Thursday, April 21, 2011

अन्ना के आंदोलन को पटरी से उतारने की कोशिश


उमेश चतुर्वेदी
“पिछले कुछ दिनों का घटनाक्रम चिंता का विषय है. ऐसा लगता है कि देश की भ्रष्ट ताकतें भ्रष्टाचार निरोधी प्रभावी कानून तैयार करने की प्रक्रिया को पटरी से उतारने के लिए एकजुट हो गई हैं. मेरा आपसे आग्रह है कि हम एकसाथ मिलकर उन ताकतों को पराजित कर सकते हैं. उन ताकतों की एक रणनीति यह है कि समिति में शामिल सामाजिक कार्यकर्ताओं की छवि खराब की जाए.”
अन्ना हजारे की चिट्ठी के ये अंश दरअसल उस पीड़ा की अभिव्यक्ति है, जो एक अच्छे काम को पटरी से उतारने की कोशिशें से उपजी है। इस पीड़ा में अन्ना का क्षोभ भी कहीं गहरे तक साया है। ऐसी तकलीफ गांधी जी को भी आजादी मिलने के कुछ पहले हुई थी, जब उनकी सोच के मुताबिक काम करने से तब के प्रमुख कांग्रेसी हिचकने लगे थे और लगता था कि आजाद भारत के कांग्रेसियों को गांधी जी की जरूरत ही नहीं रह गई है। तब गांधी ने कहा था कि इसी देश की मिट्टी से वे दोबारा कांग्रेस से भी बड़ा आंदोलन खड़ा कर देंगे। गांधी जी की उस पीड़ा और अन्ना हजारे के क्षोभ भरे दर्द में एक अंतर है। दरअसल गांधीजी को पीड़ा उनके अपने ही अनुयायियों से पहुंची थी, जबकि अन्ना को उनके आंदोलन के साथियों से ज्यादा दूसरे लोगों के हमलों का सामना करना पड़ रहा है। इसीलिए उनका क्षोभ गांधी से कहीं कम है, लेकिन उनका भी कर्म चूंकि बृहत्तर सामाजिक संदर्भों को पटरी पर लाने से जुड़ा है, इसीलिए दर्द भी है।
जन लोकपाल की मांग को लेकर अनिश्चित कालीन अनशन पर बैठे अन्ना की मांगों को मानना भारत सरकार की मजबूरी बन गई थी। दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र होने के दावा करते न थकने वाली भारत सरकार को नव उदारीकरण के दौर में लोकतंत्र भी एक नाटक सा होता जा रहा है। फिर पश्चिमी ताकतों के सामने लोकतांत्रिक होते दिखना भी उदारवाद का ही सहज विस्तार माना जा रहा है। ऐसे में भारत सरकार को लोकतांत्रिक दिखना जरूरी था। उसके सामने इसी साल जनवरी में शुरू हुए मिस्र की राजधानी काहिरा के तहरीर चौक पर लोकतांत्रिक शक्तियों ने जिस तरह वहां के राष्ट्रपति हुस्ने मुबारक को झुकने के लिए मजबूर कर दिया था, उसका उदाहरण अभी पुराना नहीं पड़ा है। ट्यूनिशिया की घटनाएं भी ताजा ही हैं, यमन में जारी लोकतंत्र समर्थक प्रदर्शन अभी जारी ही है। नये मीडिया माध्यमों, सोशल मीडिया आदि के जरिए दुनिया जितनी छोटी हुई है, उतनी शायद इससे पहले कभी छोटी नहीं थी। इसका सहज असर पूरी दुनिया में दिख रहा है। चूंकि हम बाकी दुनिया की तुलना में खुद को कहीं ज्यादा लोकतांत्रिक साबित करने का मौका नहीं छोड़ते, लिहाजा अन्ना हजारे के सामने हमारी सरकार को झुकना ही था। वह झुकी भी। खुद अन्ना को भी इतनी उम्मीद नहीं थी कि उनके अनशन के महज चार दिनों में देशव्यापी इतना ज्यादा समर्थन मिल जाएगा। लेकिन भारी समर्थन ने उनके आत्मविश्वास को किस कदर बढ़ा दिया है कि जन लोकपाल के लिए गठित समिति की पहली बैठक में शामिल होने के लिए जाते वक्त यह कहने से नहीं चूके कि अगर उनका अनशन चार दिन और चल जाता तो केंद्र सरकार गिर जाती। उसी अन्ना का आत्मविश्वास महज दो दिनों बाद डोलने लगता है और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी को चिट्ठी लिखने के लिए मजबूर होना पडता है तो जाहिर है कि उनके अंदर कहीं न कहीं कुछ अपने राजनीतिकों के दांव-पेंचों से कुछ न कुछ खदबदा रहा है।
इटली के विद्वान मेकियावेली ने अपनी मशहूर पुस्तक द प्रिंस में सत्ता के चरित्र की व्याख्या की है। इस व्याख्या के मुताबिक सत्ताएं चाहें अधिनायकवादी हों या फिर लोकतांत्रिक, उनके मूल में एक समानता होती है, विरोधी सुरों को आसानी से स्वीकार नहीं करना। सत्ता का यह लौहआवरण ही है कि वह जल्द झुकती भी नहीं। इसका उदाहरण अपने ही देश के छोटे-छोटे आंदोलनों में दिख जाएगा। जहां लोगों की मांगें जायज हैं, लेकिन सत्ता ने ठान लिया है कि वहां उसकी मर्जी से विकास हो तो इसके लिए वह जायज मांगों को लेकर खड़े लोगों तक पर गोलियां चलाने से नहीं हिचक रही हैं। सत्ता विरोधी सुरों को कुचलने के उदाहरण राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली से ठीक नजदीक नोएडा या फरीदाबाद तक में दिख सकता है। ऐसे में यह सोचना की सत्ता अन्ना के सामने झुक गई और जन लोकपाल की राह आसान हो गई, दरअसल दिवास्वप्न जैसा ही था।
