Monday, December 20, 2010

वैचारिकता और सादगी की राजनीति के आखिरी प्रतीक

उमेश चतुर्वेदी
सन 2001 के गर्मियों की एक दोपहर दिल्ली के एक अखबारी दफ्तर में सादगी से भरी एक शख्सियत नमूदार हुई। उस अखबार ने उस शख्सियत से तब के दौर की राजनीति पर एक लेख की फरमाइश की थी। किसी व्यस्तता के चलते तय वक्त पर लेख न दे पाने की बात उन्हें याद आई तो वे सीधा अखबार के दफ्तर चले आए। दफ्तर पहुंचते ही उन्होंने इन पंक्तियों के लेखक से कागज की मांग रखी और एक कोने में तल्लीनता से लेख लिखने बैठ गए। अभी वे लेख लिख ही रहे थे कि भोपाल से आए एक दफ्तरी मित्र ने उनके बारे कुछ इस अंदाज में पूछताछ की- पंडित जी, कौन है यह शख्स, जिसके ऐसे दिन आ गए हैं कि अखबारी दफ्तर के कोने में बैठ कर लिखना पड़ रहा है। जब उस मित्र को बताया गया कि ये सज्जन जनता पार्टी के पूर्व महासचिव तथा खादी और ग्रामोद्योग आयोग के पूर्व अध्यक्ष सुरेंद्र मोहन हैं तो उनका मुंह हैरत से खुला का खुला ही रह गया।
सुरेंद्र मोहन का नाम आज की पीढ़ी हिंदी और अंग्रेजी अखबारों में छपते रहे उनके राजनीतिक लेखों के लिए ही जानती होगी। लेकिन समाजवादी आंदोलन की धारा से ताजिंदगी जुड़े रहे इस शख्स की एक दौर में देश के राजनीतिक गलियारों में तूती बोलती थी। डॉक्टर लोहिया और किशन पटनायक के नजदीकी रहे सुरेंद्र मोहन का जनता पार्टी के गठन में खास योगदान था। इंदिरा सरकार ने देश पर जब आपातकाल थोप दिया तो उसका जोरदार विरोध करने वाले लोगों में सुरेंद्र मोहन आगे थे। जिसकी कीमत उन्हें जेल यात्रा के तौर पर चुकानी पड़ी। आपातकाल खत्म होने के बाद समूचे विपक्ष की एकता के तौर पर जनता पार्टी बनी और सुरेंद्र मोहन उसके महासचिव बने। महासचिव रहते नौजवानों को राजनीति में आगे लगे और उन्हें समाजवादी नैतिकता में प्रशिक्षित करने में सुरेंद्र मोहन की भूमिका को आज भी लोग याद करते हैं। आज की राजनीति का साहित्य-लेखन और संस्कृतिकर्म से लगभग रिश्ता टूटता जा रहा है। लेकिन सुरेंद्र मोहन ऐसे राजनेता थे, जिनका लेखन और संस्कृतिकर्म से बराबर रिश्ता बना रहा। अरविंद मोहन, कुरबान अली, विनोद अग्निहोत्री से लेकर नई पीढ़ी तक के पत्रकारों से उनका रिश्ता बना रहा। रिश्तों के बीच अपनी राजनीतिक ऊंचाई को कभी आड़े नहीं आने देते थे। इन पंक्तियों के लेखक को याद है कि 1996 के लोकसभा चुनावों में किस तरह लोग उनके सामने जनता दल का टिकट पाने के लिए लाइन लगाए खड़े रहते थे। 1996 के लोकसभा चुनावों के बाद जब किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिला तो संयुक्त मोर्चा की सरकार बनवाने में हरिकिशन सिंह सुरजीत के साथ जिन नेताओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, उनमें सुरेंद्र मोहन का नाम भी आगे था। बदले में उन्हें राज्यपाल का पद वीपी सिंह सरकार ने प्रस्तावित किया। लेकिन उन्होंने विनम्रता पूर्वक इसे ठुकरा दिया। जब उन्हें खादी और ग्रामोद्योग आयोग का अध्यक्ष पद प्रस्तावित हुआ तो गांधी जी के कार्यों को आगे बढ़ाने के नाम पर उन्होंने यह भूमिका स्वीकार कर ली।
