Thursday, April 23, 2009

ऐतिहासिक मंदी से जूझ रहा जर्मनी

अंजनी राय
जर्मन चांसलर श्रीमती अंगेला मर्केल ने बुधवार को अपने दफ़्तर में आर्थिक शिखर सम्मेलन की मेजबानी की.सरकार ने इस बात को स्वीकार किया कि यूरोप की अर्थव्यवस्था नाटकीय ढंग से सिकुड़ रही है.जर्मन वित्त मंत्री पीर इस्तैन्ब्रुक ने कहा की हम वैश्विक अर्थव्यवस्था के मंदी की दौर से गुजर रहे हैं और पहली तिमाही में 3.3 प्रतिशत तक गिरने की उमीद है.ज्ञात हो की इस वर्ष की पहली तिमाही के लिए सरकारी आंकड़े 15 मई तक प्रकाशित नहीं हो रहे हैं.इस भयावह आंकड़े 2008 की चौथी तिमाही में और 2009 की पहली तिमाही दोनों को देखते हुए इस्तैन्ब्रुक ने कहा कि इस वर्ष की पूरी अर्थव्यवस्था पाँच प्रतिशत तक जा सकती है. "एक पांच से पहले दशमलव बिंदु की संभावना कम की नहीं है,". इस्तैन्ब्रुक की टिप्पणी अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष द्वारा जारी उस पूर्वानुमान को सही ठहराती है कि 2009 की जर्मनी की अर्थव्यवस्था 5.6 प्रतिशत तक जा सकती है.
29 अप्रैल को बर्लिन में 2009 के लिए नये आर्थिक अनुमानों का विवरण जारी होगा; पहले से ही यह तेजी 2.25 प्रतिशत के अपने मौजूदा अनुमान को संशोधित करने का संकेत दिया है. पर ये भी जर्मनी के आधुनिक इतिहास में सबसे बड़ी मंदी होगी.उस दौरान सम्मेलन में संघ और व्यापार अधिकारियों के साथ आर्थिक शिखर सम्मेलन के बाद बोलते हुए आर्थिक मंत्री कार्ल- थिएओदोर जू गुत्तेंबेर्ग ने कहा: "मुझे लगता है कि हम सब इस बात से सहमत है की हमारे आगे एक बहुत ही मुश्किल साल है."
ज्ञात हो की श्रीमती मेर्केल ने यह शिखर सम्मेलन बुधवार को कारोबार और व्यापार संघ के नेताओं के साथ बैठक के लिए बुलाई थी की उरोप की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था को कैसे वापस पटरी पर लाया जाये.
करीब 40 उद्योगपतियों ने जर्मनी के दो आर्थिक प्रोत्साहन पैकेज के प्रभाव का विश्लेषण किया जो करीब 80 बिलियन है - हालांकि अभी ऐसे तीसरे पैकेज की कोई योजना नहीं है.
मर्केल ने शिखर सम्मेलन के बाद संवाददाताओं से कहा कि"आज यह बहुत स्पष्ट था कि हम एक तीसरे प्रोत्साहन पैकेज के बारे में, (जो उपाय है कि वे आगे विकसित किया जाना चाहिए कुछ क्षेत्रों में,)" काम कर रहे हैं, उस पर बात नहीं होनी चाहिए. "दूसरा प्रोत्साहन पैकेज ने हमें आगे सही दिशा में काम करने के साधन दिए हैं, और हमारी कोशिश होगी कि इसका प्रभाव सही दिशा में दिखे.
बर्लिन में उच्चस्तरीय बैठक भी बुलाई गयी है, जिसमें सरकार और व्यापारी समुदाय और ट्रेड यूनियनों के बीच बेहतर तालमेल और इस आर्थिक संकट में जर्मनी की प्रतिक्रिया में सुधार लाने की विषयों पर चर्चा होगी .
लेकिन यह तय है की ये आर्थिक मंदी आने वाले चुनाव में मुख्या मुदा होगा और शायद यह श्रीमती मेर्केल के दुबारे सरकार बनाने के सपने पे पानी फेर सकता है। अब तक, एक सरकारी योजना के तहत कंपनियां कर्मचारियों की छंटनी तो नहीं कर रही हैं लेकिन उनके काम के घंटे कम किये जा रहे हैं, मसलन जैसे आमतौर पर लोग हफ्ते में 40 घंटे यहाँ काम करते हैं, वे अब 25-30 घंटे करेंगे, लेकिन जैसे हालत दिख रहे हैं, उसके हिसाब से ये योजना ज्यादा दिन तक नहीं कारगर साबित हो पायेगी और जल्द ही छंटनी शुरु होगी.
हालांकि जर्मन ट्रेड यूनियन के शीर्ष नेता माइकल सोम्मर ने कहा है कि अगर छंटनी बड़े तौर पर शुरु होगी तो इसे हम एक आम आदमी के खिलाफ युद्ध के रूप लेंगे, जिसका नतीजा बहुत गहरा होगा और उसके लिए सरकार जिम्मेदार होगी। इतना ही नहीं, अशांति से इंकार नहीं किया जा सकता है!

