Thursday, December 1, 2011

विदेशी कंपनियों को मनमोहन का क्रिसमस तोहफा

विकास के जिस मॉडल के खिलाफ पूंजीवाद के ही उत्स देश अमेरिका में जब आक्युपाई वाल स्ट्रीट यानी वाल स्ट्रीट पर कब्जा करो आंदोलन चल रहा है, ठीक उन्हीं दिनों भारत सरकार ने खुदरा में विदेशी निवेश को मंजूरी देकर देश में नई बहस को जन्म दे दिया है। यह संयोग ही है या सोची समझी तैयारी कि कुछ ही दिनों बाद पश्चिमी दुनिया का सबसे बड़ा त्यौहार क्रिसमस आने वाला है। , फ्रांस की काफरू, जर्मनी की मेट्रो, ब्रिटेन की टेस्को तथा फ्रांस की स्वार्ज जैसी विशाल कंपनियों के लिए मनमोहन सरकार का यह क्रिसमस तोहफा है। अपने अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री को यह तोहफा देने में 14 साल का लंबा वक्त लग गया। यह सच है कि 1997 में पहली बार खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश को मौका देने के विचार की शुरूआत हुई। कहने के लिए कहा जा सकता है कि तब मनमोहन सिंह देश के वित्त मंत्री नहीं थे। लेकिन उस वक्त जो वित्त मंत्री थे, वे पी चिदंबरम यूपीए एक की सरकार के वित्त मंत्री थे और मौजूदा मंत्रिमंडल में वे गृह जैसा महत्वपूर्ण विभाग संभाल रहे हैं। बहरहाल संयुक्त मोर्चा सरकार के वाणिज्य मंत्री ने छह देशों के वाणिज्य मंत्रियों के साथ कैश एंड कैरी की थोक व्यापार में जो बीजारोपण किया था, वह बीज आखिरकार चौदह साल बाद फलीभूत हो ही गया है।
क्रिसमस पर तोहफे देने-दिलाने की परंपरा रही है। तो क्या यह मान लिया जाय कि भारत सरकार ने अमेरिका की बड़ी कंपनी वॉलमार्ट
लेकिन इसे फलीभूत करने में रिटेल सेक्टर की बड़ी कंपनियों की तैयारी और भारत के लगातार बढ़ते विशाल मध्यवर्ग पर उनकी नजर के चलते ही संभव हुआ है। खुद वाणिज्य मंत्रालय मानता है कि देश का खुदरा बाजार 590 अरब डालर यानी 29.5 लाख करोड़ का है। यानी इस बड़े बाजार पर दुनिया की जानी-मानी कंपनियों की नजर है। लेकिन इसकी तैयारी बहुत पहले से ही थी। पिछले साल दुनिया की जानी-मानी सर्वेक्षण कंपनी प्राइसवाटर हाउस कूपर ने 'मजबूत व स्थिर-2011' शीर्षक से खुदरा क्षेत्र को लेकर एक अध्ययन रिपोर्ट जारी की थी। इस रिपोर्ट में प्राइसवाटर हाउसकूपर ने भारत के खुदरा क्षेत्र के बारे में अनुमान लगाया था कि यह 2014 तक बढ़कर नौ सौ अरब डालर तक पहुंच जाएगा। इस रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में अभी खुदरा कारोबार पांच सौ अरब डालर का है। प्राइसवाटर हाउसकूपर ने भारत के खुदरा बाजार में 2014 तक करीब चार फीसदी की सालाना वृद्धि का अनुमान भी लगाया था। इस रिपोर्ट के मुताबिक भारत का खुदरा बाजार एशिया का तीसरे नंबर का बाजार है। पहले नंबर पर 4500 अरब डालर के मूल्य का चीन का खुदरा बाजार है। इसके बाद दूसरे नंबर पर जापान की अर्थव्यवस्था है। भारत सरकार माने चाहे ना माने, लेकिन यह तय है कि आर्थिक मंदी की आहट के बीच रिटेल क्षेत्र की बड़ी कंपनियां भी परेशानी झेल रही हैं। जिन 82 देशों में वाल स्ट्रीट पर कब्जा करो नाम का पूंजीवाद विरोधी आंदोलन चल रहा है, उन देशों में रिटेल कंपनियां भी परेशानी में हैं। ब्रिटेन के हाल के दंगों में लोगों ने सबसे ज्यादा गुस्सा रिटेल स्टोरों पर ही उतारा। ऐसे में रिटेल क्षेत्र की कंपनियां नए बाजारों की भी तलाश में हैं। ऐसे में भारत के बाजार का खुलना उनके लिए राहत दे सकता है।
भारतीय खुदरा क्षेत्र को खोलते वक्त भारत सरकार ने दावा किया है कि इससे एक करोड़ रोजगार का सृजन होगा। इस दावे की मीमांसा के पहले सबसे पहले यह जान लेना जरूरी है कि भारत के खुदरा कारोबार में कितने लोगों को प्रत्यक्ष और परोक्ष रोजगार मिला हुआ है। भारत सरकार ने 2004 में रेहड़ी-पटरी वालों से लेकर बड़े खुदरा व्यापारियों को लेकर जो सर्वे कराया था, उसके मुताबिक, देश के शहरी इलाकों में एक करोड़ बीस लाख खुदरा कारोबारी हैं। छोटे शहरों और कस्बों में करीब साढ़े तीन करोड़ खुदरा कारोबारी हैं। वैसे कंफेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष बीसी भरतिया के मुताबिक देशभर में करीब 10 करोड़ खुदरा व्यापारी हैं। यदि यह भी मान लिया जाए कि हर खुदरा कारोबारी के पीछे चार लोगों का परिवार चलता है, तो करीब 40 करोड़ लोगों की जनसंख्या का गुजारा इससे होता है। हालांकि राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण ने साल 2007-08 में जो आंकड़े जारी किए थे, उसके लिहाज से देश में काम करने वाले लोगों का 7.2 फीसद यानी 16 करोड़ लोगों की जीविका खुदरा क्षेत्र के जरिए ही चल रही है। अब खुद सर्वेक्षण ही मानता है कि करीब 25 करोड़ लोगों का रोजगार मिला हुआ है। अगर कंफेडरेशन ऑफ ऑल इंडिया ट्रेडर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष बी सी भरतिया के मुताबिक अगर देश में दस करोड़ खुदरा कारोबारी हैं और उनके पीछे सिर्फ चार लोगों की रोजी-रोटी चलती है तो इसका मतलब है कि चालीस करोड़ लोगों की रोटी-रोजी खुदरा कारोबार ही चला रहा है। 2011 की जनगणना के मुताबिक भारत की जनसंख्या 120 करोड़ है। इस हिसाब से देखें तो तिहाई लोगों का रोजगार खुदरा कारोबार के जरिए चल रहा है। जाहिर है कि उनके रोजगार पर संकट आना लाजिमी है।
सरकार का दावा है कि खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश के बाद देश में एक करोड़ रोजगार का सृजन होगा। लेकिन एक करोड़ के रोजगार की ये गारंटी शहरी क्षेत्र में काम कर रहे  खुदरा कारोबारियों से भी कम होगा। क्योंकि भारत सरकार का 2004 का आंकड़ा कहता है कि देश के शहरी क्षेत्र में करीब एक करोड़ बीस लाख लोगों को रोजगार खुदरा क्षेत्र में मिला हुआ है। खुदरा क्षेत्र के लिए इन दिनों काम कर रहे सीपीआईएमएल के पूर्व प्रवक्ता रंजीत अभिज्ञान कहते हैं कि इन दिनों शहरी क्षेत्र में खुदरा कारोबारियों की संख्या डेढ़ करोड़ की संख्या पार कर गई है। यानी दस लाख की जनसंख्या वाले जिन शहरों में रिटेल की कंपनियां आएंगी, वहां अगर सरकारी आंकड़ों पर ही भरोसा करें तो एक करोड़ रोजगार पैदा होगा। यानी वह भारत सरकार के अपने आंकड़ों के मुताबिक मौजूदा रोजगार से ही कम होगा। लेकिन यह एक करोड़ रोजगार का दावा भी महज भुलावा है। क्योंकि बड़ी कंपनियों का अब तक का जो बिजनेस मॉडल नजर आया है, उसमें भारतीय कम मानव श्रम में ज्यादा काम और ज्यादा उत्पादकता हासिल करना है। ताकि मुनाफा ज्यादा से ज्यादा कमाया जा सके। मुनाफे के आधार वाली अर्थव्यवस्था में सरकारी दावे पर भरोसा नहीं किया जा सकता।
सरकार का दावा है कि रिटेल क्षेत्र में खुदरा निवेश के बाद जो फुड चेन और कोल्ड स्टोरेज चेन खुलेंगी, उससे देश के तीस फीसदी खाद्यान्न और फल-सब्जियों की बरबादी पर रोक लगेगी। लेकिन किस कीमत पर यह बरबादी रूकेगी, इस पर सरकारी दावा चुप है। सरकार का यह भी दावा है कि रिटेल में बड़ी कंपनियों के आने बाद छोटे कारोबारियों को भी फायदा होगा, क्योंकि प्रतियोगिता में कीमतें कम होंगी। लेकिन वालमार्ट को लेकर खुद अमेरिकी अध्ययन कहते हैं कि जिन इलाकों में वालमार्ट के स्टोर खुले, वहां के पूरे बाजार पर दस साल में वालमार्ट में कब्जा कर लेती है। रिटेल की बड़ी कंपनियों के पास भारी रकम है। लिहाजा भारत में तो उनके लिए पूरे बाजार पर कब्जा करना आसान होगा। अगर ऐसा नहीं होता तो अमेरिका में ओरेगान में उस पर रोक लगाने का फैसला वहां की नगर परिषद क्यों लेती। भगवान रजनीश के लिए मशहूर ओरेगान की नगर परिषद ने इस मसले पर बाकायदा मतदान से फैसला लिया। जाहिर है कि अमेरिका में भी रिटेल की बड़ी कंपनियों का विरोध हो रहा है।
रिटेल में विदेशी निवेश के फैसले पर लगातार जारी विरोध से साफ है कि सरकार के लिए यह फैसला परेशानी का सबब बन गया है। विपक्षी मोर्चे पर उसे जहां विरोध झेलना पड़ रहा है, वहीं चुनावी मैदान में उतरने जा रहे कांग्रेस के प्रत्याशी भी इस फैसले से बेहद परेशान हैं। उत्तर प्रदेश में कांग्रेस का टिकट पा चुके नेताओं को जनता के सामने इसका जवाब देते नहीं बन पा रहा है। दो-तीन प्रत्याशियों ने खुद इन पंक्तियों के लेखक से कहा कि क्या कांग्रेस नेतृत्व जनता में उठ रहे इस उबाल को नहीं भांप पा रहा है। जाहिर है कि सरकार का यह फैसला कांग्रेस के चुनावी प्रदर्शन पर भी असर डाल सकता है। ऐसे में देखना ये है कि सरकार विदेशी कंपनियों को दिए क्रिसमस के तोहफे पर काबिज रहती है या फिर अपनी जनता और अपने कारोबारियों के हित में कोई कदम उठाती है।


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