Friday, September 20, 2013

आडवाणी के बदले बोल से क्या थमेगा सत्ता संघर्ष


उमेश चतुर्वेदी
छत्तीसगढ़ के कोरबा ने क्या इतिहास रचने की दिशा में एक कदम बढ़ा दिया है..यह सवाल इन दिनों दो तरह से लोगों के जेहन में घूम रहा है। एक तो यह कि क्या भारतीय जनता पार्टी में शीर्ष स्तर पर मचा सत्ता का संघर्ष खत्म हो गया है ? क्या पार्टी के शीर्ष पुरूष और अयोध्या आंदोलन के प्रमुख सेनानी अपने मौजूदा रूख पर कायम रहेंगे। भारतीय जनता पार्टी की अंदरूनी परिधि के बाहर इस सवाल के अलावा भी चिंताएं और उम्मीदें हैं। मोदी विरोधियों, जिनमें ज्यादातर बाहरी और गैर भारतीय जनता पार्टी वाले दल हैं, उन्हें सांप्रदायिकता और दंगों के दागी के खिलाफ कोरबा की कहानी में भी नई रणनीति दिखती है। क्योंकि कोरबा से अयोध्या आंदोलन के महारथी ने अपने शिष्य को सीधे तौर पर समर्थन नहीं दिया। लालकृष्ण आडवाणी ने गुजरात में बिजली की उपलब्धता और विकास की प्रशंसा की।
लगे हाथों यह भी कह दिया कि अगर भारतीय जनता पार्टी की सरकार आई तो गुजरात की तरह पूरे देश का विकास होगा। निश्चित तौर पर गुजरात की इस विकासगाथा के कामयाब रचनाकार नरेंद्र मोदी हैं। लिहाजा मोदी समर्थकों ने मान लिया कि उन आडवाणी का सुर अब बदल गया है, जिन्होंने प्रधानमंत्री पद पर नरेंद्र मोदी की उम्मीदवारी के ऐलान का विरोध किया था। निश्चित तौर पर यह बदलाव भारतीय जनता पार्टी के उन कार्यकर्ताओं को खुश कर गया, जो अब मोदी के सहारे ही दिल्ली के रायसीना हिल्स के बड़े दफ्तरों से देश को दीनदयाल उपाध्याय की विचारधारा से चलाने का स्वप्न सच होता देख रहे हैं। लेकिन गौर से देखने पर पता चलेगा कि यह उत्साह सिर्फ उन कार्यकर्ताओं में हैं, जिनके लिए सत्ता का उपरी संघर्ष उतना मायने नहीं रखता। जिन्हें कांग्रेस और दूसरे दलों के बरक्स अपनी विचारधारा और शासन बेहतर नजर आता है। उन्हें लग रहा है कि कांग्रेस के दस साल के राज में महंगाई और भ्रष्टाचार ने सत्ता और समाज में जिस गहरे हद तक जड़ें जमा लीं हैं, मोदी की अगुआई में आने वाली नई सरकार उन्हें इससे निजात दिलाएगी। भारतीय जनता पार्टी के आम कार्यकर्ता इसलिए भी खुश हैं कि भारतीयता के स्वाभिमान की कमजोर पड़ती धारा में मोदी की अगुआई में नया संचार होगा। उनकी इन सब बातों का आधार गुजरात का विकास है।
लेकिन भारतीय जनता पार्टी में ही एक वर्ग ऐसा है, जिसे आडवाणी के इस कदम के बावजूद पार्टी के शीर्ष का सत्ता संघर्ष कम होता नजर नहीं आ रहा है। क्योंकि कोरबा में आडवाणी ने सीधे-सीधे मोदी का नाम लेकर प्रशंसा नहीं की। उन्होंने सिर्फ और सिर्फ गुजरात के विकास का जिक्र किया था। वैसे मोदी की उम्मीदवारी पर विरोध जताकर उन्होंने मोदी की राह में रोड़े बिछाने की भरपूर कोशिश की। यह सच है कि आज भारतीय जनता पार्टी जिस मुकाम पर है, उसके पीछे आडवाणी की ही रणनीतिक सोच रही है, जिसके आधार पर उन्होंने आगे काम किया। पार्टी की तरफ से उन्हें मौका भी दिया गया। 