Wednesday, October 28, 2009

हिंदी वाले बिग बॉस


उमेश चतुर्वेदी
11 अक्टूबर को अमिताभ बच्चन ( सहस्राब्दी के महानायक कहने वाले लोग माफ करेंगे ) के जन्मदिन पर उनकी ब्रांड वैल्यू से लेकर सिनेमा में उनके योगदान की जयगाथा के गुणगान की जैसे परिपाटी ही चल पड़ी है। इस परिपाटी को चलाने वाले हर साल इसी प्रशस्तिगान को घुमा-फिराकर पेश करके इतिश्री कर लेते हैं। जाहिर है इस बार भी यही हुआ। लेकिन अमिताभ के उस योगदान की ओर प्रशस्तिगान की परिपाटी चलाने वाले लोगों का ध्यान शायद ही गया, जिसके सहारे कथित तौर पर क्लिष्ट मानी जाने वाली हिंदी को लोकप्रिय बनाने में वह योगदान दे रहे हैं।
हिंदी मीडिया में आने वाले छात्रों और प्रशिक्षार्थियों को पहले ही दिन से गांधीजी की हिंदुस्तानी के नाम पर ऐसी हिंदी लिखने-पढ़ाने की ट्रेनिंग दी जाने लगती है, जिसे आम आदमी यानी पान- चाय वाले से लेकर खेत-खलिहान में काम करने वाला आम मजदूर भी समझ सके। शावक पत्रकार को ये घुट्टी इस तरह पिला दी जाती है कि वह बेचारा हिंदी के उन आमफहम शब्दों के इस्तेमाल से भी बचने लगता है – जिसे वह अपने कॉलेज के दिनों में नहीं- बल्कि स्कूली पढ़ाई के दौरान सीखा और समझा होता है। जब टेलीविजन चैनलों का प्रसार बढ़ा और निजी चैनलों का दौर बढ़ा तो इस घुट्टी पर कुछ ज्यादा ही जोर दिया जाने लगा। किशोरीदास वाजपेयी के लिए भले ही अच्छी हिंदी कभी भारत की भावी भाषाई अस्मिता का प्रतीक रही होगी – अच्छी हिंदी आज के मीडिया के लिए उपहास का पात्र बन चुकी है। हिंदी का उपहास सबसे ज्यादा हिंदी के ही खबरिया चैनलों में हुआ। इसके लिए मीडिया की लानत-मलामत भी खूब होती रही है।
लेकिन मुख्यधारा के हिंदी मीडिया में एक बदलाव नजर आ रहा है। अब वहां किशोरीदास वाजपेयी की तराशी अच्छी हिंदी भी परोसी जा रही है और मजे की बात ये है कि क्लिष्टता के नाम पर उसे अब तक नकारते रहे लोग भी इस हिंदी पर न्यौछावर होते नजर आ रहे हैं। कहना ना होगा कि बुद्धू बक्से पर इस हिंदी के सबसे बड़े पैरोकार के तौर पर अमिताभ बच्चन ही सामने आए हैं। जरा सोचिए...अगर बिग बॉस का तीसरा संस्करण कोई शिल्पा शेट्टी या फिर सामान्य टेलीविजन एंकर पेश कर रहा होता तो क्या वह उतनी सहजता से बिग बॉस तृतीय बोल पाता, जितनी सहजता से अमिताभ बोलते हैं। या फिर वह बोलने की कोशिश करता तो उस चैनल के प्रोड्यूसर और कर्ता-धर्ता ऐसी हिंदी को पचा पाते। अब तक हिंदी के साथ जो कुछ भी होता रहा है, कम से कम मीडिया में जो होता रहा है, उसका खयाल रखते हुए इसका जवाब निश्चित तौर पर ना में होगा। बिग बॉस कोई पहला कार्यक्रम नहीं है, जिसमें अमिताभ ऐसी हिंदी बोल रहे हैं। याद कीजिए – इसके पहले कौन बनेगा करोड़पति के दूसरे संस्करण को पेश करते वक्त भी अमिताभ कौन बनेगा करोड़पति सेकंड की बजाय कौन बनेगा करोड़पति द्वितीय बोलने में नहीं झिझकते थे।
