Sunday, January 18, 2009

शेखावत के चुनावी बिगुल के किंतु-परंतु



उमेश चतुर्वेदी

त्रेता युग में भगवान राम भले ही लंका में रावण पर विजय पाने में कामयाब रहे – लेकिन हनुमान जैसे महावीर वाली उनकी उसी सेना को उन्हीं के बेटे लव और कुश ने पछाड़ दिया था। इसे संयोग कहा जाय या फिर कुछ और ...भगवान राम के सहारे बीजेपी को 1998 और 1999 के आम चुनावों में जीत दिला चुके लालकृष्ण आडवाणी को अब कुश के ही वंशज कछवाह राजपूत शेखावत से भारी चुनौती मिल रही है।
महामहिम की श्रेणी में दूसरे पायदान पर रह चुके भैरोसिंह शेखावत ने चुनाव लड़ने का ऐलान क्या किया ...बीजेपी में घमासान ही शुरू हो गया। बीजेपी को किसी भी कीमत पर आगे नहीं बढ़ने देने की कवायद में जुटी कांग्रेस ऐसे में कैसे चुप रह सकती है। लिहाजा भावी सत्ता के लिए अभी से दांवपेंच शुरू हो गया है। राजनीतिक हलकों में कांग्रेस महासचिव दिग्विजय सिंह की भैरोसिंह शेखावत से मुलाकात को इन्हीं अर्थों में देखा – परखा जा रहा है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये है कि शेखावत सचमुच प्रधानमंत्री बनने की दौड़ में शामिल हैं या उनकी सारी रणनीति कहीं पर निगाहें और कहीं पर निशाना की शैली में रची और आगे बढ़ाई जा रही है।
ये सच है कि भारतीय संविधान में संवैधानिक पदों पर बैठे रहे लोगों के चुनाव लड़ने पर रोक नहीं है। वैसे भी अभी तक राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति रहे किसी व्यक्ति ने लोकसभा का चुनाव नहीं लड़ा है। शायद यही वजह है कि बीजेपी के एक तबके में शेखावत के चुनाव लड़ने के ऐलान के बाद तीखी प्रतिक्रिया हुई। ऐसा नहीं कि शेखावत ये नहीं जानते – शायद यही वजह रही कि शेखावत के चुनाव लड़ने के ऐलान के साथ ही उनके रणनीतिकार संविधान का हवाला देना नहीं भूले। ये सच है कि संविधान में ऐसी कोई बाध्यता या रोक नहीं है। लेकिन सियासत और संविधान को जो जानते हैं – उन्हें ये पता है कि संविधान सिर्फ लिखित बंधों-उपबंधों के साथ ही नहीं चलता, बल्कि उसका एक बड़ा स्रोत परंपराएं भी होती हैं। शेखावत चूंकि देश के उपराष्ट्रपति जैसे अहम पद पर रहे हैं- शायद यही वजह है कि उनके चुनाव लड़ने का ऐलान ना सिर्फ बीजेपी के एक धड़े – बल्कि जनता के भी एक हिस्से को पसंद नहीं आया। संविधान में तो शून्यकाल का कोई जिक्र ही नहीं है। लेकिन क्या आज कोई लोकसभा अध्यक्ष या फिर राज्य सभा का सभापति इसे जारी रखने से इनकार कर सकता है। शून्यकाल की ये अवधारणा पिछली सदी के साठ के दशक में संसद में आए डॉक्टर राम मनोहर लोहिया, पीलू मोदी, मधु लिमये, लाडली मोहन निगम जैसे प्रखर समाजवादियों की मांग पर शुरू हुई थी। तब से लेकर ये परंपरा ना सिर्फ जारी है – बल्कि आज मीडिया की सुर्खिय़ां भी बनता है। शिखर की सियासत सिर्फ लिखित संविधान से नहीं चलती, बल्कि वह उदात्त और बड़ी परंपराओं से भी आगे बढ़ती है। नैतिकता की राजनीति करते रहे शेखावत और उनके मौजूदा रणनीतिकार इससे शायद ही इनकार करें।
