Sunday, September 30, 2012

उमा बनाम ममता



उमेश चतुर्वेदी
डीजल और रसोई गैस की कीमतों में बढ़ोत्तरी और खुदरा में विदेशी निवेश के खिलाफ ममता बनर्जी की मोर्चे बंदी ने उन्हें कम से कम विपक्ष की राजनीति करने वालों का नायक जरूर बना दिया है। लेकिन विपक्ष में एक ऐसी भी शख्सीयत है, जिसे आम आदमी के साथ खड़ी नजर आ रहीं ममता बनर्जी से नाराज है। भारतीय जनता पार्टी की नेता उमा भारती की गंगा समग्र यात्रा में ममता बनर्जी की सरकार ने सहयोग देने से इनकार कर दिया है। इसे लेकर दोनों के बीच टकराव बढ़ गया है। गंगा बचाने को लेकर उमा भारती ने 21 सितंबर से गंगोत्री से गंगा समग्र यात्रा शुरू कर दी है।
उमा भारती की इस यात्रा का मकसद गंगा को प्रदूषण मुक्त बनाने और उसकी अविरल पवित्र धारा को बचाए रखने की तरफ दुनिया का ध्यान आकर्षित करना है। उमा भारती इस यात्रा को राजनीति से इतर रखने की ना सिर्फ अपील करती रही हैं, बल्कि दावे भी करती हैं। इस सिलसिले में उन्होंने सोनिया गांधी के घर जाकर सहयोग मांगने में भी उन्हें परहेज नहीं रहा। राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री से भी वे मिल चुकी हैं। उमा की योजना में गंगा समग्र यात्रा के साथ-साथ गंगा किनारे स्थित प्रमुख जगहों पर सभाएं संबोधित करना भी है। लेकिन इसी विंदु पर ममता बनर्जी को एतराज है। उन्हें लगता है कि गंगा समग्र यात्रा के दौरान पश्चिम बंगाल में अगर सभाएं हुईं तो प्रखर हिंदुत्व की पैरोकार रही उमा भारती अपनी पार्टी का आधार बनाने में इस्तेमाल कर सकती हैं। उन्हें लगता है कि इससे हिंदुत्व के ठीक विपरीत छोर पर खड़ी अल्पसंख्यक मानसिकता में गलत संदेश जा सकता है और इससे तृणमूल का अल्पसंख्यक आधार गड़बड़ा सकता है। पश्चिम बंगाल में आधिकारिक तौर पर ही करीब तीस फीसदी मुस्लिम आबादी है। अतीत में इस आबादी पर वाममोर्चे की पकड़ रही है, जिसका फायदा उसे राजनीतिक तौर पर मिलता रहा है। लेकिन माना जा रहा है कि 2011 के विधानसभा चुनावों में यह आधार दरककर ममता के पाले में चला गया। जिसके नतीजतन रायटर बिल्डिंग में ममता बनर्जी काबिज हो गई हैं। वैसे भी पश्चिम बंगाल में भारतीय जनता पार्टी का खास आधार नहीं है। उमा भारती लाख दावे करें कि गंगा समग्र यात्रा में राजनीति नहीं हैं। लेकिन इस यात्रा की कामयाबी का फायदा गंगा सफाई को लेकर जागरूकता के साथ-साथ बीजेपी को ही मिलने की ज्यादा संभावना है। यही वह पेच है, जिससे इन दिनों विपक्ष के करीब आईं ममता भी उमा भारती का साथ नहीं दे रही हैं। अपनी-अपनी तरह से फायर ब्रांड के तौर पर विख्यात दोनों नेताओं की इस रस्साकसी के चलते अगर गंगा जैसी जीवन दायिनी नदी की असल समस्या कम से कम सोनार बांग्ला की धरती पर नेपथ्य में चले जाए तो हैरत नहीं होनी चाहिए।

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