहाद्वीप और अरब देशों में भले ही ये तर्क अटपटा लगे। लेकिन अमेरिकी पोर्न उद्योग का कहना है कि वहां के मानसिक स्वास्थ्य को बचाए रखने के लिए इस उद्योग को भी बचाया जाना जरूरी है। अपनी प्रेस कांफ्रेंस में लैरी फ्लिन्ट ने जो तर्क दिया, वह भी गजब का है। उन्होंने कहा कि मंदी के दौर में जिस तरह ऑटोमोबाइल की खरीद-बिक्री कम हो गई है, कुछ वैसे ही आम अमेरिकियों की यौनेच्छा कम हो गई है। फ्लिन्ट का कहना है कि भले ही मोटर गाड़ियां न खरीदी जायं, लेकिन इस बीमारी को व्यापक नहीं होने दिया जा सकता।
जिस तरह नए आर्थिक मॉडल ने अमेरिकी अर्थव्यवस्था को जमीन देखने के लिए मजबूर किया है – कुछ वैसी ही हालत वहां के पोर्न उद्योग के लिए भी है। खबरें तो ऐसी भी आ रही हैं कि आम अमेरिकी इसे लेकर नाक-भौं सिकोड़ रहा है। दरअसल नए आर्थिक और सामाजिक मॉडल में अमेरिकी ने नई व्यवस्था गढ़ी है, उसी के कुचक्र में वह फंसता नजर आ रहा है। पोर्न उद्योग की मांग और उसका खुलकर ऐसा तर्क देना भी इसी का प्रतीक है।
जार्ज बुश तो इस उद्योग को बचाने का कोई उपाय तो नहीं कर गए, लेकिन अब पोर्न उद्योग की निगाहें नए राष्ट्रपति बराक ओबामा पर टिक गई हैं। उसे उम्मीद है कि ओबाम उसकी मांग का जरूर खयाल रखेंगे। हालांकि कुछ – कुछ परंपरावादी मान्यताओं के पक्षधर रहे ओबामा के लिए इस मांग पर खुल कर विचार करना ही आसान नहीं होगा, मांग पूरा करना तो अलग की बात है।