Monday, February 28, 2011

महंगाई से जूझ रहे लोगों को दादा ने आखिर क्या दिया

उमेश चतुर्वेदी
महंगाई से जूझ रहे लोगों को उम्मीद थी कि प्रणब मुखर्जी जब देश का 80वां बजट पेश करेंगे तो उसमें महंगाई से राहत के उपाय होंगे, लेकिन प्रणब मुखर्जी के बजट प्रस्तावों में ऐसा कुछ खास नहीं निकला, जिससे महंगाई से जूझ रही जनता राहत की उम्मीद कर सके। सरकार और कांग्रेस पार्टी इसे किसानों और आम आदमी का बजट बताते थक नहीं रही है। हालांकि कांग्रेस पार्टी को भी पता है कि यह बजट आम आदमी की उम्मीदों पर खरा नहीं उतर पाएगा। कांग्रेस प्रवक्ता मनीष तिवारी के शब्दों पर गौर फरमाएं तो यह तथ्य साफ हो जाएगा। बजट पेश होने के बाद प्रतिक्रिया देते हुए मनीष तिवारी का कहना कि वित्तमंत्री ने सस्ती लोकप्रियता हासिल करने वाला बजट पेश नहीं किया है, साफ करता है कि कांग्रेस भी मानती है कि प्रणब मुखर्जी का बजट आम लोगों की उम्मीदों पर खरा नहीं उतरा। शायद यही वजह है कि समूचा विपक्ष इस बजट को सिर्फ वायदों का पिटारा बता रहा है। यों तो वित्तमंत्री बजट को दो हिस्सों में पढ़ते हैं, लेकिन लोगों को बजट प्रावधानों से ज्यादा नजर अपनी आम जरूरत की चीजों की कीमतों पर रहती है। लोग यह भी चाहते हैं कि आयकर की छूट सीमा बढ़े। इस लिहाज से प्रणब मुखर्जी का बजट कमजोर है। लोगों को उम्मीद थी कि इस बार आयकर की छूट सीमा एक लाख साठ हजार से बढ़ाकर तीन लाख रुपये कर दी जाएगी, लेकिन यह छूट महज बीस हजार रुपये की बढ़ी। महिलाओं को पिछले कई साल से छूट देने की परंपरा ही बन गई है, लेकिन इस बार उन्हें निराशा ही हाथ लगी है। बुजुर्ग लोगों को आयकर की छूट सीमा दो लाख चालीस हजार से बढ़ाकर ढाई लाख रुपये कर दी गई। हां, अस्सी साल से ज्यादा उम्र के बुजुर्गो के लिए यह छूट सीमा पांच लाख रुपये तक कर दी गई है। अभी तक पैंसठ साल के बुजुर्गो को ही वृद्धावस्था पेंशन देने का प्रावधान था। अब यह उम्र सीमा घटाकर साठ साल कर दी गई है। फिर राशि भी दो सौ से बढ़ाकर पांच सौ रुपये कर दी गई है। महंगाई के इस दौर में जैसी गति दो सौ रुपये की थी, वैसी ही गति पांच सौ की है। ऐसे में बुजुर्गो को क्या फायदा मिलेगा। बीस हजार रुपये की आयकर छूट का साढ़े आठ फीसदी महंगाई दर के दौर में लोगों को क्या फायदा मिलेगा, इसे वित्तमंत्री ही ठीक तरीके से बता सकते हैं। लेकिन यह तय है कि आम लोगों को खास फायदा नहीं मिला है। वित्तमंत्री ने एक बोल्ड कदम जरूर उठाने का ऐलान किया है कि केरोसिन और एलपीजी के लिए अब सीधे नगद ही सब्सिडी दी जाएगी। अब तक यह सब्सिडी तेल कंपनियों को ही मिलती थी। जब किसानों को 73 हजार करोड़ रुपये की सब्सिडी दी गई थी, तब कुछ एनजीओ और राजनीतिक दलों ने मांग रखी थी कि यह सब्सिडी सीधे नगदी तौर पर किसानों को ही दी जाए तो हर किसान को साढ़े छह हजार रुपये मिलेंगे और उसका सीधा फायदा उसे मिलेगा। सरकार ने तब किसानों को ऐसा फायदा भले ही लेने नहीं दिया, लेकिन केरोसिन और एलपीजी पर नगद सब्सिडी देने का ऐलान करके एक सराहनीय कदम उठाने की कोशिश जरूर की है। लेकिन इसके लिए क्या सरकारी प्रक्रिया होगी, किन्हें यह फायदा मिलेगा, कहीं यह फायदा सिर्फ सरकार की नजर में रहे गरीब लोगों को ही मिल पाएगा..? ये कुछ सवाल हैं, जिनका जवाब सरकार को देना होगा। लेकिन यह तय है कि अगर इस सब्सिडी को लागू करने के लिए पारदर्शी और अचूक तरीका अख्तियार नहीं किया गया तो इससे