Monday, August 27, 2012

ये टिप्पणी कहीं के लिखी गई थी..अब ब्लॉग पर साया की जा रही हैं


मतभेदों की भेंट ना चढ़ें लक्ष्य
उमेश चतुर्वेदी
बीजेपी अध्यक्ष नितिन गडकरी के घेराव के मसले पर टीम अन्ना में मतभेद कोई पहली खबर नहीं है। इसके पहले भी कई मसलों पर टीम के बीच मतभेद रहे हैं। दरअसल टीम अन्ना उस तरह के वैचारिक निष्ठा के तौर पर बनी या विकसित नहीं हुई है, जैसे कोई राजनीतिक या सामाजिक संगठन खड़ा होता है। जिसे टीम अन्ना आजकल कहा जा रहा है, दरअसल वह ऐसे लोगों का समूह है, जो देश से भ्रष्टाचार का समूल नाश चाहते हैं। इसमें शामिल प्रमुख लोगों की अपनी अलग-अलग पृष्ठभूमि और सामाजिक-राजनीतिक विचारधाराएं हैं। कोई अतिवामपंथी पृष्ठभूमि का है तो किसी का वैचारिक विकास राष्ट्रवाद के तहत हुआ है।
कोई विशुद्ध समाजवादी दर्शन में भरोसा रखता है तो कोई मध्यमार्गी है। कोई अध्यापक रहा है तो कोई आंदोलनकारी, कोई वकील है तो कोई अधिकारी रहा है। जाहिर है कि सबके अपने-अपने आग्रह और इतिहास रहे हैं। इसलिए इनके बीच वैचारिक विरोध ना हो, ऐसी उम्मीद पालना गलत ही होगा। वैचारिक दुविधाएं उन राजनीतिक दलों में भी कम नहीं हैं, जो अंदरूनी स्तर पर खुद को पाकसाफ और एकता के प्रतिरूप बताते नहीं थकते। दरअसल लोकतांत्रिक समाज और विचारधारा की बुनियाद ही वैचारिक बहुलता होती है। इसके बावजूद अगर टीम अन्ना के आपसी मतभेदों को चर्चा और तवज्जो मिलती है तो इसकी दो वजहें हैं। दरअसल टीम के आंदोलन से सत्ता प्रतिष्ठान और उसे चलाने वाले बुनियादी तत्वों की नींद उड़ गई है। उन्हें लगता है कि अगर टीम अन्ना का आंदोलन कामयाब रहा तो अब तक सत्ता तंत्र के जरिए वे मलाई काटते रहे हैं, उसकी संभावना खत्म हो जाएगी। लिहाजा ऐसे तत्व इन मतभेदों को हवा देने और इस बहाने भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन की नींव को ही कमजोर करना चाहते हैं। दूसरी वजह यह है कि भारतीय धरती पर जन्म लेते ही भ्रष्टाचार का सामना कर रही जनता को इस आंदोलन से बड़ी उम्मीदें है। वह चाहती है कि आंदोलन कामयाब हो ताकि पीढ़ियों से चल रहा यह राक्षस खत्म हो। ऐसी उम्मीद लगाए बैठी जनता को लगता है कि अगर टीम के कर्णधारों के बीच ही वैचारिक मतभेद होंगे तो सत्ता प्रतिष्ठान को इस आंदोलन को कमजोर करने में मदद मिलेगी और आखिरकार वे कामयाब रहेंगे। मतभेद होना कोई नई बात नहीं है, लेकिन मतभेदों की कीमत भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन को चुकानी पड़े, सिर्फ टीम अन्ना ही नहीं, ऐसे हर आंदोलनकारी ताकतों से ऐसी उम्मीद की जाती है। दुर्भाग्यवश जनता के आकांक्षाओं के रथ पर सवार टीम अन्ना इसका खयाल नहीं रख रही है। अव्वल तो होना यह चाहिए था कि घेराव और राजनीतिक दल बनाने जैसे कदम उठाने से पहले टीम अंदरखाने में पूरा विचार-विमर्श करती और अगर कोई फैसला ले लिया जाता तो उस पर पूरे दमखम के साथ एक होकर अमल करती। लेकिन लगता नहीं कि ऐसा हो रहा है।

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