Friday, December 11, 2015

उम्मीद करें, बिहार में जारी रहेगा विकासवाद

उमेश चतुर्वेदी
राजनीति में एक कहावत धड़ल्ले से इस्तेमाल की जाती है और इस बहाने राजनीतिक दल अपनी दोस्तियों और दुश्मनी को जायज ठहराते रहते हैं। वह कहावत है – राजनीति में न तो दोस्ती स्थायी होती है और ना ही दुश्मनी। चूंकि लोकतांत्रिक समाज में राजनीति का महत्वपूर्ण लक्ष्य सिर्फ और सिर्फ लोककल्याण ही हो सकता है, लिहाजा इन स्थायी दोस्तियों और दुश्मनियों का सिर्फ और सिर्फ एक ही मकसद हो सकता है – राष्ट्रीय हित के परिप्रेक्ष्य में जन कल्याण। लेकिन क्या बिहार की राजनीति में 1993 के पहले तक रंगा और बिल्ला के नाम से मशहूर लालू और नीतीश की जोड़ी को मौजूदा परिप्रेक्ष्य में लोकतांत्रिक मूल्यों के आधार पर तौला-परखा जा सकता है?

Friday, November 27, 2015

वेतन आयोग लाएगा महंगाई


 

कर्मचारियों की सुख समृद्धि बढ़े, उनका जीवन स्तर ऊंचा उठे, इससे इनकार कोई विघ्नसंतोषी ही करेगा। लेकिन सवाल यह है कि जिस देश में 125 करोड़ लोग रह रहे हों और चालीस करोड़ से ज्यादा लोग रोजगार के योग्य हों, वहां सिर्फ 33 लाख एक हजार 536 लोगों की वेतन बढ़ोत्तरी उचित है? सातवें वेतन आयोग की रिपोर्ट सौंपे जाने के बाद केंद्र सरकार की तरफ से अपने कर्मचारियों को लेकर यही आंकड़ा सामने आया है। बेशक सबसे पहले केंद्र सरकार ही अपने कर्मचारियों को वेतन वृद्धि का यह तोहफा देने जा रही है। लेकिन देर-सवेर राज्यों को भी शौक और मजबूरी में अपने कर्मचारियों को सातवें वेतन आयोग की सिफारिशों के मुताबिक वेतन देना ही पड़ेगा। जब यह वेतन वृद्धि लागू की जाएगी, तब अकेले केंद्र सरकार पर ही सिर्फ वेतन के ही मद में एक लाख दो हजार करोड़ सालाना का बोझ बढ़ेगा। इसमें अकेले 28 हजार 450 करोड़ का बोझ सिर्फ रेलवे पर ही पड़ेगा। इस वेतन वृद्धि का दबाव राज्यों और सार्जजनिक निगमों पर कितना पड़ेगा, इसका अंदाजा राज्यों के कर्मचारियों की संख्या के चलते लगाया जा सकता है। साल 2009 के आंकड़ों के मुताबिक, सरकारी क्षेत्र के 8 करोड़ 70 लाख कर्मचारियों में से सिर्फ 33 लाख कर्मचारी केंद्र सरकार के हैं। जाहिर है कि बाकी कर्मचारी राज्यों के हैं या फिर सार्वजनिक क्षेत्र के निगमों के। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि राज्यों पर कितना बड़ा आर्थिक बोझ आने वाला है।याद कीजिए 2006 को। इसी वर्ष छठवें वेतन आयोग की सिफारिशें लागू की गईं, जिससे केंद्र पर 22 हजार करोड़ रुपए का एक मुश्त बोझ बढ़ा था। केंद्रीय कर्मचारियों की तनख्वाहें अचानक  एक सीमा के पार चली गईं। केंद्र के कुल खर्च का 30 फीसदी अकेले वेतन मद में ही खर्च होने लगा।

Sunday, November 8, 2015

बिहार में इस बार जो कुछ हुआ !



उमेश चतुर्वेदी
(बिहार के 5वें दौर के मतदान के ठीक बाद यह लेख लिखा था..लेकिन अखबारों में जगह नहीं बना पाया..लेकिन अभी-भी यह प्रासंगिक है..आप पढ़ें और इस पर अपने विचार दें)
यूं तो मीठी जुबान ही आदर्श मानी जाती है...लिहाजा वह लुभाती भी सबको है..लेकिन राजनीति में तेजाबी और तीखी जुबान भी खूब पसंद की जाती है..तेजाबी जुबान का नतीजा मीठा नहीं होता तो शायद ही कोई राजनेता उसका इस्तेमाल करता। चुनावी माहौल में अपने समर्थकों को गोलबंद करने में तीखी,तेजाबी और धारदार जुबान शायद बड़ा हथियार साबित होती है..बिहार के मौजूदा चुनाव में खासतौर पर जिस तरह लालू प्रसाद यादव ने तेजाबी जितना इस्तेमाल किया, उतना शायद ही किसी और नेता ने किया हो...कभी लालू की खासियत उनकी हंसोड़ और एक हद तक सड़कछाप जोकर जैसी भाषा होती थी..उनके मुखारविंद से जैसे ही वह जुबान झरने लगती थी, माहौल में हंसी के फव्वारे छूट पड़ते थे.. संभवत: अपनी जिंदगी की सबसे अहम राजनीतिक लड़ाई लड़ रहे लालू यादव के लिए मौजूदा विधानसभा चुनाव शायद सबसे अहम रहा, इसलिए उन्होंने कुछ ज्यादा ही तीखे जुबानी तीरों की बरसात की...इससे उनका मतदाता कितना गोलबंद हुआ, उनके समर्थकों की संख्या में उनकी लालटेन को जलाने में कितना ज्यादा इजाफा हुआ, यह तो चुनाव नतीजे ही बताएंगे। लेकिन उनकी जुबानी जंग और उसके खिलाफ गिरिराज सिंह जैसे नेताओं जो जवाबी बयान दिए..उसने भारतीय राजनीति में गिरावट का जो नया इतिहास रचा, उसकी तासीर निश्चित तौर पर नकारात्मक ही होगी..और वह देर तक महसूस की जाएगी।

Sunday, November 1, 2015

ऐसे भरेगा दाल का कटोरा



उमेश चतुर्वेदी
एक साल पहले हर-हर मोदी के नारे के विरोध में उठी आवाजों को दालों की महंगाई ने अरहर मोदी का नारा लगाने का मौका दे दिया है...80-85 रूपए प्रतिकिलो के हिसाब से तीन महीने तक बिकने वाली अरहर की दाल अब 200 का आंकड़ा पार कर चुकी है..दाल की महंगाई का आलम यह है कि अब सदियों से चली आ रही कहावत – घर की मुर्गी दाल बराबर- भी अपना अर्थ खोती नजर आ रही है। इन्हीं दिनों बिहार जैसे राजनीतिक रूप से उर्वर और सक्रिय सूबे में विधानसभा का चुनाव भी चल रहा है। ऐसे में केंद्र में सरकार चला रहे नरेंद्र मोदी पर सवालों के तीर नहीं दागे जाते तो ही हैरत होती। लेकिन क्या यह मसला सिर्फ सरकारी उदासीनता तक ही सीमित है...भारत जैसे देश में जहां ज्यादातर लोग शाकाहारी हैं, वहां प्रोटीन और पौष्टिकता की स्रोत दालों की अपनी अहमियत है। वहां दालों की महंगाई सिर्फ मौजूदा सरकारी उदासीनता के ही चलते है...इस सवाल का जवाब निश्चित तौर पर परेशान जनता नहीं ढूंढ़ेगी..उसके भोजन की कटोरी में से दाल की मात्रा लगातार घट रही है..लेकिन जिम्मेदार लोगों को इसकी तरफ भी ध्यान देना होगा कि आखिर यह समस्या आई इतनी विकराल कैसे बन गई कि अरहर की दाल की महंगाई का स्तर ढाई गुना बढ़ गया।
वैसे तो अरहर का उत्पादन अब तक ज्यादातर मौसम की मर्जी पर ही संभव रहा है। ऊंची जगहों पर ही इसका उत्पादन तब संभव है, जब बारिश कम हो। करीब दो दशक पहले तक पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार, जहां दाल का मतलब ही अरहर होता है, वहां हर खेतिहर परिवार कम से कम हर साल अपनी खेती में से दलहन और तिलहन के लिए इतना रकबा सुरक्षित रखता था, ताकि उससे हुई पैदावार से उसके परिवार के पूरे सालभर तक के लिए दाल और तेल मिल सके। लेकिन उदारीकरण में कैश क्रॉप यानी नगदी खेती को जैसे – जैसे बढ़ावा दिया जाने लगा, दलहन और मोटे अनाजों के उत्पादन को लेकर किसान निरुत्साहित होने लगे। धान और गेहूं के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य की सरकारी प्रोत्साहन पद्धति ने दलहन और तिलहन के उत्पादन से किसानों का ध्यान मोड़ दिया। मोटे अनाजों के साथ ही दलहन और तिलहन की सरकारी खरीद के अभी तक कोई नीति ही नहीं है। इसलिए देश में लगातार तिलहन और दलहन का उत्पादन घटता जा रहा है। लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि दालों और तेल के खाने के प्रचलन में कमी आई है। अपने देश में सालाना 220 से लेकर 230 लाख टन दाल की खपत का अनुमान है। इस साल सरकार ही मान चुकी थी कि दाल का उत्पादन महज 184.3 लाख टन ही होगा है। इसके ठीक पहले साल यह उत्पादन करीब 197.8 लाख टन था। इसलिए सरकार की भी जिम्मेदारी बनती थी कि वह पहले से ही करीब 45 लाख टन होने वाली दाल की कमी से निबटने के लिए कमर कस लेती। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। सरकार और उसके विभाग तब जागे, जब जमाखोरों और दाल की कमी के चलते कीमतों का ग्राफ लगातार ऊंचा उठने लगा। 