सरकारी बाबुओं के मालामाल होने और भ्रष्टाचार की नई राह खुल जाएगी। सरकार के नए ऐलानों से लोहा, ब्रांडेड रेडिमेड कपड़े, ब्रांडेड सोना, विदेशी हवाई यात्रा महंगी हो जाएगी। जबकि सौर लालटेन, साबुन, मोबाइल, एलईडी टीवी, कागज, प्रिंटर, साबुन, गाडि़यों के पुर्जे, कच्चा रेशम, सिल्क, रेफ्रिजरेटर, मोबाइल, सीमेंट, स्टील का सामान, कृषि मशीनरी, बैटरी वाली कार, बच्चों के डायपर आदि सस्ते होंगे। लेकिन सरकार ने जिस तरह सर्विस टैक्स के दायरे में बड़े अस्पतालों में इलाज समेत कई सेवाओं को लागू किया है, उससे तय है कि महंगाई और बढ़ेगी। आज के तनाव भरे दौर में जिस तरह से लोगों की जिंदगी पर खतरा बढ़ा है, उसमें बीमा पर लोगों का आसरा बढ़ा है। लेकिन बीमा पॉलिसी पर भी सेवाकर बढ़ाकर वित्तमंत्री ने एक तरह से लोगों की पॉकेट पर ही निगाह गड़ा दी है। ऐसे में महंगाई से राहत की उम्मीद कैसे की जा सकती है। आयातित कार बैटरियों और सीएनजी किट पर सीमा शुल्क घटाकर सरकार ने पर्यावरणवादी कदम उठाने की कोशिश तो की है, लेकिन सच तो यह है कि इन्हें लोकप्रिय बनाने के लिए सीमा शुल्क का आधा किया जाना ही राहत भरा बड़ा कदम नहीं हो सकता। कच्चे रेशम पर भी सीमा शुल्क घटाकर पांच प्रतिशत किया गया है, लेकिन देसी बुनकरों के लिए खास छूटों का ऐलान नहीं है। हालांकि नाबार्ड के जरिए तीन हजार करोड़ की मदद का ऐलान जरूर किया गया है। सरकार का दावा है कि इसका फायदा तीन लाख हथकरघा मजदूरों को मिलेगा। वित्तमंत्री ने किसानों को 4.75 लाख करोड़ रुपये का कर्ज देने का ऐलान किया है। इसके साथ ही वक्त पर कर्ज लौटाने पर उन्हें 3 फीसदी की छूट देने का ऐलान भी किया गया है। इसके साथ ही उन्हें 7 फीसदी ब्याज पर कर्ज देने की भी घोषणा है। इसके साथ ही कोल्ड स्टोरेज के लिए एसी पर कोई एक्साइज नहीं लगाया गया है। इसके साथ ही माइक्रोफाइनेंस क्षेत्र को मजबूती देने के लिए अलग से व्यवस्था की गई है, लेकिन इसका फायदा किसानों की बजाय छोटे उद्यमियों को आर्थिक मदद के तौर पर दिलाने का वायदा है। सच तो यह है कि इसका सबसे ज्यादा फायदा किसानों को मिलना चाहिए। उन्हें कम पूंजी के जरिये अपनी खेती को उन्नत बनाने की जरूरत हर साल पड़ती है, लेकिन सरकार ने अपनी माइक्रोफाइनेंसिंग के दायरे में किसानों पर ध्यान नहीं दिया। वित्तमंत्री ने 2000 से ज्यादा आबादी वाले गांवों में बैंक की सुविधा देने और ग्रामीण बैंकों को 500 करोड़ रुपये देने का भी ऐलान किया है। जाहिर है, गांवों तक सरकारी बैंक ही पहुंचेंगे, लेकिन गांवों में सरकारी बैंकों की जो हालत है और किसानों के साथ उनका क्या सलूक है, यह छुपा नहीं है। उनकी हालत सुधारने और किसान हितैषी बनाने के संबंध में प्रणब मुखर्जी का बजट मौन है। पिछले साल बढ़ी दालों की कीमतों और दूध के आसन्न संकट से निबटने के लिए वित्तमंत्री ने अपने बजट में प्रावधान तो किए हैं। दलहन का उत्पादन बढ़ाने के लिए उन्होंने जहां 300 करोड़ की रकम का प्रावधान किया है, वहीं इतनी ही रकम दूध का उत्पादन बढ़ाने के लिए भी देने का ऐलान है। लेकिन वित्तमंत्री यह भूल गए हैं कि इतने बड़े देश में सिर्फ 300 करोड़ की रकम से दाल और दूध का उत्पादन उस स्तर तक नहीं पहुंचाया जा सकता, जितनी कि देश को जरूरत है। भारतीय जनता पार्टी समेत विपक्षी दलों और बाबा रामदेव ने जिस तरह काले धन को देश व्यापी मुद्दा बना रखा है, उसका दबाव भी प्रणब मुखर्जी के बजट प्रस्तावों