Sunday, April 19, 2009

सियासी ड्राइंगरूम के गुलदस्ते

उमेश चतुर्वेदी
चुनावी माहौल में इन दिनों नेता बने अभिनेता बेहद चर्चा में हैं। दोनों हिंदी फिल्मों के नामी-गिरामी सितारे हैं। दोनों का नाम उस फिल्म की सफलता की गारंटी होती है। लेकिन दोनों अपनी इस फिल्मी लोकप्रियता को सियासी मैदान में भुनाने के लिए मैदान में नहीं उतर सके। इनमें से एक को जहां सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव लड़ने की अनुमति नहीं दी तो दूसरे को उसकी पार्टी ने ही इस काबिल नहीं समझा। जी हां, ठीक फरमाया। यहां चर्चा संजय दत्त और गोविंदा की हो रही है।

चुनाव लड़ने और ना लड़ने की खींचतान के बीच एक सवाल पूरी तरह से गायब है। वह सवाल है कि इन राजनेताओं की क्या कोई सियासी वकत भी है, जनता के प्रति उनकी कोई जवाबदेही भी है या फिर ये राजनीति के ड्राइंग रूम में सजाने के लिए सिर्फ गुलदस्ते की ही भूमिका निभाते हैं। गोविंदा की मुंबई के कांग्रेसी मैदान से विदाई से साफ है कि फिल्मी पर्दे पर ये राजनेता जनता की चाहे जितनी सेवा कर लें, जनता के हकों की लड़ाई चाहे जितनी कामयाबी से लड़ लें – लेकिन अगर उनमें सचमुच जनता की सेवा करने का जज्बा नहीं है तो सियासी मैदान में उनकी उपयोगिता खत्म हो जाती है और संसद में एक-एक वोट के जुगाड़ में लगी पार्टियां उन्हें चुनावी मैदान से निकाल बाहर करने में भी देर नहीं लगातीं। सिर्फ कांग्रेस ही नहीं, ये हालत राष्ट्रवाद के मुद्दे को जिंदा रखने वाली बीजेपी और डॉक्टर लोहिया और नरेंद्रदेव की चिंता करने वाली समाजवादी पार्टी सबके साथ है। डॉक्टर लोहिया के चेले मुलायम सिंह को तो जहां भी थोड़ी उम्मीद दिखती है, वहां उनके पास फिल्मी मैदान से उतारने के लिए एक नेता मिल जाता है। जयाप्रदा, जया बच्चन, संजय दत्त और राजबब्बर के अलावा उसे कोई दिखता ही नहीं है। ये बात और ही राजबब्बर आजकल कांग्रेस की बहियां थाम बैठे हैं। वैसे राजबब्बर सियासी अभिनेताओं से कुछ अलग जरूर हैं। उन्होंने समाजवादी युवजन सभा से छात्र राजनीति शुरू की थी। पुलिस की लाठियां भी खाईं थीं। लेकिन जया बच्चन हों या जया प्रदा या फिर संजय दत्त...उनका ऐसा क्या इतिहास रहा है।

