Sunday, August 1, 2010

साहित्यिकों से दो बातें

उमेश चतुर्वेदी
(रूसी विचारक प्रिंस क्रोपाटकिन से क्षमा सहित, जिनकी एक किताब का शीर्षक ही है –नवयुवकों से दो बातें )
महान कथाकार प्रेमचंद की कल जयंती बीत गई। मेरे जेहन में उनका जयशंकर प्रसाद के साथ खिंचवाई एक तसवीर ताजा हो गई है। इस तसवीर में कामायनी के रचयिता महाकवि प्रसाद धीर-गंभीर मुद्रा में खड़े हैं। लेकिन उनके साथ खड़े उपन्यास सम्राट की भंगिमा बिलकुल अलग है। उपन्यास सम्राट के फटे जूते से पैरों की अनामिका उंगली किंचित झांकती सी नजर आ रही है। प्रसाद जी की गंभीरता से ठीक उलट प्रेमचंद के स्मित होठ इससे बेपरवाह नजर आ रहे हैं। इस तसवीर के याद आने की अपनी वजह भी है। प्रेमचंद की यह भावमुद्रा दरअसल उनकी मनोदशा का प्रतीक भी है। प्रेमचंद आज भी नए-पुराने लेखकों से कहीं ज्यादा लोकप्रिय हैं। हिंदीभाषी इलाके में अगर लोकप्रियता के मामले में उनसे तुलसीदास ही भारी पड़ सकते हैं। उनकी भी जयंती आने ही वाली है। दोनों की भावभूमि भले ही अलग हो, लेकिन दोनों कम से कम एक मामले में समान हैं। जनता के बीच उनकी स्वीकार्यता और पहचान दूसरे लेखकों और कवियों से कोसों आगे है। दोनों की रचनाएं आज जिंदगी के कठिन मोड़ों पर नई राह दिखाने के लिए बतौर उदाहरण के तौर पर भी पेश की जातीं हैं। लोक और अपने समय के साथ जुड़े होने के चलते आम जीवन में उनकी पैठ का इससे बड़ा कोई उदाहरण नहीं हो सकता। दैनंदिन जिंदगी में ऐसे अक्सर अनचाहे मौके आ जाते हैं, जब राह कठिन लगने लगती है। कई बार तो राह सूझती भी नहीं। निराशा के गहरे गर्त में डूबते ऐसे पलों में तुलसी और प्रेमचंद की रचनाएं राह दिखाती नजर आती हैं।
किसी साहित्यिक और उसके साहित्य की लोकप्रियता का इससे बेहतरीन उदाहरण क्या होगा। लेकिन दुर्भाग्य देखिए कि आज कम से कम हिंदी साहित्य की दुनिया में लोकप्रियता शब्द उपेक्षा का पात्र है। आज अगर कोई लोकप्रिय है तो उसका मतलब यही लगा लिया जाता है कि वह बाजारू है। आज बाजार के बिना एक कदम आगे बढ़ना मुश्किल है, लेकिन बाजार के साथ अगर आप कदमताल मिलाने लगते हैं तो आप बाजारू बन जाते हैं। हालांकि बाजारूपन कहीं ज्यादा सतही भाव लिए हुए है। लेकिन यह कहां की बात हो गई कि आप लोकप्रिय हो गए तो बाजारू हो गए। लेकिन हिंदी का साहित्यिक समाज आज इसी विरोधाभास को लेकर जी रहा है। इन्हीं विरोधाभासों के ही चलते गुलशन नंदा, रानू , वेदप्रकाश शर्मा, सुरेंद्र मोहन पाठक, जैसे लुगदी साहित्यकार बाजारू हैं। यह बात दीगर है कि उनकी कई लुगदी रचनाएं रेलवे स्टेशनों की किताबों की दुकानों की श्रृंखला एच ह्वीलर के जरिए सामान्य पाठकों की पहली पसंद रहीं हैं। उन पर लोकप्रिय फिल्में और टेलीविजन सीरियल तक बन चुके हैं। लोगों ने उन्हें पसंद भी किया, लेकिन ये रचनाएं क्लासिक का दर्जा नहीं पा सकीं। खैर यह अलग बहस का विषय है। एक बार फिर लौटते हैं प्रसाद और प्रेमचंद की तसवीर पर। यह तसवीर दो लोगों की मनोदशा के साथ ही हिंदी की हकीकत को भी बयां करती हैं। प्रेमचंद अगर लोकप्रिय हैं तो इसकी एक बड़ी वजह जनता से उनका जुड़ाव भी है। वे हमेशा लोगों से जुड़े रहे। हाल ही में सोजे वतन की जब्ती को लेकर उनका संस्मरण पढ़ने का मौका मिला। