Thursday, May 21, 2009

लोकतंत्र में बहिष्कार बना हथियार

उमेश चतुर्वेदी
हाल में संपन्न हुए आम चुनावों में कम मतदान को लेकर उठते सवालों का दौर अभी तक थमा नहीं है। गरमी के चलते मतदान कम हुआ या फिर वोटरों की उदासीनता इसकी बड़ी वजह बनी, इसे लेकर बहस-मुबाहिसे और चर्चाओं का दौर जारी है। लेकिन इन्हीं चुनावों का जिस बड़े पैमाने पर बहिष्कार हुआ..उस पर अभी लोगों का ध्यान कम गया है। देश के लोकतांत्रिक इतिहास में ये पहला मौका है, जब लोगों ने खुलकर इतने बड़े पैमाने पर वोटिंग का बहिष्कार किया। अब तक लोग या तो वोट डालते रहे हैं या फिर मतदान केंद्र पर जाते नहीं रहे है। लेकिन इस बार जिस तरह तमाम लोकसभा सीटों के खासकर ग्रामीण इलाकों से मतदान के बहिष्कार की खबरें आईं...उससे लोकतांत्रिक भारत की नई तस्वीर उभरती है।
1973 में जयप्रकाश नारायण ने पीपुल्स फॉर डेमोक्रेसी का जो अभियान शुरू किया था, उसका मकसद था निचले पायदान तक लोकतंत्र को पहुंचाना। आज से करीब साढ़े तीन दशक पहले जब जेपी ने ये आंदोलन शुरू किया था..तो उसका मतलब साफ है कि उस वक्त भी देश की रहनुमाई करने वाले सफेदपोश लोगों का ध्यान मजलूम और कमजोर लोगों तक उस शिद्दत से नहीं पहुंच पाया था..जितनी की उम्मीद की जा रही थी। अगर 1952 के पहले आमचुनाव को छोड़ दें, तो बाद के तकरीबन सारे चुनावों में मतदाताओं को वायदों का लंबा पिटारा थमाया जाता रहा है और चुनाव बीतने के बाद उन्हें तबियत से भुलाया जाता रहा है। जयप्रकाश नारायण इसके लिए मौजूदा लोकतांत्रिक ढांचे को ही जिम्मेदार मानते थे। यही वजह है कि जब उन्होंने पीपुल्स फॉर डेमोक्रेसी का आंदोलन छेड़ा तो उसमें उनकी एक मांग जनप्रतिनिधियों को वापस बुलाने की भी थी। उनका मानना था कि देश के लोकतांत्रिक ढांचे में जनप्रतिनिधि, चाहे वह सांसद हो या विधानसभा का सदस्य..उसे तभी जिम्मेदार बनाया जा सकेगा, जब लोगों को उसे वापस बुलाने का अधिकार हो। स्विटजरलैंड जैसे कुछ देशों में ये नियम है भी। जेपी के आंदोलन में राइट टू रिकाल को भी अहम स्थान दिया गया था।
1973 के बाद से लेकर अब तक देशभर की नदियों में ना जाने कितना पानी बह गया है। राजनीति की दुनिया में भी ना जाने कितने बदलाव हो चुके हैं। लेकिन जयप्रकाश नारायण का ये सपना पूरा नहीं हो पाया। लेकिन लोग अब जागरूक होने लगे हैं। अब लोगों को लगने लगा है कि संसद और विधानसभा में हरे-लाल कालीनों पर पहुंचने वाले नेताओं की वकत उनके वोटों की ही बदौलत है। लोगों को ये भी पता चल गया है कि जब तक वे दबाव नहीं बनाएंगे, उनके ये नेता उनकी मांगों पर ध्यान नहीं देंगे। और एक बार जीत गए तो फिर जनता के दरबार में उनकी वापसी संभव नहीं होगी। रही बात उनकी जरूरी सुविधाएं भी पूरा करने की ...तो नेता शायद ही याद रखें। लिहाजा लोग पहले भी वोट के बहिष्कार का रास्ता अख्तियार करते रहे हैं। लेकिन बीते चुनावों में इस बार ये चलन कुछ ज्यादा ही दिखा। हरियाणा के जींद जिले के झांझकला के लोग पानी की गुहार लगाते- लगाते थक गए। लेकिन उनकी आवाज से उनके प्रतिनिधियों के कानों पर जूं नहीं रेंगीं। लिहाजा इस बार उन्होंने वोट के बहिष्कार का ऐलान कर दिया। उनके ऐलान ने हर पार्टी के नेताओं को मुश्किल में डाल दिया। शायद ही किसी बड़े दल का नेता था, जो वोटरों के दरबार में हाजिरी लगाने नहीं पहुंचा। उत्तर प्रदेश के झांसी जिले के सिमरिया के लोग जहां विकास को लेकर वोटिंग के बहिष्कार पर आमादा हो गए तो टिकरा तिवारी, भारौनी, मजरा कंचनपुरा के लोगों ने कंचनौधा बांध में अधिग्रहीत की गई अपनी जमीनों के मुआवजे को पूरा करने की मांग को लेकर वोटिंग का बायकाट किया। औरैया जिले के गोपालपुर, चिरैयापुर और नवलपुर के लोगों का नारा ही था, विकास नहीं तो वोट नहीं। वोटिंग बहिष्कार की ये लिस्ट सिर्फ उत्तर प्रदेश से ही इतनी लंबी रही कि पूरा पेज ही भर जाय।
ऐसा नहीं कि उनके बहिष्कार को तुड़वाने और मतदान केंद्रों पर लाने के लिए उन्हें दबाव-धमकियां नहीं दी गईं। लेकिन गांधी की राह पर चलते हुए लोगों ने हर दबाव का मुकाबला किया और वोट डालने नहीं पहुंचे। फतेहपुर जिले के जुनैदपुर, सीतापुर के बिजनापुर, उन्नाव के बैरी रसूलपुर, बांगड़मउ, बिशनपुर, लढ़पुर के लोगों ने भी कुछ ऐसी ही हुंकार भरी कि नेताओं को दिन में ही तारे नजर आने लगे। मिश्रिख के गोंदरामऊ और गपोली इलाकों में भी लोगों ने कह रखा था कि वे इस बार नेताओं के झांसे में नहीं आने वाले हैं। फिरोजाबाद जिले के दलियापुर, नगला दुहिली और नसरीपुर के कुछ लोगों को पुलिस और अफसरों का कोपभाजन भी बनना पड़ा। लेकिन वे वोटिंग बहिष्कार के अपने फैसले से टस से मस नहीं हुए।
ऐसी खबरें तकरीबन देश के हर उस हिस्से से आईं, जो आजादी के बासठ साल बाद भी बुनियादी सहूलियतों से महरूम हैं। लोगों को लग गया है कि उनके वोट में कितनी ताकत है। अगर ऐसा नहीं होता तो नेताओं के मान-मनौव्वल का दौर बुनियादी सुविधाओं से दूर इन गांवों की धूल भरी गलियों के बीच नहीं चल पाता। कई जगह नेताओं को मुंह छुपाने के लिए मजबूर नहीं होना पड़ता। लोगों में आई इस तबदीली को लोकतांत्रिक प्रक्रिया में लोगों की भागीदारी और उनकी बढ़ती जागरूकता के तौर पर देखा जाना चाहिए। अगर ऐसे लोगों को जेपी द्वारा शुरू किए गए राइट टू रिकॉल का अधिकार मिल जाए तो सोचना पड़ेगा कि देश की लोकतांत्रिक दशा और दिशा क्या होगी।