1984 के आम चुनावों में राजीव गांधी ने कुछ वैसे ही अभिनेता-अभिनेत्रियों पर भरोसा जताया था, जैसे आज अमर सिंह कर रहे हैं। तब इलाहाबाद से अमिताभ बच्चन, चेन्नई से बैजयंती माला और ऐसे ही ना जाने कितने रजत पटी चेहरे मैदान में उतार दिए गए। उनकी फिल्मी लोकप्रियता बैलेट बॉक्स में भी जमकर बरसी और वे देश की सबसे बड़ी पंचायत में जा पहुंचे। लेकिन वहां उनका प्रदर्शन कैसा रहा, ये संसद की कार्यवाही के इतिहास में दर्ज है। अमिताभ को तो जल्द ही मैदान छोड़ना पड़ा और बैजयंती माला बाली भी राजनीति को बॉय-बॉय बोल चुकी हैं। गोविंदा उसी की अगली कड़ी हैं। 2004 के आम चुनावों में उन्होंने राम नाइक जैसे कद्दावर नेता को हरा तो दिया – लेकिन जनता से उनका वैसा संवाद नहीं बना, जैसी की उनसे बतौर एक राजनेता और सांसद अपेक्षा पाली गई थी। अकेले कांग्रेस की ही ये कहानी नहीं है। बीजेपी ने भी अपनी स्टार प्रचारक हेमा मालिनी के पति धर्मेंद्र को बीकानेर की सीट से दिल्ली के दरबार में दाखिल करा दिया- लेकिन जिस जनता के वोटों से जीतकर वे संसद की सपनीली पंचायत में पहुंचे, उसके प्रति वे अपना कोई फर्ज नहीं निभा सके। परिणाम ये हुआ कि उनके वोटरों को धर्मेंद्र के लापता होने का पोस्टर लगाना पड़ा।

ये सच है कि आज के दौर में बहुत सारे राजनेता ऐसे हैं – जो अपनी जनप्रतिबद्धता को सही तरीके से निभा नहीं पा रहे हैं। उन पर पैसाखोरी और अंधाधुंध कमाई के साथ ही भ्रष्टाचार के आरोप लगते रहते हैं। उनकी तुलना में अभिनेता-अभिनेत्रियों की एक सामाजिक छवि होती है। फिल्मी पर्दे पर वे जनता की लड़ाई करते हुए दिखते-दिखाते कम से कम औसत मतदाताओं में उनकी ये सामाजिक छवि विकसित होती है। यही वजह है कि आम लोग टूट कर उन्हें वोट देते हैं। लेकिन जब यही अभिनेता उसकी समस्याओं को दूर कराने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाता, उसे लेकर कोई प्रतिबद्धता नहीं जताता तो जनता उसके लापता होने का पोस्टर लगाने लगती है। फिर जो पार्टी उसे धूमधाम से संसद में अपना एक वोट बढ़ाने के लिए टिकट देकर जिता कर लाई होती है – वही उससे किनारा करने लगती है। लेकिन सबसे बड़ी परेशानी उस जनता को होती है, जो बड़े अरमानों के साथ उस नेता को जिता कर संसद के गलियारे में भेजती है। पार्टी भले ही बाद में उसका टिकट काट दे – लेकिन नुकसान उस जनता को ही भुगतना पड़ता है, जिसने अपना कीमती वोट उस राजनेता बने अभिनेता को दिया होता है। उसका पांच साल बरबाद हो जाता है। डॉक्टर लोहिया कहते थे कि जिंदा कौमें पांच साल तक इंतजार नहीं कर सकतीं – लेकिन मजबूरी देखिए कि इस जिंदा कौम को पूरी सजगता के बावजूद पांच साल तक अपनी बदहाली दूर कराने , अपनी समस्याएं निबटवाने वाले राजनेताओं की खोज के लिए पांच साल तक इंतजार करना पड़ता है।