आंदोलन को तोड़ने की कोशिशें उसी दिन शुरू हो गईं, जब आंदोलन की कामयाबी के लिए अन्ना से ज्यादा सोनिया गांधी को ज्यादा जिम्मेदार बनाने की कांग्रेसी कोशिशें शुरू हो गईं। इतना ही नहीं, जन लोकपाल के लिए गठित ड्राफ्ट कमेटी में शांतिभूषण और उनके बेटे प्रशांत भूषण के शामिल किए जाने को वंशवाद से जोड़कर देखा-दिखाया जाने लगा। इन चर्चाओं और खबरों के पीछे जहां सत्ताधारी खेमें के कुछ लोग जुटे हैं तो कई लोग ऐसे भी हैं, जिन्हें भगवा रंग से हर कीमत पर नाराजगी है। अन्ना हजारे ने नीतीश कुमार और नरेंद्र मोदी के ग्रामीण विकास की सफल योजनाओं के लिए प्रशंसा क्या कर दी, अन्ना की लानत-मलामत का जैसे मौका ही मिल गया। अन्ना जब नीतीश या नरेंद्र मोदी की प्रशंसा कर रहे थे तो उसके पीछे उनका सहज हृदय काम कर रहा था। लेकिन अन्ना के आंदोलन के आगे मजबूर हुए ताकतवर लोगों को अन्ना के इस बयान में भी खोट और सांप्रदायिकता नजर आने लगी। नरेंद्र मोदी ने लाख गुनाह किए हों, लेकिन हकीकत तो यही है कि गुजरात की जनता ने उन्हें दोबारा चुना है। ऐसे में उन्हें गाली देना और उनके हाथों हुए विकास कार्यों की बिना वजह आलोचना करने के लिए गोधरा का भूत जगाना दरअसल नरेंद्र मोदी पर हमला नहीं था, बल्कि अन्ना के आंदोलन को पटरी से उतारने की कोशिश ही थी। इसमें एक खास विचारधारा के लोग कुछ ज्यादा ही सक्रिय हैं।
गांधीजी की अगुआई में जब कांग्रेस भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के केंद्र में थी, तब उसके साथ राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ भी काम कर रहा था, सांप्रदायिकता विरोधी गांधी को भी आरएसस के साथ से परहेज नहीं था। गांधी की हत्या का आरोप आरएसस पर था, इसके बावजूद पंडित जवाहर लाल नेहरू के मंत्रिमंडल में भारतीय जनसंघ के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी शामिल थे। पंडित जवाहर लाल नेहरू ने खुद आरएसएस को गणतंत्र दिवस की परेड में मार्च पास्ट के लिए बुलाया था। इसका यह मतलब था कि देश के समग्र विकास में वे सबको साथ लेकर चलने की विचारधारा पर चलते थे। अन्ना के मोदी समर्थक बयान को उस नजरिए से क्यों नहीं देखा गया और उसकी आलोचना करने की कोशिशें तेज हो गईं। साफ है कि अन्ना और उनकी टीम पर आरोप लगा-लगाकर दरअसल उनकी साख को धक्का पहुंचाने की कोशिशें शुरू हो गईं है।
आखिर क्या वजह है कि अन्ना की साख को चोट पहुंचाने की कोशिशें तेज हो रही हैं। इसके दो कारण हैं। पहला कारण तो विशुद्ध राजनीतिक है। अन्ना ने जन लोकपाल के लिए जो आंदोलन चलाया है, निश्चित तौर पर उसका फायदा पूरे देश को होना है। लेकिन चूंकि अन्ना और उनके साथियों ने इसका राजनीतिक फायदा उठाने की कोई मंशा जाहिर नहीं की है और न ही उनकी कोई मंशा है भी। उनके पास राजनीतिक संगठन भी नहीं है। इसके चलते देर-सवेर जब चुनाव होंगे तो विपक्षी राजनीतिक धारा के एक वर्ग को डर है कि इसका फायदा भारतीय जनता पार्टी को हो सकता है। भारतीय जनता पार्टी कालेधन, स्विस बैंक में जमा धन और भ्रष्टाचार के मसले को लेकर 2009 के आम चुनावों से ही आंदोलन कर रही है। हालांकि उसे इसका फायदा नहीं मिल पाया। लेकिन अन्ना की साख भरी आवाज ने जब लोगों को जगा दिया तो भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन तो ख़ड़ा हो गया, लेकिन चुनावी समर में जाहिर है कि यह सवाल उठाने का फायदा भारतीय जनता पार्टी को मिल सकता है। हालांकि शांति भूषण या प्रशांत भूषण जैसे जिन लोगों पर सवाल उठाए जा रहे हैं, सच तो यह है कि वे खुद भी नहीं चाहेंगे कि अन्ना के साथ खड़े आंदोलन का फायदा भारतीय जनता पार्टी को मिले। इसके बावजूद अन्ना की साख को गिराने की कोशिशें जारी हो रही हैं।
इसकी दूसरी वजह सत्ता के अहं को पहुंची चोट है, जिसका बदला वह चुकाना चाहेगी ही। वैसे सत्ता के इर्द-गिर्द भ्रष्टाचारियों का बोलबाला कुछ ज्यादा ही है। उन्हें एक और डर सता रहा है कि अगर जन लोकपाल बिल पास हुआ तो उनके तो हाथ-पांव ही बंध जाएंगे। इसके लिए वे अन्ना को ही जिम्मेदार मानते हैं और अन्ना को जनसमर्थन के मुद्दे पर पटखनी तो देने से फिलहाल वे रहे तो इसके लिए बेहतर उपाय यह है कि अन्ना की साख को ही चोट पहुंचाई जाय। लेकिन अन्ना की साख पर चोट पहुंचाने की कोशिशें में जुटे लोगों को यह पता होगा ही कि अन्ना के लिए दौड़ने-रोने और चलने वाला पूरा समाज है। अन्ना के पास कोई आर्थिक ताकत भी नहीं है। ऐसे लोगों के लिए समाज तभी उठ खड़ा होता है, जब उसकी साख होती है और अन्ना जैसे लोगों की साख एक दिन में नहीं आती। इसलिए उस पर चोट पहुंचाना भी आसान नहीं होता।

Tuesday, April 12, 2011

विधानसभा चुनावों के नतीजे और भावी राजनीति

उमेश चतुर्वेदी
