Thursday, September 22, 2011

राजनीतिक संभावनाओं के बीच मोदी का सद्भाभावना मिशन

उमेश चतुर्वेदी
अपने उपवास के आखिरी दिन नरेंद्र मोदी ने यूं तो बहुत कुछ कहा...इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने उन्हें सूक्त वाक्यों की तरह लिया...उन्हीं में से एक बात थी कि उपवास खत्म हो गया लेकिन उनका सद्भावना मिशन जारी रहेगा....नरेंद्र मोदी जैसा नेता ऐसा कह रहा हो तो निश्चित तौर पर उनके मन में इस मिशन के लिए एक खाका होगा..उसकी रणनीति होगी और इसी रणनीति के सहारे वे अपने मिशन और खुद को आगे भी बढ़ाएंगे। लेकिन सवाल यह है कि क्या भारतीय राजनीति के सर्वोच्च पद यानी प्रधानमंत्री की कुर्सी पर वे इसी मिशन के सहारे पहुंच पाएंगे...क्या उनके लिए सद्भावना मिशन की राह इतनी ही आसान होगी...जैसा कम से कम मीडिया के आधुनिक माध्यम दिखा रहे हैं...
कांग्रेस का काम है, मोदी का विरोध करना...एक हद तक नीतीश कुमार जैसे जनता दल नेताओं की राजनीतिक और रणनीतिक मजबूरी नरेंद्र मोदी के विरोध के लिए उन्हें तैयार करती है। लेकिन क्या सचमुच ऐसा है...मोदी के उपवास ने ऐसे कई सवालों को जन्म दिया है...जिन पर विचार किया जाना जरूरी है।
गांधी जी उपवास को आत्मशुद्धि का माध्यम मानते थे। संयोगवश गांधी की जन्मभूमि के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने तीन दिनी उपवास में हर दिन आत्मबल बढ़ाने और सद्भाव बढ़ाने का संदेश देने की कोशिश की। उन्होंने अपने उपवास के शुरू के दिन तो गुजरात दंगों का उल्लेख किया ...दंगा पीड़ितों से अफ़सोस भी जताया....लेकिन उम्मीद जताई जा रही थी कि वे अपने समापन संबोधन में भी दंगा पीड़ितों के लिए कुछ मरहम जरूर लगाएंगे। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। इसलिए उनकी विकास यात्रा के साथ खड़े हुए दंगा पीड़ितों के बड़े वर्ग को भी निराशा जरूर हुई होगी। हालांकि अभी तक मीडिया के बड़े हिस्से में इसे लेकर कोई सवाल नहीं उठा है। दंगा पीड़ितों की मन:स्थिति को लेकर ज्यादा जानकारी भी नहीं आई है। इसलिए सवाल यह उठता है कि क्या सद्भावना मिशन ऐसे ही आगे बढ़ेगा। मोदी ने अपने उपवास के दूसरे दिन एक और गलती की। उससे उनके पारंपरिक मतदाताओं में भले ही बड़ा संदेश गया हो...लेकिन उनके सद्भावना मिशन पर सवाल उठाने के लिए इस घटना को बार-बार उठाया जाएगा। कांग्रेस के हाथ ये एक तुरूप का पत्ता भले ही साबित न हो, लेकिन ये जरिया जरूर बनेगा। दूसरे दिन उन्हें एक शिया धर्मगुरू चादर ओढ़ाने गए। मोदी ने उनकी चादर तो कबूल कर ली, लेकिन उनके हाथ से मुस्लिम टोपी पहनने से इनकार कर दिया। सवाल यह है कि क्या मोदी टोपी पहन लेते तो मुसलमान हो जाते...निश्चित तौर पर नहीं...गुरूद्वारों में जाते वक्त गुरूद्वारे की रूमाल सिर पर बांध लेने या मस्जिद में जाते वक्त सिर पर टोपी धारण कर लेने से कोई सिख या मुसलमान नहीं हो जाता। ऐसा नहीं कि नरेंद्र मोदी को ये पता नहीं होगा। लेकिन उन्होंने टोपी न धारण करके भले ही अपने पारंपरिक मतदाताओं को खुश कर दिया। लेकिन सद्भावना मिशन के एक कदम को कमजोर जरूर किया है। मोदी या भारतीय जनता पार्टी की किसी जिम्मेदार शख्सियत ने खुलेतौर पर अब तक भले ही स्वीकार नहीं किया हो कि मोदी के उपवास का लक्ष्य उनकी स्वीकार्यता समाज के उन कोनों तक पहुंचाना रहा है, जहां अब भी उन्हें सशंकित निगाहों से देखा जाता है। मोदी की इस एक रणनीतिक गलती ने कम से कम उन पर ये निगाहें बनाए रखने का बहाना और मौका तो जरूर दे दिया है।