ऐसे में ये कहा जाय कि सियासी स्वार्थ के लिए पार्टियां ऐसे अभिनेताओं को अपने साथ लेकर आती हैं, उन्हें जिताती भी हैं। लेकिन उनकी भूमिका राजनीति के ड्राइंग रूम में सजे गुलदस्ते से ज्यादा की नहीं होती। ऐसे में ये सवाल उठना लाजिमी है कि सियासी ड्राइंगरूम में इन अभिनेताओं को गुलदस्ते की तरह सजाने की जरूरत क्या है। क्या संसद के गलियारे में अपना एक वोट बढ़ाने के लिए जनता के प्रति जवाबदेही को पांच साल तक स्थगित रखा जाना चाहिए। अभी तक तो जनता ये सवाल नहीं पूछ रही है। लेकिन देर-सवेर राजनीतिक पार्टियों से ये सवाल पूछे जाएंगे। तब शायद कोई मुन्नाभाई या विरार का छोकरा महज गुलदस्ता बनने राजनीति के आंगन में नहीं उतरेगा। लेकिन इससे वे पार्टियां भी अपनी सामाजिक भूमिका से बच नहीं सकतीं, जिनके हाथ इन गुलदस्तों को सजाने के लिए आगे बढ़ते रहे हैं।

Sunday, April 5, 2009

मुन्नाभाई से नहीं, लोकतंत्र से हुआ इंसाफ


राजकुमार पांडेय
संजय दत्त को चुनाव लड़ने से रोक कर न्यायपालिका ने अपना काम बेहतर तरीके से निभाया है। न्यायपालिका ने इस तरह से साफ संदेश दे दिया है कि वो किसी को भी बख्शने वाली नहीं है। चाहे उसका पारिवारिक बैकग्राउंड कितना भी देशभक्ति वाला हो। न्यायपालिका के इस फैसले के बाद अब व्यवस्थापिका और उसके नुमाइंदों को सोचना होगा। हमारे देश के कानून ऐसे हैं जिसके तहत संजय दत्त को तो चुनाव लड़ने से रोका जा सकता है, लेकिन दाऊद भाई अगर भारत के जेल में बंद भी हो तो उनको कोई चुनाव लड़ने से नहीं रोक सकता। अबू सलेम छोटा राजन या फिर और दूसरे तमाम अपराधी चाहे जितना राष्ट्र विरोधी काम कर रहे हों उन्हें तब तक चुनाव लड़ने से नहीं रोका जा सकता, जब तक कि उन पर मुकदमा चला कर उन्हें सज़ा न दे दी जाय। शाहबुद्दीन को चुनाव लड़ने से कोर्ट ने रोका तो उन्होंने अपनी पत्नी को मैदान में उतार दिया। और तो और लालू प्रसाद यादव बाकायदा उनके प्रचार में भी लगे हुए हैं।
नाम फौरी तौर पर एक समुदाय विशेष से आ रहे हैं इसका कत्तई ये मतलब नहीं निकालना चाहिए कि सिर्फ उसी समुदाय के लोग ही अपराधी है। दरअसल ऐसे तमाम हिंदू अपराधी हैं जो जरायम की अपनी दुकान के साथ साइ़ड बिजनेस के रूप में राजनीति का धंधा भी चला रहे हैं। उन्हें चुनाव लड़ने बिल्कुल नहीं रोका जा सकता। बल्कि राजनीतिक दल भी उन्हें चुनाव में उतार कर अपनी एक सीट पक्की कर लेते हैं। जनता से अपेक्षा की जाती है कि उनके बीच कोई भगत सिंह पैदा हों और वे ही इन गुंडे और बदमाशों को वोट न दे।