कुछ लोगों को लग सकता है कि अमिताभ कुछ अलग दिखने के चक्कर में ऐसा बोल रहे हैं। कुछ लोगों की नजर में ये उनकी और संबद्ध चैनल की मार्केटिंग रणनीति का हिस्सा भी हो सकता है। लोगों को इसमें भी बाजारवाद का हमला दिख सकता है। ये तथ्य अपनी जगह सही हो सकते हैं। लेकिन ये भी उतना ही बड़ा सच है कि आज बाजारवाद और उपभोक्तावाद के दौर में बाजार से बचना नामुमकिन है। ऐसे में अपनी कथित क्लिष्ट हिंदी भी मार्केटिंग का हथियार बन सकती है तो इसे लेकर हम खुश भले ना हों, लेकिन संतोष का भाव तो दे ही सकते हैं।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये है कि क्या वजह है कि हमारी अपनी अच्छी हिंदी हमारे ही लोगों के लिए गंवारूपन और पिछड़ेपन का प्रतीक मानी जाती रही है। वह प्रगति में बाधक समझी जाती रही है। लेकिन अमिताभ के मुंह से निकलते ही वह इतनी ताकतवर बन जाती है कि उसे भी यूएसपी बनाकर पेश किया जाने लगता है। हकीकत तो ये है कि अब तक चाहे मीडिया के चलाने वाले ज्यादातर लोग रहे हों या फिर देश के प्रशासन के, वे खांटी और खालिस हिंदी वाले नहीं रहे हैं। खुद उनके लिए हिंदी उतनी ही बेगानी रही है, जितनी आम भारतीय के लिए अंग्रेजी। ऐसे में उन्हें लगता है कि वे जितनी हिंदी जानते हैं, उनका पाठक और दर्शक भी उतनी ही हिंदी जानता और समझता है और जैसे ही उनके सामने हिंदी के कम परिचित आम शब्द आते हैं तो वह हिंदी उन्हें कठिन लगने लगती है। हां उसकी जगह पर अंग्रेजी के शब्द चल पड़ें तो कोई बात नहीं। उनकी नजर में खेत में काम करने वाला और पनवाड़ी भी अंग्रेजी के आम शब्दों को जानता-समझता है। दुनिया के किसी और देश की भाषा के लिए भले ही ये चलन चिंता का सबब हो, अपने यहां यह प्रगति और बुद्धिवादी होने का बेहतरीन सबूत है। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का एक बड़ा वर्ग इसी उटोपिया से प्रभावित रहा है। लिहाजा हिंदी के खबरिया से लेकर मनोरंजन के चैनलों पर भी आम फहम के नाम पर ऐसी हिंदी परोसी जाती रही है, जिसका जमीनी हकीकत से दूर-दूर तक का वास्ता नहीं रहा है। अमिताभ बच्चन ने इसी परिपाटी और इसी जड़ता को अपनी सहज और कथित तौर पर क्लिष्ट हिंदी का प्रयोग करके तोड़ा है। बिग बॉस में गालियां और अंदरूनी खींचतान के बाद हफ्ते में जब दो दिन अमिताभ बच्चन सामने आते हैं तो दर्शक उनका इंतजार करते हैं। उनकी हिंदी को सुनने के लिए अपने टेलीविजन चैनलों का ट्यून नहीं बदलते। अगर यह हिंदी इतनी ही लोगों के लिए कठिन होती तो बिग बॉस के प्रस्तुत कर्ता शमिता शेट्टी को हिंदी बोलने की सजा नहीं सुनाते। बिग बॉस के दूसरे सीजन में ऐसी सजा पूर्व मिस वर्ल्ड डॉयना हेडन को भी सुनाया जा चुका है।
