Friday, June 26, 2009

ऐसे भी होते हैं लोग ....

उमेश चतुर्वेदी
जेठ की तपती दोपहरी के बीच शिमला जाकर इच्छा तो एक ही होती है... किसी पहाड़ी चोटी पर जाकर ठंडी हवाओं के बीच दूर-दूर तक पसरी वादियों का दीदार करें। लेकिन ऐसा कहां हो पाता है। मैदानी इलाके में रहने के आदी मानव मन को तपती गर्मी से निजात मिली नहीं कि पैरों में जैसे पंख लग जाते हैं और शुरू हो जाता है घूमने का सिलसिला...ठंडे मौसम के बीच पसरी खूबसूरत वादियों में फैले यहां के माल रोड और रिज इलाके का चप्पा-चप्पा छान मारने के लिए जी उछल पड़ता है।
जून की तपती गरमी मे दिल्ली से निकलकर शिमला पहुंचा हमारा मन भी कहां मानने वाला था। पूरा दिन कभी अंग्रेजों की ग्रीष्मकालीन राजधानी रही शिमला को अपने पैरों तले नापने में गुजर गया। शाम होते – होते पैरों ने जवाब देना शुरू कर दिया, लेकिन मन भला कहां मानने वाला था। लेकिन थकान और आंखों में तिर रही नींद के आगे पहले दिन हमें झुकना ही पड़ा। जाहिर है इसके बाद होटल में अपना बिस्तर ही सबसे बड़ा साथी नजर आया।
लेकिन शिमला आएं और लार्ड डफरिन के बनवाए भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान का दर्शन ना करें..ये कैसे हो सकता था। अंग्रेजों की गर्मी की राजधानी में कभी वायसराय का ये निवास हुआ करता था। ब्रिटिश और बेल्जियन वास्तुकला का बेहतरीन नमूना ये भवन आजादी के बाद भारत के राष्ट्रपति का ग्रीष्मकालीन निवास बना। तब सिर्फ गरमियों में कुछ दिनों के लिए राष्ट्रपति यहां रहने आते थे। पढ़ाई-लिखाई के शौकीन रहे दूसरे राष्ट्रपति डॉ.एस. राधाकृष्णन को इस खूबसूरत और विशाल भवन का बाकी समय खाली रहना खलता रहा, लिहाजा उन्होंने इसे 1965 में भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान को दान दे दिया। तब से यहां पोस्ट डॉक्टरल रिसर्च और अध्ययन मनन जारी है। बहरहाल आधुनिक भारत के इस बेहतरीन विद्यास्थान को देखने की इच्छा पढ़ने – लिखने में दिलचस्पी रखने वाले हर इंसान को होती है। लिहाजा सपरिवार हम भी माल रोड से भारतीय उच्च अध्ययन संस्थान जा पहुंचे। पहले तो काफी देर तक टैक्सियों का इंतजार किया। साझे में चलने वाली इन टैक्सियों का कुछ ही महीनों से हिमाचल प्रदेश पर्यटन विभाग ने शुरू किया है। लेकिन उस दिन पता नहीं क्या वजह रही..घंटों इंतजार के बाद भी टैक्सियों के दर्शन नहीं हुए। तिस पर तुर्रा ये कि उनकी इस गैरहाजिरी के बारे में जानकारी देने की जरूरत भी कोई नहीं समझ रहा था। मजबूरी में हम बाल-बच्चों समेत पैदल ही उच्च अध्ययन संस्थान की ओर चल पड़े। उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में लार्ड डफरिन द्वारा बनवाए इस भवन को देखने का लुत्फ उठाने के बाद जब होटल लौटने का वक्त हुआ तो सारा उत्साह काफूर हो चुका था। दरअसल लौटते वक्त की चढ़ाई के लिए पैर साथ नहीं दे रहे थे। लेकिन मजबूरी में पैदल लौटना ही था। घिसटते हुए हम अभी कुछ सौ कदम ही चले होंगे कि अचानक हमारे बगल में एक जिप्सी आकर रूकी। सेना पुलिस के जवानों की इस जिप्सी को देखकर हैरत होना स्वाभाविक था। हम अभी कुछ समझ पाते कि जिप्सी में से एक सवाल उछला – कहां जाना है?
