Monday, December 8, 2014

विरासत की राजनीति की विदाई का दौर

उमेश चतुर्वेदी
पहले आम चुनावों और अब हरियाणा और महाराष्ट्र के चुनावों में क्या समानता है..वक्त आ गया है कि तीनों चुनावों के नतीजों और उससे निकले राजनीतिक संकेतों को अब समझने-बूझने की कोशिश की जाय। नब्बे के दशक में खासतौर पर उत्तर भारत में क्षेत्रीय अस्मिताओं के उभार के बाद राजनीतिक पंडित यह मानने लगे थे कि अब उत्पीड़ितों का समाजशास्त्र विचारधारा के स्तर पर एक ऐसी राजनीति में तबदील होने जा रहा है, जहां क्षेत्रीय आंकाक्षाओं के प्रतिनिधि दल मुख्यधारा की भारतीय राजनीति के ऐसे तत्व होंगे, जिनके बिना भारतीय राजनीति की अग्रगामी धारा की कल्पना नहीं की जा सकती। क्षेत्रीय आकांक्षाओं के उभार और छोटी जातियों-समूहों के राजनीतिक ताकत के तौर पर बदलाव के इसी दौर में महसूस किया गया कि दरअसल भारतीय लोकतंत्र करीब पांच सौ ऐसे परिवारों के छोटे-छोटे राजतंत्रीय व्यवस्था का ही समुच्चय है, जिनके इशारे पर राजनीति चलती है। ऐसे परिवार हर राजनीतिक दल में रहे हैं और क्षेत्रीय अस्तित्ववादी सोच के प्रबल होने और उसके जरिए विकसित हुई स्थानीय राजनीति से उम्मीद की गई थी कि कम से कम वह इस परिपाटी से बचेगी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ तो स्थानीय अस्मिताओं की सोच में भी बदलाव आने लगा है। तो क्या यह मान लिया जाय कि भारतीय लोकतंत्र परिपक्वता की ओर बढ़ रहा है।

आजादी के बाद रजवाड़ों ने सबसे ज्यादा स्वतंत्र पार्टी के हाथ थामे थे। लोकतांत्रिक राजनीति की डोर पकड़कर दरअसल वे अपने राजनय को ही बचाने की कोशिश में थे। जब स्वतंत्र पार्टी कमजोर हुई तो जमींदारों और रजवाड़ों का झुकाव कांग्रेस और बाद के दौर में जनसंघ की तरफ बढ़ा। तब शायद जनसंघ और बाद में उसके दूसरे अवतार भारतीय जनता पार्टी को अपने उभार के लिए इन रजवाड़ों और जमींदारों की जरूरत तो थी। लेकिन आजादी के आंदोलन के दौरान ही भारतीय जनमानस का प्रतीक बन चुकी कांग्रेस को रजवाड़ों और जमींदारों के सहयोग से अपना लोकतांत्रिक आधार बढ़ाने के साथ ही संसद और विधानसभाओं में अपनी पहुंच और पकड़ बनाने की जरूरत क्यों महसूस हुई, इस पर गहन शोध की जरूरत तो है। लेकिन यह भी सच है कि भारतीय मानसिकता में आजादी के आंदोलन के दौरान भी कम से कम पश्चिमी अवधारणा वाले लोकतंत्र को समझने और आत्मसात करने का भाव नहीं आ पाया। उसे पैसे,रसूख और जमींदारी खानदान ज्यादा लुभाते रहे। इसका असर यह हुआ कि देशभर में सिर्फ पांच-छह सौ परिवारों के पास राजनीति गिरवी होती गई। इन परिवारों के बीच से भी कभी कोई नया चेहरा उभरा भी तो कालांतर में उसने भी लोकतांत्रिक समाज में नये तरह के राजतंत्र की ही स्थापना की। सांसद का बेटा सांसद, विधायक का बेटा विधायक, सांसद की पत्नी और बेटी भी विधायक, और तो और ब्लॉक प्रमुख तक के पद परिवार के ही पास सुरक्षित रखे जाने लगे। दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक समाज होने का दावा करने वाले अपने देश में गांधी-नेहरू परिवार प्रथम परिवार की तरह तो स्थापित हो ही चुका है। लेकिन पिछले आम चुनावों ने अब लोकतांत्रिक समाज के राजतंत्री विरासतवाद को किनारे करना शुरू कर दिया है।