में दिखा। बजट भाषण पढ़ते हुए उन्होंने काले धन के दुष्प्रभावों को लेकर चिंता जाहिर करते हुए कहा कि सरकार इससे निपटने के लिए पांच सूत्रीय कार्ययोजना चला रही है। जिसके तहत काले धन के विरुद्ध वैश्विक संघर्ष में साथ, देना उपयुक्त कानूनी ढांचा तैयार करना, अनुचित तरीकों से कमाए गए धन से निपटने के लिए संस्थाएं स्थापित करना, क्रियान्वयन के लिए प्रणालियां विकसित करना और लोगों को कौशल का प्रशिक्षण देना शामिल किया गया है, लेकिन काले धन को लेकर सरकार के कड़े कदम क्या होंगे, उसकी कोई स्पष्ट रूपरेखा उनके बजट भाषण में नहीं दिखी। जाहिर है कि वित्तमंत्री ने सिर्फ चतुराई का ही परिचय दिया है। इससे साफ है कि वित्तमंत्री के मौजूदा बजट भाषण का जमीनी स्तर पर खास फायदा नहीं होने जा रहा। किसान पहले की तरह हलकान रहेंगे, मध्यवर्ग अपनी कमाई में गुजर-बसर करने के लिए मजबूर रहेगा।

Friday, February 25, 2011

रेल बजट : लेकिन आम यात्रियों की सहूलियतों की चिंता कहां हैं


उमेश चतुर्वेदी
पश्चिम बंगाल के चुनावी साल में ममता बनर्जी रेल बजट पेश करें और उनके आंचल से ममता ना बरसे, ऐसा कैसे हो सकता है। ममता बनर्जी भले ही रेल मंत्री हैं, लेकिन उनका ध्यान दिल्ली के रफी मार्ग स्थित रेलवे बोर्ड के मुख्यालय रेल भवन पर कम ही रहता है। उनकी निगाह कोलकाता के राइटर्स बिल्डिंग पर ही है। यह पूरा देश जानता है और राजनीतिकों की छोड़िए, आम आदमी भी यही मानकर चल रहा था कि संसद में इस बार भी पश्चिम बंगाल एक्सप्रेस ही दौड़ेगी। हालांकि ऐसा नहीं हुआ, अलबत्ता कोलकाता पर वे ज्यादा मेहरबान रहीं। कोलकाता को अकेले पचास ट्रेनें, मेट्रो रूट को बढ़ावा और कोच फैक्टरी की सौगात देकर उन्होंने यह साबित कर दिया है कि दुनिया चाहे जो कहे, जब तक उनके हाथ में रेलवे की कमान है, अपने कोलकाता और बंगाल पर मेहरबान बनी रहेंगी। एनडीए सरकार के रेल मंत्री के तौर पर जब उन्होंने पहली बार रेलवे का बजट पेश किया था, तब भी उन पर बंगाल के लिए बजट पेश करने का आरोप लगा था। इन आरोपों के बाद उन्होंने तीखी टिप्पणी की थी – यदि भारत उनकी मातृभूमि है तो पश्चिम बंगाल उनका स्वीट होम है और ऐसा कैसे हो सकता है कि अपने स्वीट होम के लिए वे कुछ नहीं करें।
लेकिन ममता ने बाकी इलाकों को उतने उपहार भले ही नहीं दिए, जितने कोलकाता को मिले हैं, उतने किसी और को नहीं। लेकिन यात्री किराए में बढ़ोत्तरी ना करना, बुकिंग फीस घटाकर एसी के लिए दस रूपए और गैर एसी के लिए पांच रूपए करना निश्चित तौर पर यात्रियों को सुखकर लगेगा। माल भाड़े में भी कोई बढ़त ना करके ममता ने साबित किया है कि उनकी निगाह भले ही पश्चिम बंगाल के चुनावों पर है, लेकिन जनता के दुख-दर्दों से उनका वास्ता है। महंगाई से जूझ रही जनता के लिए निश्चित तौर पर ममता का ये आंचल जरूर राहत लेकर आया है। वैसे भी मध्य एशिया और अरब देशों में बढ़ती अराजकता के चलते कच्चे तेल की कीमतें 105 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई है। जाहिर है इस महंगाई का सामना रेलवे को भी करना पड़ रहा है। ऐसे में भी अगर ममता ने रेल किराए या माल भाड़े में कोई बढ़ोत्तरी नहीं की तो जाहिर है कि उन्होंने जन पक्षधरता दिखाई है। लेकिन उदारीकरण के दौर में ऐसी जनपक्षधरता ज्यादा दिनों तक चलने वाली नहीं है। करीब 16 लाख कर्मचारियों के भारी-भरकम बेड़े वाली रेलवे रोजाना करीब एक करोड़ लोगों को ढोती