2009 में उनकी ही अगुआई में भारतीय जनता पार्टी ने चुनाव लड़ा। यहां यह भी गौर करने की बात है कि 2009 में उन्हें अगुआई तब दी गई थी, जब कुछ साल पहले जिन्ना प्रकरण के चलते पार्टी अध्यक्ष पद से हटा तक दिए गए थे। इसके बावजूद पार्टी के इस शीर्ष पुरूष पर भारतीय जनता पार्टी ही नहीं, पार्टी का उत्सकेंद्र राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को भी उनके लिए आदर का भाव रखता था। 2009 की उम्मीदवारी इस आदर का ही प्रतीक थी। लेकिन उनकी अगुआई में भारतीय जनता पार्टी और एनडीए सत्ता के शीर्ष तक पहुंचने में कामयाब नहीं हो पाए। जिस दिन चुनाव नतीजे आए, उसी दिन तय हो गया था कि अब आडवाणी को अगली बार शायद ही मौका मिले। क्योंकि तभी सियासी फिजाओं में यह चर्चा तैरने लगी थी कि आडवाणी को अगली बार शायद ही मौका मिले। हालांकि उसके पहले तक यह कहा जा रहा था कि अगर आडवाणी को मौका मिलेगा और अगर वे प्रधानमंत्री बने तो उनके मंत्रिमंडल में गृहमंत्री नरेंद्र मोदी ही बनेंगे।
सवाल यह है कि क्या आडवाणी के बदले रूख से भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष पर जारी सत्ता संघर्ष खत्म हो जाएगा। लेकिन फिलहाल ऐसा नहीं लगता। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि आडवाणी की यह कवायद पार्टी में अपनी स्वीकार्यता बनाए रखने की कोशिश है। आडवाणी के तमाम विरोधों को दरकिनार करते हुए जिस तरह भारतीय जनता पार्टी ने मोदी के नाम को मंजूरी दी, उससे तय हो गया था कि आडवाणी को अब पार्टी कम से कम इस मसले में और ज्यादा तवज्जो नहीं देने जा रही। अयोध्या आंदोलन के महारथी को मनाने की कोशिशें अगर हुईं तो सिर्फ इसलिए कि मीडिया और भारतीय जनता पार्टी के बाहर वितंडा ना खड़ा हो सके, जिसका फायदा उन वोटरों की मानसिकता बीजेपी विरोधी बनाने में भारतीय जनता पार्टी विरोधी दल उठा लें, जो शीर्ष सत्ता के संघर्ष पर निगाह तो गड़ाए हुए हैं, लेकिन ना तो वे कांग्रेस के समर्थक हैं और ना ही भारतीय जनता पार्टी के। भारतीय जनता पार्टी भी मान कर चल रही है कि इनमें से ज्यादातर कांग्रेस के कुशासन के चलते आई महंगाई और भ्रष्टाचार के विरोधी हैं। पार्टी के सामने सबसे बड़ी चुनौती इन्हीं वोटरों को अपने पाले में लाने की है। मोदी के समर्थन में ज्यादातर उत्साही तो वही कार्यकर्ता नजर आ रहा है, जिसकी वैचारिक नाभिनाल भारतीय जनता पार्टी या राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ी हुई है। हालांकि युवाओं का एक बड़ा वर्ग ऐसा जरूर है, जिसे बदलते दौर का राष्ट्रवाद, विकास और दबंग भारत की भावी छवि ज्यादा प्रभावित कर रही है। उनमें से ज्यादातर न्यू मीडिया का इस्तेमाल भी कर रहा है और उसे मोदी में एक उम्मीद नजर आती है।
भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष में सिर्फ सुषमा स्वराज ही फिलहाल आडवाणी जी के नजदीक आ रही हैं। एक दौर में भारतीय महिलाओं की प्रतीक और ओजस्वी वक्ता रहीं सुषमा स्वराज भी प्रधानमंत्री पद की दौड़ में मानी जाती रही हैं। पार्टी के शीर्ष पर संभवत: वे अकेली नेता हैं, जिनकी पृष्ठभूमि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ वाली नहीं रही है। जानकार प्रधानमंत्री पद की उनकी राह में इसे बाधा बनाते रहे हैं। लेकिन उनकी यह बाधा अच्छाई में तब बदल सकती है, जब भारतीय जनता पार्टी को लोकसभा