क्रिकेट के विश्व कप में भारत की जीत ने उन करोड़ों भारतीयों की जिंदगी में भी बेशक कुछ पल के लिए रोशनी की लकीर खींच दी है, जिनकी जिंदगी की दहलीज को अब भी असल रोशनी का इंतजार है। उदारीकरण के दौर में लाख झुठलाया जाय, लेकिन कड़वी हकीकत तो यही है कि जिंदगी में असल रोशनी लाने की जिम्मेदारी राजनीति पर है और राजनीति की दिशाएं चुनाव तय करते हैं। इन दिनों देश के चार राज्यों में विधानसभा चुनावों की प्रक्रिया जारी है। असम में चुनाव हो चुके है, नतीजों का इंतजार है। लेकिन शायद उन राज्यों के लोगों को छोड़ दें तो दूसरे इलाके के लोगों और मीडिया का ध्यान इस ओर नहीं इसका यह भी मतलब नहीं है कि इन चुनावों का कोई महत्व नहीं है और वे बेमानी हो गए है। इन चुनावों के नतीजे सिर्फ संबंधित राज्यों के लोगों के भाग्य को ही तय नहीं करेंगे, बल्कि देश की राजनीति पर भी असर डालेंगे। भारतीय जनता पार्टी के महासचिव अरूण जेटली इस चुनाव अभियान में इस तथ्य पर जोर दे रहे हैं। लेकिन उनकी भी बात का वजन इसलिए नहीं बढ़ रहा है, जिस केरल में प्रचार के दौरान उन्होंने यह कहा, उस केरल में भारतीय जनता पार्टी का खास दांव पर नहीं है।
पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार की लोककथाओं में पूरब यानी असम और बंगाल का ऐसे देस के तौर पर चित्रण है, जहां जादूगरनियां रहती हैं, जो वहां गए पुरूषों को तोता बनाकर पिंजरे में कैद कर लेती हैं। अपने खूबसूरत नागरिकों और शाक्त संप्रदाय के साथ ही उसकी तांत्रिक क्रियाओं के लिए इन राज्यों की शोहरत ने ही शायद इन लोककथाओं का जन्म दिया। लेकिन इन राज्यों की खूबसूरती को ग्रहण लग गया है। असम तीन दशकों से आतंकवाद की चपेट में है। यही वजह है कि इस राज्य में तीन दशकों में सिर्फ और सिर्फ आतंकवाद ही सबसे बड़ा चुनावी मुद्दा रहा है। चाहे असम गण परिषद की अगुआई वाला मोर्चा रहा हो या फिर कांग्रेस, दोनों ने तीन दशकों में जितने भी चुनाव लड़े हैं, उनका सिर्फ एक ही मुद्दा रहा है- खून-खराबे पर काबू और आतंकवाद का सफाया। इसके बीच एक और मुद्दा काम करता है। यहां भाषा और उन्हें बोलने वाले भी चुनावी मुद्दा बनते रहे हैं। असम की राजभाषा असमी है। लेकिन यहां बांग्लाभाषी लोग भी हैं और बांग्लादेश से विस्थापित लोग भी है। असम गणपरिषद का गठन भी बांग्लादेश से आए लोगों को असम से बाहर निकालने के आंदोलन के तूल पकड़ने के बाद ही हुआ था। लेकिन अब इसमें बोडो को भी शामिल करने का आंदोलन शुरू हो गया है। इसके साथ ही बोडो को अलग राज्य बनाने की मांग जोर पकड़ने लगी है। दिलचस्प बात यह है कि उल्फा और बोडो- दोनों उग्रवादियों के निशाने पर अब हिंदीभाषी मजदूर भी बनने लगे हैं। क्योंकि दोनों ही समुदायों को प्रवासी हिंदीभाषी दुश्मन और उनके रोजगार पर हक जताने वाले लगते हैं। इस बार जहां बीजेपी अकेले चुनावी मैदान में है। सबसे हैरतअंगेज बात यह है कि राज्य के बांग्लाभाषी इलाकों में बीजेपी का प्रभाव रहा है। 1999 के लोकसभा चुनाव में यहां से बीजेपी के चार सांसद चुने गए थे। लेकिन 2001 के विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी की स्थानीय इकाई असम गणपरिषद के साथ चुनाव नहीं लड़ना चाहती थी। लेकिन राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन में सहभागी होने के चलते बीजेपी को असम गणपरिषद के साथ चुनावी वैतरणी में उतरना पड़ा और बीजेपी के साथ ही असम गणपरिषद को भी मुंह की खानी पड़ी। तब से लेकर तरूण गोगोई के नेतृत्व में कांग्रेस की सरकार चल रही है। हालांकि 2006 के विधानसभा चुनावों में तरूण गोगोई की अगुआई में कांग्रेस को साफ बहुमत नहीं मिल पाया। इत्र व्यापारी बदरुद्दीन अजमल की असम यूनाइडेट डेमोक्रेटिक फ्रंट (एयूडीएफ) ने पिछले चुनाव में कांग्रेस को जोरदार झटका दिया था। हालांकि बाद में वह भी सरकार में शामिल हो गई। तरूण गोगोई की अकेली उपलब्धि उल्फा से बातचीत शुरू कराना है। हालांकि कई मंत्रियों पर भ्रष्टाचार के आरोप हैं। विपक्षी असम गणपरिषद पिछले चुनावों में बिखरी हुई थी। उसमें दो-फाड़ हो गया था। लेकिन इस बार प्रफुल्ल मोहंत की अगुआई में पार्टी के साथ सीपीएम और सीपीआई का मोर्चा कांग्रेस को टक्कर दे रहा है। वैसे दिल्ली के राजनीतिक हलके में कहा जा रहा है कि असम गण परिषद और बीजेपी भले ही चुनावी मैदान में अलग-अलग हों, लेकिन उनके बीच सियासी समझ विकसित हो गई है। यानी जरूरत पड़ी तो दोनों दल चुनाव बाद एक साथ सरकार बना सकते हैं। हालांकि चुनाव पूर्व हुए कुछ सर्वेक्षणों में कांग्रेस की वापसी की उम्मीद जताई जा रही है। लेकिन सी वोटर के यशवंत देशमुख का मानना है कि वहां कांग्रेस की वापसी मुश्किल है।