है। जाहिर है कि इसमें भारी भरकम रकम खर्च होती है। लेकिन यह खर्च कहां से आएगा, ममता बनर्जी के बजट में इसका जिक्र नहीं है। अलबत्ता उन्होंने रेलवे की तरफ सरकार को छह प्रतिशत का लाभांश भी दिया है। रेलवे के जानकारों को लगता है कि इसमें कहीं न कहीं कोई गड़बड़ जरूर है। अगर सचमुच में भी ऐसा हुआ है तो इसकी कीमत आनेवाले दिनों में रेलवे को आर्थिक तौर पर चुकानी पड़ सकती है। ममता ने रेलवे के लिए अब तक के सबसे अधिक 57, 630 करोड़ रुपये के परिव्यय का प्रस्ताव किया है। लेकिन जहां तक रकम जुटाने का सवाल है तो इसे बांड और बाजार से उगाहने की दिशा में मोड़ दिया गया है। ममता के इस बजट से पंद्रह हजार करोड़ रूपए बाजार से उगाहने का लक्ष्य है। इससे साफ है कि कर्ज आधारित व्यवस्था पर रेल को चलाने की कोशिश है। ममता ने नई लाइनों के लिए 9583 करोड़ रुपये का प्रावधान किया है। इसके साथ ही 1300 किलोमीटर नई लाइनें, 867 किलोमीटर लाइनों का दोहरीकरण और 1017 किलोमीटर का आमान परिवर्तन करने का लक्ष्य रखा गया है। लेकिन ममता के पुराने बजटों से साफ है कि ऐसे प्रस्ताव उन्होंने पहले भी रखे हैं, लेकिन उन पर काम न के बराबर भी हुआ है। जिस कोलकाता पर वे मेहरबान रही हैं, वहां के मेट्रो के विस्तार का लक्ष्य उन्होंने यूपीए सरकार के रेलमंत्री के तौर पर अपने पहले बजट में भी रखा था। लेकिन हकीकत यह है कि इस दिशा में अब तक कोई खास प्रगति नहीं हो पाई है। इसे कोलकाता वासी अच्छी तरह से जानते हैं। ममता ने अपने बजट प्रस्ताव में आठ क्षेत्रीय रेलों पर टक्कररोधी उपकरण लगाने का भी प्रस्ताव किया है। इन उपकरणों का नीतीश कुमार के रेल मंत्री रहते सफल परीक्षण किया जा चुका था। ऐसे में सवाल यह उठना लाजिमी है कि आखिर इन्हें लागू करने की कोशिश अब जाकर क्यों शुरू हुई है। ममता ने जयपुर-दिल्ली और अहमदाबाद-मुंबई रुट पर ऐसी डबल डेकर ट्रेनें चलाने का ऐलान किया है। ऐसा ऐलान पिछले बजट में धनबाद-कोलकाता रूट के लिए भी किया गया था। लेकिन हकीकत में अब तक इस रूट पर डबल डेकर ट्रेनों का सफल परीक्षण तो नहीं हो सका है। जब बंगाल के इलाके में सफल प्रयास नहीं हो पाया तो दूसरे इलाके में इसके जल्द सफल होने की उम्मीद कैसे की जा सकती है। भारतीय रेल की सबसे बड़ी समस्या उसकी रफ्तार है। ममता ने यात्री गाडियों की रफ्तार 160 से बढाकर 200 किलोमीटर
प्रति घंटे करने के बारे में व्यावहारिक अध्ययन कराने का ऐलान किया है। लेकिन जिस हालत में भारतीय रेलवे के ट्रैक हैं, उसमें इसे व्यवहारिक जामा पहनाया जाना आसान नहीं है। उत्तर पूर्वी राज्यों और जम्मू-कश्मीर में अलगाववादी भावनाओं को बढ़ावा देने में रेलवे की गैरमौजूदगी को भी जानकार बड़ा कारण बताते रहे हैं। इस संदर्भ में ममता का वह प्रयास सराहनीय कहा जा सकता है, जिसके तहत उन्होंने सिक्किम को छोड पूर्वोत्तर के सभी राज्यों की राजधानियों को अगले सात साल में रेल संपर्क से जोड़ने का कार्यक्रम बनाया है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब रेलवे की हालत ही खराब है तो इसके लिए जरूरी रकम आएगी कहां से। रेल बजट इस बारे में साफ जानकारी नहीं देता। रेलवे के जानकार मानते हैं कि भारतीय रेलवे जिस हालत में है, उसमें उसकी हालत सुधारने के लिए परियोजना बजट बढ़ाया जाना चाहिए। रेलवे की जो हालत है, उसमें परियोजनाएं बजट प्रस्तावों में रख तो दी जाती हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर उनके विकास की दिशा में कोई काम नहीं हो सकता। जब ऐसे ही खुशफहमी भरा बजट लालू यादव पेश करते थे तो नीतीश कुमार कहा करते थे कि उनके इस बजट की कीमत आने वाले रेलमंत्री को चुकानी पड़ेगी। ममता बनर्जी ने रेलवे पर श्वेत पत्र लाकर लालू राज की खुशफहमियों की कलई खोलने की कोशिश की थी। लेकिन खुद ममता रेलवे के ढांचागत विकास के लिए खास योजना लेकर नहीं आ सकी हैं। भारतीय यात्रियों को भारतीय रेलों से वक्त की पाबंदी और साफ-सुथरी ट्रेनों के साथ सहूलियतों की अपेक्षा रहती है। लेकिन दुर्भाग्यवश ममता के इस पूरे बजट में इन पर कोई ध्यान नहीं दिया गया है।

Saturday, February 12, 2011

अनुभवों के विस्तारित आकाश का प्रस्थान बिंदु


उमेश चतुर्वेदी
हिंदी में लोक साहित्य के अध्ययन का आधार बना गीत - रेलिया ना बैरी, जहजिया ना बैरी , पइसवा बैरी भइले ना - भी दरअसल प्रवासी पीड़ा की ही अभिव्यक्ति था। लेकिन आज प्रवास का मकसद वैसा नहीं रहा, जैसा उन्नीसवीं सदी के आखिरी दिनों से लेकर आजादी के कुछ बरसों बाद तक रहा है। लिहाजा प्रवासी रचनात्मकता के स्वर भी बदले हैं। पहले का प्रवासन चूंकि अभाव और मजबूरियों का प्रवास था, लिहाजा उस वक्त की रचनात्मकता में सिर्फ और सिर्फ अभाव और मजबूरियों का ही जिक्र मिलता है। सैनिक और विशाल भारत का संपादन करते वक्त पंडित बनारसी दास चतुर्वेदी प्रवास और उसकी पीड़ा के संपर्क में आ गए थे। जिसका नतीजा बाद में प्रवास और प्रवासी रचनात्मकता के उनके गहन अध्ययन में नजर आया। लेकिन आज प्रवास का मकसद बदल गया है। आज के प्रवास में मजबूरी नहीं बल्कि शौक है। बेहतर या उससे भी आगे की कहें तो सपनीली जिंदगी की तलाश आज के प्रवास का अहम मकसद बन गया है। शायद यही वजह है कि मशहूर कथाकार और हंस के संपादक राजेंद्र यादव प्रवासी लेखन को खाए-अघाए लोगों का लेखन कहने से खुद को रोक नहीं पाते। यह सच है कि प्रवासी लेखन को लेकर इन दिनों हिंदी साहित्यिक समाज में खास आलोडऩ है। लेकिन इसके पीछे विशुद्ध रचनात्मक वजह नहीं है। बल्कि आज ब्रिटेन -अमेरिका या कनाडा जैसे समृद्ध देशों में रह-रहे रचनात्मक लोगों को सबसे ज्यादा अपनी रचनात्मक पहचान की मान्यता हासिल करने से जुड़ गया है। लेकिन ऐसा नहीं कि प्रवासी रचनात्मकता को पहचान पहले से हासिल नहीं रही है या फिर प्रवासी लेखक को यथेष्ट सम्मान नहीं मिलता रहा है। अगर ऐसा होता तो आज से करीब चौथाई सदी पहले गंगा में अमेरिका में रह रही लेखिका सुषम बेदी का उपन्यास गंगा जैसी पत्रिका में कमलेश्वर उत्साह से धारावाहिक तौर पर नहीं छाप रहे होते। कादंबिनी के पुराने अंकों में जब किसी ब्रिटिश या प्रवासी लेखक की रचना राजेंद्र अवस्थी प्रकाशित करते तो बाकायदा उसकी घोषणा की जाती- ब्रिटेन से आई कहानी। जाहिर है कि प्रवासी लेखन को पहले से ही इज्जत मिलती रही है। पत्रकारिता की दुनिया में भी एक दौर में जब हिंदुस्तान टाइम्स के वाशिंगटन स्थित संवाददाता एन सी मेनन रिपोर्टें लिखते तो उनकी रिपोर्ट के साथ अलग से खास बाइलाइन लगाई जाती- एन सी मेनन राइट्स फ्रॉम वाशिंगटन। जाहिर है कि वाशिंगटन, लंदन या ओस्लो के लेखन को तब भी खास महत्व मिलता था।