Sunday, October 25, 2015

साहित्य अकादमी में रचा गया नया इतिहास

उमेश चतुर्वेदी 
1994 की बात है..साहित्य अकादमी का साहित्योत्सव चल रहा था...उस वक्त साहित्य अकादमी के सचिव थे इंद्रनाथ चौधरी...अध्यक्ष शायद असमिया लेखक वीरेंद्र भट्टाचार्य..गलत भी हो सकता हूं..उस साल साहित्य अकादमी ने संवत्सर व्याख्यान का आयोजन किया था-साहित्योत्सव के मौके पर... इंडिया इंटरनेशनल सेंटर के संभ्रांत माहौल और हॉल में व्याख्यान और खान-पान का भव्य आयोजन था..उसी दौरान इस भुच्चड़ देहाती को दिल्ली के शहराती साहित्यकर्म का परिचय मिला..भारतीय जनसंचार संस्थान में तकरीबन मुफलिसी की तरह पढाई करते वक्त साहित्य चर्चा के साथ सुस्वादु भोजन का जो स्वाद लगा तो तीन दिनों तक लगातार जाता रहा..दूसरे सहपाठी मित्र भी साथ होते थे..वहीं पहली बार नवनीता देवसेन को सुना...मलयालम की विख्यात लेखिका कमला दास, जो बाद में सुरैया हो गई थीं..उन्हें भी सुना अपनी टूटी-फूटी अंग्रेजी में..हिंदी के तमाम कवियों-लेखकों को लाइन में लगकर खाना लेते और खाते देखकर अच्छा लगा...हैरत भी हुई....क्योंकि इन्हीं में से कुछ को अपने जिले बलिया के एक-दो आयोजनों में नखरे में डूबते और रसरंजन की नैया में उतराते देखा था...तब अपनी नजर में उन लेखकों-कवियों की हैसियत देवताओं से कुछ ही कम होती थी..यह बात और है कि इनमें से कई के साथ जब ऑफ द रिकॉर्ड बातचीत की, उनके धत्कर्म देखॅ तो लगा कि असल में वे भी सामान्य इंसान ही हैं...
सवाल यह कि इन बातों की याद क्यों..क्योंकि 23 अक्टूबर 2015 को साहित्य अकादमी के सामने नया इतिहास रचा गया है..भारतीय-खासकर हिंदी का साहित्यकर्म राष्ट्रीयता और भारतीयता की अवधारणा को धर्मनिरपेक्षता की विचारधारा के खिलाफ मानता है...उसे यह सांप्रदायिक लगता है.. अतीत में इसी बहाने हिंदी साहित्यकर्म की मुख्यधारा की शख्सियतें भारतीयता-राष्ट्रीयता की बात करने वाले कलमचियों से चिलमची की तरह व्यवहार करती रही हैं...1994 में साहित्योत्सव के संवत्सर व्याख्यान में भारतीयता की बातें अकेले रख रहे थे –देवेंद्र स्वरूप..तब उनका उपहास उड़ाया गया था... उनसे हिंदी साहित्यकर्म के आंगन में आए विदेशी-आक्रांता घुसपैठिया जैसा व्यवहार वहां मौजूद साहित्यिक समाज ने किया था..तब उनके साथ एक ही नौजवान खड़ा होता था...उसका प्रतिवाद उन दिनों काफी चर्चित भी हुआ था..साहित्यिक समाज के वाम विचारधारा पर वह हमले करते वक्त कहता था- पनीर खाकर पूंजीवाद को गाली देते हैं—बाद में पता चला कि वह नौजवान नलिन चौहान है..नलिन अगले साल भारतीय जनसंचार संस्थान का विद्यार्थी बना...
23 अक्टूबर 2015 को अभिव्यक्ति पर कथित रोक, कलबुर्गी नामक कन्नड़ लेखक की हत्या और सांप्रदायिकता फैलाने वालों के खिलाफ साहित्य अकादमी की चुप्पी के खिलाफ हिंदी की कथित मुख्य़धारा की साहित्यिक बिरादरी ने विरोध जुलूस निकाला..साहित्य अकादमी के आंगन में कभी वाम विचारधारा के खिलाफ खड़े होने की हिम्मत दूसरी विचारधारा नहीं करती थी..उसी साहित्य अकादमी के प्रांगण में कथित विरोध और सम्मान वापसी अभियान के खिलाफ लेखकों का हुजूम उमड़ पड़ा..कुछ लोग उन लेखकों का मजाक उड़ा रहे हैं कि वे प्रेमचंद से बड़े लेखक हैं..प्रेमचंद ने क्या लिखा है..इस पर अलग से लेख लिखने की इच्छा है..बहरहाल साहित्य अकादमी के इतिहास में यह पहला मौका था...जब वहां वंदे मातरम का नारा लगा, भारत माता की जय बोली गई..मालिनी अवस्थी ने विरोध में आवाज बुलंद की..नरेंद्र कोहली, बलदेव वंशी विरोधियों की नजर में लेखक ना हों तो ना सही...पाठकों के दिलों में जरूर बसते हैं..उनकी किताबों की रायल्टी कथित मुख्यधारा की आंख खोलने के लिए काफी है...
साहित्य कर्म में बदलते इतिहास को सलाम तो कीजिए

Wednesday, October 21, 2015

सवाल भी कम नहीं हैं सम्मान वापसी अभियान पर



उमेश चतुर्वेदी
(आमतौर पर मेरे लेख अखबारों में स्थान बना लेते हैं..लेकिन यह लेख नहीं बना पाया..देर से छपने से शायद इसका महत्व कम हो जाए)
वैचारिक असहमति और विरोध लोकतंत्र का आभूषण है। वैचारिक विविधता की बुनियाद पर ही लोकतंत्र अपना भविष्य गढ़ता है। कोई भी लोकतांत्रिक समाज बहुरंगी वैचारिक दर्शन और सोच के बिना आगे बढ़ ही नहीं सकता। लेकिन विरोध का भी एक तार्किक आधार होना चाहिए। तार्किकता का यह आधार भी व्यापक होना चाहिए। कथित सांप्रदायिकता और बहुलवादी संस्कृति के गला घोंटने के विरोध में साहित्यिक समाज में उठ रही मुखालफत की मौजूदा आवाजों में क्या लोकतंत्र का व्यापक तार्किक आधार नजर आ रहा है? यह सवाल इसलिए ज्यादा गंभीर बन गया है, क्योंकि कथित दादरीकांड और उसके बाद फैली सामाजिक असहिष्णुता के खिलाफ जिस तरह साहित्यिक समाज का एक धड़ा उठ खड़ा हुआ है, उसे वैचारिक असहमति को तार्किक परिणति तक पहुंचाने का जरिया माना जा रहा है। 2015 का दादरीकांड हो या पिछले साल का मुजफ्फरनगरकांड उनका विरोध होना चाहिए। बहुलतावादी भारतीय समाज में ऐसी अतियों के लिए जगह होनी भी नहीं चाहिए। लेकिन सवाल यह है कि क्या क्या सचमुच बढ़ती असहिष्णुता के ही विरोध में साहित्य अकादमी से लेकर पद्मश्री तक के सम्मान वापस किए जा रहे हैं।
भारतीय संविधान ने भारतीय राज व्यवस्था के लिए जिस संघीय ढांचे को अंगीकार किया है, उसमें कानून और व्यवस्था का जिम्मा राज्यों का विषय है। चाहकर भी केंद्र सरकार एक हद से ज्यादा कानून और व्यवस्था के मामले में राज्यों के प्रशासनिक कामों में दखल नहीं दे सकती। लालकृष्ण आडवाणी जब देश के उपप्रधानमंत्री और गृहमंत्री थे, तब उन्होंने जर्मनी की तर्ज पर यहां भी फेडरल यानी संघीय पुलिस बनाने की पहल की दिशा में वैचारिक बहस शुरू की थी। जर्मनी में भी कानून और व्यवस्था राज्यों की जिम्मेदारी है। बड़े दंगे और अराजकता जैसे माहौल में वहां की केंद्र सरकार को फेडरल यानी संघीय पुलिस के जरिए संबंधित राज्य या इलाके में व्यवस्था और अमन-चैन बहाली के लिए दखल देने का अधिकार है। संयुक्त राज्य अमेरिका में संघीय पुलिस यानी फेडरल ब्यूरो ऑफ इनवेस्टिगेशन के जरिए केंद्र सरकार को कार्रवाई करने का अधिकार है। लेकिन आज कथित हिंसा के विरोध में अकादमी पुरस्कार वापस कर रहे लेखकों और बौद्धिकों की जमात में तब आडवाणी की पहल को देश के संघीय ढांचे पर हमले के तौर पर देखा गया था।

Tuesday, October 13, 2015

फॉर्मा सेक्टर बनाम केमिस्ट..जंग जारी है..



उमेश चतुर्वेदी
                 (सोपान STEP पत्रिका में प्रकाशित )
फार्मा सेक्टर इन दिनों उबाल पर है..उसके बरक्स केमिस्ट भी नाराज हैं..केमिस्टों को ऑनलाइन दवा बिक्री की सरकारी नीति से एतराज तो है ही...अपनी दुकानों पर उन्हें फार्मासिस्टों की तैनाती भी मंजूर नहीं है..इसीलिए उन्होंने 14 अक्टूबर को देशव्यापी हड़ताल रखी। इसके पहले फार्मासिस्टों ने 29 सितंबर को लखनऊ, रायपुर और छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में सड़कों पर उतर कर प्रदर्शन किया..लखनऊ में तो शिक्षामित्रों के आंदोलन की तरह फॉर्मासिस्टों को पीटने की तैयारी थी..लेकिन फॉर्मासिस्टों ने संयम दिखाया..इसके पहले गुवाहाटी, रांची, जमशेदपुर और हैदराबाद में फार्मासिस्ट आंदोलन कर चुके हैं..लेकिन उनसे जुड़ी खबरें तक नहीं दिख रही हैं..दरअसल फार्मासिस्टों की मांग है कि जहां-जहां दवा है, वहां-वहां फॉर्मासिस्ट  तैनात होने चाहिए। पश्चिमी देशों में एक कहावत है कि डॉक्टर मरीज को जिंदा करता है और फॉर्मासिस्ट दवाई को। पश्चिमी यूरोप के विकसित देशों, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड में डॉक्टर मरीज को देखकर दवा तो लिखता है, लेकिन उसकी मात्रा यानी डोज रोग और रोगी के मुताबिक फार्मासिस्ट ही तय करता है। इसी तर्क के आधार पर केमिस्ट शॉप जिन्हें दवा की दुकानें कहते हैं, वहां भी फॉर्मासिस्ट की तैनाती होने चाहिए। लेकिन जबर्दस्त कमाई वाले दवा बिक्री के धंधे की चाबी जिन केमिस्टों के हाथ है, दरअसल वे ऐसा करने के लिए तैयार ही नहीं है। इसके खिलाफ वे लामबंद हो गए हैं और 14 अक्टूबर को देशव्यापी हड़ताल करने जा रहे हैं..रही बात सरकारों की तो अब वह भी फॉर्मासिस्टों को तैनात करने को तैयार नहीं है। ऐसे में सवाल यह है कि आखिर लगातार फॉर्मेसी कॉलेजों की फेहरिस्त लंबी क्यों की जा रही है। सरकारी क्षेत्र की बजाय निजी क्षेत्र में लगातार फॉर्मेसी के कॉलेज क्यों खोले जा रहे हैं।