पश्चिम बंगाल और केरल दो ऐसे राज्य हैं, जहां वामपंथ अपनी पकड़ और पहुंच बनाए हुए है। दुनिया के तमाम अहम देशों से मार्क्सवादी राजनीति की विदाई के दौर में भी पश्चिम बंगाल अलग उदाहरण बना हुआ है। संसदीय राजनीतिक परंपरा में शामिल वामपंथी सरकार की लगातार 34 साल से मौजूदगी को दुनिया हैरत की निगाह से देखत रही है। लेकिन इस बार माना जा रहा है कि ममता बनर्जी की अगुआई वाली तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस का गठबंधन वामपंथ के इस गढ़ को ध्वस्त कर देगा। सिंगूर और नंदीग्राम के बाद तृणमूल कांग्रेस की राज्य के मतदाताओं में बढ़ती पकड़ और पहुंच को पिछले लोकसभा चुनावों में देखा जा चुका है। इसलिए माना जा रहा है कि इस बार पश्चिम बंगाल का लाल दुर्ग ध्वस्त हो सकता है। चूंकि वामपंथी खेमे के पास इन दिनों ज्योति बसु जैसा कोई चमत्कारिक नेता नहीं है, लिहाजा इस मान्यता में दम भी देखा जा रहा है। वाममोर्चे के शासन ने राज्य में भूमि सुधार का जो इतिहास रचा, वह पूरे देश में कहीं नहीं दिखा। आम लोगों की असल रहनुमाई करने का दावा करने वाली इस राजनीतिक विचारधारा से उम्मीद कहीं ज्यादा थी। लेकिन यह उम्मीद तकरीबन हर मोर्चे पर विफल हुई है।
अंग्रेजों के साथ के चलते देश में सबसे पहले कहीं नवजागरण आया तो वह बंगाल ही था। इसके चलते आजादी मिलते तक पश्चिम बंगाल में उद्योगों का जाल बिछा हुआ था। 1977 में जब पहली बार वाम मोर्चा की सरकार बनी तो उम्मीद जगी कि इस राज्य में आम लोगों की भलाई की राह में ढेर सारे बदलाव होंगे। सबसे बड़ा बदलाव तो भूमि सुधारों का हुआ। तब से लेकर अब तक चुनावी राह से इस राज्य में वामपंथी सरकार बनी हुई है। चीन और वेनेजुएला को छोड़ दें तो तकरीबन पूरी दुनिया से कम्युनिस्ट विचारधारा वाली सरकारों की विदाई हो चुकी है। ऐसे में संसदीय परंपरा को आत्मसात करते हुए 34 सालों से सरकार चलाना सचमुच वामपंथी विचारधारा की कामयाबी का ही इतिहास है। लेकिन इस दौर में जिस तरह सत्ता के विकेंद्रीकरण के नाम पर स्थानीय स्तर तक वामपंथी कैडरों की ताकत में इजाफा हुआ, उसका नतीजा राज्य में एक नए तरह के शोषण के तौर पर दिखा। आम आदमी की सैद्धांतिक तौर पर बात करने वाली विचारधारा के लोगों ने आम लोगों पर कहर बरपाने शुरू कर दिए। औद्योगिक केंद्र रहे पश्चिम बंगाल से उद्योगों की विदाई हो गई। पूरबिया लोकगीतों में सजने वाला बंगाल और कोलकाता अपना रौनक खोने लगा। वाम मोर्चे की सांगठनिक गुंडई का नजारा सिंगूर और नंदीग्राम में दिखा। इसके खिलाफ ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस ने मोर्चा संभाला। कहा जा रहा है कि उसे नक्सलियों का भी समर्थन हासिल है। बंगला समाज अपने संस्कृति कर्मियों पर खासा गर्व करता है। लेकिन वाममोर्चे की सांगठनिक जबर्दस्ती और राज्य की बदहाली ने महाश्वेता देवी, शंखो घोष, अपर्णा सेन जैसे तमाम संस्कृति कर्मी भी राज्य की वाममोर्चा सरकार के खिलाफ हो गए। इसका नतीजा पिछले लोकसभा चुनाव में भी दिखा। इस बार वाम मोर्चा अपने पुराने सभी साथियों मसलन सीपीएम, सीपीआई, आरएसपी, फारवर्ड ब्लॉक के साथ अपना गढ़ बचाने की जुगत में जुटा है, वहीं ममता बनर्जी और कांग्रेस उसका मुकाबला कर रहे हैं। इसी राज्य की राजधानी कोलकाता में 1951 में भारतीय जनता पार्टी के पूर्व संगठन भारतीय जनसंघ की स्थापना श्यामाप्रसाद मुखर्जी ने की थी। लेकिन यहां भारतीय जनता पार्टी एक कोने में पड़ी अपने अस्तित्व को साबित करने की जद्दोजहद में जुटी हुई है। चुनाव सर्वेक्षण मान रहे हैं कि इस बार तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस का राज्य सचिवालय रायटर्स बिल्डिंग पर कब्जा होने जा रहा है। लेकिन सीटों के बंटवारे को लेकर जिस तरह दोनों पार्टियों में खींचतान जारी रही, उससे दोनों पार्टियों का आपसी विश्वास बरकरार नहीं हो पाया है। कांग्रेस पार्टी के एक महत्वपूर्ण नेता का इन पंक्तियों के लेखक ने पूछा कि ममता बनर्जी से कांग्रेस का भरोसा बन गया है। तो उनका जवाब था कि पहले ममता खुद पर तो भरोसा करें। इस जवाब में ही छुपा है कि दोनों पार्टियों का भविष्य कैसा रहने वाला है। वैसे सच तो यह है कि वाममोर्चे की सांगठनिक जबर्दस्ती से पश्चिम बंगाल को मुक्ति दिलाने का दावा कर रही ममता बनर्जी के पास विकास का पहिया पटरी पर लाने के लिए कोई विशेष कार्यक्रम या रोडमैप नहीं है। अगर है भी तो अब तक नजर नहीं आया है। फिर तृणमूल कांग्रेस के कार्यकर्ता भी वाममोर्चे के कार्यकर्ताओं के तर्ज पर निचले स्तर तक तुर्की-बतुर्की काम करने की तैयारियों में जुट गए हैं। यानी अगर राज्य में सत्ता का परिवर्तन हुआ तो वहां सिर्फ राजनीति का ही नहीं, अराजकता का नया इतिहास भी रचा जाएगा। जिसे एक किनारे बैठकर देखने के लिए कांग्रेस भी मजबूर रहेगी।
