Saturday, December 15, 2012

आगत की चिंता



उमेश चतुर्वेदी
लखनऊ से प्रकाशित समकालीन सरोकार में प्रकाशित....आत्मकथ्य वहां प्रकाशित नहीं हुआ है..
आत्मकथ्य:
आगत की राजनीतिक मीमांसा निश्चित तौर पर विगत की नींव पर खड़ी होती है। ऐसे में सवाल यह उठना स्वाभाविक है कि आखिर भावी राजनीतिक पूर्वानुमान ज्यादातर ध्वस्त क्यों हो जाते हैं? चूंकि ज्यादातर राजनीतिक पूर्वानुमानों में ईमानदारी की सुगंध कम होती है, अपने आग्रह और पूर्वाग्रह मीमांसकों के अपने व्यक्तित्व पर हावी हो जाते हैं। बेशक यह मानव स्वभाव है, लिहाजा इससे बचने की उम्मीद पालना भी कई लोगों को बेकार लगता है। लेकिन कालजयी रचनाधर्मिता और पत्रकारिता इस मानव स्वभाव से उपर उठने के बाद ही सामने आती है। भीड़तंत्र को मानवीय आग्रह जितना आकर्षित करते हैं, कालजयी शख्सियतों को वे उतने ही निर्विकार रहने को मजबूर करते हैं। ऐसे ही वक्त में प्रख्यात पत्रकार राजेंद्र माथुर की बातें याद आती हैं। उनका कहना था कि पत्रकार संजय की तरह सिर्फ और सिर्फ दर्शक होता है और उसका काम घटनाओं को रिपोर्ट भर कर देना होता है।
लेकिन होता इसके ठीक उलट होता है। वह खुद को नियंता और नियंत्रक मान बैठता है और गड़बड़ी यहीं होती है। लेकिन हकीकत तो यह है कि जब मानवीय कमियों और आग्रहों-पूर्वाग्रहों की वजह से आगत के राजनीतिक पूर्वानुमान गड़बड़ और गलत साबित हो जाते हैं तो जगहंसाई भी खूब होती है। इसीलिए भावी राजनीतिक परिदृश्य की कल्पना करने की दिशा में कई दिमाम सामने तो आ जाते हैं, लेकिन उन पर सटीक भविष्यवाणी करने से लोग बचते हैं। आगत की राजनीतिक घटनाओं की व्याख्या करने से पहले की गई इस व्याख्या को भावी गलतियों के लिए सफाई के तौर पर तो ले लिया जाना चाहिए। लेकिन अगर सौभाग्यवश कुछ घटनाएं सही साबित हो जाएं तो इसके लिए इन पंक्तियों के लेखक को तीरंदाज भी ना समझा जाए।
आगत :
2012 का सूरज अतीत बनने की तरफ लगता है जैसे तेजी से बढ़ रहा है। 2012 का साल भी राजनीतिक घटनाओं के लिहाज से बेहद उबाल वाला रहा। आज के दौर में नई आर्थिकी जिस तरह राजनीति को अपनी उंगलियों पर नचा रही है, उससे लगता है कि शायद ही किसी राजनीतिक दल में इतनी हिम्मत होगी जो नई आर्थिकी के आगे हथियार ना डाले। लेकिन बंगाल की शेरनी ममता बनर्जी ने साबित कर दिया कि वे नई आर्थिकी के सामने हथियार नहीं डालने वाली हैं। भारतीय राजनीति परिदृश्य में वह अकेली राजनेता नजर आ रही हैं, जिन्होंने ठान रखा है कि आर्थिकी को भी राजनीति और समाज के इशारे पर ही चलना होगा। खुदरा क्षेत्र में विदेशी निवेश के मुद्दे पर उन्होंने केंद्र सरकार से समर्थन वापस लेने में हिचक नहीं दिखाई। यह बात और है कि आम लोगों की भलाई और जनता के सबसे निचले तबके के हितों का दावा करने वाली समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने जनता के बीच खुदरा में विदेशी निवेश को लेकर गुस्सा तो जरूर दिखाया, लेकिन अंदरखाने में उन्होंने केंद्र सरकार और कांग्रेस के सामने हथियार डाल दिया। नतीजतन सरकार बच गई। असलियत तो यह है कि जनपक्षधर  और मजलूमों के साथ होने का दावा करने वाली दोनों पार्टियों ने जितना कांग्रेस या केंद्र सरकार के सामने हथियार नहीं डाला, उससे कहीं ज्यादा दोनों नई आर्थिकी के सामने ही झुकती नजर आईं। बेशक समाजवादी पार्टी ने नवंबर के तीसरे सप्ताह तक उत्तर प्रदेश के 63 लोकसभा सीटों के उम्मीदवारों का ऐलान कर दिया। लेकिन यह तय है कि वह अगले साल भी सरकार को गिराने नहीं जा रही। 