Thursday, February 14, 2013

राहुल की चुनौतियां


उमेश चतुर्वेदी
(प्रथम प्रवक्ता में प्रकाशित )
जयपुर चिंतन बैठक में पार्टी के औपचारिक तौर पर नंबर दो बनने के बाद कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने जिस तरह बैठकों का दौर शुरू कर दिया है, उससे साफ है कि पार्टी में भले ही औपचारिक तौर पर वे नंबर दो हैं, लेकिन असलियत में वे नंबर एक बनने की प्रक्रिया का एक सोपान पार कर चुके हैं। यह प्रक्रिया कांग्रेस मुख्यालय में 24 जनवरी को नजर आयी, जब उपाध्यक्ष बनने के बाद राहुल गांधी पहली बार वहां पहुंचे। नीली जींस और सफेद कुर्ते में पहुंचे राहुल के इस पहनावे में भी कांग्रेस की भावी संस्कृति और कदमों के संकेत देखे गए। माना गया कि राहुल की कांग्रेस आग और अनुभव का मेल होगी। अपनी नई टीम बनाने के लिए उन्होंने जिस तरह बैठकों का दौर जारी रखा है, उससे अभी तक कोई साफ संकेत तो नहीं निकले हैं। ना ही राहुल गांधी ने अपनी जुबान खोली है। लेकिन यह तय है कि उनकी टीम अनुभव की उतनी ही आंच होगी, जितना नई आग को सुलगाने में उसकी भूमिका होगी।

Friday, February 8, 2013

बयानों के तीर


उमेश चतुर्वेदी
(दैनिक जागरण राष्ट्रीय संस्करण में प्रकाशित)
भारत के सदियों के इतिहास में भारत विभाजन सबसे बड़ा त्रासद अनुभव है...विभाजन की विभीषिका झेल चुकी पीढ़ी अब खत्म होने के कगार पर है। लेकिन उसकी पीड़ा बाद की पीढ़ी के खून तक में समा चुकी है। कांग्रेस प्रवक्ता शकील अहमद के लालकृष्ण आडवाणी के बयान को सिर्फ राजनीति के चश्मे से ही नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि उसे भारत विभाजन की उस त्रासदी से जोड़कर देखा जाना चाहिए, जिसकी कीमत आज तक सीमा पार की एक ही तरह की सभ्यताएं भुगत रही हैं। लालकृष्ण आडवाणी रहे हों या इंद्रकुमार गुजराल या फिर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, इन लोगों ने भारत की तरफ रूख इसलिए नहीं किया था कि उन्हें यहां सत्ता मिलेगी। भारत विभाजन के बाद हिंदुओं और मुसलमानों के बीच जो गहरा अविश्वासबोध फैला था, लाखों लोगों को अपनी बसी बसाई गृहस्थी, पीढ़ियों की खून पसीने की कमाई समेत अपना सबकुछ खो दिया था। इस त्रासदी को लेकर इतिहास के हजारों पन्ने रंगे जा चुके हैं। मशहूर पत्रकार कुलदीप नैय्यर की हाल ही में आई पुस्तक बियांड द लाइन्स में उन्होंने लिखा है कि जब दोनों तरफ की हताश आबादी दूसरी तरफ जा रही थी तो उनकी पीड़ा का वर्णन तक नहीं किया जा सकता था। हो सकता है कि लालकृष्ण आडवाणी को आम लोगों की तरह वैसी पीड़ा झेलते हुए भारत नहीं आना पड़ा हो। लेकिन इसका यह भी मतलब नहीं कि अपनी जड़ों से कटने का दर्द उन्हें नहीं हुआ होगा। इसलिए राजनीतिक तौर पर ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक तौर पर भी ऐसे बयानों को स्वीकार नहीं किया जा सकता।