1989 में राष्ट्रीय मोर्चा के गठन में भी सुरेंद्र मोहन की भूमिका रही। लेकिन बदले में उन्होंने कोई प्रतिदान लेना स्वीकार नहीं किया। 1977 और 1989 में भी उन्हें राज्यपाल और कैबिनेट मंत्री पद का प्रस्ताव दिया गया, लेकिन गांधीवादी सादगी में भरोसा करने वाले सुरेंद्र मोहन को पदों का मोह लुभा नहीं पाया। समाजवादी मूल्यों से उनका ताजिंदगी रिश्ता बना रहा। समाजवादी आंदोलन पर जब भी आंच आती दिखी या समाजवादी कार्यकर्ता पर हमला हुआ, आगे आने से वे कभी पीछे नहीं हटे। 2009 की गर्मियों पर जब डॉक्टर सुनीलम पर हमला हुआ तो दिल्ली के मध्यप्रदेश भवन के सामने चिलचिलाती धूप में प्रदर्शन करने से भी वे पीछे नहीं हटे। खादी के पैंट-शर्ट में लंबी-पतली क्षीण काया को संभालते कंधे पर खादी का झोला टांगे उनकी शख्सियत हर उस मौके पर नमूदार हो जाती, जहां उनकी जरूरत होती। अस्सी पार की वय और दमे का रोग उनकी राह में कभी बाधा नहीं बना। दिल्ली के विट्ठलभाई पटेल हाउस के ठीक सामने अखबारों का गढ़ आईएनएस बिल्डिंग स्थापित हैं। वहां संजय की चाय की दुकान पर पत्रकारों के साथ चाय पीने और सामयिक राजनीति की चर्चा करते उन्हें देखा जा सकता था। हालांकि पिछले कुछ सालों से उम्र के तकाजे ने इस आदत पर विराम लगा दिया था।
शुक्रवार की सुबह जब सामयिक वार्ता से जुड़े एक मित्र का फोन उनके न रहने की खबर के साथ आया तो सहसा भरोसा नहीं हुआ। गुरूवार की देर शाम वे मुंबई से लौटे थे और लिखाई-पढ़ाई के बाद सो गए थे। शुक्रवार की सुबह उठकर उन्होंने पानी पिया और बेचैनी की शिकायत की। पत्नी मंजू मोहन जब तक उन्हें अस्पताल ले जाने की तैयारी करतीं, समाजवाद का सादगीभरा सितारा उस राह पर कूच कर गया, जहां से सिर्फ स्मृतियां ही लौट पाती हैं। जब-जब समाजवाद की चर्चा छिड़ेगी, दिल्ली के नौजवान पत्रकारों को समाजवादी दुरभिसंधियों को समझने की जरूरत पड़ेगी, सुरेंद्र मोहन की याद आती रहेगी।

Saturday, December 4, 2010

बेशर्मी की इंतिहा

उमेश चतुर्वेदीदिल्ली मेट्रो रेल के महिला कोच में सवारी के आदी हो रहे पुरूषों की धुनाई के बाद नए सवाल उठ खड़े हुए हैं। महिला पुलिस के हाथों मार खाए पुरूषों के एक वर्ग का अहम जाग गया है। ऐसे पुरूषों ने नेशनल कॉलिजन फॉर मेन नामक संगठन बनाकर अपने लिए अलग से कोच लगाने की मांग की है। अभी तक समाज का कमजोर तबका ही अपने लिए आरक्षण और आरक्षित स्थानों की मांग करता रहा है, यह पहला मौका है जब मजबूत समझे जाने वाले पुरूष समाज के किसी संगठन ने अपने लिए आरक्षित डिब्बे की मांग रखी है। अगर पहले से चल रहे फार्मूले को ही आधार बनाया जाय तो यह मानना ही पड़ेगा कि महिलाओं की बढ़ती ताकत के सामने पुरूष वर्ग खुद को असहाय समझने लगा है। इस असहायता के दबाव में उन्हें अपने लिए महिलाओं की ही तरह खास हैसियत की मांग रखने की जरूरत पड़ने लगी है।