एक अखबार ने दावा किया है कि शेखावत की मौजूदा रणनीति में अहम भूमिका जनता दल यूनाइटेड के सांसद दिग्विजय सिंह, चंद्रशेखर सरकार में राज्यमंत्री रहे राजस्थान के उद्योगपति कमल मोरारका और चंद्रशेखर के सहयोगी रहे एच एन शर्मा की है। चूंकि अभी तक किसी ने इससे इनकार नहीं किया है – लिहाजा अखबार के इस दावे को मानने में किसी को कोई गुरेज नहीं होगा। अगले आम चुनाव में किसी भी गठबंधन या दल को स्पष्ट बहुमत मिलने के आसार दिखाई नहीं पड़ रहे हैं। शेखावत के रणनीतिकारों को लगता है कि अगर बीजेपी की अगुआई वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन को बहुमत नहीं मिला तो ढेरों ऐसे दल हैं – जिन्हें उदारवादी छवि वाले शेखावत को समर्थन देने से गुरेज नहीं होगा – जबकि बीजेपी और एनडीए के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार लालकृष्ण आडवाणी का साथ देना बेहद कठिन होगा। 2002 के उपराष्ट्रपति चुनावों में शेखावत अपने संपर्कों का कमाल दिखा चुके हैं। जब उन्हें दलीय समर्थन से भी ज्यादा वोट मिला। लेकिन शेखावत के रणनीतिकार ये भूल जाते हैं कि राष्ट्रपति चुनाव में इन्हीं शेखावत जी को तमाम दावों के बावजूद समाजवादी पार्टी. राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी और जयललिता के अन्नाद्रमुक ने उन्हें वोट नहीं डाला। आज जबकि शेखावत के चुनाव लड़ने के ऐलान को लेकर विवादों का दौर तेज है – राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी ने भी उन्हें भविष्य में समर्थन देने का ऐलान करने में देर नहीं लगाई। इससे शेखावत के रणनीतिकार खुश हो सकते हैं। लेकिन उन्हें जनता के इस सवाल का जवाब देना मुश्किल होगा कि यदि शेखावत को लेकर राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी इतनी ही मुतमईन थी तो उसने राष्ट्रपति चुनाव में उनका साथ क्यों नहीं दिया। शेखावत के अमर सिंह और मुलायम सिंह से भी बेहतर संबंध बताए जाते हैं। कहा तो यहां तक जाता है कि जिस लालू यादव पर उनकी बीजेपी के नेता सरयू राय और सुशील कुमार मोदी चारा घोटाले में हमले किए जा रहे थे, उन्हीं लालू यादव के अजमेर में पढ़ रही दो बच्चियों के स्थानीय अभिभावक शेखावत ही थे। तब वे राजस्थान के मुख्यमंत्री के तौर पर बीजेपी की सरकार चला रहे थे। इन्हीं संबंधों की चाशनी में शेखावत के रणनीतिकारों को भविष्य की सत्ता की चाबी शेखावत के हाथों में आती दिख रही है। लेकिन सिर्फ एक साल पहले का इतिहास इस उम्मीद को सिरे से खारिज कर देता है। राष्ट्रपति चुनावों में समाजवादी पार्टी कांग्रेस की उम्मीदवार प्रतिभा ताई पाटिल को खुलेआम समर्थन देने की हालत में नहीं थी। लिहाजा जयललिता की अगुआई में उसने वोटिंग से बाहर रहने का ही फैसला किया। ये बात और है कि उसके और जयललिता के सांसदों ने प्रतिभा पाटिल को वोट देने में कोई हिचक नहीं दिखाई। दिलचस्प बात ये है कि इन सांसदों पर पार्टी ह्विप के उल्लंघन को लेकर कोई कार्रवाई भी नहीं हुई। रही बात राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी की तो उसे भी मराठी महिला के नाम पर पहले प्रतिभा पाटिल ही नजर आईं – शेखावत उसकी लिस्ट में कहीं नहीं थे।
शेखावत के रणनीतिकारों का दावा है कि वे बीजू जनता दल के अध्यक्ष नवीन पटनायक, तेलुगू देशम पार्टी के एन चंद्रबाबू नायडू , पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा और जयललिता के संपर्क में हैं और वक्त पड़ने पर वे शेखावत का साथ देने में पीछे नहीं हिचकेंगे। लेकिन अपने इस दावे का आधार समझाने में अभी तक कामयाब नहीं हो पाए हैं।