Sunday, October 11, 2015

लालू का पिछड़ा दांव क्या खिलाएगा गुल

उमेश चतुर्वेदी
बिहार के चुनावी रण में जब से राष्ट्रीय जनता दल प्रमुख लालू प्रसाद यादव ने अगड़ों के खिलाफ पिछड़े वर्ग के लोगों को गोलबंद करने की मुहिम छेड़ी है, उसके बाद राजनीतिक समीकरण तेजी से बदले हैं। उपर से भले ही राज्य के चुनावी मैदान में एक तरफ जहां जनता दल यू, राष्ट्रीय जनता दल और कांग्रेस का महागठबंधन है तो दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी की अगुआई में लोकजनशक्ति पार्टी और राष्ट्रीय लोकसमता पार्टी का राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन मुकाबले में है। लेकिन लालू यादव ठीक उसी तरह पिछड़ों की गोलबंदी करने की कोशिश में जुटे हुए हैं, जिस तरह राष्ट्रीय मोर्चा ने 1990 के चुनावों में किया था। तब इतिहास बदल गया था। कांग्रेस का 13 साल का शासन उखड़ गया था। उसके बाद पहले जनता दल और बाद में राष्ट्रीय जनता दल के तौर पर लालू और उनकी पत्नी राबड़ी देवी का पंद्रह सालों तक लगातार शासन चला। सन 2000 के कुछ कालखंड को छोड़ दिया जाय तो लालू का पंद्रह साल तक बिहार में निर्बाध शासन चला। इस बार अंतर सिर्फ इतना आया है कि तब मुकाबले में कांग्रेस थी और जनता दल के साथ भारतीय जनता पार्टी थी। आज मुकाबले में भारतीय जनता पार्टी है और कांग्रेस छोटे भाई की भूमिका में महागठबंधन की छोटी साथी बनी हुई राष्ट्रीय जनता दल और जनता दल यू के सहारे पाटलिपुत्र में अपनी राजनीतिक मौजूदगी दर्ज कराने की कोशिश कर रही है।

Friday, October 2, 2015

स्वच्छता से गुजरता विकास का पथ


उमेश चतुर्वेदी
 (इस लेख को पत्रसूचना कार्यालय यानी पीआईबी ने जारी किया है.. पीआईबी की वेबसाइट से साभार)
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के महत्वाकांक्षी और महात्मा गांधी को सच्ची श्रद्धांजलि देने वाले स्वच्छ भारत अभियान ने एक साल पूरा कर लिया है। इस अभियान की पहली सालगिरह ने देश को आंकलन का एक मौका दिया है कि स्वतंत्रता से जरूरी स्वच्छता के मोर्चे पर वह 365 दिनों में कहां पहुंच पाया है। यहां यह बता देना जरूरी है कि बीसवीं सदी की शुरूआत में जब गांधी के व्यक्तित्व का कायाकल्प हो रहा था, उन्हीं दिनों उन्होंने यह मशहूर विचार दिया था- स्वतंत्रता से भी कहीं ज्यादा जरूरी है स्वच्छता। गांधी के इस विचार की अपनी पृष्ठभूमि है। इस पर चर्चा से पहले प्रधानमंत्री के इस अहम अभियान की दिशा में बढ़े कदमों की मीमांसा कहीं ज्यादा जरूरी है।
स्वच्छ भारत अभियान की शुरूआत के बाद देश के तमाम बड़े-छोटे लोगों ने झाड़ू उठा लिया। लेकिन सफाई की दिशा में हकीकत में कितनी गहराई से कदम उठे, इसका नतीजा यह है कि शहरों ही नहीं, गांवों में अब भी बजबजाती गंदगी में कमी नजर आ रही है। शुरू में यह अभियान जिस तेजी के साथ उठा और जिस तरह से झाड़ू को लेकर सरकारी विभागों, जनप्रतिनिधियों ने कदम उठाए, उसे कारपोरेट घरानों और स्वयंसेवी संगठनों का भरपूर सहयोग मिला। इस पूरे अभियान की कामयाबी अगर कहीं सबसे ज्यादा दिखती है तो वह है नई पीढ़ी की सोच में। नई पीढ़ी के सामने अगर सड़क पर गंदगी फैलाई जाती है तो उसे गंदगी फैलाने वाले को टोकने में देर नहीं लगती। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का स्वच्छ अभियान की शुरूआत का मकसद सिर्फ भारत को साफ करना ही नहीं है, बल्कि लोगों की मानसिकता में बदलाव लाना है। क्योंकि बदली हुई मानसिकता की स्वच्छता की परंपरा को सतत बनाए रख सकती है।

Monday, September 21, 2015

हार्दिक के पीछे कौन

उमेश चतुर्वेदी
जिस पाटीदार समुदाय के हाथ गुजरात के सौराष्ट्र इलाके की खेती का बड़ा हिस्सा हो, जिसके पास हीरा तराशने वाले उद्योग की चाबी हो, जिसके हाथ कपड़ा उद्योग का बड़ा हिस्सा हो, जिसके पास राज्य के कुटीर उद्योगों का बड़ा हिस्सा हो, जिसके पास गुजरात के मूंगफली और गन्ना की उपज का जिम्मा हो, जिसके पास राज्य के शिक्षा उद्योग का बड़ा हिस्सा हो, वह पाटीदार समुदाय अगर आरक्षण की मांग को लेकर मैदान में उतर जाता है तो इसके पीछे सिर्फ आरक्षण की मांग ही होना हैरत में डालने के लिए काफी है। तो क्या गुजरात के बीस फीसदी आबादी वाले पाटीदार समुदाय के 22 साल के हार्दिक पटेल के पीछे उठ खड़ा होने की वजह सिर्फ आरक्षण की मांग ही नहीं है? देश में बड़े-बड़े आंदोलनों को नजदीक से देख चुके या फिर उनकी अगुआई कर चुके लोगों का कम से कम तो यही मानना है। जयप्रकाश आंदोलन के दौरान छात्र युवा संघर्ष समिति के अगुआ रहे वरिष्ठ पत्रकार रामबहादुर राय को हार्दिक पटेल की अपील पर भी शक है। उनका मानना है कि ऐसे आंदोलन स्वत: स्फूर्त नहीं होते और हार्दिक पटेल की इतनी ज्यादा अपील या त्याग-तपस्या का उनका कोई बड़ा इतिहास भी नहीं रहा है कि उनके पीछे सूबे का ताकतवर पाटीदार समुदाय उमड़ पड़े। राय साहब के नाम से विख्यात राम बहादुर राय का मानना है कि हार्दिक पटेल के आंदोलन के पीछे कहीं न कहीं संगठन की शक्ति जरूर है। तो क्या हार्दिक पटेल के आंदोलन के पीछे कोई ऐसी बड़ी राजनीतिक हस्ती भी काम कर रही है, जिसके पास सांगठनिक काम का तपस्या जैसा अनुभव भी है। सिर्फ सवा साल पहले हुए आम चुनावों में गुजरात की सभी 26 सीटें भारतीय जनता पार्टी की झोली में आ गई थीं। जाहिर है कि ऐसा शत-प्रतिशत नतीजा बगौर बीस फीसदी आबादी वाले लोगों के समर्थन से हासिल नहीं किया जा सकता था। ठीक सवा साल बाद अगर गुजरात की पांचवें हिस्से की आबादी आरक्षण की मांग को लेकर उठाए गए झंडे के नीचे आ खड़ी हो तो निश्चित तौर पर कारण सिर्फ यही नहीं होना चाहिए। जिस पाटीदार समुदाय के हाथ राज्य की 120 विधानसभा सीटों में से एक तिहाई यानी चालीस पर कब्जा हो, जिसके पास करीब नौ सांसद हों, जिस समुदाय की अपनी हस्ती आनंदी बेन पटेल राज्य की मुख्यमंत्री हो, जिस समुदाय का सदस्य नितिन पटेल राज्य की सरकार का आधिकारिक प्रवक्ता हो, इससे साबित तो यही होता है कि इस समुदाय के पास राजनीतिक ताकत और रसूख भी कम नहीं है। इसके बावजूद अगर पाटीदार समुदाय अपनी ही सरकार, अपने ही नेता के खिलाफ सड़कों पर उतर आया हो इसके संकेत कुछ और ही हैं...तो क्या पाटीदार समुदाय किसी और वजह से भारतीय जनता पार्टी से नाराज है ? इस सवाल का जवाब देने से पाटीदार समुदाय हिचक रहा है। आरक्षण को लेकर आंदोलन कर रही समिति के लोग भी खुलकर बोलने से बच रहे हैं। लेकिन भारतीय जनता पार्टी के अंदर से छनकर दबे-ढंके स्वर में जो खबरें बाहर आ रही हैं, वे कुछ और ही कह रही हैं। उनके मुताबिक हार्दिक पटेल महज मोहरा हैं। असल ताकतें तो पर्दे के पीछे हैं। तो आखिर कौन-सी वजह है, जिससे पाटीदार समुदाय अचानक से नाराज होकर लाखों की संख्या में सड़कों पर उतरने लगा है। 25 अगस्त को वह अहमदाबाद को जाम कर चुका है और अब गांधी की नमक यात्रा के तर्ज पर अहमदाबाद से दांडी की यात्रा करने जा रहा है।

