Sunday, May 6, 2012


शहरी मध्यवर्ग के समर्थन के बिना नक्सली
उमेश चतुर्वेदी
छत्तीसगढ़ में सुकमा के जिलाधिकारी एलेक्स पॉल मेनन के अगवा प्रकरण ने नक्सल प्रभावित इलाकों में सरकारी मशीनरी की लाचारगी की पोल तो खोली ही है, लेकिन एक नई तरह का संकेत भी दिया है। नक्सलियों ने मध्यस्थता के लिए जिन लोगों के नाम सुझाए थे, उनमें से दो अहम शख्सीयतों ने मध्यस्थता का प्रस्ताव ठुकराने में देर नहीं लगाई। सुप्रीम कोर्ट के वकील और अन्ना हजारे की कोर टीम के अहम सदस्य प्रशांत भूषण की ख्याति वामपंथी विचारों के लिए भी रही है। लेकिन उन्होंने इस बार ना सिर्फ मध्यस्थता का प्रस्ताव ठुकरा दिया, बल्कि किसी सिविल अधिकारी को बंधक बनाने की नक्सली रणनीति पर भी सवाल खड़े कर दिए हैं। नक्सलियों ने आदिवासी महासभा के अध्यक्ष मनीष कुंजम का भी नाम मध्यस्थों के लिए सुझाया था। लेकिन उन्होंने भी सिर्फ पॉल मेनन के लिए दवाएं ले जाने का मानवीय रास्ता ही अख्तियार किया। उन्होंने भी मध्यस्थता में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई।

