Wednesday, July 4, 2012


भारत की कूटनीतिक कामयाबी या विफलता !
उमेश चतुर्वेदी
(यह लेख दैनिक ट्रिब्यून में छप चुका है)
पाकिस्तान की कोटलखपत जेल की काली कोठरी में तीस साल काटने के बाद रिहा होने के बाद सुरजीत ने जो बयान दिया है, उसने भारत को रक्षात्मक रूख अख्तियार करने के लिए मजबूर कर सकता है। सुरजीत को लेकर अब तक यही कहा जाता रहा है कि 1982 में उन्होंने गलती से सीमा पार कर ली और भारत-पाकिस्तान के बीच जारी कूटनीतिक और सैनिक विश्वासहीनता और खींचतान के शिकार बन गए। भारत की तरफ से सुरजीत को लेकर किए गए इन दावों में उनके निर्दोष होने की ही दुहाई दी जाती रही है। लेकिन बाघा सीमा को पार करते ही उन्होंने जो बयान दिया है, उससे भारतीय कूटनीति पर सवाल उठने लगे हैं। सुरजीत के बयान ने भारत के सारे दावों पर पानी फेर दिया है। सुरजीत ने कहा है कि वे भारतीय खुफिया एजेंसी रिसर्च एंड एनालिसिस विंग यानी रॉ के लिए जासूसी कर रहे थे और जब पकड़ लिए गए तो उन्हें सबने छोड़ दिया।