हरियाणा और महाराष्ट्र के विधानसभा चुनावों में विरासत की जंग कमजोर हुई है। हाल के दिनों तक माना जाता था कि हरियाणा की राजनीति तीन लालों के परिवार के बिना आगे नहीं बढ़ सकती। बेशक इस सोच में पिछले दस सालों से सेंध भूपिंदर सिंह हुड्डा ने लगा रखी थी। इसके बावजूद देवीलाल, बंसीलाल और भजनलाल के परिवारों के बिना इस राज्य की राजनीति को आगे बढ़ने की कल्पना भी नहीं की जा सकती थी। देवीलाल के बेटे ओमप्रकाश चौटाला और उनके पोते अजय चौटाला शिक्षक भर्ती घोटाला में दिल्ली की तिहाड़ जेल में दस साल की सजा काट रहे हैं। ऐन चुनावों के वक्त उन्हें जमानत भी मिल गई। जमानत पर छूटने के बाद उन्होंने हरियाणा में हुंकार भरी कि जेल से ही वे मुख्यमंत्री पद की शपथ लेंगे। यह ऐलान उस बेटे का था, जिसका बाप का कथन भारतीय राजनीति के लोकतांत्रिक अध्याय का सूत्र वाक्य बन गया है। देवीलाल कहा करते थे कि लोकराज लोकलाज से चलता है। लेकिन ओमप्रकाश चौटाला लोकलाज को जैसे ताक पर रख रहे थे। लेकिन हालत यह देखिए कि वे खुद अपनी पार्टी को कहां तक चुनाव जीता पाते, अपने पोते दुष्यंत चौटाला तक को नहीं जिता पाए। बहू नैना चौटाला भी चुनावी मैदान में खेत रहीं। कभी हरियाणा की राजनीति में दबंगई का पर्याय रहे चौटाला के दूसरे बेटे अभय चौटाला जेल से बाहर हैं। पिछली विधानसभा के सदस्य भी थे। लेकिन इस बार उन्हें हार का स्वाद चखना पड़ा है।
हरियाणा के दूसरे राजपरिवार बंसीलाल के परिवार का भी ऐसा ही हाल रहा। उनके बेटे सुरेंद्र सिंह तो 2004 में ही एक हेलीकॉप्टर हादसे में जान गवां चुके हैं। तब वे राज्य में मंत्री थे। उनके साथ राज्य के ही मंत्री ओमप्रकाश जिंदल भी मारे गए थे। बहरहाल हरियाणा में अब उनकी राजनीतिक विरासत उनकी बेटी कीर्ति चौधरी और पत्नी किरण चौधरी चला रही हैं। कीर्ति लोकसभा चुनावों में हार गईं और हुड्डा सरकार की मंत्री रहीं किरण चौधरी को भी हार का सामना करना पड़ा है। हरियाणा के तीसरे लाल भजनलाल के बेटे कुलदीप विश्नोई की हरियाणा जनहित कांग्रेस के पिछली विधानसभा में छह सदस्य थे। लेकिन इस बार सिर्फ दो ही विधायक चुने जा सके हैं। यानी यहां भी विरासत की राजनीति पर सवाल उठ खड़े हुए हैं।