उन्नीसवीं सदी के आखिरी दिनों में कहा जाता है कि देवकीनंदन खत्री की ऐयारीपूर्ण रचनाएं -चंद्रकांता और चंद्रकांता संतति पढ़ने के लिए लोगों ने हिंदी सीखी थी। हिंदी का विस्तार इसी तरह हुआ है। लेकिन आज ये मान्यता पूरी तरह बदल गई है। कथित क्लिष्ट हिंदी के इस्तेमाल को लेकर टीआरपी या सर्कुलेशन गिरने की चिंताएं जताई जाती रही हैं। लेकिन बिग बॉस तृतीय या फिर कौन बनेगा करोड़ पति द्वितीय के टीआरपी के आंकड़े इस मान्यता को झुठलाने के लिए काफी हैं। बिग बॉस तृतीय की टीआरपी 400 अंकों के स्तर पर पहुंच गई है। निश्चित तौर पर अमिताभ के इस हिंदी प्रेम के पीछे उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि का बड़ा योगदान रहा है। उनके पिता हरिवंश राय बच्चन हिंदी के मशहूर कवि थे। हिंदी के प्रति उन्हें बचपन से एक खास संस्कार मिला है। इसका असर बिग बॉस के तीसरे सीजन की उनकी प्रस्तुति पर भी दिख रहा है। ऐसे में मीडियाघर में हिंदी की इस नई प्रतिष्ठा को लेकर आशावान बनने में कोई हर्ज नजर नहीं आ रहा है। भले ही इसका जरिया अमिताभ ही क्यों ना बन रहे हों।

Sunday, October 25, 2009

किसे जरूरत है न्यूडिटी की


उमेश चतुर्वेदी
साल - 1995
मिलिंद सोमण और मधु सप्रे की न्यूड जोड़ी का एक फोटो एक पत्रिका के कवर पेज पर छपा है..टफ शूज के विज्ञापन में ये जोड़ी बिल्कुल नंगी नजर आ रही है। उनके शरीर के गोपन अंगों को अजगर के जरिए ढांप रखा गया है।
साल – 2009
मॉडलिंग बिल्कुल वैसी ही है। इस बार भी जूते ही हैं। बस किरदार बदल गए हैं। इस बार मधु की जगह पर हैं बॉलीवुड की अभिनेत्री शौर्या चौहान और उनका साथ दे रहे हैं बन्नी आनंद। इस बार शरीर के गोपन अंगों को एक ही कपड़े के जरिए ढंका गया है।
1995 और 2009 के बीच महज चौदह साल का फासला है, लेकिन सोच के धरातल पर हमारी दुनिया कितनी बदल गई है, इसका जीवंत उदाहरण है शौर्या और बन्नी के विज्ञापन का नोटिस भी नहीं लिया जाना। 1995 में जब ये विज्ञापन पहली बार एक फिल्मी पत्रिका के कवर पृष्ठ पर छपा था तो जैसे हंगामा बरप गया था। शिवसेना ने इसका ना सिर्फ जोरदार विरोध किया था, बल्कि इसके खिलाफ कोर्ट भी गई थी। लेकिन आज ना तो शौर्या पर कोई सवाल उठ रहा है और ना ही उसका साथ दे रहे बन्नी आनंद पर...1991 में मनमोहनी मुस्कान के सहारे जब अपनी अर्थव्यवस्था उदार हो रही थी, तब वामपंथी और दक्षिणपंथी- दोनों तरह की विचारधारा के लोग कम से कम एक मसले पर एक विचार रखते थे। विश्वनाथ प्रताप सिंह की सरकार को समर्थन देने के अलावा कम ही मौके ऐसे रहे हैं- जब वैचारिकता के दो विपरीत ध्रुव एक राय रखते हों। दोनों का मानना था कि उदारीकरण हमारी अर्थव्यवस्था को ही नहीं, संस्कृति को भी बदलेगी। उदारीकरण की करीब डेढ़ दशक की यात्रा के बाद ये अंदेशा बिल्कुल सच साबित होता दिख रहा है। दिलचस्प बात ये है कि इसके समर्थकों की भी संख्या बढ़ती जा रही है। इसी साल के शुरूआत में जब फ्रांस के राष्ट्रपति सरकोजी की पत्नी कार्ला ब्रूनी के न्यूड फोटो के करीब नौ लाख रूपए में बिकने की खबर आई तो इस पर सवाल उठाने वालों की लानत-मलामत करने वालों की फौज जुट आई थी। बदलाव की बयार का इससे बड़ा और क्या उदाहरण होगा !
