Friday, September 7, 2012

सिर्फ इतराने का ही मौका नहीं दे रही है क्रिसिल की रिपोर्ट



उमेश चतुर्वेदी
उदारीकरण के दौर में बदहाली और अनदेखी के प्रतीक रहे भारतीय गांव अचानक ही महत्वपूर्ण होते नजर आ रहे हैं। आर्थिक मामलों की शोध और पड़ताल करके साख तय करने वाली संस्था क्रिसिल की रिपोर्ट के चलते गांवों को लेकर आर्थिक उदारीकरण के पैरोकारों का नजरिया बदलता दिख रहा है। क्रिसिल की रिपोर्ट के मुताबिक उपभोग और खर्च के मामले में भारतीय गांवों ने भारतीय शहरों को पछाड़ दिया है। इस रिपोर्ट के मुताबिक गांवों का खर्च शहरों की तुलना में करीब 19 फीसदी ज्यादा हो गया है। उपभोग और आर्थिक गतिविधियों के केंद्र रहे
भारतीय शहर अगर बदहाल समझे जाने वाले गांवों की तुलना में पिछड़ जाएं तो इस पर हैरत तो होगी ही। फिर वैश्वीकरण और उदारीकरण के जरिए बेहतर आर्थिक और सामाजिक भविष्य का ताना-बाना बुनने वाले लोगों को उम्मीदें दिखाने का बहाना मिलेगा ही और ऐसा हो भी रहा है। सदियों से बचत और मितव्ययिता की संस्कृति में जीते-आगे बढ़ते रहे भारतीय गांव अगर शहरों की बनिस्बत ज्यादा खर्च करेंगे तो उपभोग आधारित अर्थव्यवस्था को खुशियां होंगी हीं। लेकिन क्या सचमुच खुशियां मनाने का वक्त आ गया है, इस सवाल पर पड़ताल करने का मौका आ गया है। यह परखना भी जरूरी हो गया है कि क्या गांव सचमुच शहरों को पीछे छोड़ गए हैं और आर्थिक मानचित्र पर वे नई कहानी लिखने को तैयार हैं।
इन सवालों पर चर्चा करने से पहले क्रिसिल के आंकड़ों पर नजर डालते हैं। क्रिसिल की रिपोर्ट के  मुताबिक वित्त वर्ष 2010 से लेकर वित्त वर्ष 2012 में गांवों में 3,75,000 हजार करोड़ रुपये की खपत हुई है। वहीं इस दौरान शहरों में 2,9,000 करोड़ रुपये की खपत हुई है। यानी कुल खर्च के मामले में गांवों ने शहरों को पीछे छोड़ दिया है। क्रिसिल का मानना है कि चूंकि अब भारतीय गांवों की आर्थिक धुरी सिर्फ खेती-किसानी ही नहीं रही है। वहां भी कंस्ट्रक्शन गतिविधियां बढ़ी हैं। शहरों से नजदीक स्थित गांवों के लोग सर्विस सेक्टर में खप रहे हैं। फिर सेज, औद्योगीकरण और उदारीकरण की नई गतिविधियों के चलते गांव वालों को मुआवजे मिले हैं और इसके चलते गांवों के लोगों की आर्थिक गतिविधियां बढ़ी हैं। तमाम भ्रष्टाचार के बावजूद मनरेगा योजना का भी गांवों की आर्थिक गतिविधियां बढ़ाने में खासा योगदान है। चूंकि पैसा गांव वालों के भी पास आ रहा है, लिहाजा वहां भी उपभोग बढ़ा है, चूंकि उपभोग बढ़ा है इसका मतलब साफ है कि खर्च भी बढ़ा है। आज गांव वाला कभी शौक से तो कभी मजबूरीवश शहर जा रहा है और अपनी कमाई का एक हिस्सा अपने गांव भेज रहा है। बहरहाल बेशक कुल खर्च को लेकर गांवों और शहरों की तुलना शायद पहली बार की गई है। लेकिन उपभोक्ता वस्तुओं की खपत के मामले में गांवों ने पहले ही पीछे छोड़ दिया था। नब्बे के दशक के आखिरी दिनों में एक बड़े आर्थिक अखबार ने एफएमसीजी बाजार का अध्ययन किया था। इसके मुताबिक सौंदर्य प्रसाधनों, टूथ पेस्ट, मंजन, ब्रश, साबुन, वाशिंग पाउडर, शैंपू आदि के खपत के मामलों में गांवों ने शहरों को पीछे छोड़ दिया था। इस सर्वे के मुताबिक एफएमसीजी बाजार का 56 फीसदी हिस्सा सिर्फ गांवों में ही इस्तेमाल हो रहा था। यानी अगर समेकित रूप से देखें तो गांव पहले भी शहरों की तुलना में ज्यादा खर्च कर रहे थे। लेकिन प्रति व्यक्ति खर्च के आधार पर क्रिसिल के ही आंकड़ों की तुलना करें तो गांवों की हकीकत सामने आ जाती है।