दुनिया में वाम विचार धारा की पहली सरकार बतौर चुनाव देने वाले राज्य केरल में भी फिलहाल वाममोर्चा की सरकार है। राज्य के मुख्यमंत्री वी एस अच्युतानंदन की ईमानदारी और सादगी की वाममोर्चे कार्यकर्ताओं पर पूरी पकड़ है। इसके बावजूद उन्हें पिछली बार की ही तरह इस बार भी सीपीएम ने टिकट नहीं दिया। पिछली बार कार्यकर्ताओं के दबाव पर उन्हें ना सिर्फ टिकट दिया गया, बल्कि सीपीएम नेतृत्व को उन्हें मुख्यमंत्री भी बनाना पड़ा। इस बार उनको टिकट तो आखिरकार दबाव में दे दिया गया, लेकिन राज्य सचिव पनिराई विजयन के दबाव में अगर सत्ता मिलती भी है तो अच्युतानंदन को आसानी से मुख्यमंत्री की कुर्सी शायद ही मिले। वैसे देश का सबसे पहला संपूर्ण शिक्षित इस राज्य के ग़रीब परिवारों से आने वाले 54 प्रतिशत लोग बेरोज़गार हैं, जबकि प्रभावशाली परिवारों के मामले में यह आंकड़ा 24.8 प्रतिशत है। राज्य के सकल घरेलू उत्पाद के 41 फीसद हिस्से का उपभोग सिर्फ दस फीसद जनता करती है। अगर खाड़ी देशों में यहां के कामगारों को काम न मिला होता तो शायद कई घरों में चूल्हे भी नहीं जलते। भगवान का अपना देश के तौर पर विख्यात इस राज्य में पर्यटन की अकूत संभावनाओं के बावजूद राज्य सरकारें कुछ कर नहीं पाईं। इसके बावजूद राज्य के ज्यादातर लोगों की पहली पसंद वीएस अच्युतानंदन हैं। लेकिन बेरोजगारी और महंगाई के चलते इस बार माना जा रहा है कि कांग्रेस की वापसी होगी। इस बार कांग्रेस के साथ यहां केरल कांग्रेस और मुस्लिम लीग भी शामिल है। मजे की बात यह है कि उत्तर भारत में बीजेपी की सांप्रदायिक राजनीति का विरोध करने वाली कांग्रेस को केरल में मुस्लिम लीग सांप्रदायिक नजर नहीं आती। लेकिन कांग्रेस के सामने भी मुख्यमंत्री पद की चुनौती भी है। राज्य में कांग्रेस के मुख्यमंत्री पद के दो दावेदार है- राज्य कांग्रेस अध्यक्ष रमेश चेनिथला और पूर्व मुख्यमंत्री ओमान चांडी। पिछली बार ए के एंटनी को हटाने के बाद कुछ महीनों तक चांडी को ही कांग्रेस ने मुख्यमंत्री बनाया था। लेकिन रमेश चेनिथला को उम्मीद है कि चुनाव बाद उनके पक्ष में भाग्य का दांव पलट सकता है।
सबसे दिलचस्प मुकाबला तमिलनाडु में हो रहा है। जहां एक तरफ करूणानिधि की अगुआई वाला डीएमके और कांग्रेस का गठबंधन है तो दूसरी तरफ जयललिता की अगुआई वाला एआईडीएमके है। जयललिता के साथ सीपीआई और सीपीएम भी है। तीसरा मोर्चा तमिल अभिनेता विजयकांतन की पार्टी डीएमडीके का है। पिछली बार उनकी पार्टी ने दस फीसदी वोट पाकर तहलका मचा दिया था। 1999 के लोकसभा चुनावों में राज्य से चार सीटें हासिल करने वाली बीजेपी एक बार फिर यहां अपना अस्तित्व तलाश रही है। हालांकि राज्य बीजेपी के पूर्व अध्यक्ष सी पी राधाकृष्णन चाहते थे कि पार्टी जयललिता के साथ विधानसभा चुनावों में उतरे, लेकिन राज्य प्रभारी वेंकैयानायडू का तर्क था कि राज्य स्तरीय पार्टी से गठबंधन कैसे हो सकता है। हालांकि इस तर्क का आधार समझ में नहीं आया। इस बार राज्य का प्रभावी नाडर समुदाय का एक नेता टूटकर बीजेपी के साथ आने को तैयार था। लेकिन उसे पार्टी ने भाव ही नहीं दिया। बहरहाल यह राज्य ऐसा है, जहां भ्रष्टाचार सबसे बड़ा मुद्दा है। भ्रष्टाचार को लेकर राज्य की जनता भी बंटी हुई नजर आ रही है। हालांकि वोटरों को खरीदने और मंगल सूत्र से लेकर लैपटाप देकर खरीदने की कोशिश हो रही है। चुनाव सर्वेक्षणों की मानें तो इस बार अम्मा की वापसी की संभावना ज्यादा है। पांचवा राज्य पुद्दुचेरी है, यहां की तीस सदस्यीय विधानसभा का चुनाव भी साथ ही हो रहा है। हालांकि उसकी राजनीतिक गूंज खास सुनाई नहीं दे रही है।
यह सच है कि अगर ममता को पश्चिम बंगाल में बहुमत के करीब सीटें मिलीं तो वह कांग्रेस का साथ छोड़ने से देर नहीं लगाएंगी। लेकिन तमिलनाडु में अगर जयललिता का संगठन जीतता है तो केंद्र के साथ डीएमके का साथ बना रहेगा। लेकिन क्योंकि भ्रष्टाचार के दलदल में फंसे करूणानिधि परिवार के लिए सरकार का साथ ही संजीवनी बन सकता है। केरल और पश्चिम बंगाल की हार वाम मोर्चे के लिए सदमा तो होगा, लेकिन उम्मीद की जा सकती है कि संघर्षों के लिए मशहूर इस मोर्चे के नेता महंगाई और भ्रष्टाचार के मसले पर केंद्र की नाक में दम करने से नहीं हिचकेंगे। जिसकी अनूगूंज देर तक सुनाई देगी। केरल में प्रचार करते वक्त भारतीय जनता पार्टी महासचिव अरूण जेटली ने उम्मीद जताई है कि इन विधानसभा चुनावों के नतीजे राजनीतिक स्तर पर कई बदलाव लाएंगे। हो सकता है, बदलाव आएं, लेकिन इसमें बीजेपी का भी योगदान होगा, इसे लेकर संदेह की गुंजाइश बनी हुई है।

Monday, April 11, 2011

समाजवाद की प्रासंगिकता और तीसरी धारा की करवट लेती राजनीति

उमेश चतुर्वेदी