शेखावत को बीजेपी में भ्रष्टाचार की इन दिनों सिरे से याद आ रही है। पिछले डेढ़ साल से वे उपराष्ट्रपति नहीं हैं। ये भी सच है कि उन्हें वसुंधरा राजे के भ्रष्टाचार की पहले से ही जानकारी होगी। ऐसे में ये सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर अब जाकर उन्हें भ्रष्टाचार के खिलाफ अभियान की शुरू करने की जरूरत क्यों महसूस हुई। वे उस बीजेपी के सदस्य भी 2002 से नहीं हैं – जिसकी स्थापना और उसे परवान चढ़ाने में उनकी बड़ी भूमिका रही है। इसके चलते पार्टी का अनुशासन उन्हें इसके विरोध में आड़े भी नहीं आ सकता था। वे वसुंधरा के भ्रष्टाचार के खिलाफ खुलकर बोल सकते थे। वे कोई सामान्य बीजेपी कार्यकर्ता नहीं रहे हैं – जिनकी आवाज बीजेपी के सत्ता गलियारे में ही गुम हो जाती और आलाकमान तक नहीं पहुंचती। अगर वे ऐसा करते तो शायद पार्टी वसुंधरा को हटाने के लिए मजबूर हो जाती। तब शायद उनकी खड़ी की हुई बीजेपी की राजस्थान में सरकार होती। उन्होंने ऐलान किया है कि पार्टी में भ्रष्टाचार के खिलाफ वे जनजागरण करेंगे – ताकि उनकी वह पार्टी साफ और मजबूत हो, जिसे खड़ा करने में उन्होंने भी खून-पसीना बहाया है। लेकिन शेखावत ने ये नहीं किया और विधानसभा चुनाव में वसुंधरा और बीजेपी का बेड़ा गर्क होते देखते रहे।
राजस्थान की राजधानी जयपुर से दिल्ली के सत्ता गलियारों तक एक खबर ये भी आ रही है कि शेखावत अपने दामाद नरपत सिंह राजवी को नेता प्रतिपक्ष बनवाना चाहते थे। लेकिन इसमें वे नाकामयाब रहे। राजस्थान की राजनीति के जानकारों का कहना है कि राजवी के दांवपेंच और सारी कवायद धरे रह गए। आलाकमान ने वसुंधरा को ही नेता प्रतिपक्ष बनवा दिया। इसके बाद सालों से दबा गुस्सा फूट पड़ा और शेखावत मैदान में कूद गए। ये भी सच है कि वसुंधरा से राजस्थान के दूसरे बड़े कद्दावर बीजेपी नेता जसवंत सिंह की भी नहीं बनी। हालांकि खुलेतौर पर उन्होंने इस विवाद पर अभी तक कुछ नहीं बोला है। लेकिन माना ये जा रहा है कि शेखावत के इस अभियान में उनका भी सहयोग है।
पर्दे के पीछे जारी सियासी खेल की पूरी हकीकत अभी तक सामने नहीं आ पाई है और उम्मीद भी नहीं है कि ऐसा हो पाएगा। लेकिन एक चीज तय है कि सर्वोच्च संवैधानिक पद पर रहे शेखावत के इस अभियान से चाहे जिसका फायदा हो – उनकी वह पार्टी फायदे में तो नहीं ही रहेगी, जिसे बनाने- संवारने में उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी लगाई है।

Friday, January 16, 2009

क्यों हारे गुरूजी


उमेश चतुर्वेदी
शिबू सोरेन की हार से देश भले ही हैरत में हो ..लेकिन झारखंड के लोग हैरत में नहीं हैं। हैरत में तो उनके स्टॉफ में शामिल वे लोग भी नहीं हैं ..जो हाल ही में सत्ता के खेल में उनसे जुड़े। हैरत उस कांग्रेस को भी नहीं हुई है ...जिसके सहयोग और दम के सहारे शिबू सोरेन 26 अगस्त 2007 को झारखंड की गद्दी पर बैठे थे। देश हैरत में इसलिए है कि इस नए-नवेले राज्य ने ना सिर्फ अपने मुख्यमंत्री...बल्कि सूबे की सियासत के गुरूजी को पटखनी दी है।