लेकिन यह मांग सिर्फ असहायता या महिलाओं की तुलना में पुरूषवाद को कमतर देखने का नतीजा नहीं है। दिल्ली में भी देश के बाकी इलाकों की तरह बसों तक में महिलाओं के लिए आरक्षित सीटें रहती हैं। देश के दूसरे इलाकों में लोग महिलाओं को देखते ही सीट खाली कर देते हैं। पश्चिम बंगाल में तो महिला के लिए सीट नहीं छोड़ना बस हो या फिर मेट्रो, मारमीट तक की वजह बन सकता है। लेकिन दिल्ली में ऐसे अपवाद ही कभी दिखते हैं, अलबत्ता यहां महिलाओं को अपमानित करने की ही संस्कृति रही है। कई बार सीट मांगते वक्त सीट के सामने उपर महिला लिखा दिखाना महिलाओं के लिए उल्टा भी पड़ जाता है। बेशर्म पुरूष सवारी को यह कहने में भी हिचक नहीं होती कि उपर लिखा है तो उपर ही बैठ जाओ। ऐसी दिल्ली में मेट्रो रेल कारपोरेशन ने ट्रेनों में महिलाओं के लिए खासतौर पर अलग कोच का इंतजाम यह सोचकर किया था कि महिलाएं यात्रा के दौरान खुद को महफूज महसूस कर सकें। लेकिन दिल्ली के पुरूषों की सोच नहीं बदली, उन्हें महिलाओं के लिए आरक्षित कोच में ही चढ़ने में आनंद आने लगा। शुरू में तो मेट्रो अधिकारियों ने इसे इक्का-दुक्का घटना मान कर नजरअंदाज किया। कई बार नजरअंदाज करना बड़े नासूर की वजह बन जाता है। दिल्ली में भी कुछ ऐसा ही हुआ। दिल्ली की मेट्रो रेलों के महिला आरक्षित डिब्बों में पुरूष सवारियों का घुसना नहीं रूका। इस बहाने महिला सवारियों से छेड़खानी की घटनाएं भी बढ़ने लगीं। हारकर मेट्रो और उसकी सुरक्षा में तैनात सीआईएसएफ के अधिकारियों को आखिरी रास्ता अख्तियार करना पड़ा। सादी वर्दी में महिला सिपाहियों को तैनात किया गया और महिला सवारियों की वेश में चढ़ी सीआईएसएफ की इन सिपाहियों ने शोहदों की जमकर धुनाई की। इस धुनाई को अखबारों और खबरिया चैनलों की सुर्खियां भी हासिल हुईं। संस्कारवान तबके को यह कदम महिलाओं के हित में नजर आया। लेकिन नेशनल कॉलिजन फॉर मेन की सोच कुछ दूसरी है। लिहाजा उसे इन घटनाओं ने पुरूषों को चेताने की बजाय अलग ही मांग रखने का आधार मुहैया करा दिया। कॉलिजन का तर्क है कि जब महिलाओं के लिए अलग और रिजर्व कोच हो सकते हैं तो पुरूषों के लिए क्यों नहीं। लेकिन उनके पास इस सवाल का जवाब नहीं है कि पुरूषों की तरह क्या महिलाएं भी ट्रेनों और बसों में छेड़खानी करती पाई जाती हैं। सवाल तो यह भी है कि सुनसान सड़कों में देर रात अकेले गुजरते पुरूषों से क्या महिलाएं भी रेप करती हैं। सवाल तो यह भी है कि क्या महिलाएं भी पुरूषों को वक्त-बेवक्त छूने का सुख उठाने की ही कोशिश में रहती हैं। जाहिर है इन सभी सवालों का जवाब ना में ही है। अभी हाल ही में दिल्ली के एयरटेल हाफ मैराथन में शामिल होने के बाद बॉलीवुड अभिनेत्री गुल पनाग ने कहा था कि दिल्ली के पुरूष छूने का कोई मौका हाथ से नहीं जाने देते। जाहिर है कि उस दिन दिल्ली वालों ने उनसे शारीरिक छेड़खानी का सुख उठाने का मौका नहीं गंवाया। कुछ साल पहले मुंबई की लोकल रेलों में