जैसा कि सुरक्षा बलों की आवाज में जैसी तल्खीभरी कड़क होती है, वैसा कुछ नहीं था। हमें चूंकि माल रोड लौटना था, लिहाजा हमारा जवाब भी वही था। जिप्सी में सवार सेना पुलिस के दोनों जवान जवाब सुनकर कुछ देर ठिठके। दरअसल उन्हें कहीं और जाना था। लेकिन उन्होंने हमारे साथ छोटे बच्चों को देखा। इसके बाद उनका कर्तव्यबोध जाग गया। उन्होंने गाड़ी में बैठने का इशारा किया। इसके बाद हमने कब माल रोड की चढ़ाई पूरी कर ली, हमें पता ही नहीं चला। इस बीच उनसे हमारी निजी बातचीत भी हुई। मैं उनका नाम पूछते ही रह गया...लेकिन उन्होंने नाम नहीं बताया। बस उनका यही जवाब था, दूर-देश से आए लोगों के हम इतना भी काम आ सकें..बस यही काफी है। जब तक हम गाड़ी से उतरते, वे लोग जिस तेजी से आए थे, उसी तेजी से अपनी राह लौट गए।
जो हिमाचल सरकार सैलानियों के ही दम पर जमकर कमाई कर रही है..उसे भी ये आवाज सुननी चाहिए। टूरिस्ट स्थलों पर ठगी और लूट की घटनाएं देखते रहने के लिए आदी रहे हमारे मन के लिए तो ये अपनापा सुखद हैरत में डालने के काफी है।

Monday, June 8, 2009

ये हिंदी की जीत है....

उमेश चतुर्वेदी

ज्योतिरादित्य सिंधिया, जितिन प्रसाद, सचिन पायलट और अगाथा संगमा में अपने पिताओं की विरासत की राजनीति के अलावा क्या समानता है..ये सवाल कुछ लोगों को अटपटा जरूर लग सकता है। लेकिन जिन्होंने 28 मई को केंद्रीय मंत्रिमंडल का शपथ ग्रहण समारोह देखा है, उन्हें इस सवाल का जवाब मालूम है। अभिजात्य माहौल में पले-बढ़े, महंगे कान्वेंट और विदेशी विश्वविद्यालयों में पढ़े-लिखे इन नौजवानों के लिए अंग्रेजी वैसी ही है, जैसे छोटे-शहरों और गांवों के पिछड़े स्कूलों में पढ़े लोगों की सहज जबान हिंदी है। लेकिन इन नौजवान नेताओं ने राष्ट्रपति भवन के गरिमामय माहौल में जिस तरह हिंदी को अपनाया और देश की अहम भूमिका निभाने की शपथ इसी जबान में ली, उससे साफ है कि नए भारत को समझने का उनका नजरिया मनमोहन मंत्रिमंडल में शामिल उनके दूसरे साथियों से कुछ अलग है।
22 मई को जब मनमोहन मंत्रिमंडल की पहली खेप के 19 मंत्रियों में से महज चार ने ही हिंदी में ही शपथ ली थी। तब इसे लेकर खासकर हिंदी क्षेत्रों में हैरतनाक प्रतिक्रिया हुई थी। गैर हिंदीभाषी मंत्रियों को एक बारगी माफ भी कर दें तो ठेठ हिंदीभाषी इलाके के नेताओं का अंग्रेजी में शपथ लेना कम से कम हिंदीभाषी क्षेत्रों के लोग पचा नहीं पाए। वैसे कोई हिंदी में मंत्री पद की शपथ ले या फिर अंग्रेजी में, इसे वह नेता विशेष अपना निजी मामला बता सकता है, क्योंकि संविधान ने उसे ये छूट दे रखी है। लेकिन क्या सार्वजनिक जीवन में आए लोगों को इस आधार