नक्सली भले ही जंगलों से अपनी रणनीति को अंजाम देते रहे हों, भारतीय संविधान को लेकर उनके अंदर प्रतिकार की भावना हो, अपने लक्ष्य को हासिल करने के लिए भारतीय राज सत्ता के प्रतीक पुलिस वालों और सुरक्षा बलों का खून बहाते रहे हों। इस पर सरकारी मशीनरी और आम नागरिक को भले ही एतराज रहा हो, लेकिन वामपंथ के इस अतिवादी प्रतीक और विचार को भारतीय शहरी मध्यवर्ग के एक बड़े हिस्से का समर्थन रहा है। भारत में अतिवादी इस वामपंथी विचारधारा के फैलने में मसलन  असामनता, अधिकारों का हनन और जल-जंगल -जमीन से वहां के मूल निवासियों की बेदखली को गिनाया जाता रहा है। इसे संयोग कहें या नागरिक समाज की नवसंरचना, नक्सलवाद के पनपने के इन कारणों से भारतीय शहरी मध्यवर्ग प्रभावित नहीं रहा है। उसे जंगल और गांव वाले की तुलना में कहीं ज्यादा अधिकार, सुरक्षा और सहूलियतें हासिल रही हैं। आजादी के बाद भारत में जैसा विकास मॉडल अख्तियार किया गया, उसमें गांव लगातार हाशिए पर ही रहे। सहूलियतों का डंका सिर्फ शहरी इलाकों में ही बजा। उदारवाद के दौर में पहले से ही हाशिए पर रहे गांव और हाशिए पर चले गए। सहूलियतें हासिल करने की दौड़ में वे और पिछड़ गए। ऐसे ही हालात ने गांवों में नक्सलवाद को पनपने और उनके असर में लाने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। लेकिन इसके समानांतर यह भी सच रहा है कि नक्सलवाद को वैचारिक समर्थन शहरी मध्यवर्ग और विश्वविद्यालयों से मिलता रहा है। यह समर्थन ही भारतीय नक्सलवाद को वैचारिक आधार और एक हद तक सामाजिक मान्यता मुहैया कराता रहा है। यही वजह है कि जब भी कोई सरकार ग्रीन हंट जैसा कार्यक्रम चलाने का ऐलान करती रही है, इलाहाबाद और पटना से लगायत दिल्ली के जंतर-मंतर तक विरोध प्रदर्शनों की झड़ी लग जाती है। इन शहरों के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय जैसे विश्वविद्यालय कैंपसों में तो नक्सलवाद के खिलाफ राजसत्ता की खूनी और कठोर कार्रवाइयों को लेकर सवाल उठने लगते हैं। भारतीय लोकतांत्रिक धारा का प्रतिकार करने वाली नक्सलवादी ताकतों का वैचारिक आधार चीन के क्रांतिकारी नेता माओत्से तुंग के विचार हैं। माओ ने कहा था कि सत्ता बंदूक की नली से निकलती है। माओ के इस विचार ने एक तरह से लोकतांत्रिक प्रक्रिया की सीमाएं तय कर दी थीं। यह कितना बड़ा विरोधाभास है कि भारतीय नक्सली भी माओ से वैचारिक प्राणवायु हासिल करते हैं, उसी वैचारिक खाद-पानी से सहारे भारतीय लोकतांत्रिक प्रक्रिया और राजसत्ता को अपने तरीकों से नकारते हैं। लेकिन जब उन्हें समर्थन का खाद पानी चाहिए होता है तो उसे भारत का वह शहरी समाज मुहैया कराता है, जिसे भारतीय लोकतांत्रिक प्रक्रिया कुछ किंतु और परंतु के साथ स्वीकार्य हैं।
2010 की गर्मियों में घात लगाकर जब नक्सलियों ने बस्तर के जंगलों में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल के 76 जवानों को मार गिराया था, तब उनके खिलाफ सैनिक कार्रवाई की मांग उठी थी। नागरिक समाज के एक बड़े तबके के साथ ही राजनीति और प्रशासन के एक वर्ग ने नक्सलियों के खिलाफ सैनिक कार्रवाई की पुरजोर वकालत की थी। लेकिन तब सेना ने ही ऐसी कार्रवाई के औचित्य पर सवाल उठाए थे। इस सवाल का मतलब यह नहीं था कि सेना नक्सलियों के गोला-बारूद से डर गई थी या उनकी रणनीति उसे भयाक्रांत कर रही थी। दरअसल तब सेना को यह डर था कि उसका जो इकबाल भारतीय समाज के बीच है, उस पर सवाल उठने शुरू हो जाएंगे। सेना की आशंका की वजह भी नक्सलवाद के शहरी मध्यवर्ग के समर्थक ही थे। दिलचस्प यह है कि तब नक्सलियों के एक वर्ग ने अति उत्साह में यह चेतावनी भी दे दी थी कि अगर उनकी मांगें नहीं मानी गईं तो उनकी कार्रवाई की जद में शहरी इलाके भी होंगे। तब उन्हें वैचारिक आधार मुहैया कराने वाले रणनीतिकारों ने नक्सलियों को चेताया भी था कि अगर वे शहरी समाज में कार्रवाई शुरू करेंगे तो उनके खात्मे की घड़ी नजदीक होगी। उन्हें वैचारिक आधार मुहैया कराने वाले लोगों को पता है कि नक्सलियों के खिलाफ उठीं सेना की बंदूकें या सुरक्षा बलों की रायफलें कई बार अगर नीचे हो जाती हैं या जवानों की उंगलियां ट्रिगर से हट जाती हैं तो इसलिए नहीं कि नक्सली उनकी तुलना में ज्यादा ताकतवर हैं, बल्कि नक्सलवाद समर्थक नागरिक समाज का एक बड़ा तबका उन्हें ऐसा करने के लिए मजबूर कर देता है।
नक्सलवादी भी अब आरोपों के घेरे में है। नक्सली इलाकों में रहने वाले लोग जैसे ही अपने इलाकों से बाहर आकर किसी महफूज शहरी इलाके में पहुंचते हैं तो उनके दर्द का बांध फूट पड़ता है। सेक्स और पैसे से जुड़े आरोपों को महज नक्सलवाद विरोधी आरोप कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। लेकिन ये चर्चाएं अब उस शहरी समाज के मन में  भी संदेह की गुंजाइश बढ़ा रही है, जिसने मौके-बेमौके नक्सलियों को समर्थन की ताकत दी है। बहरहाल यह शक ही है कि अब नक्सलियों को लेकर शहरी मध्यवर्ग के एक बड़े तबके का समर्थन कमजोर हो रहा है। प्रशांत भूषण और मनीष कुंजम का नकार भी इसका ही प्रतीक है। देर-सवेर नक्सलवाद को मिलता रहा यह शहरी समर्थन और छिजेगा। इसकी भी वजह है। दरअसल शहरी मध्यवर्ग को अपनी महफूज सीमा और वर्ग में ही आंदोलन माकूल लगते रहे हैं। लेकिन अपने ही बीच के किसी व्यक्ति को प्रताड़ित होना उसके अवचेतन को गहरे तक चोट पहुंचाता है। तब उसका मध्यवर्ग बोध जाग उठता है। सुकमा के कलेक्टर एलेक्स पॉल मेनन भले ही इस वक्त अपनी नौकरी की वजह से राजसत्ता के प्रतिनिधि हों, लेकिन अव्वल तो वे भी शहरी मध्यवर्ग का ही हिस्सा हैं। जाहिर है कि उनके अपहरण ने शहरी मध्यवर्ग को झटका लगा है। अब तक नक्सली कार्रवाई में मारे जाते रहे सुरक्षा बलों के जवानों में से ज्यादातर हाशिए पर रह रहे ग्रामीण समाज के एक बड़े तबके से रहा है। जिससे जनमत बनाने वाले शहरी मध्यवर्ग की खास सहानुभूति नहीं रही है। इसलिए उनका मारा जाना शहरी मध्यवर्ग को नहीं हिलाता रहा है। लेकिन पॉल मेनन जैसे लोगों को बंधक बनाना शहरी मध्यवर्ग पर ही चोट पहुंचा रहा है।
नक्सली समस्या से जूझने के लिए तमाम तरह के प्रशासनिक फैसले होते रहेंगे। लेकिन भारतीय समाज पर नजर रखने वाले लोगों को नक्सलवादी गतिविधियों को लेकर शहरी मध्यवर्ग का यह बदलाव चौंकाऊं नजर आ सकता है। ऐसे में सवाल यह है कि क्या नक्सल प्रभावित इलाकों की सरकारें शहरी मध्यवर्ग में आ रहे इस बदलाव को भांप पा रही हैं

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