दरअसल प्रवासी लेखन का जोर भारत सरकार द्वारा शुरू किए गए प्रवासी भारतीय सम्मेलनों के बाद जोर पकड़ रहा है। भारत सरकार का यह आयोजन अब सालाना गति हासिल कर चुका है। लेकिन ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि यह आयोजन पूरी तरह आर्थिक और राजनीतिक उद्देश्यों को हासिल करने लिए है। सांस्कृतिक पहचान और भारतीय धरती से जुड़ाव की दिशा में भारत सरकार द्वारा पोषित और पल्लवित किए जा रहे प्रवासी भारतीय सम्मेलन का अब तक कोई योगदान नहीं रहा है। इन संदर्भों में डीएवी गल्र्स कॉलेज यमुनानगर और कथा(यूके) का प्रवासी भारतीय साहित्य सम्मेलन को पहला ऐसा सांस्कृतिक कार्यक्रम कहा जा सकता है, जिसमें प्रवासी भारतीय लेखन को उसकी मूल नाल से जोडऩे की कोशिश हो रही है।
मौजूदा प्रवासी लेखन का प्रमुख सुर अपनी जड़ों से जुडऩे की कोशिश तो है ही, प्रवास में गए लोगों की अगली पीढ़ी की सांस्कृतिक चिंताएं भी ज्यादा हैं। जहां प्रवासियों की पहली पीढ़ी सूरदास के कृष्ण की तरह अपने गांव- अपने पुराने परिवेश को - उधौ मोहि ब्रज बिसरत नाहीं की तर्ज पर याद करती रहती है। जबकि ब्रिटेन-अमेरिका या कनाडा में पैदा उन्हीं प्रवासियों की संतानों के लिए भारतीय संस्कार और संस्कृति कोई मायने नहीं रखती। जाहिर है यह सांस्कृतिक तनाव कई बार प्रवासी परिवारों के लिए सांस्कृतिक भ्रम लेकर आता है। इस भ्रम के चलते पीढिय़ों के बीच टकराव भी होता है। जाहिर है कि प्रवासी रचनाओं में सांस्कृतिक विभ्रम की यह स्थिति खूब नजर आती है।
दुनियाभर से आए प्रवासी रचनाकारों को लेकर यमुनानगर में जितनी कहानियों पर चर्चाएं हुईं, ज्यादातर का प्रमुख सुर यही रहा। मौजूदा प्रवासी लेखन में इससे भी आगे की बात हो रही है। आज का प्रवासी लेखन विदेशी समाज के अनुभवों से भी समृद्ध कर रहा है। विदेशी संसार में देसी मन के अनुभवों का जो विस्तार हुआ है, उसे प्रवासी साहित्यकारों की पैनी निगाहों ने बारीकी से पकड़ा है। इन अर्थों में कहें तो प्रवासी लेखन ने हिंदी साहित्य के आकाश को विस्तार दिया है। नई जमीन के नए अनुभवों से ओतप्रोत इस रचना संसार में भी खामियां हो सकती हैं। जिन पर विचार होना चाहिए और होगा भी। यमुनानगर की धरती पर शुरू हुआ यह समारोह निश्चित तौर पर प्रवासी भारतीय लेखन के वैचारिक आलोडऩ के लिए नई जमीन मुहैया कराएगा। इतनी उम्मीद तो हम कर सकते ही हैं।

Saturday, February 5, 2011

राजा की गिरफ्तारी के निहितार्थ

उमेश चतुर्वेदी
पूर्व संचार मंत्री ए राजा की गिरफ्तारी से उस तबके के लोग बेहद आशान्वित महसूस कर रहे हैं, जिन्हें मौजूदा व्यवस्था से अब भी उम्मीद बनी हुई है। उन्हें लगता है कि प्रभावशाली नेता और उसके साथ रसूखदार अधिकारियों की गिरफ्तारी से भ्रष्टाचारियों में यह संदेश जरूर जाएगा कि मौजूदा व्यवस्था के हाथ उसकी गर्दन तक पहुंच सकते हैं। खालिस्तानी आतंकवाद की भेंट चढ़े मशहूर पंजाबी कवि पाश की कविता है- सबसे खतरनाक होता है हमारे सपने का मर जाना। भ्रष्टाचार के विरोधी में लामबंद नजर आ रही एक पीढ़ी में इस उम्मीद का बचे रहना जरूरी है। लेकिन क्या इस एक गिरफ्तारी से भ्रष्टाचार के समूल नाश की उम्मीद पाल लेना बेमानी नहीं लगता। अतीत पर भरोसा करें तो ऐसा सोचना गलत भी नहीं है। नरसिंह राव सरकार के संचार मंत्री रहे पंडित सुखराम की भी हिमाचल फ्यूचरिस्टिक कंपनी को बेजा फायदा पहुंचाने और घोटाले में नाम आने के बाद ठीक वैसे ही सीबीआई ने गिरफ्तार किया था, जैसे ए राजा को गिरफ्तार किया गया है। जिस तरह राजा के साथ तत्कालीन टेलीकॉम सचिव सिद्धार्थ बेहुरा को गिरफ्तार किया गया है, सुखराम के साथ उसी तरह तब की दूरसंचार विभाग की अतिरिक्त सचिव रूनू घोष को भी सीबीआई ने जेल की राह दिखाई थी। लेकिन भ्रष्टाचार को न रूकना था और न ही रूका। 