हालांकि ये कोई पहला मौका नहीं है – जब किसी उपचुनाव में कोई मुख्यमंत्री खेत रहा। इसके पहले उत्तर प्रदेश के नौंवें मुख्यमंत्री त्रिभुवन नारायण सिंह भी सातवें दशक में गोरखपुर के मनीराम सीट से उपचुनाव में हारे थे। शिबू सोरेन और त्रिभुवन नारायण सिंह की हार में एक समानता है। त्रिभुवन नारायण सिंह को एक अदने से कांग्रेसी कार्यकर्ता रामकृष्ण द्विवेदी ने हराया था तो शिबू सोरेन को हार उनके ही मंत्री रहे एनोस एक्का के एक नामालूम से कार्यकर्ता राजा पीटर ने हराया है। त्रिभुवन नारायण सिंह को हराने वाले रामकृष्ण द्विवेदी चुनाव लड़ने से पहले अमर उजाला के संवाददाता थे। बाद में वे युवा कांग्रेस में शामिल हुए और उन्होंने इंदिरा कांग्रेस के उम्मीदवार के तौर पर उस त्रिभुवन नारायण सिंह को चुनावी मैदान में पटखनी दी – जिन्हें उत्तर प्रदेश की सियासत के ताकतवर नेता चंद्रभानु गुप्त का समर्थन था। चंद्रभानु गुप्ता उत्तर प्रदेश में कांग्रेस के ताकतवर गुट सिंडिकेट के मजबूत स्तंभ थे। लिहाजा त्रिभुवन नारायण सिंह की हार को हैरत की नजर से देखा गया था। उन्हें हराने का इनाम रामकृष्ण द्विवेदी को मिला भी। उन्हें कमलापति त्रिपाठी ने अपने मंत्रिमंडल में बतौर पुलिस राज्य मंत्री शामिल किया था।
इन अर्थों में शिबू सोरेन की हार हैरतनाक इसलिए नहीं है ...क्योंकि उन्हें खुद ही भरोसा नहीं था कि वे उस तमाड़ विधानसभा सीट से चुनाव जीत जाएंगे – जो कभी जनता परिवार का गढ़ रहा है। आज के दौर में शायद ही कोई मुख्यमंत्री होगा- जो इस तरह चुनाव का सामना करने से भागता रहेगा। शिबू सोरेन 26 अगस्त 2007 को मुख्यमंत्री बने और चुनाव मैदान में तब जाकर उतरे..जब संवैधानिक कायदे के मुताबिक उनके चुने जाने में महज एक महीने का ही वक्त बाकी रह गया था। उन्हें खुद की जीत पर भरोसा किस कदर था, वह इससे ही साबित है कि उन्होंने मुख्यमंत्री बनने के बाद भी अब तक लोकसभा की सदस्यता से इस्तीफा नहीं दिया है।
दो हजार चार के चुनाव के बाद झारखंड जैसी विधानसभा बनी है, उसमें ही सत्ता के कई नायाब खेलों की चाबी छुपी हुई है। ऐसे –ऐसे नायाब खेल हुए भी ..जिनकी कम से देश के सियासी इतिहास में कहीं और मिसाल नहीं मिलती। बीजेपी को अपने समर्थक विधायक को एंबुलेंस में लादकर राष्ट्रपति के समक्ष परेड करानी पड़ी। इसका फायदा पहले बीजेपी को मिला। लेकिन सत्ता समीकरण में सौदेबाजी की हालत में पहुंचे निर्दलीय विधायकों ने पांसा पलट दिया और कभी बीजेपी के ही सिपाही रहे मधु कोड़ा के हाथ में आ गई। जिसमें खुद शिबू सोरेन ने भी अहम भूमिका निभाई। बीजेपी के हाथ से सत्ता फिसल रही थी – लिहाजा लालू प्रसाद यादव और कांग्रेस ने भी बीजेपी को पटखनी देने के लिए हिसाब-किताब करने में देर नहीं लगाई। लेकिन साल बीतते – बीतते शिबू सोरेन का मधु कोड़ा से मोहभंग होने लगा। फिर जिस गुरूजी ने उन्हें आशीर्वाद दिया था, वही गुरूजी उन्हें हटाने की मुहिम में जुट गए। चिरूडीह केस में जेल जाने के बाद वैसे ही उन्हें केंद्र के कोयला मंत्रालय की गद्दी से दूर होना पड़ा था। लेकिन चिरूडीह और शशिनाथ झा हत्याकांड में अदालत से छूटने के बाद गुरूजी को सत्ता से दूरी खलने लगी। पहले तो केंद्र में मंत्री पद पाने के लिए दबाव बनाया और असफल रहे। इसके बाद उन्होंने अपना ध्यान उस राज्य की कमान थामने पर लगाया, जिसके गठन की लड़ाई उन्होंने खुद शुरू की थी।
शिबू सोरेन की हार में इन घटनाओं ने जहां परोक्ष भूमिका निभाई है, वहां हाल ही में घटी एक घटना का सीधा हाथ भी माना जा रहा है। माना जाता है कि गुरूजी को सत्ता के करीब लाने में उनके बेटे दुर्गा सोरेन और हेमंत सोरेन की बड़ी भूमिका रही। दोनों बेटों की चाहत झारखंड की कमान अपने हाथ में बनाए रखने पर रही है। लेकिन सत्ता की कमान हाथ में आते ही गुरूजी में जो बदलाव आया- उनकी हार की वजह जानने के लिए इस बदलाव को समझना ज्यादा जरूरी है।