Sunday, May 10, 2009

संजय दत्त को अब क्यों याद आ रहा है मुसलमान का बेटा होना


उमेश चतुर्वेदी
अपनी जादू की झप्पी से फिल्मी पर्दे पर लोगों की समस्याएं दूर करने में मुन्नाभाई भले ही सफल रहे हों, लेकिन राजनीति के अखाड़े में उनकी ये झप्पी उन्हीं पर भारी पड़ती नजर आ रही है। उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती को जादू की झप्पी देने की उनकी कोशिश को चुनाव आयोग ने सही नहीं माना और आखिरकार प्रतापगढ़ के जिलाधिकारी और जिला निर्वाचन अधिकारी को उन्हें लिखित में माफी मांगनी पड़ी। चूंकि चुनाव आयोग और अधिकारियों ने इस बयान का संज्ञान लिया, इसलिए कम से कम चुनाव प्रचार में अब संजय दत्त की इस झप्पी पर रोक तो लगती नजर आ रही है।
लेकिन इससे भी कहीं ज्यादा वे एक और खतरनाक बयान देते फिर रहे हैं। लेकिन इसकी तरफ किसी का ध्यान नहीं जा रहा है। संजय दत्त कहते फिर रहे हैं कि जब वे टाडा के तहत जेल में बंद थे तो उन्हें पुलिस वाले मुसलमान का बेटा कहकर पिटाई किया करते थे। संजय कहते फिर रहे हैं कि चूंकि उनकी मां मुसलमान थीं, इसलिए उन्हें पुलिस वाले जेल में उत्पीड़ित करने का कोई मौका नहीं छोड़ते थे। संजय दत्त ये बयान जिस समाजवादी पार्टी के मंचों से देते फिर रहे हैं, सियासी और वोटरों की दुनिया में माना जाता है कि वह मुसलमानों की रहनुमाई करती है। लिहाजा मुन्नाभाई के इस बयान पर जगह-जगह तालियां जमकर बज रही हैं और इस पर कोई सवाल नहीं उठ रहा है। अव्वल तो भारतीय जनता पार्टी को ये सवाल उठाना चाहिए था, हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण की उसकी कोशिशों में एक कोशिश और भी जुट जाती। लेकिन उसे भी संजू बाबा का ये बयान भड़काऊ और सवालिया घेरे वाला नहीं लग रहा है। बहुजन समाज पार्टी और कांग्रेस इस बयान पर इसलिए सवाल नहीं उठा पा रहे हैं, क्योंकि उन्हें लग रहा है कि चुनावी दौर में जो भी मुस्लिम मतदाता उसकी ओर आकर्षित हो रहे हैं, वे कहीं विदक नहीं जायं।
लेकिन इससे इस बयान पर सवाल उठाने की गुंजाइश खत्म नहीं हो जाती। ये सच है कि संजय दत्त की मां नरगिस दत्त भले ही मुसलमान थीं, लेकिन उनका नाम सामने आते ही इस देश के जेहन में मदर इंडिया, श्री चार सौ बीस, आवारा जैसे ढेरों फिल्मों की नायिका की छवि उभरती है। बुर्के में ढंकी और लदी-फदी कोई आम मुसलमान महिला का अक्स नहीं उभरता। शायद ही किसी को याद है कि संजय दत्त को इसके पहले किसी ने किसी मुसलमान के बेटे के तौर पर याद किया हो। सब उन्हें सुनील दत्त के बेटे के ही तौर पर जानते रहे। अगर मुसलमान और हिंदू के खांचे में उन्हें बांटकर देखा जाता रहता तो नाम, राकी और साजन से लेकर खलनायक और मुन्नाभाई एमबीबीएस जैसी फिल्में सफलता का परचम नहीं लहरातीं। जिनके दम पर वे लोकप्रियता के उंचे पायदान पर खड़े हैं और उनकी ये लोकप्रियता ही है कि समाजवादी पार्टी और उसके कर्ता-धर्ता अमर सिंह ने उन्हें प्रचार मैदान में उतार रखा है।
