Monday, December 8, 2014

पर्रिकर बन पाएंगे वाई बी चव्हाण?

उमेश चतुर्वेदी
मनोहर पर्रिकर की रक्षा मंत्री पद नियुक्ति ने एक बार इतिहास को दोहराया है. लोकतांत्रिक भारतीय इतिहास में ये दूसरा मौका जब किसी मुख्यमंत्री को इस्तीफा दिलाकर केंद्र में रक्षा मंत्री बनाया गया है. तकनीकी रूप से मनोहर पर्रिकर भले ही मराठी व्यक्ति ना हो, लेकिन मूलतः वे भी मराठी ही हैं. यानी पहली बार किसी मराठी व्यक्ति को ही अपने राज्य से इस्तीफा दिलाकर केंद्र में लाया गया था, दूसरी बार भी मराठी अस्मिता को ही नायक पर देश की रक्षा जिम्मेदारी सौंपी गई है. 1962 में चीनी हमले से पस्त भारतीय मानस को संभालने और उत्साहित करने की जिम्मेदारी महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री यशवंत राव चव्हाण को दी गई. वीके कृष्णमेनन के रक्षा मंत्री पद से इस्तीफे के बाद तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू को यशवंत राव चव्हाण पर ही भरोसा जमा. इस बार बेशक वैसे हालात नहीं हैं. सीमा पर आक्रमण को अगर छिटपुट घटनाओं को छोड़ दे तो भारतीय जनमानस अब 1962 जैसी हालत में हताश नहीं है. लेकिन यह संयोग जरुर है कि भारत को रक्षा क्षेत्रा में आज भी चीन से ही कड़ी और मुश्किल चुनौती ना सिर्फ मिल रही है बल्कि भारतीय राजनय इससे जूझ रहा है. 52 साल पहले यशवंत राव चव्हाण की मुश्किलें जरुर बड़ी थीं. लेकिन गोवा जैसे अपेक्षाकृत शांत राज्य के मुख्यमंत्री रहे और अब दिल्ली लाए गए मनोहर पर्रिकर की चुनौतियां भी कम नहीं हैं.

विरासत की राजनीति की विदाई का दौर

उमेश चतुर्वेदी
पहले आम चुनावों और अब हरियाणा और महाराष्ट्र के चुनावों में क्या समानता है..वक्त आ गया है कि तीनों चुनावों के नतीजों और उससे निकले राजनीतिक संकेतों को अब समझने-बूझने की कोशिश की जाय। नब्बे के दशक में खासतौर पर उत्तर भारत में क्षेत्रीय अस्मिताओं के उभार के बाद राजनीतिक पंडित यह मानने लगे थे कि अब उत्पीड़ितों का समाजशास्त्र विचारधारा के स्तर पर एक ऐसी राजनीति में तबदील होने जा रहा है, जहां क्षेत्रीय आंकाक्षाओं के प्रतिनिधि दल मुख्यधारा की भारतीय राजनीति के ऐसे तत्व होंगे, जिनके बिना भारतीय राजनीति की अग्रगामी धारा की कल्पना नहीं की जा सकती। क्षेत्रीय आकांक्षाओं के उभार और छोटी जातियों-समूहों के राजनीतिक ताकत के तौर पर बदलाव के इसी दौर में महसूस किया गया कि दरअसल भारतीय लोकतंत्र करीब पांच सौ ऐसे परिवारों के छोटे-छोटे राजतंत्रीय व्यवस्था का ही समुच्चय है, जिनके इशारे पर राजनीति चलती है। ऐसे परिवार हर राजनीतिक दल में रहे हैं और क्षेत्रीय अस्तित्ववादी सोच के प्रबल होने और उसके जरिए विकसित हुई स्थानीय राजनीति से उम्मीद की गई थी कि कम से कम वह इस परिपाटी से बचेगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ तो स्थानीय अस्मिताओं की सोच में भी बदलाव आने लगा है। तो क्या यह मान लिया जाय कि भारतीय लोकतंत्र परिपक्वता की ओर बढ़ रहा है।

Friday, December 5, 2014

बीएचयू विवाद में पुलिस कार्रवाई पर सवाल

उमेश चतुर्वेदी
काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में छात्र संघ बहाली के मसले पर हुए छात्र संघर्ष ने हाल के दिनों में रैंकिंग में टॉ तीन में स्थान बनाने वाले इस विश्वविद्यालय के माहौल पर तो सवाल खड़ा किया ही है, उससे बड़ा सवाल इस संघर्ष से निबटने के तरीकों को लेकर उत्तर प्रदेश के प्रशासनिक और पुलिस अमले पर भी उठा है. बड़ा सवाल यह है कि छात्रों के संघर्ष को रोकने और आपसी तनाव को भापने में वाराणसी प्रशासन क्यों चूक गया? उससे भी बड़ा सवाल यह है कि हजारों कीं संख्या वाले विश्वविद्यालय के दो बड़े छात्रावासों बरला और ब्रोचा को सिर्फ दो घंटे में खाली कराने का तुगलकी फरमान पुलिस को क्यों दिया गया? अपनी लाठियों के जरिए मासूम जनता पर क्रूरता के लिए मशहूर उत्तरप्रदेश की पीएसी के जवानों ने जिस तरह लाठी मार-मार कर छात्रावासों को खाली कराया, उससे सवाल यह उठता है कि क्या उत्तर प्रदेश पुलिस अब भी उन्नसवीं सदीं में ही जी रही है? इक्कीसवीं सदीं में चल रही हैदराबाद की पुलिस अकादमी में दी जाने वाली ट्रेनिंग पर भी सवाल उठाने का वक्त गया है, क्योंकि हॉस्टल खाली कराए जाने के प्रशासनिक फैसले के चलते 200 से ज्यादा छात्र घायल हुए हैं. पुलिस लाठियों और बर्बर कार्रवाही से चोर का निशान लेकर ये छात्र पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के अपने गांवों में लौट गए हैं. लेकिन उनमें से ज्यादातर के घरवालों का सवाल है कि आखिर उनके बच्चों का क्या दोष था कि उन्हें हल्दी-दूध पिलाकर और मरहम पट्टी करके पीठ-पैर पर पड़े जख्मों को भरने का इंतजार करना पड़ रहा है.