डॉक्टर राममनोहर लोहिया की जन्मशताब्दी बीत गई, स्वतंत्रता के बाद भारतीय मनीषा और राजनीति को झकझोर कर रख देने वाली इस शख्सियत की याद को जनमानस के बीच ताजा करने की कोशिश क्यों करती...लोकसभा की फकत चार साल की सदस्यता में ही इस शख्सियत ने शाश्वत सवालों को उठाकर तत्कालीन सरकारों को सोचने और बचाव की मुद्रा में आने के लिए बाध्य किया, भारतीय संसदीय इतिहास में ऐसी दूसरी नजीर नहीं मिलती। ऐसे में स्वाभाविक ही था कि लोहिया को सरकारी स्तर पर याद किया जाता और उनकी जन्मशताब्दी मनाई जाती। लेकिन ऐसा नहीं हो सका..जबकि इस सरकार और कांग्रेस पार्टी में अब भी लोहियावदी समाजवाद के अब भी कई समर्थक शामिल हैं। उम्मीद तो यह भी थी कि जयप्रकाश और लोहिया के नाम पर तीसरी कतार में खड़े होकर समाजवादी राजनीति करने वाले लोगों के बीच भी कोई हलचल होगी, लेकिन दुर्भाग्यवश ऐसा भी नहीं हुआ। ना सिर्फ समाजवादी, बल्कि मार्क्सवादी धारा के लोग भी मानते हैं कि देश में इन दिनों जैसी परिस्थितियां हैं, उनमें लोहिया की राह पर चलते हुए आंदोलन खड़े किए जा सकते हैं और उनके ही जरिए मौजूदा हालात से निबटा जा सकता है। लोहिया जन्मशताब्दी की पूर्व संध्या पर उनकी रचनाओं के लोकार्पण के मौके पर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के महासचिव एबी वर्धन का कहना कि देश में लोहियावादी तरीके से आंदोलन खड़ा करने की परिस्थितियां मौजूद हैं, लेकिन मौजूदा राजनीतिक तंत्र की साख ही संकट में है, लिहाजा जनता भरोसा करने को तैयार नहीं है।
यह सच है कि घरेलू और अंतरराष्ट्रीय- दोनों ही मोर्चों पर हालात बेहद तकलीफदेह और कशमकश भरे हैं। महंगाई बेलगाम हो गई है, गरीब की जिंदगी को कौन कहे, निम्न मध्यवर्ग की जिंदगी भी बेकाबू महंगाई से बदहाल होती जा रही है। राजनीतिक तंत्र में भ्रष्टाचार संस्थानिक तौर पर जड़ जमा चुका है। राज्यों के मुख्यमंत्रियों से लेकर केंद्रीय मंत्रियों तक पर खुलेआम भ्रष्टाचार के आरोप लग रहे हैं, हसन अली जैसे टैक्स चोर के साथ महाराष्ट्र के तीन-तीन पूर्व मुख्यमंत्रियों के पैसे के लेन-देन की बात सामने आती है, आजाद भारत के इतिहास में दूसरी बार प्रधानमंत्री पर अपनी सरकार बचाने के लिए सांसदों की खरीद-फरोख्त का आरोप लगा है। इन सब मसलों से ऐसा नहीं कि जनता परेशान नहीं है..आम लोगों में रोष नहीं है...लेकिन शहरी इलाकों में आर्थिक उदारीकरण ने जिस तरह जिंदगी के संघर्ष को सामाजिक संघर्षों से भी कहीं ज्यादा बड़ा बना दिया है, इसलिए लोग सब चलता है- कहकर राजनीति और व्यवस्था के साख पर आए संकट को देखने के लिए मजबूर हैं। ऐसे में क्या लोहिया चुप रहते..निश्चित तौर पर वे नए सिरे से आंदोलन खड़ा कर देते, कमजोर लोगों और जनता के हक-हकूक की आवाज उठाना उनका उसूल था, लिहाजा वे अपने इस उसूल से किसी भी कीमत पर समझौते नहीं करते।
भारतीय राजनीति में मुलायम सिंह यादव, लालू प्रसाद यादव, राम विलास पासवान, शरद यादव और नीतीश कुमार जैसी शख्सियतें लोहिया और जयप्रकाश की समाजवादी धारा पर ही राजनीति करने का दावा करती रही हैं। कांग्रेस के मुखर प्रवक्ता मोहन प्रकाश भी लोहियावादी राजनीति के पुरोधा रहे हैं। ऐसे में अगर आम लोगों और मजलूमों की सहूलियत की बात करने वाली मनीषा इन राजनेताओं पर टकटकी लगाकर देखती हैं तो यह वाजिब ही है। लेकिन दुर्भाग्यवश समाजवादी धारा के सहारे राजनीति और सत्ता की सीढ़ियां नापती रही राजनेताओं की इस पहली पंक्ति को लोहिया याद तो हैं, लेकिन उनके उसूल लगातार पीछे छूटते गए हैं। हालांकि लोहिया की जन्मशताब्दी की पूर्व संध्या पर राजधानी दिल्ली में एक मंच पर जब लोहियावाद के समर्थक एक मंच पर जुटे तो एक बार फिर यही सवाल उठा कि क्या लोहिया की याद में लोगों की समस्याओं के लिए मैदान में उतरना और समाजवादियों को एक मंच पर लाना जरूरी नहीं हो गया है। शरद यादव हों या रामविलास पासवान या फिर मुलायम सिंह यादव, तीनों कम से कम एक मुद्दे पर सहमत रहे कि अगर मौजूदा हालात के खिलाफ मजबूत आवाज नहीं उठाई गई तो आने वाले वक्त में देश को और भी कठिन हालात और चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा। जाहिर है कि इस मौके पर एक बार फिर से तीसरे मोर्चे को जिंदा करने और आम लोगों की राजनीति करने की मांग उठाई गई। इसकी राम विलास पासवान और मुलायम सिंह यादव ने जोरदार शब्दों में वकालत की। लेकिन शरद यादव इस सवाल से कन्नी काट गए। दरअसल राजनीति की दुनिया में रामविलास पासवान की हालत किसी से छुपी नहीं है। पहले लोकसभा और बाद में बिहार विधानसभा चुनाव में उनकी पार्टी की जो हालत हुई है, उसमें उन्हें समाजवाद और उनकी एकता की याद आनी स्वाभाविक है। उत्तर प्रदेश में दूसरी बड़ी ताकत रहे मुलायम सिंह को भी अपना जनाधार डोलता नजर आ रहा है, लिहाजा उन्हें भी समाजवादी एकता का शिगूफा पसंद आ रहा है। लेकिन क्या यह इतना आसान है।
