Friday, December 21, 2012

सार्वजनिक परिवहन के चरित्र को बदलो


राष्ट्रीय सहारा में प्रकाशित
उमेश चतुर्वेदी
दिल्ली में झकझोर देने वाली बलात्कार की घटना को सिर्फ मानसिकता से ही जोड़कर देखा जा रहा है। इसका दूसरा पहलू कानून-व्यवस्था से जुड़ा मामला भी है। लेकिन यह कानून-व्यवस्था से भी आगे सामाजिकता और सार्वजनिक परिवहन के चारित्रीकरण का भी मामला है।सभ्य समाज में सार्वजनिक परिवहन कैसा होना चाहिए, उसे संभालने और चलाने वाले कैसे होने चाहिए और क्या उसका भी सभ्य चरित्र होना चाहिए, दुर्भाग्यवश इसकी तरफ किसी का ध्यान नहीं जा रहा है। सार्वजनिक परिवहन में बलात्कार निश्चित रूप से गंभीर और संगीन मसला है। लेकिन हमें नहीं भूलना चाहिए कि जब सार्वजनिक परिवहन का कोई चारित्रीकरण नहीं होता तो उसमें चारित्रिक पतन की शुरूआत यात्रियों से बदसलूकी से शुरू होती है और बात छेड़खानी, छिनैती-झपटैती से आगे बढ़ते हुए बलात्कार तक जा पहुंचती है।
यूं तो पूरे देश के सार्वजनिक परिवहन को लेकर जो भी नीति है, उसमें उसके चारित्रिकरण को लेकर कोई इंतजाम नहीं है। ज्यादातर हिस्सों में तो यह सिर्फ कानून-व्यवस्था का मामला है। यही वजह है कि इसे लागू करने वाला पुलिस और परिवहन तंत्र इसके साथ सिर्फ कानून और व्यवस्था की तरह व्यवहार करता है। इसीलिए इक्कीसवीं सदी में एक दशक तक आगे गुजार चुके देश के सुदूरवर्ती इलाकों में टूटी बसों और हिचकोले खातीं जीपों में भेंड़-बकरी की तरह लोग ठूंसे रहते हैं। इस ठुंसाई में यात्रियों के मूलभूत मानवाधिकारों का रोजाना और तकरीबन हर ट्रिप में उल्लंघन होता है।   लेकिन पुलिस और परिवहन तंत्र इन समस्याओं को देश की गरीबी और बढ़ती जनसंख्या की समस्या के तौर पर लेता है। चूंकि सार्वजनिक परिवहन तंत्र के चारित्रिक उत्थान की कोई कोशिश ही नहीं की गई, इसलिए इसके ज्यादातर हिस्से पर माफिया और स्थानीय गुंडों का ही कब्जा है। गाड़ी का काम करना इसी वजह से आज भी माफियागिरी की ही तरह माना जाता है। जब देश की सार्वजनिक परिवहन प्रणाली का चेहरा ऐसा ही होगा तो उससे बेहतर नतीजों और बेहतर व्यवहार की उम्मीद भला कैसे की जा सकती है।
जब दिल्ली में रेडलाइन बसों का आतंक था तो तब दिल्ली की सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था की इस खामी की तरफ भी ध्यान दिलाने की कोशिश की गई थी। रेड लाइन बसों का संचालन भी देशभर में व्याप्त सार्वजनिक परिवहन तंत्र के माफिया रूप का ही विस्तार था। हालांकि इसकी तरफ बार-बार ध्यान दिलाया गया, लेकिन ना तो पुलिस और ना ही तत्कालीन तंत्र से जुड़े लोगों ने इसकी तरफ ध्यान नहीं दिया। इसका असर यह हुआ कि दिल्ली में अब भी सार्वजनिक परिवहन तंत्र समस्या बना हुआ है और बसों में छेड़खानी से लेकर बलात्कार जैसी घिनौनी घटनाएं हो रही हैं। यह सार्वजनिक परिवहन का बदनुमा चेहरा ही है कि दिल्ली की महिलाएं मजबूरी में ही बसों में घुसने की हिम्मत दिखाती हैं। अगर वक्त रहते इस समस्या पर रोक नहीं नहीं लगाई गई और सार्वजनिक परिवहन की मानसिकता में बदलाव लाने के लिए बुनियादी सुधार नहीं किए गए तो वह दिन दूर नहीं, जब ऐसे घिनौने चेहरे मेट्रो जैसी व्यवस्था में भी दिखने लगे। लेकिन इस पर कारगर लगाम लगाने की वजह फौरी उपायों के जरिए ही इस समस्या का समाधान ढूंढ़ा जा रहा है।
विकसित देशों में सार्वजनिक परिवहन के लिए मुकम्मल नीतियां हैं। इन नीतियों में यात्री प्राथमिक है, उसकी सहूलियतें प्राथमिकता में रखी जाती हैं। वहां बस ऑपरेटर या सार्वजनिक परिवहन संचालक की सहूलियतें दूसरे नंबर पर आती हैं। नई आर्थिकी के साथ कदमताल मिलाते हुए आगे बढ़ने का दावा कर रहे अपने देश में भी अव्वल तो ऐसा ही इंतजाम होना चाहिए था। लेकिन तंत्र की मजबूरियों के चलते मान सकते हैं कि पूरे देश में फिलहाल ऐसी व्यवस्था नहीं हो सकती। लेकिन राजधानी दिल्ली में तो ऐसा किया ही जा सकता है। क्योंकि