Tuesday, September 25, 2012

किस समाज की बात करता है जेएनयू



उमेश चतुर्वेदी
सभ्य समाज में खासकर उच्च शिक्षा के संस्थानों में ऐसे मूल्यों की उम्मीद की जाती है, जो अपने समाज को नई रोशनी दिखाते हुए बंद समाज के लिए प्रगति की राह खोल सके। ऐसा तभी हो सकता है, जब शैक्षिक संस्थान समाज सापेक्ष विचार रखे। लेकिन क्या दिल्ली के सर्वाधिक सुविधा और स्वायत्तता संपन्न जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय इन कसौटियों पर कसा  जा सकता है। निश्चित तौर पर इसका जवाब ना में ही दिया जा सकता है। प्रगतिशीलता की एक निशानी समाज सापेक्ष विचारों को बढ़ावा देने के साथ ही असहिष्णुता की भावना को भी बढ़ावा देने वाली होनी चाहिए। लेकिन जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय का छात्र समुदाय इसके ठीक उलट व्यवहार करता नजर आता है।(दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में प्रकाशित...)
28 सितंबर को विश्वविद्यालय में प्रस्तावित गोमांस पार्टी को भी ऐसे ही व्यवहार के तौर पर रेखांकित किया जा सकता है। विश्वविद्यालय में कार्यरत द न्यू मटेरियलिस्टनामक संगठन ने इस पार्टी को आयोजित करने का ऐलान किया है। वामपंथी रूझान वाला यह संगठन पहले यह पार्टी ईवीआर पेरियार के जन्मदिन पर करने वाला था। लेकिन छात्रसंघ चुनाव के चलते इसे शहीद भगत सिंह के जन्मदिन 28 सितम्बर को आयोजित करने का ऐलान किया है।
जाहिर है कि इसका विरोध होना ही है। विश्व हिंदू परिषद ने इसके खिलाफ चेतावनी दे ही दी है। इसके खिलाफ दिल्ली पुलिस और जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय प्रशासन ने भी चेतावनी जारी कर दी है। विश्वविद्यालय के सभी छात्रावासों के वार्डनों को ऐसी कोई पार्टी नहीं होने देने के ले तैयार रहने की ताकीद कर दी गई है। लेकिन जेएनयू के छात्रों की जो फितरत रही है, उससे साफ है कि वे अपनी पार्टी आयोजित करने की हर मुमकिन कोशिश करेंगे। ऐसे में तनाव और विवादों होने की पूरी गुंजाइश है। बेशक प्रशासन ऐसी पार्टी ना होने दे, लेकिन सवाल यह है कि क्या जेएनयू के ये छात्र अपने ऐसे कार्यों से समाज को कौन सा प्रगतिशील विचार देना चाहते हैं। क्या वे अपने ही मूल समाज जहां से वे आते हैं, उन समुदायों और अपने ही परिवारों में ऐसी प्रतिगामिता ही हिम्मत दिखा सकते हैं। सवाल यह है कि वे पश्चिम बंगाल के अपने कॉमरेडों को दुर्गा पूजा से रोक सकते हैं या केरल के कॉमरेडों से ओणम की महत्ता को अस्वीकार कराने का दम दिखा सकते हैं। निश्चित तौर पर इसका जवाब ना में है। लेकिन जेएनयू में बीफ पार्टी आयोजित करने वाले कॉमरेडों का कहना है कि