2011 की जनगणना के मुताबिक शहरीकरण की तमाम कोशिशों के बावजूद गांवों में आज भी देश की जनसंख्या का 72.2 प्रतिशत हिस्सा रहता है, जबकि शहरों में सिर्फ 27.8 फीसदी जनसंख्या ही निवास कर रही है। आजादी के बाद यह आंकड़ा 80 और 20 का था। बहरहाल ताजा आंकड़ों के मुताबिक ही अगर क्रिसिल के खर्च वाले आंकड़ों की तुलना करें तो गांव अब भी पिछड़े नजर आएंगे। यानी देश की 72.2 फीसदी जनसंख्या जहां तीन लाख 75 हजार करोड़ खर्च कर रही है, जबकि 27.8 फीसदी जनसंख्या दो लाख 90 हजार करोड़ रूपए खर्च कर रही है। इस हिसाब से देखें तो देश की अधिसंख्य जनसंख्या अब भी शहरों की तुलना में कम ही खर्च कर रही है। यानी देश की अधिसंख्य जनसंख्या की हालत बदहाल ही है। तमाम अच्छाइयां दिखाने के बावजूद क्रिसिल की रिपोर्ट गांवों में मौजूद बदहाली और ऊंचनीच आधारित समाज की तरफ भी इशारा करती है। कुछ गैर सरकारी संस्थाओं के मोटे आकलन के मुताबिक आज भी गावों की करीब अस्सी फीसदी आबादी अब भी खेती और किसानी या उससे जुड़ी गतिविधियों में मजदूरी करके जीवनयापन करने को मजबूर है। मौजूदा स्थिति में देश की जीडीपी में खेती का योगदान महज 15 फीसदी ही है। जिस पर देश की करीब 57 फीसदी जनसंख्या का गुजर-बसर करना नियति है। यानी गांव की ज्यादातर जनसंख्या आज भी बदहाली में गुजर करने को मजबूर है। अभी ज्यादा दिन नहीं हुए, जब देश के 68 वें राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण की रिपोर्ट सार्वजनिक हुई थी। इस रिपोर्ट के मुताबिक देश में 8 करोड़ 33 लाख लोग आज भी ऐसे हैं, जिन्हें महज 17 रूपए रोजाना पर गुजर-बसर करना पड़ता है। अगर इन आंकड़ों के लिहाज से देखें तो क्रिसिल की रिपोर्ट के बाद गांवों के बीच मौजूद ऊंच-नीच की हालत की पोल ही खुल जाती है।
क्रिसिल ने अपनी ताजा रिपोर्ट में गांवों में खर्च क्षमता बढ़ने के पीछे रोजगार गारंटी योजना के साथ ही गैर खेती रोजगार के मौकों में वृद्धि के साथ ही गांवों के लिए तमाम सरकारी योजनाओं को जिम्मेदार बताया है। इस पर शक भी नहीं किया जा सकता। लेकिन सवाल यह है कि राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण की रिपोर्ट के बाद भी क्रिसिल की रिपोर्ट से खुश हुआ जा सकता है। इसका जवाब भले ही उदारीकरण के पैरोकार हां में बताएं, लेकिन ऐसा नहीं है। खुद क्रिसिल भी मानती है कि ग्रामीण इलाके की इस खर्च क्षमता को टिकाऊ बनाए रखने के लिए जरूरी है कि लघु अवधि की आय बढ़ाने वाली योजनाओं के साथ ही स्थायी रोजगार देने वाली स्कीमें बनाई जाएं। यानी क्रिसिल भी एक हद तक मानती है कि गांव अब भी पिछड़े हैं। गांवों में अब भी रोजगार के साधन बढ़ाए जाने की जरूरत है। खेती आधारित उद्योगों को बढ़ावा दिया जाना चाहिए, ताकि ज्यादा से ज्यादा लोगों को रोजगार हासिल हो सके। आखिर में क्रिसिल की रिपोर्ट में एक अच्छी चीज यह है कि उदारीकरण की व्यवस्था में गांवों की परवाह न करने वाले अंग्रेजी दां शहरी आर्थिक नियंता गांवों में उम्मीद की किरण देख सकते हैं। तब गांवों को अबाध बिजली और बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराने की सोच विकसित हो सकती है। उपभोक्तावादी वस्तुओं की उत्पादक कंपनियां गांवों की बुनियादी सुविधाएं बढ़ाने के लिए सरकारी क्षेत्र पर दबाव बना सकती हैं। ताकि भविष्य में वे इसका फायदा उठा सकें। लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि सोच में बदलाव रातोंरात नहीं होता। इसके लिए हमें अभी इंतजार करना होगा।

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