Thursday, March 31, 2011

कहीं डीम्ड यूनिवर्सिटी जैसा न हो हाल

उमेश चतुर्वेदी
ज्ञान और सूचना की सदी के तौर पर घोषित इक्कीसवीं सदी में भारतीय मनीषा को आगे रखने के लिए अपने मानव संसाधन विकास मंत्रालय की योजनाओं का कोई सानी नहीं है। कपिल सिब्बल की अगुआई वाले मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने नामचीन कॉलेजों और संस्थानों को एक और ताकत और सम्मान देने का फैसला किया है। मंत्रालय की योजना है कि देश के नामचीन संस्थान और कॉलेज अपनी खुद की डिग्री दे सकें। शिक्षा के विकास की गति और सरकारी दावे को देखते हुए सरकार की इस योजना में कोई बुराई नजर नहीं आती। अगर कॉलेज या संस्थान नामचीन हैं तो उन्हें डिग्री के लिए किसी विश्वविद्यालय या डीम्ड विश्वविद्यालय पर क्यों आश्रित रहना चाहिए। कुशल और शिक्षित दिमागों और हाथों की खोज में जुटी दुनिया में इससे भारतीय छात्रों की पूछ और पहुंच ही बढ़ेगी। तभी एशिया और ज्ञान की इक्कीसवीं सदी में भारतीय डंका ठीक तरीके से बज सकेगा। मानव संसाधन विकास मंत्रालय की इन उम्मीदों और उत्साह पर रंज करना जरूरी भी नहीं है। लेकिन वैधानिक तरीकों की आड़ में अपने यहां जिस तरह से शिक्षा क्षेत्र में मनमानियां की जा रही हैं, डर उसी की वजह से है। कुछ इसी तरह भारतीय छात्रों का भला चाहते हुए स्वर्गीय अर्जुन सिंह ने डीम्ड विश्वविद्यालयों की सीरिज खड़ी कर दी। शिक्षा को सर्वसुलभ बनाने और ज्यादा से ज्यादा छात्रों तक को डिग्रियां देने के लिए डीम्ड विश्वविद्यालयों की जो सीरीज खड़ी की गई, उनकी हालत अंदरखाने में जाकर ही पता चल पाएगी। हकीकत में ये डीम्ड विश्वविद्यालय डिग्रियां बांटने की दुकानें बन गए हैं। दिल्ली से सटे हरियाणा में दो मानद विश्वविद्यालय हैं। दोनों ने अपने अध्यापकों को मौखिक आदेश दे रखे हैं कि किसी छात्र को फेल नहीं करना है। इन विश्वविद्यालयों के संचालकों की समस्या यह है कि अगर उनके यहां छात्र फेल होने लगे तो दूसरी बार उनके यहां एडमिशन कौन लेगा, फिर उनकी शैक्षिक दुकान कैसे चलेगी। दिल्ली से ही सटे हरियाणा के एक मानद विश्वविद्यालय में अध्यापकों की भर्तियों के वक्त इंटरव्यू विश्वविद्यालय संचालकों के घर की दो महिलाएं लेती हैं। अभ्यर्थियों ने भले ही इंजीनियरिंग, पत्रकारिता, सोशल वर्क, बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन या अंग्रेजी पढ़ाने के लिए आवेदन किया होगा, ये दोनों महिलाएं ही उनका इंटरव्यू लेंगी। लियोनार्दो द विंची की तरह ये महिलाएं या तो इतनी प्रतिभाशाली हैं कि वे सब कुछ जानती हैं या फिर नई शिक्षा व्यवस्था से खिलवाड़ हो रहा है। राजधानी दिल्ली के दक्षिणी हिस्से में चल रहे एक संस्थान से लोगों ने दो साल पहले की तारीख में एमफिल में एडमिशन करा लिया और अब वे विश्वविद्यालय का अध्यापक बनने के लिए जरूरी नेट की परीक्षा से छूट पा गए हैं। सच तो यह है कि ये डीम्ड विश्वविद्यालय और संस्थान पैसे लाओ और डिग्रियां बांटने की दुकान की तरह काम कर रहे हैं। इसलिए क्या गारंटी है कि नामचीन कॉलेजों और संस्थानों