1990 में अयोध्या के बाबरी ढांचे को अपनी प्रशासनिक ताकत से बचा लेने के बाद से मुलायम सिंह यादव वामपंथी पार्टियों के चहेते बने हुए हैं। वामपंथी पार्टियां उन्हें सांप्रदायिकता की राजनीति के खिलाफ खड़ी मजबूत शख्सियत ही नहीं मानतीं, बल्कि हर आम चुनाव के बाद उनमें वे तीसरे मोर्चे की अगुआई का अक्स भी उत्साह से देखती हैं। नई आर्थिकी के सामने उनके लगातार हथियार डालने के बाद उन्हें लेकर वामपंथी दलों के इस चहेतपन में कमी नहीं आई है। इसके बावजूद यह तय है कि मुलायम सिंह यादव अगले साल भी कोई क्रांतिकारी कदम नहीं उठाने जा रहे हैं। लेकिन यह तय है कि अगर किसी औचक राजनीतिक घटनाक्रम के चलते सरकार गिरती है और अगले चुनाव होते हैं तो वे पर्दे के पीछे से भारतीय जनता पार्टी का साथ भी दे सकते हैं। बशर्तें कि उनके समर्थन से सरकार बनती नजर आ रही है। दिलचस्प यह है कि इस विचारधारा को सबसे ज्यादा भारतीय जनता पार्टी के समर्थक ही हवा दे रहे हैं। रही बात बीएसपी की तो उसका अतीत खुद के विस्तार के लिए किसी भी कीमत को हासिल करना रहा है। लिहाजा अगर उसे जरूरत पड़ी तो आम चुनावों के बाद भारतीय जनता पार्टी भी वह साथ दे सकती है। ममता बनर्जी के कांग्रेस का साथ छोड़ने के बाद से ही अनुमान लगाया जा रहा है कि आम चुनाव 2013 में होंगे। भयानक बढ़ी महंगाई के चलते विपक्ष उम्मीद भी पाल रखा है कि अगर चुनाव हुए तो उसके ही हाथ सत्ता का छींका लगेगा। लेकिन ऐसा सोचने और ऐसी उम्मीद पालने वाले लोग 2009 की कांग्रेस की रणनीति भूल गए हैं। महंगाई तब भी थी और उम्मीद तब भी आज की ही तरह लगाई जा रही थी। लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ। कांग्रेस अभी अर्थव्यवस्था में जान-फूंकने की कोशिश में लगी हुई है। बेशक इसे पटरी पर लाना संभव नहीं है। लेकिन इस बीच उसके वित्त मंत्री ब्याज दरें घटाने जैसे लोकप्रिय उपायों में जुटे हुए हैं। फिर कॉमनवेल्थ, टू जी, कोलगेट जैसे घोटालों से चौतरफा घिरी कांग्रेस ने जिस तरह से इन आरोपों की हवा निकालनी शुरू की है, उससे एक हद तक वह खुद पर लगी कालिख धोने में कामयाब हुई है। टूजी की दोबारा नीलामी में आई गिरावट के बाद उसने कैग पर ही आरोप लगाना शुरू कर दिया है कि उसने बेवजह ही एक लाख छिहत्तर हजार करोड़ के घोटाले का आरोप लगाया। अब कांग्रेस के रणनीतिकार हर मंच से दलीलें दे रहे हैं कि ऐसा कोयला खदान घोटाले के साथ भी होगा। यानी कांग्रेस खुद के पक्ष में हवा बनाने की तैयारी में जुटी है। 2012 के आखिर में दो राज्यों गुजरात और हिमाचल प्रदेश में चुनाव होंगे। गुजरात में तो खुद कांग्रेस भी मान रही है कि वह कोई करामात दिखाने नहीं जा रही। अगले साल राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्यप्रदेश में चुनाव होने हैं। अगर कोई भारी उलटफेर नहीं हुआ तो माना यही जा रहा है कि तीनों राज्यों में भारतीय जनता पार्टी की ही जीत होगी। राजस्थान में कांग्रेस सरकार खासी अलोकप्रिय हो चुकी है। मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में जितना वहां की भाजपा सरकारें लोकप्रिय नहीं हैं, उससे कहीं