Saturday, September 13, 2014

इंसानियत की तरफ बढ़े हाथ


उमेश चतुर्वेदी
(नवभारत टाइम्स में प्रकाशित) 
तपती गरमी के बीच बारिश की फुहारें जिंदगी में जैसे नई लहर लेकर आती हैं..जीने और नए तरीके से सोचने की लहर..इस लहर को बार-बार महसूस किया है...लहजा बदल सकता है..हरफ बदल सकते हैं..लेकिन बारिश के साथ जिंदगी का यह अनुभव हर शख्स को होता ही है..लेकिन यह बारिश भी जिंदगी में एक नए तरह का अनुभव करा जाएगी..ऐसा कभी सोचा भी नहीं था..नियति में तमाम भरोसे के बावजूद इस अनुभव को संजोग ही कह सकते हैं..दफ्तरी भागमभाग और जुतम-जुताई के बाद थकान उतारने का अपना एक ही जरिया है गप्पबाजी..कभी वह कोरी होती है तो कभी उसमें बौद्धिकता का छौंका भी लग जाता है..जुलाई के आखिरी हफ्ते के उस दिन दफ्तर से निजात के बाद खुद को सहज करने के लिए उस दिन भी एक अड्डे पर जाने का विचार था..लेकिन अचानक आई बारिश ने इरादा बदलने को बाध्य कर दिया...दरअसल जिस अड्डे पर जाना था, वहां आने वाले कई अड्डेबाज बारिश में फंस गए थे.

Thursday, September 11, 2014

कहां हैं जेहादी और हुर्रियत के लोग

उमेश चतुर्वेदी
जम्मू-कश्मीर की भयावह बाढ़ 16 जून 2013 को उत्तराखंड मेंआए विनाशकारी जलप्रलय की याद दिला रही है। मीडिया की खबरें कश्मीर ही नहीं, जम्मू में बाढ़ और नदियों में समाई जिंदगियों और बस्तियों की कहानी से अटी पड़ी है। राजौरी जिले के एक दो मंजिला मकान के नदी में समाहित होने की तस्वीर कुछ ऐसे ही मीडिया में साया हुई है, जैसे पिछले साल गंगा और उसकी सहयोगी अलकनंदा नदी में उत्तराखंड में कुछ घर और बिल्डिंगें समा गई थीं और देखते ही देखते वहां जिंदगी का नामोनिशान मिट गया था। जम्मू में तवी नदी के किनारे स्थित गणेश जी की मूर्ति बाढ़ में उत्ताल उठती लहरों से कुछ वैसे ही मोर्चा संभाले हुए मीडिया रिपोर्टो में  नजर आती रही, जैसे पिछले साल ऋषिकेश में गंगा की लहरों से भगवान शंकर की मूर्ति ने दो-दो हाथ किया था। बाहरी दुनिया के लिए उत्तराखंड की विनाशलीला के प्रतीक के तौर पर लहरों के बीच खड़ी शंकर की मूर्ति बनी थी। यह दुर्योग ही है कि ठीक पंद्रह महीने बाद जम्मू में भगवान शंकर के बेटे भगवान गणेश की प्रतिमा जम्मू-कश्मीर के जल प्रलय का प्रतीक बन गई है।

Thursday, September 4, 2014

सुलभ क्रांति का नया दौर : साक्षात्कार

प्रधानमंत्री के मिशन टॉयलेट पर सुलभ इंटरनेशनल के संस्थापक विंदेश्वर पाठक से वरिष्ठ पत्रकार उमेश चतुर्वेदी की बातचीत
सुलभ क्रांति का नया दौर : साक्षात्कार
हर साल स्वतंत्रता दिवस यानी पंद्रह अगस्त को लालकिले से प्रधानमंत्री का राष्ट्र के नाम संबोधन में दरअसल देश की भावी नीतियों और योजनाओं की ही झलक मिलती रही है। 67 साल से साल-दर-साल प्रधानमंत्री के भाषण में कई बार सिर्फ रस्मी घोषणाएं भी होती रही हैं। लेकिन इस बार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कुछ अलग हटकर भी घोषणाएं कीं। जिन्हें लेकर देश इन दिनों संजीदा भी दिख रहा है। ऐसी ही एक घोषणा मिशन शौचालय की भी रही। इसमें प्रधानमंत्री ने निजी और कारपोरेट सेक्टर से अपील की कि वे स्कूलों में बच्चियों-लड़कियों के शौचालय बनवाने के लिए आगे आएं। हाल के दिनों में दूर-दराज के इलाकों में बच्चियों और महिलाओं से ज्यादातर रेप की घटनाएं खुले  में शौच के  लिए  जाने  के  दौरान  हुई। इन अर्थों में प्रधानमंत्री की अपील को गहराई से महसूस किया जा रहा है। देश में सुलभ शौचालयों के जरिए क्रांति लाने में विंदेश्वर पाठक का बड़ा योगदान है। उन्होंने मैला ढोने वाले समुदाय की मुक्ति की दिशा में भी बड़ा काम किया है। शौचालयों के जरिए क्रांति लाने वाले विंदेश्वर पाठक इस सिलसिले में क्या सोचते हैं, इसे लेकर की गई बातचीत के संपादित अंश पेश हैं-
पाठक जी, सबसे पहला सवाल यह है कि प्रधानमंत्री की इस योजना को आप किस तरह देखते हैं?
gandhiji
स्वयं अपने शौच की सफ़ाई को, गांधीजी ने एक बड़े सामाजिक आंदोलन का रूप दिया
देखिए शौचालय की क्रांति की दिशा में इस देश में अब तक महात्मा गांधी और मैंने ही काम किया है। इसके बाद मोदी जी पहले व्यक्ति हैं, जिन्होंने इतनी संजीदगी से इस मसले को उठाया है। ऐसा नहीं कि बाकी लोगों ने इस मसले को नहीं उठाया।