Saturday, September 13, 2014

इंसानियत की तरफ बढ़े हाथ


उमेश चतुर्वेदी
(नवभारत टाइम्स में प्रकाशित) 
तपती गरमी के बीच बारिश की फुहारें जिंदगी में जैसे नई लहर लेकर आती हैं..जीने और नए तरीके से सोचने की लहर..इस लहर को बार-बार महसूस किया है...लहजा बदल सकता है..हरफ बदल सकते हैं..लेकिन बारिश के साथ जिंदगी का यह अनुभव हर शख्स को होता ही है..लेकिन यह बारिश भी जिंदगी में एक नए तरह का अनुभव करा जाएगी..ऐसा कभी सोचा भी नहीं था..नियति में तमाम भरोसे के बावजूद इस अनुभव को संजोग ही कह सकते हैं..दफ्तरी भागमभाग और जुतम-जुताई के बाद थकान उतारने का अपना एक ही जरिया है गप्पबाजी..कभी वह कोरी होती है तो कभी उसमें बौद्धिकता का छौंका भी लग जाता है..जुलाई के आखिरी हफ्ते के उस दिन दफ्तर से निजात के बाद खुद को सहज करने के लिए उस दिन भी एक अड्डे पर जाने का विचार था..लेकिन अचानक आई बारिश ने इरादा बदलने को बाध्य कर दिया...दरअसल जिस अड्डे पर जाना था, वहां आने वाले कई अड्डेबाज बारिश में फंस गए थे.
.बारिश हो तो राजधानी दिल्ली का ट्रैफिक बौरा जाता है...ऐसे भागने की कोशिश करता है..मानो हिरण के पीछे चीता लपक पड़ा हो..लेकिन बारिश के बीच अक्सर राजधानी के चौराहे की बत्तियां गुल हो जाती हैं और इसके बाद चीतल की तरह भागता ट्रैफिक आगे निकलने की होड़ में अजगर की मानिंद सुस्त हो जाता है..तो इसी भागमभाग और सुस्ती से बचने के लिए अड्डेबाजों ने गप्पबाजी को उस दिन को मुल्तवी कर दिया..लिहाजा अपने राम को भी मेट्रो की दूसरी राह पकड़नी पड़ी..इसी दूसरी राह में चलते वक्त नया अनुभव हुआ..ऐसा अनुभव जिससे अब तक लगातार शहराती समाज और संस्कार को कोसने और सुदूर पीछे छूटे अपने गंवई समाज और बोध को याद करते रहने की अपनी आदत पर हैरत भी हुई..
वाकया राजीव चौक मेट्रो स्टेशन का है..गुड़गांव मेट्रो को पकड़ने के लिए जमीन के नीचे जाने वाले रास्ते की तरफ बढ़ा तो पुलिस बूथ से गिनकर दस कदम आगे एक महिला रोती हुई नजर आई..साथ में उसका सामान और तीन नन्हें-मुन्ने बच्चे बैठे पड़े थे..पहली ही नजर में महिला उस समाज की नजर आ रही थी..जिसे हमारे खबरिया चैनल डाउन मार्केट या लोअर मिडिल क्लास कहते हुए उस समाज के तकलीफों की चर्चा से दूर रहने में ही अपनी बहादुरी समझते हैं..लेकिन महिला के पास
एक युवा आधुनिका खड़ी थी..महिला के आंसुओं से तरबतर चेहरे और लाल आंखों ने किसी मल्टीनेशनल कंपनी में काम करने वाली उस लड़की को खींच लिया था..अभी वह महिला से रोने का कारण पूछ ही रही थी कि बिल्कुल चमकदमक कपड़े और जूतों से लैस हाथ में महंगा टेबलेट और फोन लिए एक लड़का भी आ गया। उसने भी महिला की परेशानी पूछी..पता चला कि वह महिला अपने तीन नन्हें बच्चों और एक पंद्रह साल के बड़े बच्चे के साथ छपरा से आई थी..