संजय दत्त को सचमुच पुलिस वालों ने कितना उत्पीड़ित किया, इसे उन दिनों के टीवी फुटेज को ही देखकर समझा जा सकता है, जब वे टाडा कोर्ट में अपनी हाजिरी बजाने के लिए जाते थे। अदालत के बाहर सिक्युरिटी चेक के पहले उन्हें देखते ही जिस तरह पुलिस वालों की बांछें खिल उठती थीं, इसे पूरे देश ने देखा है। कुछ पुलिस वाले उत्साह में ये भूल भी जाते थे कि लोकप्रियता के पायदान पर जो शख्स खड़ा है और अदालत में पेशी के लिए आ रहा है. वह आरोपी है। इसी झोंके में वे संजय दत्त से हाथ तक मिला बैठते थे। क्या आपको लगता है कि दाऊद इब्राहीम या बबलू श्रीवास्तव कोर्ट में पेश करने के लिए लाया जाएगा तो लोग उससे हाथ मिला बैठेंगे। अदालतों में रसूखदार और ताकतवर ना जाने कितने तरह के अपराधी रोज आते हैं। लेकिन कितने पुलिस वालों की हिम्मत है कि वे सरेआम कैमरे के सामने उनसे हाथ मिला लें। लेकिन संजय दत्त से पुलिस वाले हाथ मिलाने से नहीं हिचकते थे। जिन्होंने ये फुटेज देखे हैं, उन्हें याद है कि जब संजय दत्त आते थे तो महिला सिपाहियों के चेहरे पर वैसी ही मुस्कुराहट और उत्साह नजर आता था, जैसे किसी लोकप्रिय अभिनेता को नजदीक से देखने के बाद आता है। अब जबकि संजय दत्त ये बयान देते फिर रहे हैं और समाजवादी पार्टी इसे जगह-जगह भुनाने की कोशिश कर रही है, ऐसे में ये सवाल उठना लाजिमी है कि कोर्ट के बाहर संजय दत्त से हाथ मिलाने वाले सारे या अधिकतर सिपाही मुसलमान थे...निश्चित तौर पर इसका जवाब ना में होगा। जब सिपाही कोर्ट में पेश होने जाते वक्त संजय दत्त से हाथ मिला सकते हैं तो क्या वे जेल में उन पर अत्याचार कर सकते हैं। ऐसा नहीं कि संजय दत्त जेल जाने से पहले सुपरहिट फिल्में नहीं दे सके थे। राकी और नाम उनके जेल जाने से पहले की सुपर हिट फिल्में हैं। क्या तब जेल कर्मचारियों को ये पता नहीं होगा कि संजय दत्त हिंदी रजतपट के कामयाब हीरो हैं। साफ है कि इन सब सवालों का जवाब ना में होगा।
अब संजय दत्त समाजवादी पार्टी के नेताओं के समझाने से खुद को मुसलमान का बेटा बताते फिर रहे हैं या फिर अपनी मनमर्जी से...ये तो गहन शोध का विषय है। लेकिन ये भी सच है कि संजय दत्त की असल दुनिया हिंदी सिनेमा का रजतपट ही है। जहां जाति और धर्म की बेड़ियों के खांचे में बांधकर अभिनेताओं के काम पर तालियां नहीं बजाई जातीं। वहां मधुबाला, तब्बू और माधुरी दीक्षित पर सीटियां धर्म और जाति को देखकर नहीं बजतीं। वहां उनका काम और उनका अभिनय देखा जाता है। सियासी मैदान में प्रचार से जाने के पहले काश संजय दत्त इस पर भी ध्यान देते।