डॉक्टर राममनोहर लोहिया पर आरोप लगता रहा है कि उन्होंने समाजवादी आंदोलन को बार-बार तोड़ा। 1963 में जब वे फर्रूखाबाद लोकसभा सीट से उपचुनाव में जीतकर संसद पहुंचे, तब एक प्रमुख अंग्रेजी अखबार ने उनके बारे में लिखा था कि चीनी मिट्टी के बर्तनों में सांड़ घुस आया है। इससे साफ है कि लोहिया को लेकर एक वर्ग की धारणा क्या थी। कुछ इसी अंदाज में 1977 के बाद कई बार समाजवादी पार्टियां टूटीं और बिखरी हैं। उन्होंने अपने नेता लोहिया की इस विरासत को बखूबी संभाले रखा। तीन-तीन बार केंद्र की सत्ता में पहुंचने के बाद समाजवादी धारा के आंदोलन में इतना बिखराव हुआ कि राजनीतिक हलकों में इसे लेकर एक जुमला ही कहा जाने लगा – इस दिल के टुकड़े हजार हुए, कोई यहां गिरा, कोई वहां गिरा। लेकिन ध्यान देने योग्य तथ्य यह है कि लोहिया ने समाजवादी आंदोलन को तोड़ा तो उसके पीछे उनके सिद्धांत और उसूल थे। जबकि बाद के दौर में समाजवादी आंदोलन के बिखरने की वजह समाजवादी नेताओं के अहं का आपसी टकराव और वंश-परिवारवाद का बढ़ावा रही है। लोहिया परिवार और वंशवादी राजनीति के खिलाफ थे, लेकिन उनके मौजूदा अनुआयियों के अंदर यह रोग कूट-कूट भर गया है। यही वजह है कि समाजवादी आंदोलन पर जनता का भरोसा कम होता गया है।
कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के खेमे में बंटी भारतीय राजनीति में लोहिया के बहाने समाजवादी धारा के नेता भले ही आपसी एकता की चर्चा चला रहे हों, या फिर एक होना उनकी मौजूदा राजनीतिक मजबूरी हो, लेकिन सच तो यह है कि परिवारवाद और पैसावाद की परिधि से वे बाहर निकलने को तैयार नहीं है। समाजवादी धारा के नेता जब तक इन बुराइयों से दूर थे, अपने प्रभाव क्षेत्र की अधिसंख्य जनता के हीरो थे। लेकिन जैसे ही उन्होंने उसूलों को तिलांजलि देकर उसी राजनीतिक संस्कृति को अख्तियार करना शुरू किया, जिसके विरोध में उनका पूरा विकास हुआ था, जनता की नजरों से वे उतरते गए। इसके साथ ही समाजवादी धारा की राजनीति की साख पर संकट बढ़ता गया। ऐसे में सवाल उठ सकता है कि उड़ीसा में बीजू जनता दल और हरियाणा में इंडियन नेशनल लोकदल की साख अभी – भी क्यों बची हुई है। सच तो यह है कि उनकी साख अपनी समाजवादी सोच से ज्यादा बीजेपी की अपनी कमियों और खामियों के चलते बची हुई है।
तो क्या यह मान लिया जाय कि लोहिया के विचार और समाजवादी सोच पर आधारित उनकी राजनीति के दिन लद गए...इस सवाल का जवाब देना आसान नहीं है। लेकिन इतना तय है कि जब तक आम आदमी का सही मायने में सशक्तिकरण हो सकेगा, देसी भाषाओं के जरिए लोकतांत्रिक ताकत हासिल नहीं की जा सकेंगी, राजनीति जनता से सीधे ताकत नहीं हासिल करेगी, लोहिया की प्रासंगिकता बनी रहेगी।

Thursday, April 7, 2011

रालेगण सिद्धि के गांधी की आवाज

उमेश चतुर्वेदी
संसद और राष्ट्रपति भवन से महज डेढ़ किलोमीटर की दूरी पर स्थित सरदार पटेल भवन की चारदीवारी से सटा मंच पांच अप्रैल की सुबह से ही गुलजार है। उदारीकरण के बाद की चमक-दमक भरी दुनिया में स्मार्ट पर्सनैलिटी और खूबसूरत चेहरे ही आकर्षण का केंद्र माने जा रहे हैं। इसके बावजूद राजधानी के जंतरमंतर रोड पर ठिगने कद का एक बूढ़ा आदमी हजारों लोगों के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है। पांच अप्रैल की सांझ को यहां अपार जनसमुदाय गांधीजी का प्रिय भजन वैष्णव जन तो तेने कहिए गाने में मगन था, उस भीड़ में दो-तीन युवतियां ऐसी भी थीं, जिनके भर हाथ सजे चूड़े बता रहे थे कि उनकी हाल ही में शादी हुई है। लेकिन ठिगने कद के गांधी टोपीधारी अन्ना हजारे के सादे व्यक्तित्व का चुंबक इन युवतियों को भी जंतरमंतर पर खींच लाया है। देश के तमाम कोनों से जुटे बूढ़े-जवान, औरत-मर्द, पढ़े-लिखे, अनपढ़ हर तरह के लोग इस भीड़ में शामिल हैं। वे अन्ना के साथ हैं। अन्ना की जबान जब खुलती है तो वे धाराप्रवाह मराठी बोलते हैं। हिंदी की कुछ लाइनें मराठी में छौंक का काम करती हैं। लेकिन लोग उन्हें सुनने को ब्याकुल हैं। यह नजारा कम से कम उन भारतीयों के लिए राहत का संदेश लेकर आया है, जिन्हें लगता है कि देश में लूट-खसोट चलती रहेगी, अफसर-नेता और कारपोरेट का गठजोड़ जनता की गाढ़ी कमाई से मलाई काटता रहेगा। लेकिन जन लोकपाल बिल की अन्ना हजारे की मांग ने नजारा बदल कर रख दिया है। सूचना के अधिकार के लिए लड़ने वाले कार्यकर्ता अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया और पूर्व पुलिस अधिकारी किरण बेदी, समाजवादी आर्यसमाजी स्वामी अग्निवेश, गोविंदाचार्य सभी इस महायज्ञ में आहुति देने और भ्रष्टाचार का खात्मा करने की लड़ाई में शामिल हो गए हैं।
भ्रष्टाचार पूरे देश में संस्थानिक हालात को प्राप्त कर चुका है। भ्रष्टाचार की आंच में झुलसता आम नागरिक इसे अपनी नियति मानने को मजबूर हो चुका था। लेकिन अन्ना की एक आवाज ने निराशा के इन स्वरों को बदलकर रख दिया है। दुष्यंत कुमार की गजल की वे पंक्तियां एक बार साकार होती नजर आ रही हैं – कौन कहता है आसमां में सूराख नहीं हो सकता/ एक पत्थर तो तबियत से उछालो यारो। अन्ना हजारे ने पत्थर उछाल दिया है, आसमां में सूराख कितना बड़ा होगा, यह तो तय होना बाकी है। लेकिन इस पत्थर की धमक कितनी है, इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि भारत के प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने अन्ना हजारे से अपना अनशन वापस लेने की मांग की है। लेकिन अन्ना अपनी जिद्द पर अड़े हैं। 2जी स्पेक्ट्रम घोटाला, मुख्य सतर्कता आयुक्त पी जे थॉमस की नियुक्ति और कॉमनवेल्थ खेल घोटाले में चौतरफा घिरी सरकार पर अन्ना की मांग का दबाव कितना है, यह प्रधानमंत्री की अपील से साफ है।