ज्यादा हताश कांग्रेस है। अगर इन विधानसभा चुनावों में कांग्रेस का प्रदर्शन अच्छा नहीं रहता तो जाहिर है कि उसके खिलाफ माहौल बनेगा। ऐसे माहौल में वह चुनाव मैदान में उतरना शायद ही पसंद करे। लेकिन एक तथ्य साफ है कि 2जी घोटाले में अपनी बेटी के जेल जाने से डीएमके सुप्रीमो करूणानिधि बेहद नाराज हैं और इसके लिए वे कांग्रेस के नेतृत्व को जिम्मेदार मानते हैं। खुदरा में विदेशी निवेश का विरोध जताकर वे संदेश दे चुके हैं। ऐसे में यह तय है कि आम चुनाव की घोषणा होने के बाद वे कांग्रेस का साथ शायद ही दें। कांग्रेस की हालत आंध्र प्रदेश में भी उसके ही अपने सिपहसालार रहे वाईएस रेड्डी के बेटे जगनमोहन रेड्डी खराब कर चुके हैं। इसलिए वहां से कांग्रेस की वापसी संभव भी नहीं है। लिहाजा ऐसी हालत में नहीं लगता कि कांग्रेस वक्त से पहले चुनाव कराने की हिम्मत दिखाएगी। रही बात सरकार के सहयोगियों के साथ छोड़ने की तो यह साफ हो गया है कि आज कल मुद्दों की राजनीति की बजाय सत्ता के जरिए ताकत की मलाई खाने पर ज्यादा जोर है। ऐसे में तय वक्त तक शायद ही दूसरी ममता बनर्जी होगी जो सत्ता की मलाई नहीं खाना पसंद करेगी।
नवंबर के दूसरे हफ्ते में जिस तरह राहुल गांधी को कांग्रेस की कमान देने की कवायद शुरू हुई है, उससे भी साफ है कि केंद्र के चुनाव तय वक्त या अधिक से अधिक छह महीने पहले होंगे। राहुल गांधी अपनी तरह से कांग्रेस को तैयार कर रहे हैं। उनके सिपहसालारों में बेशक भंवर जितेंद्र सिंह, आरपीएन सिंह, जितिन प्रसाद, सचिन पायलट और ज्योतिरादित्य सिंधिया का नाम आगे है। लेकिन यह भी सच है कि उनका भरोसा इन दिनों कांग्रेस में सक्रिय दो पुराने समाजवादियों जनार्दन द्विवेदी और मोहन प्रकाश पर बढ़ गया है। राहुल की तरफ से अव्वल राजनीतिक रणनीतियां ये ही दोनों नेता तैयार कर रहे हैं। तो क्या मान लिया जाय कि कांग्रेस में समाजवाद की वापसी हो रही है। जिस तरह से उसने नई आर्थिकी के सामने हथियार डाले हैं, उससे तो नहीं लगता। लेकिन यह तय है कि कांग्रेस की योजनाओं और कार्यों पर आगे समाजवादी नेताओं की पकड़ ज्यादा रहने वाली है। यहां यह बता देना जरूरी है कि इस बीच अंबिका सोनी एक बार फिर कांग्रेस के संगठन में ताकतवर बनकर उभर सकती हैं। कुछ लोग उम्मीद लगा रखे हैं कि लगातार नरेंद्र मोदी की तीसरी जीत के बाद कांग्रेस के गुजरात से कद्दावर नेता अहमद पटेल की स्थिति कमजोर होगी तो वे दिवास्वप्न पाल रहे हैं। दरअसल पटेल कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के बेहद भरोसेमंद हैं। यानी जब तक सोनिया गांधी के हाथ कमान रहेगी, तब तक अहमद पटेल की ताकत कम नहीं होने वाली।
रही बात भारतीय जनता पार्टी की तो वहां जिस तरह शिखर नेतृत्व का ही एक तबका नितिन गडकरी को नीचा दिखाने की कोशिश में जुटा है, उसकी कीमत पार्टी को चुकानी पड़ सकती है। चूंकि बीजेपी ही प्रमुख राजनीतिक विपक्ष है, लिहाजा महंगाई और भ्रष्टाचार से पीड़ित जनता कांग्रेस के विकल्प के तौर पर उसकी ही तरफ देखती है। यह बात और है कि नई आर्थिकी के सामने हथियार डालने में उसकी भी कोई सानी नहीं है। इन सबके बावजूद भारतीय जनता पार्टी पूरे साल खुद की ही लड़ाइयां लड़ती रहेगी। नितिन को दिल्ली फोर के एक प्रमुख नेता के निशाने पर रहना ही होगा। भारतीय जनता पार्टी के