को डिग्री देने की सहूलियत मिलते ही उसका फायदा पैसा कमाने की दुकान बन चुके संस्थान नहीं उठाएंगे और यह अधिकार पाने के लिए खानापूर्ति करने में कामयाब नहीं होंगे। कहने के लिए मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने एक कमेटी बना दी है, जो डिग्री देने की हैसियत चाहने वाले संस्थानों के शैक्षिक इतिहास और गरिमा की जांच करेगी। यह कमेटी उन कॉलेजों के स्तर की जांच वहां पढ़ाई-लिखाई के इतिहास और शिक्षा के क्षेत्र में वर्षो के उनके रिकार्ड के आधार पर जांच करेगी। इसके साथ ही उन्हें नेशनल असेसमेंट एंड एक्रीडिटेशन कौंसिल में कम से कम ए श्रेणी में पंजीकृत होना होगा। जिस देश में मेडिकल कौंसिल, आईसीटीईए और डीम्ड यूनिवर्सिटी का दर्जा देने वाली कमेटियों में पैसों का खेल चलता हो, वहां यह कैसे नहीं होगा कि डिग्री देने वाले संस्थानों को मान्यता देने वाली एजेंसी या समिति में तीन-पांच न हो और शिक्षा की दुकानें बने कॉलेज भी डिग्री बांटने की दुकान बन जाएं। पहले किसी संस्थान पर किसी विश्वविद्यालय से जुड़े होने के चलते शैक्षिक गुणवत्ता बनाए रखने का दबाव रहता था, लेकिन बदले हालात में यह दबाव संस्थानों से खत्म हो जाएगा। इसका असर यह होगा कि दुकानें चल निकलेंगी।
अभी फर्जी डिग्री से पायलटों की भर्ती का मामला चर्चा में है। फर्जी डिग्री से पायलट बनने की वजह यही है कि डीजीसीए जैसी संस्थाओं ने ऐसे संस्थानों को प्रशिक्षण की छूट दे दी, जिनका मकसद सिर्फ और सिर्फ पैसे कमाना था। जयपुर से गिरफ्तार एक छात्र ने मीडिया से साफ कहा भी कि उसे पायलट ट्रेनिंग के लिए अपने संस्थान को पांच लाख रूपया देना पड़ा था। लेकिन जब वह गिरफ्तार हुआ तो संस्थान बता रहा है कि उसने सिर्फ एक लाख रूपए ही बतौर फीस वसूली है। सच तो यह है कि पायलट बनाने वाले संस्थान को भी भावी विमान चालकों की गुणवत्ता से कोई लेना-देना नहीं था। उन्हें सिर्फ पैसे बनाना था। अगर वे कमजोर छात्रों को फेल कर देते या फिर फर्जी डिग्री पर आने वाले छात्रों के प्रवेश को रोक देते तो उनकी कमाई मारी जाती। लिहाजा उन्होंने अपनी कमाई का ध्यान रखा, भावी यात्रियों की सुरक्षा पर सोचना भी उन्होंने जरूरी नहीं समझा। वैसे भी अगर वे एडमिशन रोकते या फिर कमजोर छात्रों को फेल करते तो अगले साल उन्हें नए छात्र नहीं मिलते।
कपिल सिब्बल ने मानव संसाधन विकास मंत्री बनते ही डीम्ड विश्वविद्यालयों की जांच कराई थी। उनकी जांच में देश के 128 डीम्ड विश्वविद्यालयों में से 44 किसी भी मानक पर खरे नहीं उतरते थे। इनमें राजधानी दिल्ली के नजदीक स्थित हरियाणा का मानव रचना इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी और लिंग्या यूनिवर्सिटी के साथ ही नोएडा का जेपी इंस्टीट्यूट ऑफ इन्फॉर्मेशन टेक्नॉलजी भी शामिल था। जाहिर है कि जब राजधानी से सटे संस्थान मानद विश्वविद्यालय बनने के बाद नियमों का मजाक उड़ा सकते हैं तो दूर के विश्वविद्यालयों और संस्थान क्या करेंगे, इसका अंदाजा लगाना आसान है। वैसे भी जिन 44 डीम्ड विश्वविद्यालयों पर सवाल उठे हैं, उन्होंने सुप्रीम कोर्ट से स्टे ले रखा है। यानी उनका फिलहाल कुछ बिगड़ता नहीं दिख रहा है, उल्टे छात्रों को वे डिग्री बांटने की कवायद में जुटे हुए ही हैं। ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि संस्थानों और कॉलेजों को डिग्री देने की छूट मिली तो गुणवत्ता को बनाए रखने के लिए फुलप्रूफ इंतजाम कैसे होंगे। क्या सरकार फिर डीम्ड विश्वविद्यालयों की तरह इंतजार करेगी कि वे कैसा प्रदर्शन करते हैं और फिर उन पर सवाल खड़े करेगी और फिर होगा ढाक के तीन पात।
सच तो यह है कि शिक्षा की दुकानों के तौर पर तब्दील हो रहे संस्थानों पर अभी तक कोई कारगर लगाम नहीं लगाई जा सकी है। इसलिए मानव संसाधन विकास मंत्रालय उच्च शिक्षा के विकास के लिए अपनी पीठ चाहे जितनी थपथपा लें, हकीकत तो यह है कि एक पूरी की पूरी पीढ़ी के साथ शैक्षिक तौर पर मजाक हो रहा है। बेहतर है कि सरकार संस्थानों को डिग्री बांटने का अधिकार देने के अपने फैसले पर विचार करके इतने कड़े प्रावधान बनाए, जिससे किसी संस्थान या डीम्ड विश्वविद्यालय को डिग्री बेचने की छूट न मिल सके।

Saturday, March 19, 2011

जाट आरक्षण के किंतु-परंतु

उमेश चतुर्वेदी
उत्तर भारत के सबसे उल्लासमय त्यौहार होली की होलिका जलाकर जाट आंदोलन फिलहाल भले ही खत्म हो गया है, लेकिन भारतीय राजनीति में आरक्षण को लेकर जो आग दोनों बड़े दलों कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी ने लगाई है, उसकी कीमत देश को चुकानी पड़ती रहेगी। मौजूदा जाट आंदोलन को लेकर उत्तर प्रदेश और हरियाणा की राज्य सरकारों के साथ केंद्र सरकार का जो चलताऊ रवैया रहा है, उससे आरक्षण आंदोलन को लेकर भारतीय राजनीति के भावी कदमों का आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता है। उत्तर प्रदेश और हरियाणा के जाट जिस तरह अपना चूल्हा-चौका और चौपाल रेलवे लाइनों पर लगाकर बैठे रहे और राज्य सरकारों के साथ केंद्र सरकार भी हाथ पर हाथ धरे बैठी रही, उससे साफ है कि मौजूदा लोकतांत्रिक व्यवस्था में ताकतवर समूह के छोटे-मोटे हितों के लिए व्यापक जनसमुदाय की बलि दी जा सकती है। हरियाणा और उत्तर प्रदेश से गुजरने वाली रेलगाड़ियों के यात्री चूंकि मजबूत वोट बैंक नहीं थे, लिहाजा उनकी तरफ किसी ने ध्यान नहीं दिया। उन्हें उनके हाल पर छोड़ दिया गया। पश्चिम बंगाल में चूंकि जाट कोई वोट बैंक नहीं है, लिहाजा रेल मंत्री ममता बनर्जी रेलवे को हो रहे नुकसान को लेकर अपने उस दर्द को भी भूल गईं, जो उन्होंने इसी 25 फरवरी को रेल बजट पेश करते हुए देश के सामने रखा था।
लोकतंत्र में जब कोई समुदाय मजबूत वोट बैंक बन जाता है तो उसे लेकर राजनीति कितनी मुतमईन हो जाती है, इसे जाटों के आरक्षण आंदोलन से समझा जा सकता है। हरियाणा की कांग्रेस सरकार और उत्तर प्रदेश की बहुजन समाज पार्टी की सरकार ने इस आंदोलन में हस्तक्षेप करने की कोई कोशिश नहीं की। उलटे जाटों के आरक्षण का समर्थन ही करती रहीं। आज जो जाट समुदाय आरक्षण की मांग कर रहा है, उसे एक दशक पहले तक खुद को आरक्षित समुदाय में संबोधित