मोदी के उपवास को लेकर बिहार में भी गठबंधन चला रहे दोनों दलों यानी जनता दल यू और भारतीय जनता पार्टी के बीच रिश्तों की बर्फ जमनी शुरू हो गई है। जैसे ही ये बर्फ बढ़ने लगती है, मीडिया और सियासत के एक वर्ग को गठबंधन पर दरार दिखने लगती है। लेकिन लोग ये भूल जाते हैं कि जनता दल यू का जो इतिहास रहा है, उसमें तो बीजेपी को उसके साथ एक-दम नहीं होना चाहिए या फिर बीजेपी के साथ उसे नहीं होना चाहिए। 1990 की रामरथ यात्रा को बिहार के समस्तीपुर में रोकने का प्रशासनिक श्रेय लालू यादव को ही मिलना था, क्योंकि वे उस वक्त बिहार के मुख्यमंत्री थे। आज वे हर मंच से इसका श्रेय लेते घूमते हैं। लेकिन जानने वाले जानते हैं कि इसकी हकीकत कुछ और ही है। तब लालू यादव के आका दिल्ली में कपड़ा राज्य मंत्री शरद यादव थे। धर्मनिरपेक्षता के उन दिनों दूसरे अलंबरदार के तौर पर उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री मुलायम सिंह हुआ करते थे और उन्होंने ऐलान ही कर रखा था कि बिहार की सीमा से आडवाणी का रामरथ जैसे ही उत्तर प्रदेश की सीमा में देवरिया में घुसेगा, वहीं उन्हें गिरफ्तार कर लिया जाएगा। दूरदर्शन पर राष्ट्र के नाम संबोधन में भी वे इसे जाहिर कर चुके थे। लेकिन तब की जनता दल की अंदरूनी राजनीति में उनसे अदावत रखने वाले शरद यादव, मोहन प्रकाश, रंजन यादव नहीं चाहते थे कि मुलायम सिंह को गिरफ्तारी का श्रेय मिला और एक तरह से लालू यादव पर दबाव बनाकर समस्तीपुर में आडवाणी को गिरफ्तार कराया गया। शरद यादव और उनके ग्रुप को लालू पर भरोसा नहीं था तो तब के लालू के मंत्री जगदानंद सिंह को यह जिम्मेदारी दी गई थी और उन्होंने उसे बखूबी निभाया भी। एक बात और...1991 की लोकसभा में भारतीय जनता पार्टी प्रमुख विपक्षी दल था। तब जनता दल कमजोर होकर तीसरे पायदान पर जा पहुंचा था। तब की लोकसभा की कार्यवाही उठाकर देख लीजिए तो पता चलेगा कि शरद यादव भारतीय जनता पार्टी के लिए कैसे जुमलों का इस्तेमाल करते थे। उनके मुताबिक तब भारतीय जनता पार्टी लोटा बाबा, बाल्टी बाबा की पार्टी थी। लेकिन 1999 आते-आते लोटा बाबा और बाल्टी बाबाओं को कोसने वाली शख्सियत लोटा और बाल्टी बाबा के मंत्रिमंडल में बतौर नागरिक उड्डयनमंत्री शामिल हो जाती है। इस राजनीति पर भी ध्यान दिए जाने की जरूरत है। दो घटनाओं से साफ है कि आडवाणी के खिलाफ एक हद तक सोच रखने वाले शरद यादव को 2009 के चुनावों में प्रधानमंत्री पद के तौर पर उन्हें मंजूर करना पड़ा और उनकी अगुआई में चुनाव मैदान में उतरना पड़ा। क्या 2009 में भारतीय जनता पार्टी की अगुआई वाला एनडीए जीत जाता तो शरद यादव उस मंत्रिमंडल में शामिल नहीं होते। आडवाणी की छवि निश्चित तौर पर वाजपेयी जैसी उदार नहीं है। मोदी उन्हीं के उत्तराधिकारी के तौर पर आगे बढ़ते हुए माने जाते