Sunday, September 30, 2012

उमा बनाम ममता



उमेश चतुर्वेदी
डीजल और रसोई गैस की कीमतों में बढ़ोत्तरी और खुदरा में विदेशी निवेश के खिलाफ ममता बनर्जी की मोर्चे बंदी ने उन्हें कम से कम विपक्ष की राजनीति करने वालों का नायक जरूर बना दिया है। लेकिन विपक्ष में एक ऐसी भी शख्सीयत है, जिसे आम आदमी के साथ खड़ी नजर आ रहीं ममता बनर्जी से नाराज है। भारतीय जनता पार्टी की नेता उमा भारती की गंगा समग्र यात्रा में ममता बनर्जी की सरकार ने सहयोग देने से इनकार कर दिया है। इसे लेकर दोनों के बीच टकराव बढ़ गया है। गंगा बचाने को लेकर उमा भारती ने 21 सितंबर से गंगोत्री से गंगा समग्र यात्रा शुरू कर दी है।

Tuesday, September 25, 2012

किस समाज की बात करता है जेएनयू



उमेश चतुर्वेदी
सभ्य समाज में खासकर उच्च शिक्षा के संस्थानों में ऐसे मूल्यों की उम्मीद की जाती है, जो अपने समाज को नई रोशनी दिखाते हुए बंद समाज के लिए प्रगति की राह खोल सके। ऐसा तभी हो सकता है, जब शैक्षिक संस्थान समाज सापेक्ष विचार रखे। लेकिन क्या दिल्ली के सर्वाधिक सुविधा और स्वायत्तता संपन्न जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय इन कसौटियों पर कसा  जा सकता है। निश्चित तौर पर इसका जवाब ना में ही दिया जा सकता है। प्रगतिशीलता की एक निशानी समाज सापेक्ष विचारों को बढ़ावा देने के साथ ही असहिष्णुता की भावना को भी बढ़ावा देने वाली होनी चाहिए। लेकिन जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय का छात्र समुदाय इसके ठीक उलट व्यवहार करता नजर आता है।(दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में प्रकाशित...)

Tuesday, September 18, 2012

चिंता से परे है हिंदी का मामला
राजकिशोर
हिंदी का रुतबा घट रहा है क्योंकि जो दुनिया को समझने और अपने को व्यक्त करने के लिए हिंदी बोलते या लिखते हैं, उनका रुतबा कम हो रहा है। पचास साल बाद हिंदी सिर्फ आर्थिक दृष्टि से अविकसित लोगों की भाषा रह जाएगी। वे कौन होंगे जो अविकसित रह जाएंगे? वही, जिनकी कीमत पर व्यवस्था एक छोटे-से वर्ग का श्रृंगार करती आई है
कुछ हैं, जो खुश हैं कि हिंदी आगे बढ़ रही है। हिंदी के अखबार बढ़ रहे हैं। कई ऐसे शहर हैं, जहां से हिंदी के चार-पांच अखबार निकलते हैं और वे सभी कमोबेश बिक जाते हैं।

Monday, September 10, 2012

राजनीति का खेल और पदोन्नति में आरक्षण

उमेश चतुर्वेदी

अपने समाज को लोकतांत्रिक बताते नहीं अघाते...लेकिन हकीकत तो यह है कि अब भी सिर्फ अपनी राजनीतिक व्यवस्था ही लोकतांत्रिक ढांचे को अख्तियार कर पाई है। कुछ मसलों में अब भी वह लोकतांत्रिक धारा को अपनाने की प्रक्रिया में भी है। लेकिन अपना समाज और समाज में विमर्श की आधारभूमि अब भी लोकतांत्रिक नहीं हो पाई है। इसलिए कई बार आरक्षण जैसे मसले को लेकर जो विमर्श है, उसमें लोकतांत्रिक उदारता गायब है। इसलिए यहां जब भी कोई आरक्षण के मौजूदा ढांचे और उससे होने वाले फायदे-नुकसान पर सवाल उठाता है, वैसे ही उसे प्रतिगामी या रूढ़िवादी ठहरा दिया जाता है। यही वजह है कि ऐसे मसलों पर आमतौर पर वैसी खुली वैचारिकता नहीं दिख पाती, जिसकी उम्मीद की जाती है।

Friday, September 7, 2012

सिर्फ इतराने का ही मौका नहीं दे रही है क्रिसिल की रिपोर्ट



उमेश चतुर्वेदी
उदारीकरण के दौर में बदहाली और अनदेखी के प्रतीक रहे भारतीय गांव अचानक ही महत्वपूर्ण होते नजर आ रहे हैं। आर्थिक मामलों की शोध और पड़ताल करके साख तय करने वाली संस्था क्रिसिल की रिपोर्ट के चलते गांवों को लेकर आर्थिक उदारीकरण के पैरोकारों का नजरिया बदलता दिख रहा है। क्रिसिल की रिपोर्ट के मुताबिक उपभोग और खर्च के मामले में भारतीय गांवों ने भारतीय शहरों को पछाड़ दिया है। इस रिपोर्ट के मुताबिक गांवों का खर्च शहरों की तुलना में करीब 19 फीसदी ज्यादा हो गया है। उपभोग और आर्थिक गतिविधियों के केंद्र रहे

Wednesday, September 5, 2012