1996 में दिल्ली की एक वकील अंजलि ने एक सेमी पोर्न पत्रिका के कवर पृष्ठ के लिए सेमी न्यूड मॉडलिंग की थी। तब दिल्ली समेत देश के तमाम बार एसोसिएशनों ने उनकी सदस्यता रद्द करने की मांग रखी थी। बार एसोसिएशन का मानना था कि न्यूडिटी का प्रचार करने वाली वकील की साख कैसे बन सकती है। उसके प्रति लोग आदर का भाव कैसे रख सकते हैं। पता नहीं उसके बाद कोई महिला वकील न्यूडिटी के ऐसे प्रचार के साथ बाजार में उतरी कि नहीं..लेकिन ये साफ है कि इस कृत्य के जरिए वकील बिरादरी ने अपने लिए एक लक्ष्मण रेखा जरूर खींच दी, जिससे लांघना आसान नहीं होगा।
हिंदी के प्रचार-प्रसार में अपनी अहम भूमिका निभाने वाले बॉलीवुड ने न्यूडिटी के प्रसार में भी कम भूमिकाएं नहीं निभाई हैं। राजकपूर के जमाने में बैजयंती माला सेमी न्यूड यानी बिकनी में संगम होगा कि नहीं गाते नजर आईं थीं। हिंदी सिनेमा के ग्रेट शो मैन राजकपूर ने बाद की फिल्मों में कला और कहानी के नाम पर सेमी न्यूडिटी का जमकर इस्तेमाल किया। सत्यम शिवम सुंदरम की जीनत अमान हों या फिर राम तेरी गंगा मैली की मंदाकिनी...कहानी की जरूरत और कला के नाम पर आपको सेमी न्यूडिटी दिख ही जाती है। सबसे बड़ी बात ये है कि फिल्मी अर्थशास्त्र को सफल बनाने में महिला न्यूडिटी का ही ज्यादा इस्तेमाल होता रहा है। बॉलीवुड में कदम रखने वाली हर अदाकारा पहले न्यूडिटी से इनकार करती रही है, फिर कहानी की जरूरत और मांग के मुताबिक सेमी न्यूडिटी की नुमाइश करने से पीछे नहीं रही है। लेकिन माया मेम साहब के जरिए केतन मेहता ने पुरूष न्यूडिटी को भी नया आयाम दे दिया। माया मेम साहब फिल्म की नायिका केतन की पत्नी दीपा मेहता थीं। इस फिल्म के एक अंतरंग दृश्य में शाहरूख खान और दीपा दोनों नंगे नजर आए थे। यह न्यूडिटी भी कला और कहानी की जरूरत के नाम पर फिल्मी दर्शकों को पेश की गई थी। शेखर कपूर ने दस्यु सुंदरी फूलन देवी की जिंदगी पर आधारित फिल्म बैंडिट क्वीन बनाई तो उसमें बलात्कार का खुलेआम सीन भी कहानी और जरूरत के तर्क के आधार पर ही पेश किया था। मीरा नायर की फिल्म कामसूत्र हो या फिर सलाम बांबे....उसमें भी न्यूडिटी कला के नाम पर जमकर परोसी गई।
पुरूष न्यूडिटी को हाल के दिनों में नया आयाम दिया है राजकपूर के पोते रणवीर कपूर ने। भारतीय कानूनों के मुताबिक बेशक वे पूरी तरह से निर्वस्त्र नहीं दिख सकते थे, लेकिन सांवरिया के निर्देशक ने उन्हें निर्वस्त्र तो कर ही दिया। अब इस कड़ी में नया नाम अपने सुरीले गीतों के लिए मशहूर मुकेश के पोते नील नितिन मुकेश का जुड़ गया है- जो जेल फिल्म में पूरी तरह निर्वस्त्र नजर आ रहे हैं। रानी मुखर्जी अब तक न्यूडिटी और अंग प्रदर्शन से बचती रही हैं- लेकिन अपना बाजार भाव बढ़ाने के लिए उन्हें भी सेमी न्यूडिटी पर ही आखिर में जाकर भरोसा बढ़ा नजर आ रहा है। अगर ऐसा नहीं होता तो बिकनी में वह हड़िप्पा बोलती नजर नहीं आतीं।