दफ्तरों में नितिन गडकरी पर सवाल उठने को लेकर जितनी चिंताएं नहीं हैं, उससे कहीं ज्यादा उन पर निशाना साधने के पीछे वाले हाथों को लेकर है। कार्यकर्ता दबी जुबान से एक कद्दावर नेता का नाम लेने से भी नहीं हिचक रहे, जिन्होंने अब तक एक भी आम चुनाव में हिस्सा नहीं लिया है। अगले साल नरेंद्र मोदी गुजरात को किसी को सौंप कर दिल्ली की तरफ कूच करने की कोशिश करेंगे। लेकिन इसके लिए वे गुजरात में अपने किसी भरोसेमंद को गद्दी सौंपना चाहेंगे। लेकिन जैसी कि भारतीय जनता पार्टी की रवायत रही है, वह किसी ऐसे व्यक्ति को चुनना पसंद करेगी, जो भारतीय जनता पार्टी को दोबारा जीत दिला सके और मोदी के इशारे पर ही काम करने को तैयार नहीं हो। पार्टी मध्यप्रदेश और कर्नाटक में ऐसा कर चुकी है। पार्टी को तमिलनाडु में भी उठने की तैयारी करनी है। लेकिन यह तय है कि अगर वह जे जयललिता के साथ जाएगी तो उसे पूर्व अध्यक्ष सीपी राधाकृष्णन का साथ लेना होगा और अगर वह डीएमके के साथ जाएगी तो पी राधाकृष्णन ही बने रहेंगे। कर्नाटक में यह तय है कि येदियुरप्पा बगावती तेवर अख्तियार किए रहेंगे। लेकिन अगर कायदे से उन्हें कुर्सी की गारंटी दी जाय तो फिर से कमल के साथ आ जाएंगे। जो लोग यह मान कर चल रहे हैं कि बिहार में नीतीश कुमार बीजेपी का साथ छोड़ देंगें, उन्हें निराशा हाथ लग सकती है। नीतीश कुमार के खिलाफ अब बिहार में बगावती तेवर दिखने लगे हैं। बेशक महादलितों और अति पिछड़ों में उन्होंने अपना आधार बनाया है। लेकिन ब्राह्मण, भूमिहार, कायस्थ और एक हद तक राजपूत जातियों में बीजेपी की ही पकड़ बनी हुई है। इन जातियों के सामने लालू यादव अभी भी एक खौफ की तरह हैं। नीतीश भी अब जान रहे हैं कि अगर विरोध पर काबू पाना है तो बीजेपी का साथ जरूरी है। फिर पिछड़ों और दूसरी जातियों ने लालू की सभाओं में जुटना शुरू कर दिया है। इसलिए अब नीतीश का बीजेपी के साथ बने रहना मजबूरी है। ऐसे में बीजेपी को लेकर उनके ढीले तेवर भी नजर आएं तो हैरत नहीं होनी चाहिए।
रही बात वामपंथी पार्टियों की तो वे अब भी अतीत में जीने में ज्यादा भरोसा कर रही हैं। उनमें अतुल कुमार अनजान जैसे नेतृत्व पर भरोसा करने का माद्दा नहीं है। लिहाजा वे जनता से कटी हुई हैं। वे अब भी मार्क्स की पारंपरिक व्याख्या के ही सहारे जनता में अपनी पकड़ बनाए रखने में जुटी हुई हैं। हालांकि निजी ईमानदारी में उनके नेता अब भी दूसरी पार्टियों के नेताओं से कहीं ज्यादा आगे नजर आते हैं। इसके बावजूद नहीं लगता कि वे अपनी राजनीतिक सोच में कुछ बदलाव लाएंगी। उन्हें अपनी सोच को बदलना ही होगा। हालांकि महंगाई के मुद्दे पर उन्होंने जिस तरह बीजेपी का साथ दिया, अगर आगे भी ऐसा किया तो देश के हालात बदल सकते हैं। लेकिन सबसे बड़ी बात यह है कि आज के दौर में निजी और दलगत राजनीतिक नफा-नुकसान आम लोगों और देश के नफा-नुकसान पर हावी हो गए हैं। ऐसे में अगले पूरे साल यह सवाल बना रहे कि देश को लेकर कौन सोच रहा है तो हैरत नहीं होनी चाहिए। यह बात और है कि देश के बारे में कोई ज्यादा सोच रहा है तो वह जनता है और उसकी यह सामूहिक सोच नेताओं और राजनेताओं की बनिस्बत कहीं ज्यादा संजीदा है। यहां यह बताना बेमानी है कि यह सोच बनी रहेगी और इसी से उम्मीद भी है।

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