किए जाने से भी परेशानी होती थी। वह समुदाय मारपीट तक करने के लिए उतावला हो जाता था। लेकिन राजनीति के उकसावे ने उसे आरक्षण के लिए इस कदर उतावला बना दिया है कि अब वह आरक्षण के लिए मारपीट करने के लिए उतावला होता नजर आ रहा है। मौजूदा दौर में जब भी कोई समुदाय अपने लिए आरक्षण की मांग करता है तो उसका आधार मोरार जी देसाई सरकार द्वारा गठित बीपी मंडल आयोग है। यह सच है कि आजादी के पहले तक देश का जाट समुदाय एक हद तक पिछड़ा और कमजोर था। कुछ इलाकों में उसे शूद्रों की श्रेणी में भी रखा जाता था। लेकिन आजादी के साठ – बासठ साल में जाट आबादी बहुल इलाकों में जिस तेजी से विकास हुआ है, उसने जाट समुदाय की आर्थिक स्थिति बदल कर रख दी है। हाल के दिनों में जिस तरह राजस्थान, हरियाणा, दिल्ली और उसके आसपास और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जिस तरह औद्योगीकरण और शहरीकरण हुआ है, उसने जाट समुदाय की आर्थिक स्थिति बेहतर बना दी है। अब जाट का छोरा अपनी दुल्हन को लेने के हेलीकॉप्टर से जाने लगा है, चमचमाती गाड़ियां और गले में मोटे –मोटे सोने की चेन उसकी जीवन शैली का अंग बन गया है। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या सचमुच अब भी जाट समुदाय को आरक्षण की जरूरत है। मंडल कमीशन ने आरक्षण देने के लिए जो 11 मानक तय किए थे, उन मानकों में जाट समुदाय कहीं भी आरक्षित श्रेणी में आने के लिए फिट नहीं बैठता था। जिनमें सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक मानक शामिल किए गए थे। गौरतलब है कि मंडल आयोग ने सभी पैमानों के लिए समान वेटेज नहीं दिया था, सामाजिक सूचकांकों के लिए उसने जहां तीन पाइंट वेटेज तय किया था तो शैक्षिक पिछड़ापन के लिए दो पाइंट। वहीं आर्थिक के लिए एक पाइंट वेटेज था। इसी तरह सामाजिक स्थिति के आकलन के तहत पहले दो बिंदु थे- ऐसी जातिया-वर्ग, जिन्हें अन्य जातिया सामाजिक तौर पर पिछड़ा मानती हैं तो दूसरा बिंदु था, ऐसी जातियां, जो मुख्यत: अपने जीवनयापन के लिए शारीरिक श्रम पर निर्भर थीं। शैक्षिक पैमानों के अहम बिंदु थे, ऐसी जातियां, जहां 5 से 15 साल की उम्र के बच्चे, जिन्होंने कभी स्कूल का मुंह नहीं देखा हो, उनका अनुपात राज्य के औसत से 25 फीसदी अधिक हो तथा जाति-वर्ग विशेष के ऐसे बच्चे, जो 5-15 साल की उम्र के बीच स्कूल छोड़ जाते हों, उनकी संख्या राज्य के औसत से 25 फीसदी अधिक हो। दरअसल जाटों को आरक्षण देने की वकालत 1989 में बनी राष्ट्रीय मोर्चा की सरकार ने भी नहीं की थी। वी पी सिंह की इस सरकार में देवीलाल जैसा कद्दावर जाट नेता बतौर उपप्रधानमंत्री शामिल था। यह पूरी दुनिया जानती है कि राष्ट्रीय मोर्चा की उस सरकार के सबसे बड़े घटक जनता दल का सबसे बड़ा वोट बैंक जाट समुदाय ही था। अगर उस वक्त जाटों ने अपने लिए आरक्षण की मांग की होती तो वी पी सरकार उसे आसानी से मान लेती। लेकिन तब आरक्षित समुदाय में शामिल होना जाट समुदाय के लिए अपमान की बात थी। जनता दल अपने अंतर्विरोधों के कारण खुद खत्म हो गया और यही वह दौर था, जब उत्तर भारत