अभी यह विवाद ही है कि पाकिस्तानी राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने सरबजीत को रिहा करने वाले आदेश पर हस्ताक्षर किए या नहीं। खबरें तो पहले सरबजीत की रिहाई की ही आईं, लेकिन देर रात को इसे बदलकर सुरजीत की रिहाई बता दिया गया। अगर सरबजीत की रिहाई का आदेश हुआ और फिर उनकी रिहाई नहीं हुई तो इसमें भारतीय राजनय का कोई दोष नहीं माना जा सकता। क्योंकि पाकिस्तानी राजनय और अधिकारी अपनी मनमानी के लिए विख्यात रहे हैं। लेकिन भारतीय कूटनीति सुरजीत की रिहाई के बाद क्यों विफल हो गई। आमतौर पर ऐसी रिहाई के वक्त संबंधित देश की कूटनीतिक बिरादरी के लोग भी होते हैं। पाकिस्तान का भारतीय उच्चायोग सुरजीत के स्वागत से कैसे चूक गया। उसने सुरजीत के साथ वैसा अपनापा भरा व्यवहार क्यों नहीं किया, जिसकी ऐसे मौकों पर जरूरत होती है। इन सवालों के जवाब खोजे जाने जरूरी हैं। आमतौर पर ऐसे कैदियों की रिहाई के वक्त कैदी के देश का कूटनीतिक मिशन सक्रिय होता है और उस कैदी का स्वागत करके स्वदेश वापसी तक का इंतजाम करता है। खुली दुनिया में सांस ले रहे कैदी की इस दौरान खैरमकदम के साथ ही क्या बयान देना है और क्या नहीं बोलना है, इसके लिए उसे समझाया भी जाता है। लेकिन सुरजीत के मामले मे ऐसा कुछ नजर नहीं आया। तो क्या यह मान लिया जाय कि पाकिस्तान स्थित भारतीय मिशन और उसके अधिकारियों के साथ ही भारत स्थित विदेश मंत्रालय के अफसर भी सरबजीत की रिहाई ना हो पाने के गम और अबू हमजा उर्फ अबू जिंदाल की गिरफ्तारी के जश्न के बीच भूल गए कि सुरजीत को लेकर भी उनकी कोई जिम्मेदारी बनती है। अगर ऐसा हुआ होता तो कम से कम अपनी रिहाई के फौरन बाद सुरजीत ये नहीं कहते कि वे रॉ के एजेंट थे और उन्हें जब गिरफ्तार कर लिया गया तो उनकी तरफ से लोगों ने आंख फेर ली।
पड़ोसी और अपने दोस्त और दुश्मन देशों की जासूसी की परंपरा शायद तब से ही है, जब से राज्य की अवधारणा ने जन्म लिया है। लेकिन उतना ही सच यह भी है कि कभी-भी कोई देश यह स्वीकार नहीं करता कि वह किसी देश में जासूसी करता है। याद कीजिए पिछले साल अमेरिका में हुई रूसी सुंदरियों की गिरफ्तारी और उनकी रिहाई की घटनाओं को। तब रूस ने भी यह स्वीकार नहीं किया कि वह अमेरिका में उन सुंदरियों के जरिए जासूसी करा रहा था। वे सुंदरियां इन दिनों रूस में कहीं जिंदगी बिता रही हैं। लेकिन उन्होंने कम से कम अपनी रिहाई के फौरन बाद यह स्वीकार भी नहीं किया कि वे अमेरिका में खुफिया मिशन को अंजाम दे रही थीं। इस प्रसंग में देखें तो सुरजीत की रिहाई के वक्त जो हुआ, वह उलट ही है। निश्चित तौर पर सुरजीत से अभी कुछ दिनों तक और इंटरव्यू होंगे, कोई प्रकाशक जाकर उनके जेल जीवन के अनुभवों को लिपिबद्ध कराकर अपनी तिजोरी में कुछ और इजाफा करने की कोशिश भी करेगा। इस पूरी प्रक्रिया के बीच सुरजीत के जासूसी के कुछ सुने और ज्यादातर अनसुने किस्से और कारनामे भी आएंगे। लेकिन यह बाद की बात होगी। लेकिन भारत और पाकिस्तान का अपना जो रिश्ता है, उसमें फौरी तौर पर आए इस बयान ने निश्चित तौर पर भारत को नुकसान ही पहुंचाया है। अब पाकिस्तान यह प्रचारित करने में कोई कसर नहीं रखेगा कि भारत उसके इलाकों में जासूसी कराता है। भारत पर वह वैसे ही तमाम तरह के दोष मढ़ता रहा है, अब सुरजीत के इस बयान ने उसे एक और मौका मुहैया करा दिया है।
अबू हमजा या अबू जिंदाल की गिरफ्तारी के बाद से अपने कूटनीतिक मिशन को बेहद कामयाब मान रहे हैं। इस गिरफ्तारी पर गृह मंत्री पी चिदंबरम, विदेश मंत्री एसएम कृष्णा और गृह सचिव राजकुमार सिंह तक बयान दे चुके हैं। लेकिन अब अधिकारी ही मानने लगे हैं कि गिरफ्तार शख्स अबू हमजा नहीं है, जिसका नाम मुंबई पर 26/11 के हमले की चार्जशीट में दायर है। गिरफ्तार किए गए शख्स का नाम अबू जिंदाल है। ऐसे में अब भारतीय एजेंसियों पर दबाव बढ़ गया है कि वह पहले उसे उसी  अबू हमजा के तौर पर साबित करें, जो हमले के वक्त पाकिस्तानी जमीन से कसाब जैसे आतंकवादियों को निर्देश दे रहा था। या फिर चार्जशीट में नया नाम जोड़ें। बहरहाल इस गिरफ्तारी के बाद आए नामों में पेच ने भी भारतीय कूटनीतिक मिशन की कामयाबी पर सवाल खड़े किए हैं। यह सच है कि गिरफ्तार शख्स भी पाकिस्तान की धरती से ही आतंकवाद की दुनिया में कूदा और अपने आकाओं को खुश करने के लिए आतंकी साजिशों में शामिल रहा। लेकिन उसे अबू हमजा साबित करने के लिए उसकी आवाज की मिलान करनी होगी और तभी पाकिस्तान पर दबाव बढ़ाया जा सकेगा। लेकिन सवाल यह है कि बिना पक्की खबर और पुष्टि के अधिकारियों और मंत्रियों तक ने ये कैसे कह दिया कि अबू हमजा को गिरफ्तार कर लिया गया है। इससे भी पाकिस्तान पर दबाव बढ़ाने की रणनीति कमजोर हो सकती है। क्योंकि पाकिस्तान यह तर्क दे सकता है कि गिरफ्तार आतंकवादी अबू हमजा नहीं, बल्कि अबू जिंदाल है। हो सकता है, दोनों ही नाम एक ही शख्स के हों। लेकिन सवाल यह है कि जब तक यह साबित नहीं कर लिया गया, उसका खुलासा क्यों किया गया। पाकिस्तान वैसे भी मुकरने और इनकार का आदी रहा है। सामान्य कूटनीतिक शिष्टाचार की कमी भी उसकी तरफ से बार-बार महसूस की गई है। ऐसे में भारतीय कूटनीति को ज्यादा सावधानी से काम लेना चाहिए था। पाकिस्तान की ही कोटलखपत जेल में 22 सालों से बंद सरबजीत की रिहाई के लिए उनकी बहन और बेटियों ने कोशिशें तेज कर दी हैं। इस बीच खबर यह भी रही है कि पाकिस्तान अपनी आजादी के दिन यानी 14 अगस्त को सद्भावना मिशन के तहत सरबजीत की रिहाई कर सकता है। लेकिन सुरजीत के बयान से पाकिस्तानी हुक्मरानों के मन में एक फांस तो फंस ही सकता है। ऐसे में अगर 14 अगस्त को भी पाकिस्तान इसी बहाने से सरबजीत की रिहाई से मुकर जाए तो हमें हैरत नहीं होनी चाहिए। हालांकि हम उम्मीद कर सकते हैं कि आतंकवाद के पीछे पाकिस्तान के हाथ होने की बात तकरीबन पूरी दुनिया मानने लगी है। एक दौर तक उसके हर तरह के आका और सरपरस्त रहे अमेरिका की विदेश मंत्री हिलेरी क्लिंटन भी कहने लगी हैं कि पाकिस्तान ने आतंकवाद रूपी जो सांप दूसरों के लिए पाले थे, वे अब उसे ही डंसने लगे हैं। क्लिंटन के इस एक बयान ने पाकिस्तान का असल चेहरा पूरी दुनिया के सामने ला दिया है। लेकिन हमें यह भी नहीं भूलना चाहिए कि पाकिस्तान अमेरिका के सामने रणनीतिक और आर्थिक मजबूरियों के चलते झुक जाएगा, लेकिन भारत ग्रंथि उसे भारत के सामने झुकने के लिए मजबूर नहीं कर सकती। ऐसे में रणनीतिक कूटनीति की सधी चालें ही कामयाब हो सकती हैं। इसे भारतीय अधिकारियों को हर हाल में समझना ही होगा। 

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