चुनावों में 200 के आसपास सीटें ना मिलें। जिसकी अब भी ज्यादा संभावना जताई जा रही है। तब बाहरी दलों से समर्थन जुटाने में सुषमा स्वराज की समाजवादी पृष्ठभूमि काम आ सकती है। इसलिए यह मान लेना कि भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष स्तर पर सत्ता संघर्ष थम गया है, यह जल्दबाजी होगी। वैसे आडवाणी के गुजरात समर्थन को भी चुनाव बाद के हालत की तैयारी के तौर पर देखा जा रहा है। अयोध्या आंदोलन के दौरान घोर सांप्रदायिक माने जाते रहे आडवाणी आजकल ना सिर्फ नीतीश कुमार के चहेते बन गए हैं, बल्कि गाहे-बगाहे वामपंथी दल भी उनकी शान में कशीदे काढ़ते रहे हैं। भारतीय जनता पार्टी में अलग-थलग दिखते आडवाणी को लेकर विपक्षी दलों का यह बदलाव चौंकाने वाला है। बेशक इसमें जिन्ना प्रकरण ने भी अपनी भूमिका निभाई। आडवाणी की यही इन दिनों पूंजी भी है। इस पूंजी के सहारे वे भी चुनाव बाद के हालात में सार्थक और कामयाब हस्तक्षेप की उम्मीद पाले हुए हैं।
भारतीय जनता पार्टी के शिखर नेतृत्व में वेंकैया नायडू और अनंत कुमार भी आडवाणी के ही शिष्य माने जाते रहे हैं। लेकिन वेंकैया के गृहराज्य आंध्र में भारतीय जनता पार्टी की क्या वकत है। यह किसी से छिपा नहीं है। अनंत कुमार बेशक बेंगलुरू की अपनी सीट जीतते रहे हैं, लेकिन उनके राज्य कर्नाटक में अपनी मॉस अपील नहीं है। सही मायनों में इन दोनों नेताओं की जननेता की छवि नहीं रही। रायसीना हिल्स की राजनीति पर पैनी निगाह रखने वाले लोगों को पता है कि इन दोनों के शीर्ष स्तर तक पहुंचने में आडवाणी के आशीर्वाद का बड़ा योगदान रहा है। यह बात और है कि जैसे ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने मोदी के नाम पर मुहर लगाने की आखिरी झंडी दे दी, इन दोनों नेताओं ने संघ की इच्छा के मुताबिक खुद को ढालने में देर नहीं लगाई। इसलिए फिलहाल मोदी की अगुआई पर इनकी तरफ से सवाल उठने का सवाल भी पैदा नहीं होता। वैसे राजधानी की राजनीति में एक चर्चा यह भी है कि आडवाणी की इच्छा बदलने और प्रकारांतर से ही सही, मोदी को लेकर आडवाणी की राय बदलने में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह कार्यवाह भैयाजी जोशी ने बड़ी भूमिका निभाई है। उन्होंने ही संघ प्रमुख मोहन राव भागवत का संदेश आडवाणी को दिया और समझाने में कामयाब रहे कि भारतीय जनता पार्टी के हित में मोदी को लेकर उन्हें अपना रवैया बदल लेना चाहिए। बहरहाल एक बात तय है कि फिलहाल मोदी को लेकर भारतीय जनता पार्टी के शीर्ष का सत्ता संघर्ष थमा नजर आएगा। अंदरखाने से दांवपेच का खेल चलता रहेगा। वैसे यह भी सच है कि भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ताओं की मांग के आगे पार्टी नेतृत्व भी असहाय है। लेकिन अंदरखाने के सत्ता संघर्ष को ताकत तभी मिलेगी, जब भारतीय जनता पार्टी बहुमत के जादुई आंकड़े तक नहीं पहुंच पाएगी। तब हो सकता है कि पार्टी के शीर्ष नेतृत्व का बड़ा धड़ा पाला बदलने में देर नहीं लगाए। कहना ना होगा कि मोदी को भी इस खेल का आभास है। लिहाजा उनकी कोशिश ज्यादा से ज्यादा वोटरों को लुभाने की है।

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