जब बात जनता की चली तो इसे भी समझ लेना जरूरी है कि जनता क्यों इस तरह के लोगों को वोट दे देती है। ग़ाज़ीपुर इलाके से मुख्तार अंसारी जनप्रतिनिधि रहे। अब वहां किसी के भी घर में शादी व्याह हो, या किसी दूसरे मौके पर बिजली की जरूरत होती थी तो बिजली नहीं कटती थी। वजह ये थी कि मुख्तार भाई सीधे इंजीनियरों को फोन कर देते थे, फला तारीख को इतने से इतने बजे तक बिजली नहीं जानी चाहिए। किसकी मजाल कि भाई का हुक्म टाल दे। किसी को पानी के टैंकर की जरूरत पड़ती थी तो भी भाई का हाथ उसके साथ होता था। आम आदमी को इससे ज्यादा की जरूरत नहीं और दूसरी तबीयत वालों के तो भाई लोग मसीहा हैं ही। फिर साधारण आदमी से ले कर असाधारण बदमाश तक को मुख्तार भाई का नेतृत्व शूट करता है।
अब नेताजी की बात कर लें। नेता जी नेता बनने से पहले किसी तरह दो जून रोटी का जुगाड़ करते थे। अब वे पांच तारा सुविधाओं के हक़दार हो गए हैं। उनका क्लास बदल गया है। उन्हें किसी भी आम आदमी से बात करने की फुर्सत नहीं। अगर वे मंत्री हो गए तो फिर कमीशन के दलालों के साथ मीटिंग करने से उन्हें फुर्सत ही कहां हैं जो वे किसी साधारण आदमी की बेटी की शादी में एक टैंकर दिला सकें। या फिर किसके घर फेरे अंधेरे में हो रहे हैं, इसकी जानकारी भी वो ले पाएं।
तो इस हालत में किसी आम आदमी को जरूरत क्या है कि उसे मुख्तार भाई या शाहबुद्दीन की जगह छात्र संघ में उत्पात मचा कर राजनीति में आए किसी व्यक्ति को वोट दे।
फिर भी ऐसा नहीं कि देश में अब संजीदा राजनीतिज्ञ न रह गए हों। हैं तभी तो जो भी सही व्यवस्था चल रही है। उन्ही संजीदा लोगों को सोचने की जरूरत है कि अपराधियों को किस तरह से चुनाव में उतरने से रोका जा सके। संजय दत्त चुनाव लड़ें या न लड़े इससे देश को कुछ भी फर्क नहीं पड़ता। अलबत्ता इस फैसले के जरिए जो संदेश सुप्रीम कोर्ट ने दिया था, उसे समझने की जरूरत है। सुप्रीम कोर्ट भी मुख्तार और अतीक जैसे या फिर काल्पनिक हालात में जाएं तो दाऊद भाई जैसों को फिलहाल तो चुनाव लड़ने से नहीं रोक सकता। इन्हें रोकने के लिए नए सिरे से कानून बनाने होंगे। वो भी कानून ऐसे हों जिनका किसी भी तरह से दुरुपयोग न हो सके। क्योंकि आज कोई भी कानून बनने के पहले ही उसके दुरूपयोग के रास्ते खोजे जाने लगते हैं। पहले भी कानून बनाने वालों ने ऐसा ही भोलापन किया। उन्हें अंदेशा कम ही था कि आने वाले वक्त में राजनीति और समाज की ये दशा होगी। उन्हें इसका इल्म नहीं हो पाया था कि कोई राज्यपाल भी अपने पद का किस हद तक दुरुपयोग कर सकेगा। भाई महावीर से ले कर रमेश भंडारी और भी बहुत से कांग्रेसी राज्यपालों ने इसके नए रिकॉर्ड बनाए। सबब ये है कि अब बहुत सोच समझ कर उन कानूनों को बनाने का वक्त आ गया है कि दागदार लोग लोकतंत्र के यज्ञ से दूर रहे और इसकी पवित्रता बरकरार रहे।