दिल्ली का भी  दावा है कि वह विकसित देशों की राजधानियों से कदमताल कर रही है। लेकिन दुर्भाग्यवश यहां की सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था ने अब भी दुनिया के दूसरे विकसित देशों से कुछ नहीं सीखा है। बसों के रंग बदल देने भर से बसों और उनमें काम करने वालों का चरित्र नहीं बदल सकता। नब्बे के शुरूआती दशक में डीटीसी की हड़ताल के बाद रेडलाइन बसें रातों रात सड़कों पर उतारने की जो गलती की गई थी, वही गलती बार-बार दोहराई जा रही है। दुनिया के दूसरे विकसित देशों में सार्वजनिक परिवहन के ड्राइवरों और कंडक्टरों का पुलिस सत्यापन कराया जाता है। उनके अतीत और विगत के चरित्र की जांच की जाती रही है। लेकिन दिल्ली में रेडलाइन बसें उतारते वक्त ऐसा नहीं किया गया। उन दिनों जिन लोगों के पास पैसे थे, बस खरीद सकते थे और बेरोजगारी में लप्पे मार रहे थे, उन्हें रातोंरात दिल्ली में बसें चलाने की इजाजत दे दी गई। बिना उन्हें यह बताए हुए कि उन्हें यात्रियों से कैसा सलूक करना होगा। इसलिए रेडलाइन के कर्मचारियों के जरिए जो परिपाटी शुरू की गई, वह बदतमीज परिपाटी अब भी जारी है। बेशक कॉमनवेल्थ के चलते दिल्ली की सड़कों से निजी ब्लूलाइन बसें हटा दी गईं, लेकिन उनमें से ज्यादातर अब ह्वाइटलाइन या चार्टर्ड की शक्ल में फिर से सड़कों पर उतर आई हैं। ब्लूलाइन के ड्राइवर और कंडक्टर ही इन बसों में काम कर रहे हैं। दरअसल प्रशासन और पुलिस मान रही है कि बसों का रंग बदल देने भर से कर्मचारियों का चरित्र भी बदल जाएगा। लेकिन इसका हश्र बसों में बलात्कार और छिनैती जैसी घटनाएं सामने आ रही हैं। दिल्ली को शर्मसार करने वाली बस नोएडा और दिल्ली के बीच जिस रूट पर चलती है, उस पर रोजाना बसों में यात्रियों से बदतमीजी होती है। ये निजी बस चालक डीटीसी और नोएडा अथॉरिटी के बसों को भी अपनी बसों से पीछे चलने को मजबूर करते हैं। विरोध करने वाले यात्रियों से बदतमीजी और मारपीट तक की जाती है। ऐसा नहीं कि इस तथ्य से नोएडा और दिल्ली पुलिस अनजान है। अगर नोएडा और दिल्ली के बीच चलने वाली बसों का सर्वे किया जाय तो ज्यादातर में काम करने वालों का चरित्र संदिग्ध ही मिलेगा। इसे लेकर नोएडा से दिल्ली रोजाना सफर करने वाले लोगों ने बार-बार शिकायतें की हैं। लेकिन कभी इस पर ध्यान नहीं दिया गया।
किसी शहर का सार्वजनिक परिवहन भी उसके चरित्र को बयां करता है। दुर्भाग्यवश दिल्ली का सार्वजनिक परिवहन का चेहरा ज्यादा दागदार है। यहां के ऑटोवाले हों या टैक्सी वाले या निजी बस वाले, ज्यादातर यात्रियों से बदसलूकी अपना वाजिब हक मानते हैं। जब मौका हाथ लगता है तो यह बदसलूकी चरम पर पहुंच जाती है और कोई शर्मसार करने वाली या झकझोर देने वाली घटना सामने आ जाती है। फिर कुछ दिनों तक इस पर होहल्ला मचता है और दिल्ली पटरी पर आ जाती है। अगर यह सिर्फ कानून व्यवस्था का ही मसला होता तो इसे पुलिस के डंडे के जोर पर सुलझाया जा सकता था। हालांकि पुलिस भी अपनी सीमाओं का रोना रोती रहती है।  सार्वजनिक परिवहन व्यस्था को शिष्ट और शालीन बनाना आज ना सिर्फ दिल्ली,बल्कि पूरे राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की जरूरत है। सार्वजनिक परिवहन व्यस्था में काम करने वाले लोगों मसलन बसों के ड्राइवर, कंडक्टर से लेकर टैक्सियों और ऑटो के ड्राइवरों तक का पुलिस सत्यापन होना चाहिए। पुलिस इससे इनकार कर सकती है। लेकिन इसके लिए वाजिब रास्ते निकालने होंगे। फ्लाइओवरों और सड़कों से चमक चुकी दिल्ली के सार्वजनिक परिवहन के चेहरे को भी चमकाना होगा। तभी रात को सवारी ले जाते वक्त कोई टैक्सी ड्राइवर किसी सवारी से बदसलूकी करने से हिचकेगा, कोई ऑटोवाला लुटेरों को जानबूझकर अपने ऑटो में लिफ्ट देने से बचेगा और कोई बस ड्राइवर अपने साथियों के साथ बलात्कार की घटनाओं को अंजाम देने से बचेगा।


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