1995 में प्रमुख विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी ने हिमाचल फ्यूचरिस्टिक घोटाले के खिलाफ 16 दिन तक संसद की कार्रवाई नहीं चलने दी थी। 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले के खिलाफ बीजेपी समेत समूचे विपक्ष का रवैया भी कुछ वैसा ही रहा, जिसके चलते संसद के शीतकालीन सत्र में कोई विधायी कामकाज नहीं हो सका।
समूचा विपक्ष इस मसले की संयुक्त संसदीय समिति से जांच कराने की मांग पर अड़ा हुआ था। विपक्ष अपनी इस मांग पर अब भी कायम है। राजा की गिरफ्तारी के बाद विपक्ष का तर्क और मजबूत ही हो गया है। उसका कहना है कि राजा की गिरफ्तारी से साबित होता है कि 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले में राजा का हाथ है। यह बात प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह भी तीन साल से जानते रहे हैं, लेकिन उन्होंने राजा के खिलाफ कार्रवाई करने में तीन साल की देर लगा दी। राजा की गिरफ्तारी को कांग्रेस की साख बचाने की कवायद से भी जोड़कर देखा जा सकता है। गिरफ्तारी के फौरन बाद कांग्रेस प्रवक्ताओं ने इसका श्रेय लेने की कोशिश भी की। इसके लिए उन्होंने प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के उस बयान का सहारा जरूर लिया, जिसमें उन्होंने कहा था कि अगर भ्रष्टाचार हुआ है तो कानून अपना काम जरूर करेगा। यह ठीक है कि सीबीआई प्रधानमंत्री के अधीन ही काम करती है। बिना उनके इशारे पर सीबीआई राजा और बेहुरा की गिरफ्तारी का कदम नहीं उठा सकती थी। लेकिन यह भी सच है कि प्रधानमंत्री कार्यालन ने सदिच्छा से राजा की गिरफ्तारी के लिए हरी झंडी नहीं दिया है। सुब्रह्ममण्यम स्वामी की याचिका पर सुनवाई करते हुए राजा पर कई सवाल सुप्रीम कोर्ट ही उठा चुका है। सुप्रीम कोर्ट ने ही जब सवाल पूछा कि आखिर इतने बड़े घोटाले के आरोपी राजा अब तक मंत्रिमंडल में क्यों बने हुए हैं, तब जाकर उनसे इस्तीफा मांगा गया।
सच तो यह है कि बढ़ती महंगाई और 2 जी स्पेक्ट्रम घोटाले की ठोस जांच में हीलाहवाली से सरकार की साख पर सवाल उठ खड़े हुए हैं। राष्ट्रमंडल खेल आयोजन में घोटाला की खबर आने के बाद भी सरकार की ओर से कोई ठोस कदम उठाते हुए नहीं दिखे। अभी राष्ट्रमंडल खेल आयोजन के घोटाले से उबरने की कांग्रेस कोशिश कर ही रही थी कि मुंबई के आदर्श सोसायटी घोटाले से सरकार और कांग्रेस की नींद उड़ गई। लिहाजा अशोक चव्हाण को हटाकर कांग्रेस ने अपने दामन को पाक-साफ दिखाने की कोशिश की। अपेक्षाकृत शालीन व्यक्तित्व के धनी पृथ्वीराज चव्हाण को दिल्ली से भेजकर महाराष्ट्र की बागडोर थमाई गई। लेकिन अब उनका भी नाम आदर्श घोटाले में सामने आ रहा है। लेकिन एक लाख 76 हजार करोड़ का 2जी स्पेक्ट्रम घोटाले की खबर सब पर भारी पड़ गई। सबसे बड़ी बात यह है कि प्रधानमंत्री की चेतावनी के बाद भी राजा अपने ढंग से स्पेक्ट्रम बांटते रहे। लेकिन गठबंधन धर्म की मजबूरियों ने शायद प्रधानमंत्री का हाथ बांधे रखा और राजा बचे रहे। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के कड़े तेवर के बाद राजा को जाना पड़ा। इसके बाद इस महत्वपूर्ण विभाग की जिम्मेदारी तेजतर्रार वकील कपिल सिब्बल को थमाई गई। सिब्बल साहब के वकील दिमाग ने इसमें राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार को भी शामिल करने की कोशिश की। लेकिन सीबीआई के हाथों राजा की गिरफ्तारी ने सिब्बल के उस तर्क को भी बेदम बनाकर रख दिया है।