Friday, September 18, 2015

लाल दुर्ग में भगवा सेंध के सियासी निहितार्थ

उमेश चतुर्वेदी
दिल्ली विश्वविद्यालय में चारों प्रमुख सीटों पर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद की जीत हाल के दिनों में विधानसभा चुनावों में बुरी तरह मात खा चुकी भारतीय जनता पार्टी के लिए राहत भरी खबर है। लेकिन उससे कहीं ज्यादा बीजेपी के लिए जेएनयू में एक ही सीट का ज्यादा प्रतीकात्मक महत्व है। जिस विश्वविद्यालय में एक दौर में मुरली मनोहर जोशी के कार्यक्रम का तब विरोध हो रहा हो, जब वे मानव संसाधन विकास मंत्री थे, संस्कृत विभाग की स्थापना के वक्त ही उसका विरोध हो रहा हो, उस विश्वविद्यालय के छात्रसंघ में एबीवीपी की जीत कहीं ज्यादा बड़ी है। भगवा खेमे के लिए यह जीत क्यों बड़ी है और इसके क्या प्रतीकात्मक महत्व हैं, इस पर विचार करने से पहले जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्रों की बदलती प्रवृत्तियां और विश्वविद्यालय के बाहर जाते ही विचारधारा के प्रति आ रहे बदलावों पर भी ध्यान देना जरूरी है।
दिल्ली जैसे कास्मोपोलिटन शहर में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय सही मायने में कास्मोपोलिटन संस्कृति का प्रतीक है। इस विश्वविद्यालय में देश के कोने-कोने के अलावा दुनिया के तमाम देशों के भी छात्र पढ़ते हैं। जाहिर है कि दुनिया के ज्यादातर हिस्सों में मार्क्सवाद की पूछ और परख लगातार कम होती जा रही है। उदारीकरण की आंधी ने मार्क्सवादी विचार को सबसे ज्यादा चोट पहुंचाई है। इसके बावजूद जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय मार्क्सवादी विचारधारा का गढ़ रहा है। इसकी स्थापन से ही यहां की छात्र राजनीति पर वर्षों से लगातार मार्क्सवादी विचारधारा के दलों के छात्र संगठनों का कब्जा रहा है। अतीत में मशहूर समाजवादी विचारक और कार्यकर्ता आनंद कुमार और पूर्व रेल राज्य मंत्री स्वर्गीय दिग्विजय सिंह जैसे समाजवादियों और कांग्रेस की छात्र इकाई भारतीय राष्ट्रीय छात्र संघ यानी एनएसयूआई को छोड़ दें तो यहां की छात्र राजनीति में वामपंथी विचारधारा का दबदबा रहा है। नब्बे के दशक में भारतीय जनता पार्टी के उभार के बाद इस विश्वविद्यालय में भारतीय जनता पार्टी की विचारधारा वाले छात्र संगठन अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद ने अपनी पैठ बढ़ाने की कोशिशें तेज तो की, लेकिन उसे सिर्फ एक बार 2000 में संदीप महापात्रा के तौर पर महज एक वोटों से अध्यक्ष पद पर जीत हासिल हुई थी। लेकिन एबीवीपी को बाद में इस लाल दुर्ग में इतना समर्थन हासिल नहीं हुआ कि वह संदीप महापात्रा की जीत जैसा इतिहास दुहरा सके। इन अर्थों में देखें तो 2015 के छात्र संघ चुनावों में एबीवीपी के सौरभ कुमार शर्मा की संयुक्त सचिव पद पर 28 वोटों से जीत भगवा खेमे की धमाकेदार जीत के तौर पर ही मानी जाएगी।

Monday, September 7, 2015

अल्पसंख्यकवाद से डूब रही केरल में कांग्रेस

उमेश चतुर्वेदी
यह आलेख यथावत पत्रिका के 01-15 सितंबर 2015 अंक में प्रकाशित हो चुका है...
क्या भारतीय जनता पार्टी के लिए प्रश्न प्रदेश रहा सुदूर दक्षिण का राज्य केरल अगले साल होने जा रहे विधानसभा चुनावों में उम्मीद की नई किरण बनकर आएगा। यह सवाल राज्य की जनता से कहीं ज्यादा खुद सत्ताधारी यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट की अगुआ कांग्रेस पार्टी के अंदर ही गंभीरता से पूछा जा रहा है। इसकी वजह बना है जून में संपन्न राज्य विधानसभा का इकलौता उपचुनाव। राज्य की अरूविकारा विधानसभा सीट पर उपचुनाव विधानसभा स्पीकर जी कार्तिकेयन के निधन के चलते हुआ। उपचुनाव में भले ही कांग्रेस के कद्दावर नेता जी कार्तिकेयन के बेटे के ए सबरीनाथन की जीत हुई, लेकिन उनकी जीत का अंतर कम हो गया। अपने पिता की तरह उन्होंने मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के उम्मीदवार को ही हराया। लेकिन उपचुनाव में भारतीय जनता पार्टी मतदाताओं की पसंदीदा पार्टी के तौर पर तेजी से उभरी। यही वजह है कि कांग्रेस में भारतीय जनता पार्टी के उभार को लेकर आशंका जताई जाने लगी है और इसकी बड़ी वजह इसी उपचुनाव में भारतीय जनता पार्टी का बढ़ा वोट प्रतिशत है। 2011 के विधानसभा चुनावों की तुलना में इस उपचुनाव में भारतीय जनता पार्टी के वोट बैंक में 17.18 प्रतिशत की जबर्दस्त बढ़ोत्तरी हुई। दिलचस्प बात यह है कि इस उपचुनाव को केरल के मुख्यमंत्री ओमान चांडी ने अपनी सरकार के कामकाज के लिए जनमत संग्रह का नाम दिया था। कांग्रेस के उम्मीदवार की जीत को स्वाभाविक तौर पर  केरल के मुख्यमंत्री ओमान चांडी के समर्थन में ही माना जाएगा। इसके बावजूद अगर कांग्रेस चिंतित है तो इसकी बड़ी वजह है मौजूदा विधानसभा उपचुनाव में कांग्रेस के वोट में आई 9.16 प्रतिशत की गिरावट। हैरत की बात यह है कि कांग्रेस के मुकाबले लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट की अगुआ मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के वोट बैंक में सिर्फ 6.1 फीसद की ही गिरावट दर्ज की गई।
हालांकि कांग्रेस के मुकाबले मार्क्सवादी वोट बैंक में यह गिरावट बेशक कम है, लेकिन 1957 में दूसरे विधानसभा चुनाव से ही राज्य में अपनी मजबूत पकड़ बनाने वाले वामपंथ के लिए वोट बैंक में यह कमी उसके समर्थक आधार में आई बड़ी छीजन के तौर पर ही देखा जा रहा है।
अरुविकारा विधानसभा उपचुनाव ने कांग्रेस में अल्पसंख्यक तुष्टिकरण के खिलाफ बहुसंख्यक नायर वोट बैंक और उस समुदाय से आने वाले नेताओं को जुबान खोलने का मौका दे दिया है। हालांकि पार्टी हलकों में यह सवाल दबे सुर से ही उठ रहा है। अगर कांग्रेस आलाकमान ने वक्त रहते इस पर गंभीरता से ध्यान नहीं दिया तो यह सवाल खुले तौर पऱ भी उठने लगेगा। पाठकों को यह जानकर हैरानी होगी कि जम्मू-कश्मीर के बाद केरल दूसरा राज्य है, जहां अल्पसंख्यक तबके के हाथ में शासन- सत्ता के प्रमुख सूत्र हैं। राज्य के मुख्यमंत्री ओमान चांडी तो अल्पसंख्यक ईसाई समुदाय के तो हैं ही, भ्रष्टाचार और शराब लॉबी से रिश्वतखोरी के आरोपों का सामना कर रहे राज्य के वित्त मंत्री के एम मणि भी उसी समुदाय से आते हैं। राज्य कांग्रेस में एक तबका अब यह मानने लगा है कि क्रिश्चियन और मुस्लिम वोट बैंक का अब और ज्यादा तुष्टिकरण राज्य में कांग्रेस के लिए वैसे ही दिन देखने को मजबूर कर देगा, जैसा अस्सी के दशक तक उसके गढ़ रहे उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में उसे देखना पड़ रहा है, जहां कांग्रेस का नामलेवा भी नहीं बचा है।
केरल की सत्ता में कांग्रेस की वापसी के बड़े रणनीतिकार राज्य में पार्टी के नौ साल तक अध्यक्ष रहे रमेश चेनिथला रहे। चेनिथला इन दिनों राज्य के गृहमंत्री हैं और राज्य की उस नायर जाति से ताल्लुक रखते हैं, जिसे समाज और सरकारी नीतियों में आजादी के बाद से ही उपेक्षित कर दिया गया है। बेशक इस उपेक्षा के अपने ऐतिहासिक कारण हैं। आजादी के पहले तक नायरों का केरल के समाज और सत्ता तंत्र में दबदबा था। लेकिन राज्य की करीब 14 फीसद आबादी रखने वाले इस तबके को आजादी के तत्काल बाद जो उपेक्षित किया गया, उसकी टीस अब तक इस तबके को अखर रही है। चूंकि कांग्रेस के समर्थक रहे इस तबके को लगने लगा है कि पार्टी उसका सिर्फ वोट बैंक में पूरक हैसियत के लिए इस्तेमाल करती रही है, इसलिए इस तबके का कांग्रेस से मोहभंग होने लगा है। इसी वजह से अब वह तबका भारतीय जनता पार्टी की तरफ झुकता नजर रहा है। इसलिए राज्य कांग्रेस का एक धड़ा अब मानने लगा है कि वक्त आ गया है कि अल्पसंख्यक राजनीति से किनारा करके पार्टी को नायर जैसी अगुआ बहुसंख्यक समुदाय की जातियों के साथ अपना जुड़ाव साबित करना होगा।