महाराष्ट्र में उत्तर भारतीयों के लिए आतंक और दहशत का पर्याय रहे राज्य के नए राजपरिवार ठाकरे की विरासत को आगे बढ़ाने की जंग लड़ रहे राज ठाकरे को इस बार जनता ने भरपूर सिखाया है। उनका सिर्फ एक ही विधायक जीत पाया है और उन्हें तीन फीसदी से भी कम वोट मिला है। ठाकरे की विरासत को ही आगे बढ़ा रहे शिवसेना के मौजूदा सुप्रीमो उद्धव ठाकरे खुद मुख्यमंत्री बनने का सपना पाले हुए थे। पंद्रह साल से सत्ता से बाहर शिवसेना के संस्थापक बाल ठाकरे ने परिपाटी स्थापित की थी। सत्ता से बाहर रहने और सत्ता दूसरे हाथों में देकर उसके सूत्र अपने हाथों में रखने की इस परिपाटी को मौजूदा प्रमुख उद्धव ठाकरे बदलना चाहते थे। इसी गुमान में उन्होंने 25 साल पुराने गठबंधन से हाथ झटकते हुए भारतीय जनता पार्टी से अलग राह अख्तियार कर ली। पच्चीस सालों से महाराष्ट्र की राजनीति में बड़े भाई की भूमिका निभाती रही शिवसेना ना सिर्फ छोटे भाई की भूमिका में है। बल्कि भारतीय जनता पार्टी की तुलना में उसे आधी से कुछ ही ज्यादा सीटें हासिल हुई हैं। यह बात और है कि इसी राज्य में भारतीय जनता पार्टी के बड़े नेता गोपीनाथ मुंडे की दोनों ही बेटियां जीत गईं। बड़ी बेटी पंकजा मुंडे तो मुख्यमंत्री पद की दावेदारी पेश कर चुकी हैं। जबकि छोटी भी रिकॉर्ड मतों से सांसद चुन ली गई हैं। वैसे नारायण राणे खुद हार गए, लेकिन उनके बेटे नीतेश चुनाव जीत गए हैं। यह बात और है कि विपक्षी कांग्रेस की कमजोर राजनीति में अपनी विरासत को कम से कम फिलहाल तो आगे बढ़ा ही नहीं पाएंगे।
भारतीय जनता पार्टी की अपनी राजनीतिक मजबूरियों के चलते भले ही विरासत को आगे बढ़ाते हुए तमाम नेताओं के बेटे सांसद बन तो गए। लेकिन नरेंद्र मोदी ने विरासत के इन दावेदारों को सत्ता से दूर ही रखा है। वसुंधरा के बेटे दुष्यंत हों या फिर धूमल के बेटे अनुराग ठाकुर..मंत्रिमंडल में उन्हें जगह नहीं मिली। यानी मोदी बाहर ही नहीं, अंदरूनी राजनीति में भी विरासत और परिपाटी को किनारे कर रहे हैं। बिहार में लालू यादव का घरेलू राजनीतिक कुनबा किनारे है ही तो उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव का बरकरार है। यह बात और है कि परिवार से बाहर उसकी हैसियत लगातार घटी है। यानी विरासत पर खतरे की घंटी यहां भी है। तमिलनाडु में करूणानिधि का परिवार भी राजपरिवार की तरह स्थापित हो गया है। लेकिन उनके दोनों ही बेटे स्टालिन और अल्लागिरी चुनावों में खेत रहे।
बेशक अब भी विरासत की राजनीति करने वाले लोगों की बड़ी फौज सक्रिय है और दावेदारी भी ठोक रही है। लेकिन हाल के चुनावों ने साबित किया है कि अब यह ज्यादा दिन नहीं चलने वाला है। लोकतंत्र के बीच वही राजतंत्र और विरासतवाद आगे बढ़ पाएगा, जो जनता की आकांक्षाओं को पूरा करेगा। तो क्या यह मान लिया जाय कि भारतीय लोकतंत्र परिपक्वता की ओर मजबूत कदम बढ़ा चुका है। लोकतंत्र के मूल वोटरों का मिजाज तो कम से कम ही बता रहा है।

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