तो क्या यह मान लिया जाय कि राजा की गिरफ्तारी बिना किसी राजनीतिक उद्देश्य के ही संभव हो पाई है और क्या यह गिरफ्तारी सिर्फ कानून को अपना काम करने देने का नतीजा है। निश्चित तौर पर इसका जवाब ना में है। दरअसल सरकार के सामने विपक्ष को साधने के लिए इससे बड़ा कोई दूसरा रास्ता नजर नहीं आ रहा है। सरकार जानती है कि अगर वह 2जी स्पेक्ट्रम के आवंटन घोटाले में ठोस कदम नहीं उठाती तो उसके लिए शीतकालीन सत्र की तरह संसद का बजट सत्र चला पाना आसान नहीं होगा। अगर विपक्ष ने बजट सत्र भी नहीं चलने देने की ठान ली तो देश की आर्थिक देनदारियों और लेनदारियों पर संकट उठ खड़ा होगा। अपने सिद्धांतों और राजनीतिक प्राथमिकताओं के मुताबिक सरकार के लिए बजट पास करा पाना भी सरकार के लिए टेढ़ी खीर साबित होगा। सरकार इस बहाने विपक्ष की जेपीसी की मांग के धार को भी कुंद करने की कोशिश कर रही है। हालांकि अभी विपक्ष झुकता नजर नहीं आ रहा है। उल्टे उसने जेपीसी की मांग और तेज कर दी है। विपक्षी नेताओं के एक वर्ग को लगता है कि राजा कि गिरफ्तारी से उसे राजनीतिक फायदा मिल सकता है। चाहे भारतीय जनता पार्टी के नेता हों या फिर किसी और पार्टी के, वे भी मुगालते में हैं। राजा के इस भ्रष्टाचार के खिलाफ सबसे पहले सवाल तमिलनाडु भारतीय जनता पार्टी के पूर्व अध्यक्ष सीपी राधाकृष्णन ने उठाए थे। उनके बयान को एक हिंदी पाक्षिक के अलावा किसी ने स्थान नहीं दिया था। लेकिन जैसे ही यह मामला लेकर सुब्रह्मण्यम स्वामी ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका के जरिए उठाया, भारतीय जनता पार्टी इस मसले को संसद और बाहर भुनाने के लिए कूद पड़ी। यह बात और है कि सीपी राधाकृष्णन की राय पर पहले उनकी ही पार्टी ने ध्यान नहीं दिया। इससे साफ है कि भारतीय जनता वक्त रहते इस राजनीतिक मसले का फायदा उठाने के लिए कितनी तैयार है। 1995 के संचार घोटाले के आरोपी सुखराम को कांग्रेस ने निकाल बाहर किया तो उन्होंने हिमाचल कांग्रेस बना ली। सुखराम को मुगालता था कि हिमाचल के लोग उसे हाथोंहाथ अपना लेंगे। लेकिन ऐसा नहीं हो सका। भारतीय जनता पार्टी भी हिमाचल प्रदेश में राजनीतिक रसूख हासिल करने की जुगाड़ में थी। उसे सुखराम की पार्टी में ही सहारा नजर आया और पार्टी ने उसी सुखराम को अपना लिया, जिनके भ्रष्टाचार के खिलाफ 16 दिनों तक संसद नहीं चलने दी थी। भ्रष्टाचार पर रोक नहीं लग पाने के पीछे भारतीय राजनीति की इस अवसरवादिता का भी बड़ा हाथ रहा है।
तीस जनवरी को गांधी जी की पुण्यतिथि पर देश के छह महानगरों में स्वयंसेवी संगठनों और स्वतंत्रता सेनानियों की मांग पर जुटी लोगों की भीड़ ने भी सरकार की भौहों पर बल ला दिया है। दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और बेंगलुरू में भ्रष्टाचार के खिलाफ जुटे लोगों की मांग है कि एक ऐसा लोकपाल बिल लाया जाए, जिसके दायरे में प्रधानमंत्री का पद भी हो। भ्रष्टाचार और उसे रोकने के उपायों की मांग को लेकर जुटी भीड़ ने भी सरकार पर दबाव बढ़ा दिया है। लोगों की इस भीड़ से एक तथ्य साबित तो हुआ कि आम लोग अब सरकार को हीलाहवाली करने वाली संस्था मानने लगे हैं। राजनीतिक पंडितों के एक वर्ग का माना है कि राजा की गिरफ्तारी की एक वजह सरकार पर बढ़ता यह जनदबाव भी है।