Sunday, August 23, 2015

लय में लौट आए पीएम



उमेश चतुर्वेदी
स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री से उम्मीद लगा रखे लोगों को उनके भाषण में वैसी ताजगी और नई दिशा नजर नहीं आई, जैसा चुनाव अभियान से लेकर पिछले पंद्रह अगस्त तक उनके शब्दों में नजर आती रही। प्रचंड जनमत की आकांक्षाओं के रथ पर सवार होकर जिस तरह सत्ता के शीर्ष पर नरेंद्र मोदी पहुंचे हैं, उसमें जनता की कसौटियों पर कसे जाने की चुनौतियां कुछ ज्यादा होनी ही थी और वह प्रधानमंत्री के सामने है भी। ऐसे में पंद्रह अगस्त के भाषण को लेकर उन पर टीका-टिप्पणी होनी ही थी। दस-पंद्रह साल पहले की बात होती तो इस टीका-टिप्पणी को देखने के लिए कुछ वक्त की दरकार होती। लेकिन फटाफट खबरों वाले खबरिया चैनलों की अनवरत कथित बहस यात्रा और प्रतिपल सक्रिय सोशल मीडिया के दौर में इससे बचाव कहां। अब तत्काल फैसले भी होने लगते हैं और उन पर टिप्पणियों की बौछार भी होने लगती है। जाहिर है कि पंद्रह अगस्त को प्रधानमंत्री मोदी के भाषण को लेकर ऐसी टिप्पणियां शुरू भी हो गईं। तब सवाल यह उठने लगा कि प्रधानमंत्री अब चूकने लगे हैं। सवाल यह भी उठा कि अब तक अभियान के मूड में रही उनकी शैली से जनता का मोहभंग होने लगा है।
प्रधानमंत्री मोदी को हर कदम पर नाकाम देखने की उम्मीद लगाए बैठे उनके विरोधियों को लगने लगा कि वह घड़ी आ ही गई। दिलचस्प यह है कि ऐसी उम्मीदें उनके विपरीत वैचारिक ध्रुव पर बैठे लोगों के साथ ही उनके अपने ही दल में समय की धार के सामने निरूपाय चुपचाप रह रही शख्सियतें भी लगा रखी थीं। बेशक पंद्रह अगस्त के दिन राजनीति ना करने की नसीहतनुमा जानकारी देने के बाद मोदी के खिलाफ लगातार आक्रामक रूख रखे कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने आजादी की सालगिरह पर दिए प्रधानमंत्री के रस्मी भाषण पर टिप्पणी करने से मना कर दिया। लेकिन अगले ही दिन उनके प्रवक्ताओं की टीम ने यह कहना शुरू कर दिया कि प्रधानमंत्री अब चूकने लगे हैं। सवाल तो जनता दल यू के उस प्रवक्ता ने भी उठाने शुरू कर दिए, जो हाल के दिनों तक भारतीय जनता पार्टी के नेताओं के साथ गलबहियां डाले दिखते रहते थे। जी हां, यहां बात केसी त्यागी की हो रही है। लेकिन दो दिन बीते नहीं कि प्रधानमंत्री ने अपने विरोधियों की खुशी बने रहने नहीं दी। दुबई के क्रिकेट स्टेडियम में चालीस हजार लोगों के सामने अपने 75 मिनट के भाषण में उन्होंने जिस तरह लोगों का दिल जीता, उससे एक बार फिर अमेरिका में न्यूयार्क के मेडिसन स्क्वायर पर हुए भाषण की याद ताजा कर दी। बुत परस्ती के विरोधी देश की सरजमीन पर भारत माता की जय बोलकर जिस तरह प्रधानमंत्री ने हर उस मुद्दे को छुआ, जो भारतीय गौरव गाथा की बखान करता है, उससे अमीरात में बैठे हजारों भारतीय तो खुश हुए ही, भारत में भी उनके चहेतों को लगा कि उन्होंने अपनी लय नहीं खोई है। उनकी लय बरकरार है। हालांकि आलोचना करने वाले यह कहने से नहीं चूक रहे कि दुबई में लोगों के बीच सवा घंटे का लंबा भाषण नहीं होना चाहिए। लेकिन सवाल यह भी है कि आखिर वहां मौजूद चालीस हजार लोग भाषण सुनने के लिए टिके क्यों रहे। उनका टिकना ही साबित करता है कि प्रधानमंत्री ने अपनी लय पर अपना काबू बरकरार रखा है..

Wednesday, August 12, 2015

नाक की लड़ाई बना संसदीय हंगामा

पता नहीं क्यों..यह लेख अखबारों में जगह नहीं बना पाया..हरिभूमि में इसका संपादित अंश प्रकाशित हुआ है.....पूरा लेख अविकल यहां प्रकाशित किया जा रहा है....
उमेश चतुर्वेदी
लोकसभा से अपने 25 सांसदों के निलंबन के बाद कांग्रेस का आक्रामक होना स्वाभाविक ही था। लोकतांत्रिक समाज में विपक्ष अक्सर ऐसे अवसरों की ताक में रहता है, ताकि वह खुद को शहीद साबित करके जनता की नजरों में चढ़ सके। ठीक सवा साल पहले मिली ऐतिहासिक और करारी हार से पस्त पड़ी 130 साल पुरानी पार्टी कांग्रेस के लिए यह निलंबन अपने कैडर और अपने निचले स्तर तक के कार्यकर्ताओं को जगाने और उनमें नई जान फूंकने का मौका बन कर आया। अपने सांसदों के निलंबन को लेकर उसे शहीदाना अंदाज में रहना ही चाहिए था। संसद में जारी हंगामे के पीछे ललित मोदी की मदद को लेकर सुषमा स्वराज और वसुंधरा राजे के इस्तीफे की मांग को ही कांग्रेस असल वजह बता रही है। राजनीति का तकाजा भी है कि वह इसी तथ्य को जाहिर करे। लेकिन क्या हंगामे और उसके बाद निलंबन का सच सिर्फ इतना ही है ? सवाल यह भी उठता है कि क्या संसद में हंगामे और उसे न चलने देने की परिपाटी की शुरूआत भारतीय जनता पार्टी ने ही की, जैसा कि कांग्रेस लगातार कह रही है। इस हंगामे की असल वजह क्या सिर्फ सुषमा और वसुंधरा के इस्तीफे की मांग का सत्ता पक्ष द्वारा ठुकराया जाना ही है? इन सवालों का सही जवाब देर-सवेर ढूंढ़ा भी जाएगा और सामने आएगा भी। तब निश्चित तौर पर सत्ता और विपक्ष- दोनों पक्षों को कम से कम जनता की अदालत में जवाब देना भारी पड़ेगा। लेकिन तब तक आम लोगों के अधिकारों के साथ जितना खिलवाड़ होना होगा, वह हो चुकेगा...

Sunday, May 24, 2015

सियासी डिमेंसिया

यह आपबीती है..जैसा कि अपनी आदत है..पहले अखबारों को भेजा..नहीं छपा..कुछ एक पत्रिकाओं को भी दिया..उन्होंने भी नकार दिया..इसलिए अब सार्वजनिक मंच यानी फेसबुक पर डाल रहा हूं..पढ़ें और प्रतिक्रियाएं दें तो बेहतर...उमेश चतुर्वेदी
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राजनीति से लोग एक ही उम्मीद रखते हैं...अगर राजनेता को वोट दिया हो तो यह उम्मीद कुछ ज्यादा ही बढ़ जाती है..अगर वोट देने के बाद खुदा न खास्ता वह नेता लोकसभा या विधानसभा पहुंच गया तो उसे वोट देने वाले उससे कुछ ज्यादा ही अनुराग हो जाता है.इस अनुराग में छिपी होती अहमियत पाने की चाह, वक्त-बेवक्त आने वाली मुसीबतों के वक्त सियासी साथ और वक्त-जरूरत पर समाज में उस राजनेता के साथ के जरिए हासिल रसूख..लेकिन नब्बे के दशक में विकसित भारतीय राजनीति में जिस तरह के राजनेता आगे बढ़े हैं, उनमें से अगर कोई सत्ता ही नहीं, बल्कि लोकसभा और विधानसभा में ही पहुंच गया तो ज्यादा चांस ये ही होता है कि वह अपने वोटरों, रोज के संग-साथ वाले उन लोगों को पहचानना बंद कर दे, जिनके कंधे के सहारे उसने चुनाव लड़ा, चुनाव से पहले टिकट हासिल किया और उससे भी कहीं ज्यादा उस वोटर के दरवाजे पर रात-बिरात खाना खाया, चाय पी या फिर पानी ही पिया...चिकित्सा की भाषा में भूलने की बीमारी को डिमेंशिया कहते हैं..चुनाव जीते हुए राजनेता अक्सर कम से कम उम्मीदें लगाए बैंठीं साथ धूल फांक चुकी जमात के लिए डिमेंशिया का मरीज बन जाता है..
हाल के चुनावों में प्रधानमंत्री मोदी ने जिस तरह प्रचार किया, उससे जनता को उम्मीद थी कि इस बार कम से उसका पल्ला सियासी डिमेंशिया के शिकार शख्सियतों से पल्ला नहीं पड़ेगा। अगर फितरत ही बदल जाए तो फिर क्या राजनीति और क्या राजनेता ? इसी बीच आती है पत्रकारिता..दिलचस्प बात यह है कि आमतौर पर पत्रकारों से बेहतर रिश्ते रखने वाली राजनीति का डिमेंशिया पत्रकारिता को लेकर भी अब बढ़ने लगा है। अव्वल तो पत्रकारिता का काम है मौजूदा इतिहास को नंगी आंख से देखना और उसे ज्यों का त्यों जनता के सामने रख देना। लेकिन कारपोरेट के दबाव और उदारवाद के चलन में पत्रकारिता ये जिम्मेदारी भूलती जा रही है..उसे सत्ता तंत्र का गुणगान करना या फिर भावी सत्ताधारी के साथ जोड़-जुगत भिड़ाना और गाहे-बगाहे पत्रकारिता की ताकत के जरिए मदद कर देना अब ज्यादा अच्छा लगता है...वह भी इसलिए कि अगर भविष्य में राजनेता लोकसभा या विधानसभा पहुंचा तो अपने सहस्रबाहुओं के जरिए कहीं न कहीं, किसी न किसी मोर्चे पर कोई मदद जरूर कर देगा। यह बात और है कि अब यह पत्रकारिता भी सियासी डिमेंशिया के मरीजों की मार झेलने को मजबूर है।