आयोजकों यदि जन्माष्टमी को रसिया और होली को भांग पीने का आयोजन हो सकता है तो गोमांस पार्टी आयोजित करने स्वतन्त्रता क्यों नहीं मिलनी चाहिए। इस आयोजन का उद्देश्य भाजपा, आरआरएस सहित अन्य हिंदूवादी संगठनों की राजनीति पर कठोर प्रहार करना है क्योंकि इन्होंने गाय को राजनीति का केंद्र बनाया हुआ है। जेएनयू सेंटर फॉर अफ्रीकन स्टडीज़ के पीएच-डी छात्र एवं फॉरमेशन कमेटी फॉर बीफ पोर्क फेस्टिवल के सदस्य अनूप का मानना है कि जेएनयू संसद के कानून द्वारा बना संस्थान है इसलिए गोमांस पार्टी के आयोजन पर दिल्ली एनसीआर एक्ट-1984 लागू नहीं होता। अब अनूप को कौन समझाए कि कोई संस्थान भले ही संसद के कानून द्वारा बना हो, लेकिन जब कानून और व्यवस्था की बात आती है तो उस पर संबंधित राज्य के ही कानून लागू होते हैं। उसे जेनेवा समझौते के तहत अपने परिसर में किसी दूतावास की तरह स्वायत्त और अपना कानून लागू करने की आजादी नहीं होती।
दिल्ली पुलिस ने जिस तरह इस मसले का संज्ञान लिया है, उससे उम्मीद की जा सकती है कि वह ऐसे संवेदनशील मुद्दे पर विश्वविद्यालय में पार्टी नहीं होने देगी। लेकिन इस एक घटना के बाद यह सवाल मौजूं हो गया है कि आखिर खुद को संभ्रांत मानने वाले जेएनयू आखिरकार समाज को क्या दे रहा है। गांधी जी ने जब स्वदेशी का समर्थन और विदेशी के बहिष्कार का आंदोलन छेड़ा था तो खुद विदेशी सामानों की होली जलवायी थी। चाहे विलायत की ठंड में ही उन्हें जाना पड़ा, लेकिन उन्होंने धोती का साथ नहीं छोड़ा। लेकिन जेएनयू के छात्र संगठनों में कथनी-करनी का ऐसा समावेश नजर नहीं आता। सात साल पहले जेएनयू छात्रसंघ में वामपंथी छात्र संगठनों ने वादा किया था कि अगर वे चुनाव जीते तो परिसर स्थित नेस्केफे के कॉफी शॉप को बंद करा देंगे। उन्होंने ऐसा किया भी, लेकिन यह बात और है कि कैंपस के बाहर निकलने बाद उन्हें नजदीक स्थित बसंत कांटिनेंटल के परिसर में तो कभी साकेत के अनुपम परिसर जैसी जगहों पर विदेशी कॉफी और दूसरे पेय पदार्थों से परहेज नहीं रहा। सवाल यह है कि जनता की गाढ़ी कमाई से चल रहे जेएनयू के छात्र संगठन यह क्यों भूल जाते हैं कि जिस जनता के पैसे पर वे इतने बेहतर माहौल में बेहतर किताबों के बीच आजाद जीवन जीते हुए आजाद शिक्षा हासिल कर रहे हैं, उसी जनता के प्रति उनकी भी कोई जिम्मेदारी बनती है। क्या यह जिम्मेदारी एक खास विचारधारा को सिर्फ गालियां देकर या उसके समर्थक लोगों को विश्वविद्यालय में ना घुसने देने की जिद्द से ही हासिल की जा सकती है।
चार साल पहले विश्वविद्यालयों के कुलपतियों का एक सम्मेलन जामिया मिलिया इस्लामिया में हुआ था। उस सम्मेलन में सुझाव दिया गया कि सभी विश्वविद्यालयों को जेएनयू से प्रेरणा लेनी चाहिए। सभी कुलपति चुप रहे थे। लेकिन एक कुलपति ने बड़े अफसरों और मंत्रियों के सामने जब यह सवाल उछाला कि क्या सभी विश्वविद्यालयों को वैसी ही आर्थिक सहूलियतें दी जा सकती हैं। यदि हां तो बाकी विश्वविद्यालय भी उससे प्रेरणा ले सकते हैं। दुर्भाग्यवश उस बैठक में शामिल ज्यादातर कुलपति इस विचार से सहमत थे, लेकिन उस कुलपति का साथ देने की हिम्मत नहीं जुटा सके। कहने का मतलब यह है कि जेएनयू को आज जो स्वायत्तता मिली हुई है, उसमें जनता की गाढ़ी कमाई का बड़ा हिस्सा लगा है। जेएनयू समानता की विचारधारा का जोरदार समर्थन देता है। लेकिन हकीकत तो यह है कि उसका आधार ही समानता की इस विचारधारा के उलट है। यानी वह विशिष्टता की अवधारणा से ही ओतप्रोत है। अव्वल तो होना यह चाहिए था कि विशिष्टता की इस अवधारणा के साथ विश्वविद्यालय के छात्र संगठन आम लोगों की आवाज बनकर उभरते। अगर 1942 में बलिया आजाद हुआ था तो उसकी बड़ी वजह काशी हिंदू विश्वविद्यालय और इलाहाबाद विश्वविद्यालय के छात्रों का योगदान भी था। जयप्रकाश आंदोलन की पूरी रूपरेखा भी छात्रों ने तैयार की थी। राजनीति ने बाद में उस पर अपनी रोटी सेंकी। स्वायत्त छवि के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्रों से भी ऐसे ही प्रगतिशीलता की उम्मीद की जाती रही है। लेकिन दुर्भाग्यवश वह कभी दक्षिणपंथी विरोध के अतिवाद में अपने को मसरूफ रखना अपनी उपलब्धि समझता है तो कभी वह देश की अधिसंख्य जनसंख्या की भावनाओं से खिलवाड़ को ही प्रगतिशीलता का पर्याय मानता है। जेएनयू के बारे में आस-पास के इलाकों में एक कहावत प्रचलित है या तो अमेरिका या फिर मुनिरका। मुनिरका जेएनयू के सामने का गांव है। कहावत का आशय है कि विश्वविद्यालय के छात्र बाहर निकलते हैं तो या तो अमेरिका यानी विदेशों का रूख करते हैं या भारतीय समाज से वे इतना कट जाते हैं कि कुढ़ते हुए मुनिरका में रहने को मजबूर हो जाते हैं। बदलते दौर में इस संभ्रांत विश्वविद्यालय के छात्रों से ऐसे बदलाव की उम्मीद की जाती है, जो समाज को दिशा दे सके। सामाजिक नफरत की बुनियाद को मजबूत करना किसी शैक्षिक संस्थान की पहचान नहीं हो सकती। जरूरत इस बात की है कि जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्र इस तथ्य को समझें। तभी समाज को वे सही प्रतिदान दे पाएंगे।  

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