न्यूडिटी फिल्मों के जरिए टेलीविजन के पर्दे पर भी जमकर दिख रहा है और इसका सबसे बड़ा जरिया बन रहे हैं रियलिटी शो। बिग बॉस में जिस तरह भारतीय जनता पार्टी के चेहरा रहे प्रमोद महाजन के बेटे राहुल महाजन ने स्वीमिंग पूल में पायल रोहतगी और मोनिका बेदी के सीन दिए- उसे क्या कला के नाम पर पेश किया गया। टेलीविजन की एक सुशील बहू के तौर पर अपनी पहचान बना चुकी श्वेता तिवारी ने हाल के दिनों में प्रसारित हुए रियलिटी शो इस जंगल से मुझे बचाओ में जिस तरह झरने के नीचे नहाते हुए पोज दिए या फिर बाद में आई निगार खान और कश्मीरा शाह ने बिकनी बीच स्नान किया – सबके लिए कला की ही दुहाई दी जाती रही है।
बात इतनी तक ही रहती तो गनीमत थी...फैशन शो में कपड़ों के बहाने जिस तरह देह की नुमाइश की जाती है, उसे भी कला ही माना जाता है। पश्चिमी देशों में न्यूडिटी के नाम पर ऐसे फैशनेबल कपड़ों का चलन बढ़ रहा है – जिसके जरिए न्यूडिटी का ना सिर्फ प्रचार होता है, बल्कि ये कपड़े नैकेडनेस को रोकने का भी दावा करते हैं। अभी तक इस परिपाटी का प्रचार तो भारतीय बाजारों में नहीं हुआ है। लेकिन जिस तरह के कपड़े पहने लड़के-लड़कियां महानगरों में नजर आने लगे हैं, उसे अगर वैधानिक दर्जा देने के लिए पश्चिम के इस विचार को उधार ले लिया जाय तो हैरत नहीं होनी चाहिए।
महिला न्यूडिटी को विजय माल्या जैसे रसिक रईसों ने नई ऊंचाई ही दी है। हर साल वे दुनिया के खूबसूरत लोकेशनों पर न्यूडिटी के नाम पर हॉट बालाओं की तस्वीरें प्रोफेशनल फोटोग्राफरों के जरिए खिंचवाते हैं। इससे तैयार कैलेंडर रईस और रसूखदार लोगों के पास भेजे जाते हैं। जिन्हें ये कैलेंडर नहीं मिलते- वे खुद को कमतर करके आंकते हैं। न्यूडिटी के नाम पर तैयार इस कैलेंडर को कथित हाईप्रोफाइल सोसायटी में जिस तरह सम्मान हासिल हुआ है, उससे साफ है कि कथित हाई प्रोफाइल सोसायटी का जिंदगी के प्रति नजरिया पूरी तरह बदल गया है। चूंकि इस वर्ग के पास ना सिर्फ पैसा है, बल्कि रसूख भी है, लिहाजा इन्हें लुभाने के लिए अब न्यूडिटी को परोसने वाली कला दीर्घाएं भी खुलने लगी हैं।