की राजनीति में भारतीय जनता पार्टी ने अपना आधार बढ़ाना शुरू किया था। गोविंदाचार्य की सामाजिक इंजीनियरिंग में पार्टी की निगाह जनता दल के बड़े वोट बैंक जाटों के साथ ही पिछड़े वर्ग पर निगाह थी। तब भारतीय जनता पार्टी के एजेंडे में जाटों के आरक्षण का मुद्दा शामिल नहीं था। हिंदुत्व की राह पर चल रही भारतीय जनता पार्टी को जाटों ने बाद के चुनावों में भरपूर समर्थन दिया। यहीं से बतौर वोट बैंक जाटों पर कांग्रेस की निगाह लगी। इसके बाद भी उसने अपने एक वरिष्ठ नेता पी शिवशंकर की अगुआई में बने पिछड़ा वर्ग आयोग की रिपोर्ट को आधार बनाया, जिसे उसने नवंबर 1997 में पेश किया था। जिसने राजस्थान के जाटों को कमजोर बताया था। इसके बाद कांग्रेस ने राजस्थान में जाटों को आरक्षण देने का शिगूफा छोड़ दिया। जाहिर है कि इसका फायदा कांग्रेस को मिला। उसे भैरो सिंह शेखावत की सरकार को जाट वोट बैंक के जरिए हटाने का मौका मिल गया। जाटों को कांग्रेस का यह समर्थन 1998 के आम चुनावों में भी मिला। जब पूरे उत्तर भारत में अटल बिहारी वाजपेयी की लहर चल रही थी, राजस्थान में ज्यादातर लोकसभा सीटें कांग्रेस के खाते में गईं। लेकिन ठीक तेरह महीने बाद हुए चुनावों में वाजपेयी ने राजस्थान के अपने चुनाव अभियान में जाटों को पिछड़ा वर्ग में शामिल करने का ऐलान कर दिया। जिसका सीधा फायदा भारतीय जनता पार्टी को मिला। इससे घबराई अशोक गहलौत की राज्य सरकार चुनावों के तत्काल बाद जाटों को पिछड़ा वर्ग में आरक्षित करने का ऐलान कर दिया। वोट बैंक पर पकड़ को लेकर जिस जल्दबाजी में यह कदम उठाया गया, उसका हश्र गहलौत को जहां गुर्जरों के आंदोलन के रूप में झेलना पड़ा है, वहीं उत्तर प्रदेश और हरियाणा की सरकारें हाल तक झेलती रही हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या सचमुच जाटों को आरक्षण चाहिए। इस पर मतभेद हो सकता है। जहां तक हरियाणा की बात है तो वहां का वह प्रमुख समुदाय है। राज्य की राजनीति समेत तमाम क्षेत्रों में उसकी पकड़ बरकरार है। ऐसे में उन्हें आरक्षण मिल जाय तो बाकी समुदायों का क्या होगा, जो सचमुच कमजोर हैं। यही हालत उत्तर प्रदेश की है, जिसके पश्चिमी इलाके में जाट जनसंख्या प्रभावी भूमिका में है। पश्चिमी इलाके की राजनीति और अर्थव्यवस्था को जाट समुदाय प्रभावित करता है। क्या ऐसे समुदाय को भी आरक्षण चाहिए। एक और प्रमुख तथ्य यह है कि उदारीकरण और वैश्वीकरण के दौर में सरकारी क्षेत्रों में नौकरियां आखिर बची ही कितनी हैं। निजीकरण के दौर में लगातार कम होती सरकारी नौकरियों में आखिर तमाम समुदायों को आरक्षण का कितना फायदा मिल सकता है। जाहिर है कि ये सवाल कड़वे हैं और उनका जवाब जब भी तलाशा जाएगा, आरक्षण समर्थकों की आंखें तो खुलेंगी ही, आरक्षण का समर्थन करने वाले राजनीतिक दलों की पोलपट्टी भी खुलेगी। लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि इस तरह से सोचने की हिम्मत आज के राजनीतिक दल नहीं दिखा रहे हैं। जबकि सत्ता और विपक्ष की राजनीति करने के चलते उनकी सबसे ज्यादा जिम्मेदारी बनती है।