Tuesday, June 15, 2010

एंडरसन के बहाने अर्जुन पर निशाना


उमेश चतुर्वेदी
2009 के आम चुनावों के ठीक पहले कांग्रेस के कद्दावर नेता अर्जुन सिंह की आत्मकथा आई थी – मोंहि कहां विश्राम। इस किताब को लिखते वक्त तक कांग्रेस में अपनी हैसियत के चलते यह भान नहीं था कि वे कभी राजनीति की दुनिया से आराम भी कर सकते हैं। लेकिन आम चुनावों में पार्टी से टिकट नहीं मिलने के बाद जब उनकी बेटी ने सतना से मैदान में कदम रखा तो उसी दिन तय हो गया था कि उन्हें विश्राम लेना ही पड़ेगा। जिसका सही मायने में उन्हें अनुभव चुनाव बाद यूपीए दो की सरकार के गठन के दौरान ही हुआ। जब उनके प्यारे मानव संसाधन विकास मंत्रालय को नामचीन वकील कपिल सिब्बल को सौंप दिया गया। बात यहीं तक होती तो गनीमत थी। उन्हें मंत्रिमंडल में जगह तक नहीं मिली। वे भले ही कहते रहे हों कि उन्हें विश्राम के मौके नहीं मिलेंगे, लेकिन पार्टी ने उनके आराम का पूरा इंतजाम कर दिया। लेकिन उनका खुद के बारे में जो आकलन था, वह एक बार फिर सही साबित होता नजर आ रहा है। हालांकि इस बार वजह कुछ और है।
भोपाल गैस त्रासदी के पच्चीस साल बाद आए अदालती फैसले से जहां एक्टिविस्ट और पीड़ित गुस्से में हैं, वहीं राजनीतिक गलियारों में भी तूफान आ गया है। इस तूफान को हवा दो पूर्व अधिकारियों के बयानों ने दी है। एक अधिकारी हैं भोपाल के तत्कालीन डीएम मोतीलाल सिंह। मोतीलाल सिंह का आरोप है कि यूनियन कार्बाइड कंपनी के अध्यक्ष वारेन एंडरसन को उन्होंने गिरफ्तार कर लिया था, लेकिन राज्य शासन के आदेश पर उन्हें एंडरसन को भोपाल से दिल्ली जाने वाले विमान में बैठाना पड़ा था। यह आरोप जहां राज्य सरकार पर है, वहीं दूसरे पूर्व अधिकारी सीबीआई के तब के संयुक्त निदेशक भूरेलाल का आरोप है कि वारेन एंडरसन के प्रत्यर्पण के मामले को ढीला छोड़ने के लिए विदेश मंत्रालय ने सीबीआई पर दबाव डाला था। हालांकि भूरेलाल के इस आरोप को तब के सीबीआई के निदेशक के विजय रामाराव ने गलत करार दिया है। लेकिन इन अधिकारियों के बयानों पर भरोसा नहीं करने का कारण नजर नहीं आ रहा। क्योंकि लाशों के ढेर में भोपाल को तब्दील करने वाली कंपनी का प्रमुख भारत से बाहर निकल गया, बाद में अदालत ने उसे भगोड़ा तक करार दिया। वह अमेरिका में अपने घर में आलीशान जिंदगी जी रहा है और इधर उसकी कंपनी की बनाई मिथाइल आइसोसायनायड गैस के शिकार लोग आज भी परेशान हों तो शक बढ़ेगा ही।
जाहिर है कि इस शक के घेरे में मध्यप्रदेश के तब के मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह भी हैं और 415 के अपार बहुमत से सरकार चला रहे राजीव गांधी भी हैं। लेकिन जैसी कि राजनीति की रवायत है और पार्टियों का जो ढांचा है, उसमें सर्वोच्च नेता पर सवाल न उठाने की जैसी परंपरा सी बन गई है। उसमें जाहिर है कि इस गैर जिम्मेदाराना रवैये के लिए कांग्रेस पार्टी अपने सबसे बड़े नेता पर सवाल नहीं उठा सकती। लेकिन उन जनभावनाओं का क्या करें, जो इस फैसले के बहाने एक बार फिर उबाल पर है। वैसे भी दो अधिकारियों के आरोपों ने राज्य में शासन चला रही भारतीय जनता पार्टी को कांग्रेस पर सवाल उठाने का आसान मौका दे दिया है। राज्य में अपनी खोई जमीन को