पर माफ किया जा सकता है। कम से कम उनके ज्यादातर वोटर इससे शायद ही सहमत हों। इसकी वजह ये नहीं है कि हमारी राष्ट्रभाषा हिंदी है और एक आम भारतीय अपने नुमाइंदे से उसका भाग्यविधाता बनने की शपथ हिंदी में ही लेना पसंद करता है। दरअसल पूरे देश में वोट मांगने का जरिया भारतीय भाषाएं ही हैं। जहां हिंदी बोली-समझी जाती है, वहां नेता अपने वोटरों से हिंदी में ही वोट मांगते हैं। जहां हिंदी नहीं है, वहां के नेता अपने वोटरों से उर्दू, बंगला, गुजराती, मराठी, तमिल, मलयालम जैसी स्थानीय भारतीय भाषाओं में ही अपील करते हैं। अहिंदीभाषी इलाकों को छोड़ दें तो हिंदी भाषी इलाकों से चुनकर आए नेताओं का ये फर्ज नहीं बनता कि जिस भाषा में उन्होंने वोट मांगा है, उसी भाषा में अपने लोगों की नुमाइंदगी करें। कपिल सिब्बल, अजय माकन या श्रीप्रकाश जायसवाल ने शायद ही किसी से अंग्रेजी में ही वोट मांगा होगा। लेकिन उन्होंने जिस तरह अभिजात्य अंग्रेजी में शपथ ली, उससे लोग हैरत में पड़े। ऐसे लोगों के लिए पूर्वोत्तर के राज्य मेघालय से चुनकर आई अगाथा संगमा करारा जवाब ही मानी जाएंगीं, जिन्होंने गैरहिंदी भाषी होते हुए भी हिंदी में पूरे आत्मविश्वास से शपथ लेकर लोगों का मन मोह लिया, तालियां तो खैर सबसे ज्यादा बटोरी हीं।
आजादी के बाद हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के सवाल पर पूरा देश एकमत था। लेकिन हिंदी को लेकर तत्कालीन नेहरूवादी व्यवस्था के दिल में क्या था, इसका उदाहरण है कि अंग्रेजी में सरकारी कामकाज करने को पंद्रह साल तक के लिए छूट दे दी गई। ऐसा माना गया कि इस दौरान हिंदी अपना असल मुकाम हासिल कर लेगी। लेकिन हुआ ठीक उलटा। सरकारी स्तर पर हिंदी आजतक अपना मुकाम हासिल नहीं कर पाई। लेकिन बाजार ने वह काम कर दिखाया, जो अंग्रेजी वर्चस्व वाली केंद्र सरकार की उपेक्षा के चलते नहीं हो पाया। जिस तमिलनाडु में हिंदी के खिलाफ हिंसक आंदोलन हुए, साठ से दशक में पूरा राज्य जलता रहा। उसी तमिलनाडु के लोग भी अब अपने बच्चों को खुशी-खुशी हिंदी पढ़ा रहे हैं। कभी अंग्रेजी अखबारों के लिए हिंदी की खबरें दोयम दर्जे की मानी जाती थीं। अब अंग्रेजी के ही अखबार चेन्नई में आ रहे इस बदलाव को खुशी-खुशी छाप रहे हैं। ये कोई मामूली बदलाव नहीं है।