दरअसल अपना देश दो हिस्सों में साफ बंटा नजर आ रहा है। एक तरफ बहुसंख्यक गरीब और बदहाल जनता है, जिसमें से ज्यादातर लोग गांवों या फिर शहरी स्लम में रहने को मजबूर हैं, वहीं उदारीकरण के बाद एक नव धनाढ्य वर्ग तेजी से उभरा है, जिसकी जिंदगी में मानवीय संवेदनाओं से कहीं ज्यादा पैसे की चमक भरी पड़ी है। रिश्तों की गरमाहट और संस्कारों से उनका कम ही नाता है। ऐसे में अपनी जिंदगी के खालीपन को भरने की जितनी वजहें समझ में आती हैं, उसमें न्यूडिटी भी एक है। उनकी ये भूख कला को प्रश्रय देने के नाम पर पूरी होती है। ऐसे में कलाकार भला क्यों पीछे रहते। हालत ये देखिए कि इस प्रवृत्ति के विरोध के भी अपने खतरे हैं। अगर आपने विरोध किया तो आपको दक्षिणपंथी या प्रतिक्रियावादी घोषित किए जाने का खतरा बढ़ सकता है। करीब डेढ़ दशक पहले मध्य प्रदेश के एक पत्रकार ओम नागपाल ने ऐसे सवाल उठाए थे तो उन्हें ऐसे लांछनों का भरपूर उपहार मिला था।
नव दौलतिया वर्ग को छोड़ दें तो आज भी भारतीय समाज के लिए जीवन मूल्य कहीं ज्यादा जरूरी हैं। लिहाजा अभी तक न्यूडिटी के मार्केट का आकलन नहीं हो पाया है। लेकिन ये भी सच है कि ये अरबों का कारोबार तो है ही। अकेले अमेरिका में ही पोर्न उद्योग करीब 13 अरब डॉलर का है। वहां बाकायदा इसे कानूनी मान्यता भी मिली हुई है। यही वजह है कि वहां कौमार्य बेचकर जब एक लड़की ने अपनी पढ़ाई की फीस जुटाया तो अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने उस पर कोई सवाल नहीं उठाया। दरअसल अमेरिकी समाज व्यक्तिगत आजादी का हिमायती है, लेकिन तभी तक- जब तक समाज को इससे कोई नुकसान नहीं पहुंचता। वहां भी कुछ मूल्य हैं। ये मूल्यों के प्रति अमेरिकी समाज का आग्रह ही है कि वहां की कोई अहम शख्सियत नैतिकता के पहरे और सीमा रेखा से खुद को बाहर नहीं रख पाती। भयानक मंदी के दौर में जब पिछले साल 700 अरब डॉलर के सहायता पैकेज का ऐलान किया तो पोर्न उद्योग खुद के राहत के लिए भी सहायता पैकेज की मांग को लेकर उतर गया। लेकिन खुलेपन के हिमायती अमेरिका के प्रथम नागरिक ने इस मांग पर सिरे से ही ध्यान नहीं दिया।
ऐसे में ये सवाल उठता है कि आखिर हम न्यूडिटी के प्रचार के नाम पर किस तरह की दुनिया बसाना चाहते हैं। भारत की सबसे बड़ी जरूरत अब भी भूख और अशिक्षा से निबटारा पाने की है। गांधी जी के हिंद स्वराज लिखे पूरे सौ साल हो गए हैं। उनका सपना था कि आजादी के बाद ना सिर्फ हमारी सरकार अपनी होगी, बल्कि सामाजिक ढांचा भी हमारे जीवन मूल्यों और महान परंपराओं पर आधारित होंगे। गांधी जी की न्यूडिटी दया और गरीबों के लिए कुछ कर गुजरने, उनके जीवन में नई रोशनी लाने का सबब बनती थी। लेकिन आज की कथित न्यूडिटी में सेक्सुअल फैंटेसी और रोमांच के साथ भोग की इच्छा ज्यादा है। गांधी ने कहा था कि जब तक आखिरी एक भी आदमी दुखी है, राज्य और समाज को चैन से नहीं बैठना चाहिए। काश कि हम न्यूडिटी की दुनिया में खर्च होने वाली करोड़ों की रकम को गांधी के सपनों को पूरा करने में लगाते।