भी महिलाओं के लिए आरक्षित डिब्बे में पुरूष चढ़ने से परहेज नहीं करते थे। सुनसान महिला डिब्बों में बलात्कार तक की घटनाएं भी हुईं। इसके बाद मुंबई पुलिस को सख्त रवैया अख्तियार करना पड़ा और महिला डिब्बों से पुरूष सवारियों को बाहर निकाला गया। अगर दिल्ली मेट्रो रेल कारपोरेशन ने भी मनचले पुरूषों पर काबू पाने के लिए ऐसा कोई कदम उठाया तो उसका स्वागत ही किया जाना चाहिए। अपनी शारीरिक बनावट के चलते महिलाएं पुरूषों से उनके स्तर पर कम से कम शारीरिक तौर पर मुकाबला कर ही नहीं सकतीं। लिहाजा उनके लिए आरक्षण की व्यवस्था करनी ही पड़ेगी। बहरहाल पुरूष अपनी वर्चस्ववादी मानसिकता से अब तक उबर नहीं पाए हैं। इसीलिए महिलाओं को दी जा रही महिलाजनित जरूरी सुविधाएं भी उनसे पच नहीं पा रही है। नेशनल कॉलिजन फॉर मेन की मांग बेवकूफी से ज्यादा कुछ नहीं है। एक दौर में पत्नी पीड़ित संघ ने जिस तरह सुर्खियां हासिल की थीं, इस संगठन की ओर लोगों का ध्यान कुछ उसी अंदाज में जा रहा है। ऐसे में इसका भी पत्नी पीड़ित संघ की तरह अगर हास्यास्पद हश्र होता है तो हैरत नहीं होनी चाहिए।

जीत ने बदल दिए सुर

उमेश चतुर्वेदी
भारतीय समाजवादी आंदोलन और राजनीति की जब भी चर्चा होती है, सहज ही एक पुरानी फिल्म का गीत – इस दिल के टुकड़े हजार हुए, कोई यहां गिरा, कोई वहां गिरा- याद आ जाता है। समाजवादी आंदोलन और पार्टियों की यह नियति में एकजुटता और साथ चलने का स्थायी भाव नहीं रहा है। यही वजह है कि उनमें आपसी विरोधाभास और अलगाव कुछ ज्यादा ही दिखता रहा है। बिहार में प्रचंड बहुमत हासिल कर चुके जनता दल यूनाइटेड चूंकि एक दौर में समाजवादी आंदोलन का प्रमुख अगुआ दल रहा है। लिहाजा समाजवादी आंदोलन के रोग से यह दल भला कैसे अछूता रह सकता है। बिहार विधानसभा चुनाव में उतरने के ठीक पहले जिस तरह पार्टी के मुंगेर से सांसद राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन, कैमूर के सांसद महाबली सिंह और औरंगाबाद के सांसद सुशील कुमार ने नीतीश कुमार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था तो समाजवादी विचारधारा की राजनीति की सीमाएं एक बार फिर याद आ गई थीं।
समाजवादी चिंतन में आपसी खींचतान का हश्र कम से कम हर अगले चुनाव में पराजय और टूटन के तौर पर दिखता रहा है। सुशील कुमार हों या ललन या फिर महाबली सिंह, उन्हें लगता रहा होगा कि अपने विद्रोही कदम के जरिए वे नीतीश कुमार को सबक सिखा सकते हैं। लेकिन इतिहास ने इस बार पलटी खाई है। यह पहला मौका है, जब समाजवादी विचारों के अनुयाइयों के आपसी विचलन से जनता विचलित नहीं हुई और उसने नीतीश कुमार को ही समर्थन देकर उनके एजेंडे को आगे बढ़ाने वाली नीतियों की तसदीक कर दी है। हालांकि राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन को अपने विद्रोह पर इतना ज्यादा भरोसा था कि उन्होंने नैतिकता और संसदीय राजनीति के मूल्यों तक की परवाह नहीं की। जनता दल यू के सांसद रहते हुए