आदिवासी हितों की रक्षा के लिए शुरू किए आंदोलनों ने ही शिबू सोरेन को झारखंड का गुरूजी बना दिया। लेकिन सत्ता आने के बात गुरूजी अपने साथी आदिवासियों को ही भूलने लगे। उनके ही इलाके दुमका में आरपीजी समूह एक हजार मेगावाट का थर्मल पावर प्लांट लगाने जा रहा है। इसके लिए पंद्रह गांवों की जमीन चिन्हित की गई। जिसके अधिग्रहण का पिछले साल अप्रैल से ही विरोध जारी है। गांव वालों ने इसकी मुखालफत की तो उनके खिलाफ मुकदमे दर्ज होने शुरू हो गए। अब तक करीब एक हजार लोगों के खिलाफ मुकदमे दर्ज हो चुके हैं। जब गांव वालों ने इसी छह दिसंबर को इसके विरोध में प्रदर्शन किया तो पुलिस ने उन्हें सशस्त्र प्रदर्शनकारी बताया और उन पर गोली चला दी। प्रदर्शनकारियों के हाथ में उनके पारंपरिक हथियार तीर-धनुष और कुल्हाणी ही थे। ये भी सच है कि उन्होंने एक पुलिस वाले को घायल भी किया। इस पूरे मामले में हैरतनाक बात ये है कि इस प्रदर्शन से ठीक एक दिन पहले यानी पांच दिसंबर को शिबू सोरेन दुमका आए थे और उन्होंने जिला प्रशासन के अधिकारियों को साफ निर्देश दिया था कि इन प्रदर्शनकारियों को सबक सिखाने से पीछे मत हटिए।
ये उस शिबू सोरेन का आदेश था – जिन्होंने आदिवासियों के हितों की रक्षा को लेकर 1980 में चाईबासा में आंदोलन की अगुआई की थी। ये आंदोलन महज इस बात को लेकर था कि तब की बिहार सरकार के अधिकारी वहां सागौन के पेड़ जबर्दस्ती लगाना चाहते थे, जबकि आदिवासी इसका विरोध कर रहे थे। आदिवासियों का कहना था कि सागौन का पेड़ लगाने से उनका वातावरण प्रभावित होगा – लिहाजा वहां साल का ही पेड़ लगना चाहिए। इस आंदोलन में झारखंड मुक्ति मोर्चा के देवेंद्र मांझी मारे गए थे। तब शिबू सोरेन ने इस आंदोलन का साथ दिया था। जाहिर है आदिवासियों के लिए मरमिटने वाले शिबू जब किसी औद्योगिक ग्रुप के लिए आदिवासियों को ही मारने का आदेश देने लगे तो आदिवासियों का भरोसा उनसे टूटने लगा। और ये लहर झारखंड में फैलते देर नहीं लगी।
यहां ये ध्यान देना जरूरी है कि जिस तमाड़ इलाके ने नया इतिहास रचा है..उसका भी अपना इतिहास है। तमाड़ बंडू आदिवासी इलाके में आता है और इसी इलाके के निवासी थे बिरसा मुंडा। जिन्होंने अंग्रेजी साम्राज्य के खिलाफ जबर्दस्त मोर्चा लेकर नया इतिहास ही रच दिया। शायद उनका ये इतिहास ही है कि झारखंड के लोग उन्हें भगवान के तौर पर मानते हैं। बिरसा मुंडा की जमीन से झारखंड के लोगों ने एक संदेश ये भी दे दिया है कि चाहे जितना भी बड़ा नेता क्यों ना हो ..उसकी कसौटी पर खरा नहीं उतरता, उनके हितों की अनदेखी करता है..वे उसकी अनदेखी करने से नहीं हिचकेगी।
शिबू सोरेन हार चुके हैं। लेकिन उन्होंने मुख्यमंत्री पद से अभी तक इस्तीफा नहीं दिया है। सत्ता लोलुपता का उन पर जो आरोप लगते रहे हैं ..इस्तीफा ना देने से इस आरोप को ही बल मिल रहा है। मैदान में लगी ठोकर कई बार लोगों को संभलने का मौका देती है। लेकिन शिबू सोरेन को इसकी कोई फिक्र नहीं है। वे अपने पुराने रवैये पर कायम हैं और नई परंपरा बनाने में जुटे है। अब देखना ये है कि क्या सत्ता मोह की इस परंपरा को तोड़ने में कांग्रेस कोई दिलचस्पी दिखाती है - या नहीं।