हैं। मोदी पर वाजपेयी से ज्यादा आडवाणी का ही प्रभाव माना जाता है। ऐसे में कल को मोदी की ही अगुआई में भारतीय जनता पार्टी चुनावी मैदान मे उतरती है तो क्या एनडीए के सहयोगी दल भाग खड़े होंगे। अगर यह तर्क चलता है तो उन्हें 2009 में ही भाग जाना चाहिए था। लेकिन वे जमे रहे। तर्क ये दिए जाते हैं कि बीजू जनता दल और तृणमूल कांग्रेस ने मुस्लिम वोटरों की वजह से अलग रास्ता अख्तियार कर लिया। लेकिन सिर्फ यही कारण नहीं रहे। बीजू जनता दल को पता चल गया था कि बिना बीजेपी के ही उसकी नैया पार लग जाएगी। उड़ीसा बीजेपी ने भी तब कम गलतियां नहीं की। फिर बीजेपी ने उड़ीसा में बीजू जनता दल से बात करने के लिए जिन लोगों को भेजा था, उन लोगों ने बातचीत को ठीक से संभाला ही नहीं...अलबत्ता बीजू जनता दल नहीं टूटता। रही बात तृणमूल कांग्रेस की तो उसका स्वभाव ही अतिवादी है…जिस कांग्रेस के साथ उसने चुनाव लड़ा है, उसकी कांग्रेस से ही कहां निभती दिख रही है। आज जयललिता मोदी के साथ खड़ी दिख रही हैं...लेकिन हकीकत यह है कि पिछले आम चुनाव में भी कोशिश की गई होती तो जयललिता के साथ समझौता हो सकता था या कम से कम समझदारी विकसित हो सकती थी। लेकिन तब बीजेपी के दक्षिण राज्यों के प्रभारी वेंकैया नायडू ही नहीं चाहते थे कि जयललिता के साथ समझौता हो। तमिलनाडु के नेता सीपी राधाकृष्णन ने जब ये सुझाव वेंकैया के सामने रखा था तो उनका जवाब था कि बीजेपी जैसी राष्ट्रीय पार्टी किसी क्षेत्रीय पार्टी से समझौता क्यों करे। मानों बीजेपी के समझौते सिर्फ राष्ट्रीय पार्टियों से ही हैं। लब्बोलुआब यह है कि राजनीतिक गठबंधन सिर्फ नेतृत्व की शख्सियत पर ही निर्भर नहीं करते, बल्कि राजनीतिक मजबूरियां भी साथ आने के लिए दबाव बनाती हैं। जनता दल की मजबूरी कांग्रेस के साथ जाने से रोकती है। यही हालत बीजू जनता दल की भी है। इस लिहाज से उसे दूसरे का ही हाथ थामना पड़ता है। तेलगू देशम भी तभी छिटक सकती है, जब तीसरे मोर्चे में दम दिखे। अन्यथा कांग्रेस के साथ उसके लिए भी खड़ा होना उसकी स्थानीय राजनीति पर भारी पड़ सकता है। इसलिए यह कहना कि मोदी के नाम पर कोई आएगा या नहीं आएगा...सिर्फ राजनीतिक अटकलबाजी ही होगी। अभी आम चुनावों में तीन साल की देर है। तब तक गंगा से लेकर कृष्णा-कावेरी और ब्रह्मपुत्र तक में काफी पानी बह चुकेगा। तब राजनीति की धारा क्या करवट लेगी...उस पर मोदी का नेतृत्व निर्भर करेगा। जो लोग अभी से ही मोदी को बतौर प्रधानमंत्री देखने लगे हैं, उन्हें भी नहीं भूलना चाहिए कि वाजपेयी से ज्यादा लोकप्रिय वे नहीं हैं। जब राजनीति ने करवट ली तो उनकी सारी लोकप्रियता धरी की धरी रह गई और 2004 का चुनाव बीजेपी के हाथ से निकल गया। दरअसल राजनीति जितनी संभावनाओं का खेल है, उतनी ही आशंकाओं का...मीडिया इन संभावनाओं और आशंकाओं के बीच झूलती राजनीति पर अपना नजरिया पेश करता रहता है। जबकि राजनेता आशंकाओं के बीच संभावनाओं की टोह लेता रहता है। मोदी भी टोह ले रहे हैं। लेकिन उन्हें सफलता मिल ही जाएगी...या वे असफल ही होंगे...फिलहाल कहना मुश्किल है।

3 comments:

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