Monday, May 4, 2015

वामपंथ को मुख्यधारा में ला पाएंगे येचुरी

उमेश चतुर्वेदी

पहली नजर में युवा और उर्जावान दिखने वाले 62 साल के सीताराम येचुरी भारतीय वामपंथ की प्रमुख धारा के मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी यानी सीपीएम के सर्वोच्च पद पर पहुंच गए हैं। सीपीएम की कमान संभालने वाले वे पांचवी शख्सियत हैं। जिस पद को पी सुंदरैया और ईएमएस नंबूदरीपाद जैसे धाकड़ और गंभीर वामपंथी विचारकों ने संभाला, जिस पर खिलंदड़ा और गैरभाजपा दलों के हरदिल अजीज हरकिशन सिंह सुरजीत काबिज रहे उस पद पर सीताराम येचुरी का उस प्रकाश करात के तत्काल बाद काबिज होना बेहद अहम है। जिनके संगसाथ में ही सीताराम येचुरी की पूरी राजनीति परवान चढ़ी है। सीताराम येचुरी और प्रकाश करात उस जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की उपज हैं, जिसे राजधानी दिल्ल के ठीक बीचोंबीच अपनी अलग राजनीतिक पहचान के चलते एक टापू ही माना जाता है। उदारीकरण की आंधी और कारपोरेटीकरण के गहरे असर के दौर में जब सिर्फ राजधानी दिल्ली ही नहीं, पूरा सामाजिक परिवेश ही ढलने और उसमें आत्मसात होने को ही अपनी जिंदगी का मकसद और कामयाबी समझ रहा हो, उसी परिवेश के बीच जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में वामपंथी राजनीतिक धारा का मजबूत बने रहना और मौजूदा सामाजिक-राजनीतिक बयार के खिलाफ तनकर खड़े रहना सामान्य बात नहीं है। समाज के लिए असामान्य, लेकिन जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के लिए आसान लगने वाली इस धारा की नींव निश्चित तौर पर प्रकाश करात और सीताराम येचुरी जैसे वामपंथ के प्रहरियों ने ही डाली थी।

Friday, April 17, 2015

सौ बार जनम लेंगे, सौ बार फना होंगे

उमेश चतुर्वेदी 
संदर्भ : जनता परिवार की एकता
(वेबदुनिया पर पहले प्रकाशित)
जनता परिवार एक हो गया है..उसकी नई एकता को लेकर एक फिल्म का गाना याद आ रहा है..सौ बार जनम लेंगे, सौ बार फ़ना होंगे...चालीस के दशक में जब समाजवादी खेमा कांग्रेस से अलग हुआ था, तब से लेकर अब तक ना जाने कितनी बार जनता पार्टी भिन्न-भिन्न नामों से सामने आता रहा, कभी सिद्धांत के नाम पर तो कभी गैरकांग्रेसवाद के नाम पर जनता परिवार एक होता रहा।
जब-जब अतीत में वह एक हुआ, उसका सबसे बड़ा आधार गैरकांग्रेसवाद रहा। 1963 में डॉक्टर राम मनोहर लोहिया ने पहली बार गैरकांग्रेसवाद का नारा दिया था। जिसे अब हम जनता परिवार कहते हैं, वह तब समाजवादी परिवार था। डॉक्टर लोहिया के उस नारे ने तब के समाजवादी परिवार को बड़ी संजीवनी दी। 1967 के विधानसभा चुनावों में नौ राज्यों में गैरकांग्रेसी सरकारें बनीं। जिनकी अगुआई समाजवादी परिवार को ही मिली। लेकिन समाजवादी परिवार की यह एकता बनी नहीं रहीं और आपसी अहं के टकराव ने आजाद भारत के लोकतंत्र के इस प्रयोग को वक्त से पहले ही मिट्टी में मिला दिया। जैसे ही समाजवादी अलग हुए, उनकी ताकत तीन कौड़ी की रह गई।

इस एकता के बावजूद बचे रहेंगे कई पेच

उमेश चतुर्वेदी
(दैनिक जागरण राष्ट्रीय और राज एक्सप्रेस में प्रकाशित)
लोहिया ने पचास के दशक में समाजवादियों को एक मंत्र दिया था, सुधरो या टूट जाओ। लोहिया के नाम पर बार-बार सिर्फ राजनीतिक कसमें खाने वाले भारतीय समाजवादियों ने सुधरने की सीख को उतना आत्मसात नहीं किया, जितना टूटने वाले पाठ को अंगीकार किया। समाजवादी राजनीति की जब भी चर्चा होती है, एक पुराना फिल्मी गीत बरबस मन में गूंजने लगता है- इस दल (दिल) के टुकड़े हजार हुए, कोई यहां गिरा, कोई यहां गिरा। लेकिन समाजवाद की धारा पर चलने वाले जनता परिवार रूपी समाजवाद के दिल से अलग होकर जितने टुकड़े हो चुके हैं, उन्होंने अब एक होने का फैसला कर लिया है।

Friday, April 10, 2015

अछूत महिला उषा का सच हुआ सपना


उमेश चतुर्वेदी
राजस्थान के एक छोटे से इलाके में कभी अछूत की तरह रहने वाली महिला के लिए यह सपने के सच होने जैसा ही था, जब उसने ब्रिटेन के जाने-माने विद्वानों को लंदन की यूनिवसिटी ऑफ पोर्ट्समाउथ में ब्रिटिश एसोसिएशन आफ साउथ एशियन स्टडीज के सालाना कांफ्रेंस में संबोधित किया है। यूनिवर्सिटी की प्रेस रिलीज में इस घटना को याद करते हुए लिखा गया है कि दुनिया के सबसे कमजोर और हाशिए के कुछ लोगों के अधिकार और पहचान की तरफ विश्वविद्यालय के लोगों ने पूरा ध्यान दिया।
सेंट्रल लंदन से करीब 130 किलोमीटर दूर स्थित समारोह में राजस्थान के अलवर जिले की 42 वर्षीय उषा चौमुर को ब्रिटिश अकादमिक विद्वानों के बीच बोलने के लिए पिछली रात बुलाया गया था। इस मौके पर उषा ने ब्रिटिश विद्वानों को पूरे आत्मविश्वास से ना सिर्फ संबोधित किया, बल्कि अपनी तरह जिंदगी  गुजारने वाली लाखों महिलाओं के विचार सामने रखे। जिन्हें आज भी अपने पहचान और मौलिक अधिकारों के लिए जद्दोजहद करना पड़ रहा है।

Wednesday, April 8, 2015

राजस्थान की अछूत महिला को लंदन से बुलावा

उमेश चतुर्वेदी
कभी वह समाज से उपेक्षित और अछूत थी। कभी हाथों से ही मैला साफ करती थी, रजवाड़ों की नगरी अलवर की उसी महिला को अब लंदन से बुलावा  मिला है। लंदन की यूनिवसिटी आफ पोर्ट्समाउथ में ब्रिटिश एसोसिएशन आफ साउथ एशियन स्टडीज के सालाना कांफ्रेंस में उस अगले हफ्ते भाग लेने के लिए निमंत्रण मिला है। ब्रिटिश एसोसिएशन फॉर साउथ एशियन स्टडीज दक्षिण एशियायी अध्ययन का दुनिया का प्रमुख केंद्र है।अलवर के हजूरीगेट के हरिजन कॉलोनी की 42 साल की उषा चौमूर  अगले हफ्ते ब्रिटेन के नीति निर्माताओं  और बुद्धिजीवियों के बीच स्वच्छता और भारत में  महिला अधिकार विषय पर अपना विचार रखेंगी। उषा जाने-माने एनजीओ सुलभ इंटरनेशनल द्वारा पुनर्वासित किए जाने से पहले हाथों से घर-घर में मैला की सफाई करती थीं। तब उन्हें अछूत माना जाता था। उषा अब हाथ से मैला साफ करने की पुरातन परंपरा से मुक्ति की दिशा में दूसरे लोगों के लिए मोटीवेटर की भूमिका निभा रही हैं। श्रीमती चौमूर भारत में स्वच्छका अभियान की प्रमुख हस्ती और सुलभ इंटरनेशनल के संस्थापक डॉ बिंदेश्वर पाठक के साथ इस सम्मेलन में हिस्सा लेंगी । डॉ पाठक को भी इस सम्मेलन के विशेष सत्र को संबोधित करने के लिए बुलाया गया है।
जन्म के साथ ही उषा चौमूर की जिंदगी की कहानी जैसे पहले ही लिख दी गई थी। अशिक्षित और दस साल की उम्र में ही शादी के बंधन में बंध चुकी उषा को जीवन यापन के लिए पीढ़ियों से चले आ रहे  काम में झोंक दिया गया। भारत के जटिल जातीय समाज में सबसे निम्न तबके में अछूत बिरादरी से उषा चौमूर आती हैं। जिसका काम हाथ से उच्च जातियों के घरों से मानव मल की सफाई करना और उसे ढोना था। कई लोगों की नजर में यह अपमानजनक और अछूत का काम था।