उन्हें कांग्रेस के बिहार प्रभारी मुकुल वासनिक के साथ मिलकर नीतीश कुमार को हराने की जोड़-जुगत बिठाने से कोई गुरेज नहीं रहा। इतना ही नहीं, कई जगह कांग्रेस के प्रत्य़ाशी तय करने और उनके लिए खुलेआम प्रचार करने से भी वे पीछे नहीं हटे। राजनीति में ऐसे कदम तब उठाए जाते हैं, जब या तो राजनीतिक हाराकिरी करनी होती है या फिर कदम उठाने वाले को नतीजे अपनी तरफ रहने का पूरा अंदाजा होता है। ललन बिहार की राजनीति में कुछ वक्त पहले तक नीतीश कु्मार की दाहिनी बांह माने जाते रहे हैं। कुख्यात चारा घोटाले में लालू यादव को जेल भिजवाने के अभियान में भारतीय जनता पार्टी के झारखंड के नेता सरजू राय और बिहार के उप मुख्यमंत्री सुशील मोदी के साथ ललन का भी महत्वपूर्ण हाथ रहा है। शायद यही वजह है कि कांग्रेस को बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों में खुद के लिए कहीं ज्यादा समर्थन की उम्मीद बढ़ गई थी। कैमूर के सांसद महाबली सिंह पहले लालू यादव के साथ थे। लेकिन वहां उनकी दाल नहीं गली तो वे बहुजन समाज पार्टी में शामिल हो गए थे। इसके बाद उन्हें जनता दल यू में अपना राजनीतिक कैरियर दिखा और पिछले लोकसभा चुनाव में जेडीयू के टिकट पर जीत गए। कैमूर से जीत के बाद उनकी भी उम्मीदें बढ़ गईं। अपने क्षेत्र की चैनपुर विधानसभा सीट से अपने बेटे के लिए टिकट चाहते थे, लेकिन नीतीश ने नहीं दिया तो बेटे को आरजेडी से चुनाव मैदान में उतार दिया। लेकिन नीतीश लहर के सामने उनका बेटा नहीं टिक पाया। कुछ इसी तरह औरंगाबाद के सांसद सुशील कुमार अपने भाई के लिए टिकट चाहते थे। जेडीयू ने उनकी इच्छा पूरी नहीं कि तो उन्होंने भाई को आरजेडी के टिकट पर मैदान में उतार दिया। लेकिन वह भी खेत रहा। इसी तरह टिकटों के बंटवारे को लेकर कभी नीतीश कुमार के खास सहयोगी और दोस्त रहे उपेंद्र कुशवाहा भी नाराज हो गए। सभी नाराज नेताओं को यही लगता था कि उनकी नाराजगी नीतीश को जरूर गुल खिलाएगी। लेकिन बिहार की जनता ने जिस तरह पुराने मुहावरे को बदल दिया है, उससे सबक सिखाने की मंशा रखने वाले इन नेताओं के सुर बदल गए हैं। ललन सिंह ने तो बिना देर किए नीतीश को जीत की बधाई तक दे डाली। महाबली सिंह को अब समाजवादी नैतिकता याद आने लगी है और वे कहते फिर रहे हैं कि उनके बेटे की राजनीति से उनका कुछ लेना-देना नहीं है। कुछ इसी अंदाज में सुशील कुमार भी जनता दल यू और नीतीश कुमार से अपनी निष्ठा जता रहे हैं। इन नेताओं की सोच में आए इस बदलाव के बाद अब एक और कहावत याद आने लगी है- जैसी बहे बयार, पीठ तैसी कीजै। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि हवा के झोंके की ओर पीठ करके चेहरे को बचाया तो जा सकता है, लेकिन क्या नीतीश कुमार नाम की हवा इन चेहरों को माफ करने के मूड में है। इसका जवाब नीतीश का वह बयान ही देता है, जो उन्होंने ललन सिंह की बधाई के बाद मीडिया के सवालों के जवाब में दिया था- ललन सिंह पर फैसला पार्टी आलाकमान लेगा।