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा की पत्रिका पुस्तक वार्ता के एक अंक में छपे इस संस्मरण में उन्होंने सोजे वतन की जब्ती और इसे नौकरी की दुश्वारियों की चर्चा की है। इस चर्चा का लब्बोलुआब यह है कि उन दिनों में भी उन्होंने जनता से अपने जुड़ाव को नहीं तोड़ा था।
हिंदी में इन दिनों प्रगतिशील और जनवादी होने का दावा करने वाले लोगों की अच्छी-खासी संख्या रचनारत है। लेकिन सही मायने में आमलोगों से उनका जुड़ाव कम ही है। यही वजह है कि उनके बगल वाला भी नहीं जानता कि वे कितने बड़े और महत्वपूर्ण लेखक और रचनाकार हैं। बड़े-बड़े लेखकों की मौत के बाद प्रकाशित होने वाले रिपोर्ताजों में अक्सर इस बात का जिक्र होता है कि उन्हें तो बगल वाले ही नहीं जानते। इस बहाने हिंदी वालों की लानत-मलामत भी खूब की जाती है कि हाय देखो, हिंदीभाषी लोग कितने कुसंस्कारी हैं। लेकिन हम यह भूल जाते हैं कि हमारे साहित्यिक सही मायने में उस गली की समस्या के निदान से भी दूर भागते हैं, जिसमें वे रहते हैं। अगर निदान के लिए वे जुड़ना भी चाहते हैं तो उनका लहजा विशिष्टता का भाव लिए होता है। ऐसे में जनता भला कैसे उनसे जुड़ सकती है और जुड़ेगी नहीं तो उनके लेखन से वाकिफ कैसे होगी। मराठी के ग्रंथाली आंदोलन की खूब चर्चा की जाती है। ग्रंथाली के जरिए मराठी लेखकों ने अपने साहित्य को जनता के बीच ले जाने का उपक्रम शुरू किया था। उनके लिए राहत की बात यह है कि जिन दिनों यह आंदोलन शुरू हुआ, संयोग से बाजारवाद और उदारीकरण नहीं था। लिहाजा वे बाजारू होने के आरोप से बचे रह सके। ग्रंथाली का एक मकसद आम लोगों की समस्याओं से रूबरू भी होना था। मराठी का लेखक अपने पाठकों के दैनंदिन जीवन की समस्याओं से भी रूबरू होता है। उसके साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा रहता है। यही वजह है कि वहां का पाठक अपने साहित्यिकों को सीधे जानता है।
ऐसा नहीं कि हिंदी में ऐसा नहीं हो सकता। नई पीढ़ी में ऐसे साहित्यिक आ रहे हैं जो दैनंदिन जीवन की समस्याओं से रूबरू होने और लोगों के साथ कंधा से कंधा मिलाकर खड़े होने से नहीं झिझकते। लेकिन जरूरत इस बात की है कि इस चलन को आम बनाया जाय। तभी जनता हमारे साहित्यिकों से ना सिर्फ जुड़ पाएगी, बल्कि उनकी रचनाओं से भी खुद को जुड़ा महसूस कर पाएगी।

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