Thursday, April 2, 2015

आप में ये तो होना ही था

उमेश चतुर्वेदी
दस फरवरी को दिल्ली में आए एकतरफा चुनावी नतीजों ने लोकतांत्रिक परंपराओं में आस्था और बदलाव की राजनीति से उम्मीद रखने वाले लोगों को हैरत में डाल दिया था। अचंभा इस बात का था कि बदलाव को लेकर मौजूदा राजनीतिक तंत्र से जनता का किस कदर मोहभंग हो गया है। जैसा कि अक्सर होता है, हैरत और खुशियों के बीच भी कुछ आत्माएं ऐसी होती हैं, जो तमाम बदलावों के बीच भी कुछ आशंकाओं से सिहर उठती हैं। यह बात और है कि विजेताओं का इतिहासगान करने वाले मौजूदा मीडिया परिदृश्य में शक और आशंका वाली आवाजों को विघ्न संतोषी या कुंठित मानकर दरकिनार कर दिया जाता है। केजरीवाल के प्रचंड उभार के बाद निकले विजय जुलूस के ढोल-नगाड़े की आवाजों के बीच ऐसी आशंकित आवाजें वैसी ही मध्यम पड़ गई थीं, लेकिन रामलीला मैदान में उठी इंसान से इंसान के भाईचारे की अपील के महज डेढ़ महीने बाद ही आशंका की मध्यम आवाजों का वाल्युम बढ़ गया है। 28 मार्च को दिल्ली के कापसहेड़ा के एक रिजॉर्ट में आम आदमी पार्टी के बीच जो हुआ, वह बदनाम हो चुकी पारंपरिक राजनीति से भी कहीं ज्यादा अभद्र और गंदा रहा। हो सकता है कि योगेंद्र यादव, प्रोफेसर आनंद कुमार और प्रशांत भूषण बदलाव की आकांक्षा वाली  भारतीय राजनीति के अंगने के वैसे फूल ना हों, जिसकी सुगंध दूर-दूर उस अंदाज में फैलती हो, जिस अंदाज में केजरीवाल की सुगंध वायु प्रसारित हो रही है। लेकिन यह भी सच है कि राजनीति के गलियारे में ये आवाजें अपनी साफ-सुथरी पहचान और भीनी सुगंध के चलते दूसरे आंगनों में भी पहचानी जाती रही है। ऐसे में उमर अब्दुल्ला का यह कहना कि आप ने भी दूसरे के समान बनने का फैसला कर लिया है, दरअसल साफ-सुथरी राजनीति की चाहत रखने वाले लोगों की निराशाओं का ही प्रतीक है।

आम आदमी पार्टी के प्रचंड उभार के दौर में भी एक वर्ग ऐसा रहा है, जिसे केजरीवाल की अगुआई वाली राजनीति से कोई उम्मीद नहीं रही। वैसे भी केजरीवाल की पार्टी का समूचा विकासक्रम सिर्फ किसी तरह आगे बढ़ने का इतिहास रहा है। याद कीजिए 2004-05 को, तब सूचना के अधिकार के अहम कार्यकर्ता के तौर पर उनका उभार हुआ था। उस वक्त उनकी प्रमुख सहयोगी अरूणा रॉय थीं। सूचना के अधिकार की मांग को लेकर अरूणा रॉय के साथ तब की बौद्धिक जमात का एक बड़ा हिस्सा था। उसमें हिंदी पत्रकारिता के शलाका पुरूष स्वर्गीय प्रभाष जोशी भी थे। सोशल मीडिया पर तो खबरें भी छायी रहीं कि 2004 में कांग्रेस की अगुआई में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार बनने के बाद अरूणा रॉय ने अरविंद केजरीवाल की सोनिया गांधी से सिफारिश की थी कि केजरीवाल चूंकि बेहतर काम कर रहे हैं, लिहाजा उनका तबादला नहीं किया जाए। इसीलिए उनका दिल्ली से बाहर तबादला नहीं हुआ। इसके पीछे का सच चाहे जो भी हो, लेकिन तथ्य तो साफ है कि सोनिया गांधी की अगुआई वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की महत्वपूर्ण सदस्य रहीं अरूणा राय से केजरीवाल का गहरा रिश्ता रहा। यह बात और है कि अब उनके आंदोलनों में अरूणा रॉय कहीं नजर नहीं आतीं।

Tuesday, March 31, 2015

पत्रों में साया सनातनी संस्कृति का तप



 मेश चतुर्वेदी
(यह समीक्षा पांचजन्य के 05 अप्रैल 2015 के अंक में संपादित करके प्रकाशित की जा चुकी है)
उदात्त भारतीय परंपराओं के बिना भारतीय संस्कृति की व्याख्या और समझ अधूरी है। सनातनी व्यवस्था अगर पांच हजार सालों से बनी और बची हुई है तो इसकी बड़ी वजह उसके अंदर सन्निहित उदात्त चेतना भी है। पश्चिम की विचारधारा पर आधारित लोकतंत्र के जरिए जब से नवजागरण और कथित आधुनिकता का जो दौर आया, उसने सबसे पहले सनातनी व्यवस्था को दकियानुसी ठहराने की की कोशिश शुरू की। सनातनी संस्कृति के पांच हजार साल के इतिहास के सामने अपेक्षाकृत बटुक उम्र वाली संस्कृतियां भी अगर हिंदू धर्म और संस्कृति पर सवाल उठाने का साहस कर पाईं तो उसके पीछे पश्चिम आधारित लोकतंत्र और आधुनिकता की अवधारणा बड़ी वजह रही। लेकिन इसी अवधारणा के दौर में एक शख्स अपनी पूरी सादगी और विनम्रता के साथ तनकर हिंदुत्व की रक्षा में खड़ा रहा। उसने अपनी दृढ़ प्रतिज्ञा और कठिन तप के सहारे आधुनिकता के बहाने हिंदुत्व पर हो रहे हमलों का ना सिर्फ मुकाबला करने की जमीन तैयार की, बल्कि देवनागरी पढ़ने वाले लोगों के जरिए दुनियाभर में हिंदुत्व, सनानती व्यवस्था, सनातनी ज्ञान और उदात्त संस्कृति को प्रस्तारित करने में बड़ी भूमिका निभाई।

Tuesday, March 17, 2015

विकल्प की राजनीति के भविष्य पर चर्चा


प्रेस क्लब ऑफ इंडिया और मीडिया स्टडीज ग्रुप (एमएसजी) ने मंगलवार को संयुक्त तौर पर चर्चाः विकल्प की राजनीति का भविष्य विषय पर एक कार्यक्रम का आय़ोजन किया। चर्चा का संचालन करते हुए मीडिया स्टडीज ग्रुप के अध्यक्ष अनिल चमड़िया ने कहा कि आम आदमी हमेशा अपनी राजनीतिक, सामाजिक तथा आर्थिक समस्याओं के समाधान के लिए एक नए और मजबूत, सुदृढ़ विकल्प की तलाश करता रहा है। इसी लिहाज से आम आदमी बनाम आम आदमी पार्टी की राजनीति को देखा जाना चाहिए। लेकिन आप में प्रशांत भूषण औऱ योगेंद्र यादव को लेकर जो कुछ हो रहा है वह निराशाजनक है।

जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अरुण कुमार ने कहा कि वैकल्पिक राजनीति में आर्थिक, सामाजिक व राजनीतिक तीनों तरह के विकल्पों को शामिल किया जाना चाहिए। 1990 के बाद से भारत की नीतियों पर मल्टीनेशल का कब्जा हो गया है और आम आदमी हाशिये पर आ गया है। आम आदमी पार्टी बनी तो उसके साथ एक दस्तावेज बना जिसमें हाशिये के लोगों की बात शामिल थी लेकिन वो दस्तावेज कभी भी चर्चा के लिए सावर्जनिक नहीं किया गया। कुमार ने कहा, पार्टी को डर था कि चुनाव से पहले इसे जारी कर दिया गया तो मध्यवर्ग या कोई और तबका नाराज हो जाएगा।

Monday, March 16, 2015

चंद्रपॉल सिंह यादव एनसीयूआई के अध्यक्ष बने

उमेश चतुर्वेदी

डॉ. चंद्रपॉल सिंह यादव को सर्वसम्मति से भारतीय राष्ट्रीय सहकारी संघ (एनसीयूआई) का एक बार फिर अध्यक्ष चुन लिया गया है।  डॉ यादव समाजवादी पार्टी से राज्यसभा के सदस्य हैं और लगातार दूसरी बार एनसीयूआई के अध्यक्ष निर्वाचित हुए हैं। एनसीयूआई अध्यक्ष के तौर पर उनका कार्यकाल पांच साल का होगा।

Friday, February 27, 2015

विकास की मौजूदा अवधारणा और हमारे गांव

उमेश चतुर्वेदी
(यह आलेख गोविंदाचार्य की ओर से प्रकाशित स्मारिका गांव की ओर में प्रकाशित हुआ है)
आजादी के आंदोलन के दौरान गांधीजी ने एक बड़ी बात कही थीअगर अंग्रेज यहीं रह गएउनकी बनाई व्यवस्था खत्म हो गई और भारतीय व्यवस्था लागू हो गई तो मैं समझूंगा कि स्वराज आ गया। अगर अंग्रेज चले गए और अपनी बनाई व्यवस्था ज्यों का त्यों छोड़ गए और हमने उन्हें जारी रखा तो मेरे लिए वह स्वराज नहीं होगा। विकास की मौजूदा अवधारणा में लगातार पिछड़ते गांवों, उनमें भयानक बेरोजगारी, कृषि भूमि का लगातार घटता स्तर और शस्य संस्कृति की बढ़ती क्षीणता के बीच गांधी की यह चिंता एक बार फिर याद आती है। आजादी के बाद गांधी को उनके सबसे प्रबल शिष्यों ने ना सिर्फ भुलाया, बल्कि उनकी सोच को भी तिलांजलि दे दी। गांधी को सिर्फ उनके नाम से चलने वाली संस्थाओं, राजकीय कार्यालयों की दीवारों पर टंगी तसवीरों, राजघाट और संसद जैसी जगहों के बाहर मूर्तियों तक सीमित कर दिया। उनकी सोच को भी जैसे इन मूर्तियों की ही तरह सिर्फ आस्था और प्रस्तर प्रतीकों तक ही बांध दिया गया। ऐसा नहीं कि आजादी के बाद भारतीयता और भारतीय संस्कृति पर आधारित विचारों के मुताबिक देश को बनाने और चलाने की बातें नहीं हुईं।
जयप्रकाश आंदोलन का एक मकसद गांवों को स्वायत्त बनाना और उन्हें भारतीय परंपरा में विकसित करना भी था। खुद लोहिया भी ऐसा ही मानते थे। दीनदयाल उपाध्याय के एकात्म मानववाद में जिस मानव की सेवा और उसे अपना मानकर उसके सर्वांगीण विकास की कल्पना है, वह एक तरह से हाशिए पर स्थित आम आदमी ही है। जिसके यहां विकास की किरणें जाने से अब तक हिचकती रही हैं। मौजूदा व्यवस्था में सिर्फ उस तक विकास की किरणें पहुंचाने का छद्म ही किया जा रहा है। गांधी के एक शिष्य जयप्रकाश भी गांधी की ही तरह भारतीयता की अवधारणा के मुताबिक गांवों के विकास के जरिए देश के विकास का सपना देखते थे। पिछली सदी के पचास के दशक के आखिरी दिनों गांधी जी के राजनीतिक उत्तराधिकारी और आजाद भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू ने जयप्रकाश को अपने मंत्रिमंडल में शामिल होने का निमंत्रण दिया था। 1942 के आंदोलन के प्रखर सेनानी जयप्रकाश तब तक सक्रिय राजनीति से दूर सर्वोदय के जरिए गांवों और फिर भारत को बदलने के सपने को साकार करने की कोशिश में जुटे हुए थे। जयप्रकाश ने तब नेहरू के प्रस्ताव को विनम्रता से नकारते हुए लिखा था कि आपकी सोच उपर से नीचे तक विकास पहुंचाने में विश्वास है और मैं नीचे से उपर तक विकास की धारा का पक्षधर हूं। इसलिए मेरा आपके मंत्रिमंडल में शामिल होना ना आपके हित में होगा न ही देश के हित में। हालांकि उनके तर्क के आखिरी वाक्य पर बहस की गुंजाइश हो सकती है। क्योंकि नेहरू के विकास मॉडल का हश्र हम देख रहे हैं। न तो गांव गांव ही रह पाए हैं और ना ही शहर बन पाए हैं। यानी अगर उस मंत्रिमंडल में जयप्रकाश शामिल हुए होते तो शायद सर्वोदय के सपने के मुताबिक देश में नया बदलाव तो आया ही होता। यानी गांव अधकचरे नहीं रह पाए होते।

