Thursday, September 12, 2013

श्यामरूद्र पाठक की गिरफ्तारी से उठे भारतीय भाषाओं के सवाल

उमेश चतुर्वेदी
मेरी समझ में वे लोग बेवकूफ हैं जो अंग्रेजी के चलते हुये समाजवाद कायम करना चाहते हैं| वे भी बेवकूफ हैं जो समझते हैं कि अंग्रेजी के रहते हुये जनतंत्र भी आ सकता है| हम तो समझते हैं कि अंग्रेजी के होते यहाँ ईमानदारी आना भी असंभव है| थोड़े से लोग इस अंग्रेजी के जादू द्वारा करोड़ों को धोखा देते रहेंगे|”
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डॉ॰ राममनोहर लोहिया
अगर डॉक्टर लोहिया अंग्रेजी और जर्मन के प्रखर जानकार नहीं होते तो भाषायी स्वाभिमान के मोर्चे पर जैसा भाव देश में दिख रहा है, उनके इस कथन पर उपेक्षात्मक सवाल उठते। भारतीय वैचारिक जगत पर औपनिवेशिक प्रभाव और वैचारिक जड़ता पर लोहिया ने जितने प्रहार किए हैं, उतने शायद ही किसी और नेता और विचारक ने किए हों। लेकिन दुर्भाग्यवश यह जड़ता बढ़ती ही गई। यही वजह है कि आईआईटी दिल्ली से बी टेक और एम टेक श्यामरुद्र पाठक देश के सबसे मजबूत सत्ता केंद्र सोनिया गांधी की रिहायश दस जनपथ के बाहर 225 दिनों तक संविधान के अनुच्छेद 348 ख में बदलाव की शांत मांग को लेकर बैठे रहे। लेकिन देश का भाषायी स्वाभिमान जाग नहीं पाया। 16 जुलाई 2013 को जब तुगलक रोड पुलिस ने गिरफ्तार किया तो उन्होंने पुलिस का खाना खाने से ही मना कर दिया। इससे परेशान पुलिस अफसरों ने उनके परिचितों को फोन करके बुलाना शुरू कर दिया।
पुलिस का सबसे पहला संदेश भारतीय जनता पार्टी के मुखपत्र कमल संदेश के सह संपादक संजीव सिन्हा के पास गया। संजीव को फौरन थाने में हाजिर होने को कहा गया। थाने में पहुंचने के बाद संजीव से कहा गया कि आप श्यामरूद्र पाठक को खाना खिला दें। लेकिन पाठक खाना खाने को तैयार ही नहीं हुए।
संविधान के अनुच्छेद 348 ख का प्रावधान एक हद तक अब भी गुलाम मानसिकता को ही अभिव्यक्त करता है। इसके मुताबिक देश के सभी 17 हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई की भाषा सिर्फ और सिर्फ अंग्रेजी ही होगी। यह परिपाटी अब भी चली आ रही है। मुकदमा करने और विरोधी दोनों पक्षों को पता ही नहीं रहता कि उनके मुकदमे के बारे में वकील क्या बोल रहा है या न्यायमूर्ति ने क्या फैसला सुनाया है। श्यामरूद्र पाठक की मांग इसी अनुच्छेद में सुधार करना है। 1985 में आईआईटी दिल्ली में अपनी प्रोजेक्ट रिपोर्ट हिंदी में लिखने की लड़ाई लड़ चुके पाठक ने चार दिसंबर 2012 से इस मांग के समर्थन में दस जनपथ के बाहर धरना देना शुरू किया। उनके साथ डॉक्टर विनोद पांडे और डॉ गीता मिश्रा जैसे दो अभिन्न सहयोगी ही रहे। इस मसले की गंभीरता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि कांग्रेस की तरफ से महासचिव और अब मंत्री ऑस्कर फर्नांडिस पाठक से मिलने आए। इस दिशा में कदम उठाने का आश्वासन ही दिया। लेकिन बात आगे नहीं बढ़ी। चूंकि नई दिल्ली इलाके में 144 लगी हुई है। लिहाजा सुबह आठ बजे से शाम साढ़े पांच बजे तक तीनों लोग धरना देते थे। शाम को उन्हें पुलिस गिरफ्तार करती थी और तुगलक रोड थाने ले जाती थी। गीता मिश्रा को घर भेज दिया जाता था। लेकिन अगले दिन यह धरना शुरू हो जाता था। इस बीच 17 अप्रैल को राहुल गांधी की एक यात्रा के दौरान एक पुलिसवाले ने पाठक की जमकर पिटाई भी की। हालांकि बाद में उनसे पुलिस अफसरों ने माफी भी मांग ली। पुलिस वाले भी निजी बातचीत में उनकी मांग का समर्थन ही करते रहे हैं। न्यायिक प्रक्रिया से रोजाना साबका पड़ते रहने के चलते उन्हें पता है कि हिंदी या भारतीय भाषा और अंग्रेजी में सुनवाई का क्या अंतर पड़ता है। सीतामढ़ी के मूल निवासी श्यामरूद्र पाठक के इस आंदोलन पर कुछ लोगों को आपत्ति भी रही है। लेकिन उनकी मांग को कोई नाजायज नहीं ठहरा रहा है। उनकी मांग है कि देश के हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में हिंदी समेत इलाके विशेष की भारतीय भाषाओं में सुनवाई की सहूलियत होनी चाहिए। उनकी मांग के समर्थन में धरना स्थल पर वरिष्ठ पत्रकार अच्युतानंद मिश्र, राहुल देव, पुष्पेंद्र चौहान और बलदेव वंशी जैसे भारतीय भाषा समर्थक भी बैठ चुके हैं।