वापस पाने में जुटी कांग्रेस पार्टी की मुश्किलें इस फैसले और इस फैसले के बहाने आए अधिकारियों के बयानों ने बढ़ा दी हैं। जाहिर है कि इससे बाहर निकलने का राजनीतिक रास्ता भी तलाशा जा रहा है और गुरूवार को कांग्रेस के प्रमुख प्रवक्ता जनार्दन द्विवेदी के आए बयान ने इस कोशिश को ही सुर दे दिया है। उन्हें कहना पड़ा है कि कांग्रेस पार्टी को वारेन एंडरसन के बारे में जनता को समुचित जवाब देना चाहिए। जनार्दन द्विवेदी पार्टी के बड़बोले नेता नहीं है। उन्हें एक ऐसे गंभीर राजनेता की तरह देखा जाता है, जो बिना वजह बयानबाजी में भरोसा नहीं करता। ऐसे में उनका बयान मायने रखता है। जाहिर है कि पार्टी इस त्रासदी के बाद की घटनाओं के लिए तब के मुख्यमंत्री और अपने ही कद्दावर नेता पर ही सवाल उठाने जा रही है। जाहिर है कि अर्जुन सिंह के लिए आने वाले दिन भारी होने जा रहे हैं।
दिलचस्प बात यह है कि कांग्रेस की ओर से यह बयान तब आया है, जब मध्य प्रदेश भारतीय जनता पार्टी के नेता और राज्य के संसदीय कार्यमंत्री नरोत्तम मिश्र ने अर्जुन सिंह से मांग की है कि वे इस मामले में चुप्पी तोड़ें और हकीकत से जनता को रूबरू कराएं। राजनीतिक बियाबान में जिंदगी गुजार रहे अर्जुन सिंह के लिए चुप्पी तोड़ पाना आसान भी नहीं होगा। अर्जुन सिंह तब राजीव गांधी के बेहद करीब थे। उनकी करीबी का ही असर था कि उन्हें आतंकग्रस्त राज्य पंजाब में शांति लाने की अहम जिम्मेदारी राजीव गांधी ने दी थी और उन्हें राज्यपाल बनाकर वहां भेजा था। ये अर्जुन सिंह की कोशिशें ही थीं कि राजीव- लोंगोवाल समझौता हो पाया। पंजाब की राजनीति में शांति का शुरूआत विंदु इस समझौते से ही माना जाता है। राजीव गांधी की निकटता ही थी कि उन्हें बाद में कांग्रेस का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया। इतना ही नहीं, वे राजीव मंत्रिमंडल में संचार जैसे महत्वपूर्ण विभाग के मंत्री भी रहे। सोनिया गांधी को कांग्रेस में सक्रिय करने के लिए अभियान चलाने वाले प्रमुख नेताओं में भी वे रहे हैं। इसके लिए उन्होंने पी वी नरसिंहराव से विद्रोह करके नारायण दत्त तिवारी के साथ अलग तिवारी कांग्रेस ही बना डाली थी। साफ है कि गांधी-नेहरू परिवार के विश्वस्त रहे अर्जुन सिंह के लिए तब की स्थितियों को लेकर जुबान खोलना आसान नहीं होगा।
लेकिन राजनीति की रवायत है कि जनता के सामने खुद को सही साबित करने के लिए सिर खोजे जाते हैं और उस सिर को अपनी कीमत भी चुकानी पड़ती है। कई बार यह सिर किसी खैरख्वाह का भी होता है।
विपक्षी नजरों में तो दोषी कांग्रेस प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी भी हैं। क्योंकि वे यूनियन कार्बाइड कंपनी की सहयोगी केमिकल कंपनी डाउ केमिकल के भारत में प्रवेश के मामले के प्रमुख पैरवीकार हैं। इसे लेकर बीजेपी ने सवाल भी उठाए हैं। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि कांग्रेस इस झंझावात से कैसे निकलती है और किसके माथे इन गैरजिम्मेदारियों का ठीकरा फोड़ती है।

2 comments:

  1. कोई न कोई माथा तो ढूंढ ही लिया जायेगा… बस उसके नाम के आगे "गाँधी" न लगा हो… :) :)

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