Monday, February 16, 2015

हस्तिनापुर में बीजेपी की करारी हार के पीछे की हकीकत

उमेश चतुर्वेदी
भारतीय लोकतंत्र की एक बड़ी कमी यह मानी जाती रही है कि यहां की बहुदलीय व्यवस्था में सबसे ज्यादा वोट पाने वाला दल या व्यक्ति ही जीता मान लिया जाता है। भले ही जमीनी स्तर पर उसे कुल वोटरों का तिहाई ही समर्थन हासिल हुआ हो। नरेंद्र मोदी की अगुआई में भारी बहुमत वाली केंद्र सरकार भी महज कुछ मतदान के तीस फीसदी वोटरों के समर्थन से ही जीत हासिल कर पाई है। इन अर्थों में दिल्ली में अरविंद केजरीवाल की जीत दरअसल लोकतांत्रिक व्यवस्था की सर्वोच्च मान्यताओं की जीत है। केजरीवाल की अगुआई में मिली जीत में दिल्ली के 54 फीसदी वोटरों का समर्थन हासिल है। आधे से ज्यादा वोट हासिल करने वाली केजरीवाल की आम आदमी पार्टी ने 90 फीसदी से ज्यादा सीट हासिल की है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह बड़ी और साफ जीत है। जाहिर है कि उनकी जीत के गुण गाए जा रहे हैं और गाए जाएंगे भी। दुनियाभर की संस्कृतियों में चढ़ते सूरज को सलाम करने और उसकी पूजा करने की एकरूप परंपरा रही है। इन अर्थों में केजरीवाल की ताजपोशी की बलैया लिया जाना कोई अनहोनी नहीं है।

Saturday, January 24, 2015

भूमि अधिग्रहण अध्यादेश के खिलाफ दिल्ली कूच

एकता परिषद का रजत जयंती समारोह
2020 में दिल्ली से जेनेवा तक की होगी जय जगत यात्रा

भूमि अधिकार के लिए 30 जनवरी को पूरे देश में रखा जाएगा उपवास
22 जनवरी से 24 जनवरी तक रायपुर के तिल्दा मैदान में चले एकता परिषद के रजत जयंती समारोह में अंतिम दिन तिल्दा घोषणा-पत्र जारी किया गया, जो एकता परिषद सहित विभिन्न जन संगठनों के लिए आगामी सालों में आंदोलन की दिशा दिखाएगा। इसके साथ ही आहवान किया गया कि आगामी 30 जनवरी को गांधी जी की शहादत दिवस पर पूरे देष में जिला एवं विकास खंड स्तर पर भूमि अधिग्रहण अध्यादेश को रद्द करवाने के लिए उपवास रखा जाएगा। इसमें एकता परिषद और ग्रामीण विकास मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा आगरा में किए गए समझौते को लागू करने की मांग भी की जाएगी। इसके लिए अगले महीने आगरा से दिल्ली तक की यात्रा कर भारत सरकार को भूमि अधिग्रहण अध्यादेश रद्द करने के लिए घेरा जाएगा। सम्मेलन में शामिल लोगों ने सहमति जाहिर की कि पूरी दुनिया से गैर बराबरी खत्म कर न्याय और शांति की स्थापना तक आंदोलन चलाया जाए। इसके 2020 में दिल्ली से जेनेवा तक की 15 महीने तक की पदयात्रा (मिलेनियम वाक) आयोजित की जाएगी।


तिल्दा स्थित प्रयोग आश्रम में आगामी रणनीति की घोषणा करते हुए पी.व्ही. राजगोपाल ने एकता परिषद की 19 सदस्यीय नर्इ राष्ट्रीय समिति की भी घोषणा की। श्री रनसिंह परमार, श्री प्रदीप एवं सुश्री जानकी जी वरिष्ठ साथी के रूप में काम करेंगे, जबकि राष्ट्रीय संयोजक के रूप में श्री रमेश शर्मा, श्री अनीश कुमार एवं सुश्री श्रद्धा कश्यप दायित्वों को निभाएंगे।
श्री राजगोपाल ने कहा कि आगामी सालों में एकता परिषद को बड़ी जिम्मेदारियों का निर्वहन करना है। हमें अपने-अपने क्षेत्रों में वन अधिकार कानून के तहत सामुदायिक वन अधिकार के लिए व्यापक स्तर पर कार्य करना है। आवासीय अधिकार कानून के तैयार मसौदे को कानून के रूप में लागू करवाने के लिए सरकार पर दबाव बनाना है। आंदोलन के माध्यम से जहां भूमिहीनों को जमीनें मिली हैं, वहां आंदोलन के रूप में जैविक खेती को बढ़ावा देना है। अगले कुछ सालों में देश के सभी जिलों में 500-500 युवाओं को प्रशिक्षित कर न्याय एवं समानता के आंदोलन का सक्रिय साथी बनाया जाएगा। एकता परिषद द्वारा 2016 में अंतराष्ट्रीय महिला सम्मेलन, 2017 में गांधीजी के चंपारण आगमन के सौ साल पूरे होने पर चंपारण वर्ष और 2018 में मार्टिन लूथर किंग की शहादत के 50वें साल में जाति, धर्म, नस्ल और लिंग भेद के खिलाफ अहिंसात्मक अर्थव्यवस्था पर अंतराष्ट्रीय सम्मेलन आयोजित किया जाएगा। ये सभी आयोजन 2020 की जय जगत यात्रा की तैयारियों के तारतम्य में किये जाएंगे। आगामी आंदोलन के लिए हम सब रोजाना एक रुपया और एक मुट्ठी अनाज संग्रह करेंगे, इसके लिए हर गांव में एक अनाज बैंक बनाया जाएगा।


कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए रनसिंह परमार ने कहा कि एकता परिषद को स्थानीय से विश्वव्यापी मुकाम तक पहुंचाने में राजगोपाल जी का नेतृत्व और हजारों साथियों के परिश्रम एवं संघर्ष का योगदान रहा है। इस अवसर पर एकता परिषद के पुराने साथियों को सम्मानित भी किया गया। मध्यप्रदेष के पूर्व मुख्य सचिव शरदचंद्र बेहार ने कहा कि समिति के नए साथियों को दायित्व दिया गया है, पर यह सामूहिक जिम्मेदारी है कि हम आदिवासी, दलित, भूमिहीन एवं गरीबों को उनके अधिकार दिलाने के आंदोलन में बढ़-चढ़कर हिस्सा लें। आज देश के विभिन्न राज्यों से आए साथी संगठनों एवं एकता परिषद के कार्यकर्ताओं ने चल रहे आंदोलन के बारे में अनुभवों को साझा किया। समारोह में देष भर से 2000 से ज्यादा कार्यकर्ताओं ने हिस्सा लिया। अंतराष्ट्रीय स्तर पर नेपाल, थाइलैंड, जर्मनी, फ्रांस और बेलिजयम से आए प्रतिनिधियों ने संगठन के आंदोलन के प्रति अपना समर्थन व्यक्त किया।

Thursday, January 1, 2015

जम्मू-कश्मीर पर अस्फुट चिंतन

जम्मू-कश्मीर में पीडीपी का साथ हो या फिर नेशनल कांफ्रेंस का सहयोग, लंबी राजनीति के लिए बीजेपी को भारी पड़ना तय है। पीडीपी को घाटी में मिले वोटों के पीछे अलगाववादियों की अपील ने बड़ी भूमिका निभाई है, वहीं नेशनल कांफ्रेंस के प्रमुख नेता फारूख अब्दुल्ला मोदी को वोट देने की बजाय अपना वोट समुद्र में फेंकने की अपील करते रहे हैं। जाहिर है कि दोनों बीजेपी और उसकी नीतियों के धुर विरोधी रुख के साथ सियासी ज़मीन पर खड़े हैं। इसलिए तय है कि दोनों दलों के साथ बीजेपी के रिश्ते असहज ही रहेंगे..अगर पीडीपी के साथ पार्टी जाती है तो उस पर अलगाववादियों को नैतिक शह देने का भी आरोप लगेगा। ऐसे में बेहतर तो यही होगा कि बीजेपी विपक्ष में बैठे और अपनी नीतियों पर कायम रहते हुए राज्य में अपनी पैठ बढ़ाने की कोशिश करे। सरकार में शामिल होने के बाद या खुद सरकार बना कर वह राज्य की विकास नीतियों को सीधे प्रभावित तो कर सकेगी..लेकिन ठीक विपरीत विचारधारा की सवारी कर रहे दलों के साथ उसके लिए सियासी कदमताल आसान नहीं होगी..जिसका खामियाजा पार्टी को भुगतना पड़ सकता है ।