पाठक की मांग की गंभीरता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्हें गिरफ्तारी के बाद 17 जुलाई को मजिस्ट्रेट के सामने पेश किया गया तो वह भी अदब से पेश आया। उनसे अनुरोध किया गया कि वे जमानत ले लें। क्योंकि उन्हें सीआरपीसी की धारा 107/ 151 के तहत गिरफ्तार किया गया था। लेकिन पाठक ने कहा कि वे भारतीय भाषाओं के लिए जेल जाना पसंद करेंगे। नतीजतन उन्हें तिहाड़ भेज दिया गया। अगली सुनवाई 24 जुलाई को जब उन्हें अदालत में पेश किया गया, तब तक फेसबुक के जरिए जानकारी पाकर कई वरिष्ठ वकील संसद मार्ग स्थित मजिस्ट्रेट के दफ्तर पहुंच गए। उन्होंने अपनी जिरह से साबित करने की कोशिश की कि पाठक ने कोई अपराध नहीं किया है। उसी दिन जंतर मंतर पर उनकी गिरफ्तारी और भारतीय भाषाओं के समर्थन में धरना भी दिया गया। जिसमें करीब तीन सौ लोग शामिल हुए। उनमें कई लोग बड़े अफसर थे या ऐसी बड़ी निजी कंपनियों के बड़े मुलाजिम थे, जहां अंग्रेजी का ही बोलबाला माना जाता है। अपने आंदोलन के जरिए आईआईटी में भी हिंदी माध्यम से प्रवेश परीक्षा कराने को लेकर कामयाबी हासिल कर चुके पाठक का कहना है कि उनका आंदोलन जारी रहेगा। वे पीछे हटने वाले नहीं हैं। हालांकि अदालत ने अब उन्हे विरोध प्रदर्शन के लिए दस जनपथ समेत नई दिल्ली के पूरे इलाके में जाने पर रोक लगा दी है। अदालत ने कहा है कि उन्हें अगर धरना ही देना है तो जंतर-मंतर पर ही देना होगा। पाठक को लगता है कि जंतर-मंतर पर धरना देनेभर से देश के सुप्त मानस में हिलोर नहीं पैदा होने वाली है। इसलिए कुछ और करना ही होगा। लेकिन उनका अगला कदम क्या होगा, इस पर अभी फैसला नहीं हो पाया है। अलबत्ता उनकी गिरफ्तारी ने हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में हिंदी और भारतीय भाषाओं में सुनवाई की मांग को लेकर नई हलचल जरूर पैदा कर दी है।
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संविधान ने हाईकोर्ट को छूट दी है कि राज्य सरकार की सहमति से वह अपने यहां भारतीय भाषाओं में सुनवाई की मांग कर सकता है। लेकिन इसके लिए अनुमति गृहमंत्रालय और कानून मंत्रालय ही देगा। इस प्रावधान का फायदा उठाने में राजस्थान उच्च न्यायालय, जोधपुर पहला उच्च न्यायालय है, जहां कामकाज की भाषा अंग्रेजी के अलावा हिंदी भी है।  उसे हिंदी में कामकाज की अनुमति 14 फरवरी, 1950 को मिली थी। इसी तरह इलाहाबाद और पटना उच्च न्यायालयों में भी हिंदी में कामकाज के लिए अनुमति मांगी गई थी, जिन्हें क्रमश: 1970 और 1972 में अनुमति मिली।  मध्य प्रदेश  उच्च न्यायालय, जबलपुर में हिंदी में कामकाज करने की अनुमति 1971 में मिली थी। लेकिन इसके बाद जैसे इस पर रोक ही लग गई। वर्ष 2010 में तमिलनाडु उच्च न्यायालय में तमिल में, 2002 में छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय में हिंदी में और 2012 में गुजरात उच्च न्यायालय में गुजराती में काम करने की अनुमति मांगी गई।  लेकिन केंद्रीय गृह और कानून मंत्रालयों ने इनकार कर दिया। छत्तीसगढ़ सरकार की 2002 की मांग पर इनकार 2010 में आया। इसी से पता चलता है कि भाषायी स्वाभिमान को लेकर केंद्र सरकार और उसके रहनुमाओं की सोच क्या है।

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