एक दौर तक हिंदी फिल्में हिंदी भाषा के राजदूत की भूमिका निभा रही थीं। लेकिन नब्बे के दशक में आई टेलीविजन क्रांति ने इसमें और इजाफा ही किया है। इस दौरान टेलीविजन चैनलों ने हिंदी के प्रसार में जबर्दस्त भूमिका निभाई। कभी बंगाल, तमिलनाडु और कर्नाटक के लोग हिंदी के नाम पर नाकभौं सिकोड़ते थे, लेकिन ये टेलीविजन क्रांति का ही असर है कि अब इन गैर हिंदीभाषी इलाकों के बच्चों की पहली पसंद बंगला, तमिल या मलयालम टेलीविजन चैनल की बजाय हिंदी चैनल में ही काम करना है। इसके लिए उनका एक ही तर्क होता है, हिंदी टेलीविजन चैनल में काम करने से उनकी अखिल भारतीय पहचान बनती है। बंगला या मराठी में काम करने से उनकी दुनिया सिमट जाती है। और उन्हें ये सिमटी हुई दुनिया पसंद नहीं है। उदारीकरण में कई बुराइयां हैं। लेकिन ये भी सच है कि उसने मशहूर अंग्रेजी समालोचक ई एम फास्टर की उस अवधारणा को सच साबित किया है, जिसके मुताबिक अंतरराष्ट्रीय होने की पहली शर्त स्थानीय होना है। उदारीकरण और भूमंडलीकरण के जरिए स्थानीयता का जो महत्व बढ़ा है, उसके चलते हिंदी की ताकत बढ़ी है। मजे की बात ये है कि आज उदारीकरण के दौरान पली-बढ़ी पीढ़ी हिंदी की ताकत समझ रही है। लेकिन जिस मनमोहन सिंह ने इस उदारीकरण को बढ़ावा दिया, उनके ही मंत्रिमंडल के ज्यादातर मंत्री हिंदी और उसकी स्थानीयता की ताकत को नहीं समझ रहे हैं। मनमोहन मंत्रिमंडल के 56 सदस्यों ने अंग्रेजी में ही शपथ ली है, जबकि हिंदी में शपथ लेने वाले महज 22 लोगों ने ही देश की असल राष्ट्रभाषा हिंदी में शपथ ली।
मनमोहन मंत्रिमंडल के ज्यादातर मंत्रियों के इस रवैये से ये मान लिया जाय कि हिंदी अब भी गंवारों और जाहिलों की भाषा है। अंग्रेज हिंदी समेत समस्त भारतीय भाषाओं के लिए वर्नाक्युलर विशेषण का इस्तेमाल करते थे। जो आजाद भारत में भी चलन में है। वर्नाक्युलर लैंग्वेज का मतलब होता है दासों की भाषा। कहना ना होगा आजाद भारत में भी कम से कम हिंदी को लेकर ये मानसिकता शासक वर्ग के एक बड़े हिस्से में अब भी बनी हुई है। तभी हिंदी भाषी इलाके के भी राजनेता को भी सरकारी कामकाज अंग्रेजी में ही करने में गर्व का अनुभव होता है। कई के लिए तो अंग्रेजी का इस्तेमाल अमेरिका और यूरोप तक अपनी पैठ और पहुंच बनाने का माध्यम भी होती है। हालांकि वे अपने उभार को जनतंत्र का नतीजा बताते नहीं थकते। ये बात और है कि भाषा को लेकर उनका ये रवैया कम से कम उनके लोकतांत्रिक दावे को खोखला ही साबित करता है। लेकिन हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि ये पीढ़ी अब धीरे-धीरे बीते दिनों की बात बनती जाएगी। राहत की बात ये है कि हमारे पास अभिजात्य में रचे-पगे और अंग्रेजी माध्यम से पले-बढ़े ज्योतिरादित्य, सचिन, अगाथा या फिर जितिन प्रसाद जैसे नई पीढ़ी के लोग हैं। जो कम से कम अपनी पहली वाली पीढ़ी से भाषा के नाम पर प्रगतिशील और ठेठ देसी समझ जरूर रखते हैं। उम्मीद बनाए रखने के लिए उन पर भरोसा न करने का फिलहाल कोई कारण नजर नहीं आता।