राजीव चौक से उसे बदरपुर जाने वाले रूट के लिए मेट्रो पकड़नी थी..उसी मेट्रो की तरफ वह सामान और तीन छोटे बच्चों के साथ बढ़ी..लेकिन भीड़ की रेलमपेल में उसका बड़ा बच्चा मेट्रो में चढ़ गया..उसके ही साथ उसका मोबाइल और खाने के सामान वाला झोला भी चला गया...धुर देहाती महिला को समझ ही नहीं आ रहा था कि वह क्या करे..झक मारकर वह उपर अपने तीनों बच्चों के साथ आकर बैठ गई थी..बातचीत से पता चला कि वह सुबह करीब दस बजे से वहां बैठी थी..तब से उसके बड़े बच्चे का पता नहीं था..उसे अपने पति और घरवालों का फोन नंबर तक नहीं पता था..तीनों छोटे बच्चे भूख से छटपटा रहे थे..महिला से पूछताछ करने वाली लड़की ने पहला काम यह किया कि वह एक बच्चे को लेकर कैफेटेरिया चली गई और उसके साथ खाने का सामान लेकर लौटी..लड़का भागकर पुलिस बूथ में पहुंचा..उसके बाद तो मेट्रो प्रशासन के अधिकारी भी आ गए..इसके बाद शूरू हुई महिला से पूछताछ..पता चला कि उसका पति फरीदाबाद में कहीं काम करता है और सूरजनगर में रहता है...वहीं वह जा रही थी..तो यह हादसा हो गया..तब तक भीड़ लग गई थी..उस भीड़ में से महिला का सहयोग करने के लिए हाथ आगे बढ़ने लगे थे..दिलचस्प यह है कि आगे बढ़ने वाले हाथों में सबसे ज्यादा संभ्रांत शहरी परिवारों के युवा लड़के और लड़कियां ही थे। कोई खाने के लिए पूछ रहा था तो कोई महिला को ढांढस बंधा रहा था..तो कोई बच्चों के लिए पानी की बोतलें खरीद कर ला रहा था..
तब तक वहां पहुंचे मेट्रो प्रशासन के अधिकारियों को यह भीड़ नागवार लगने लगी..एक युवा अफसर ने पुलिसवालों और सिक्युरिटी गार्ड को आदेश सुना दिया..आदेश यह कि भीड़ से प्लेटफॉर्म खाली कराओ..लेकिन मदद के लिए आगे बढ़े युवा पीछे हटने को तैयार नहीं थे..तब मेट्रो अधिकारियों का जवाब था..भाई हम इन्हें इनके घर तक पहुंचवा देंगे..आप फिक्र नहीं करें..मेट्रो अधिकारियों की तरफ सवाल भी उछले कि स्टेशन पर सीसीटीवी कैमरे होने के बावजूद करीब आठ घंटे से बैठी महिला की तरफ मेट्रो प्रशासन का ध्यान क्यों नहीं गया..
परेशान निबट देहाती महिला को सहयोग के बढ़े हाथों ने संबल दे दिया था..संबल देने वाले ज्यादातर हाथ उस वर्ग के थे, जिसके युवाओं पर आए दिन स्टंट करने, अनियंत्रित रफ्तार के दिल्ली में गाड़ी चलाने, तहजीब को छोड़ने और बात-बेबात झगड़ा और मारपीट करने के आरोप लगते रहते हैं..सड़कों पर रोडरेज में भी ज्यादातर इसी वर्ग के लोगों पर आरोप लगते रहे हैं..इससे इस वर्ग की बेहद खराब छवि बनी है..लेकिन मेट्रो की घटना ने साबित किया कि इंसानियत के साथ शिद्दत से जीने वाले उस वर्ग में भी हैं..जिन्हें अपमार्केट समाज माना जाता है..जिनके बारे में माना जाता है कि उनके अंदर दिल नहीं, सिर्फ दिमाग रहता है..

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