यथास्थितिवाद की ओर लगातार कदम बढ़ाते जा रहे देश को लगता था कि जयप्रकाश आंदोलन सामाजिक बदलाव का आखिरी आंदोलन था। हालांकि हमें यह ध्यान रखना होगा कि जयप्रकाश नारायण के शामिल होने के पहले गुजरात विद्यापीठ के छात्रों ने गुजरात सरकार के खिलाफ आंदोलन छेड़ दिया था। हॉस्टल में बदहाल व्यवस्था को लेकर शुरू हुआ यह आंदोलन पूरे राज्य की बदहाली से जुड़ गया। देखते ही देखते इस आंदोलन में पूरे गुजरात का छात्र समुदाय जुट गया। गुजरात की हवा बिहार तक पहुंची और वहां महंगाई, भ्रष्टाचार और बदहाली से जूझ रहे छात्रों का गुस्सा फूट पड़ा। लेकिन यह आंदोलन पूरी तरह नेतृत्व विहीन था। जयप्रकाश तो छात्र नेताओं की मांग पर आंदोलन की कमान थामने को तैयार हुए। हालांकि अपनी अस्वस्थता के कारण उनका मन तैयार नहीं हो पा रहा था। लेकिन एक बार उन्होंने आंदोलन की कमान क्या थामी, देश में परिवर्तन की नई बयार ही बह चली। इंदिरा गांधी ने आपातकाल लगाकर उस बदलाव को रोकने और बदहाली-भ्रष्टाचार के खिलाफ उठती आवाजों को दबाने की कोशिश तो की, लेकिन जयप्रकाश लहर के सामने वे कारगर नहीं हो पाईं। 1977 में हुए चुनावों में उन्हें बुरी तरह पराजय का दंश झेलना पड़ा। लेकिन इस आंदोलन की नाकामयाबी ही कही जाएगी कि इससे निकले लालू प्रसाद यादव जैसे नेता बदलाव की बयार के प्रतीक की बजाय पुरानी भ्रष्ट व्यवस्था का ही अंग बन गए। बाद के दौर में लालू-मुलायम अपनी जातियों के नेता के तौर पर ज्यादा जाने जाने लगे। 1974 में चंद्रशेखर ने जयप्रकाश को लिखी एक चिट्ठी में अपनी चिंता जाहिर करते हुए लिखा था कि जो लोग आपके आंदोलन में शामिल हो रहे हैं, वे व्यवस्था बदलने नहीं, बल्कि सत्ता बदलने आ रहे हैं और भविष्य में अपनी जातियों के नेता साबित होंगे। जयप्रकाश आंदोलन के बाद अस्तित्व में आई जनता पार्टी की सरकार को देश ने एक सकारात्मक प्रयोग की तरह देखा, लेकिन यह प्रयोग अपने अंतर्विरोधों के ही चलते असमय ही ध्वस्त हो गया और सार्वजनिक हित के लिए शुरू हुआ आंदोलन खत्म हो गया। इस आंदोलन के पैंतीस साल बाद यह कहने में हर्ज नहीं होना चाहिए कि कांग्रेस की सत्ता की राजनीति में नाकामयाब रहे नेताओं ने सत्ता हासिल करने के लिए जयप्रकाश का इस्तेमाल किया था।
आंदोलन तो 1987 में भी विश्वनाथ प्रताप सिंह की अगुआई में हुआ। वीपी भी जेपी बनना चाहते थे। लेकिन उनमें और जेपी में अंतर यह था कि जेपी जहां खुद सत्ता से दूर रहने के लिए मानसिक तौर पर तैयार थे, वहीं वी पी सिंह खुद प्रधानमंत्री बनना चाहते थे और चंद्रशेखर को सत्ता से दूर रखने के लिए उन्होंने देवीलाल के साथ जो राजनीतिक चौपड़ बिछाई, उससे देश एक बार फिर बदलाव हासिल करने से वंचित रह गया। इन अर्थों में अन्ना हजारे का आंदोलन कुछ अलग है। यह जनांदोलन तो बन चुका है। सामाजिक कार्यकर्ता क्रांति प्रकाश 13 साल की उम्र में ही जयप्रकाश आंदोलन में कूद गए थे। उनके मुताबिक जनआंदोलन में पूरी दुनिया में जनता से चंदा मांगने की रवायत है। लेकिन अन्ना के इस आंदोलन में पैसे की मांग नहीं हो रही है। इस आंदोलन के जरूरी खर्च सामाजिक स्वयंसेवी संगठन उठा रहे हैं। ऐसा नहीं कि जेपी की तरह राजनेता अन्ना के साथ नहीं आ रहे हैं। अन्ना के साथ उमड़ती भीड़ का फायदा उठाने में राजनीतिक दल भी शामिल हो रहे हैं। पांच अप्रैल को धरना स्थल पर जनता दल यूनाइटेड के नेता शरद यादव की मौजूदगी कुछ ऐसे ही संकेत देती है। यही कुछ बिदु हैं, जो इस आंदोलन की सफलता के लिए संशय खड़ा करते हैं। क्योंकि इस देश में नेताओं की तरह एनजीओ की भी साख अच्छी नहीं है। लेकिन अन्ना की अपनी साख और अपना इतिहास पाकसाफ है। नि:स्वार्थ भाव और गांधीवादी तरीके से अपने गांव रालेगांव सिद्धि में जिस तरह वे बदलाव लाने में कामयाब रहे हैं, उससे उनके व्यक्तित्व में चार चांद लग गए हैं। महाराष्ट्र की विलासराव देशमुख सरकार के भ्रष्ट मंत्रियों के खिलाफ अहिंसक तरीके से उन्होंने जो आंदोलन चलाया, उसकी याद आज भी देश के जेहन में ताजा है। उसके चलते विलासराव देशमुख सरकार गिरते-गिरते बची थी। तीन मंत्रियों को उन्हें अपने मंत्रिमंडल से हटाना पड़ा था। यही वजह है कि अन्ना के साथ चलने में बदहाल और लालफीताशाही से जूझते आम नागरिक को सुकून मिल रहा है। यह सुकून ही जनता को उम्मीदों की डोर से बांधे हुए है। ऐसे में यह न मानने की कोई वजह नहीं दिखती कि अन्ना का आंदोलन नाकामयाब होगा। देशभर से जुटे लोगों के समर्थन और उत्साह के सहारे भ्रष्टाचार के खात्मे की दिशा में नया इतिहास जरूर बनेगा।