Thursday, April 2, 2015

आप में ये तो होना ही था

उमेश चतुर्वेदी
दस फरवरी को दिल्ली में आए एकतरफा चुनावी नतीजों ने लोकतांत्रिक परंपराओं में आस्था और बदलाव की राजनीति से उम्मीद रखने वाले लोगों को हैरत में डाल दिया था। अचंभा इस बात का था कि बदलाव को लेकर मौजूदा राजनीतिक तंत्र से जनता का किस कदर मोहभंग हो गया है। जैसा कि अक्सर होता है, हैरत और खुशियों के बीच भी कुछ आत्माएं ऐसी होती हैं, जो तमाम बदलावों के बीच भी कुछ आशंकाओं से सिहर उठती हैं। यह बात और है कि विजेताओं का इतिहासगान करने वाले मौजूदा मीडिया परिदृश्य में शक और आशंका वाली आवाजों को विघ्न संतोषी या कुंठित मानकर दरकिनार कर दिया जाता है। केजरीवाल के प्रचंड उभार के बाद निकले विजय जुलूस के ढोल-नगाड़े की आवाजों के बीच ऐसी आशंकित आवाजें वैसी ही मध्यम पड़ गई थीं, लेकिन रामलीला मैदान में उठी इंसान से इंसान के भाईचारे की अपील के महज डेढ़ महीने बाद ही आशंका की मध्यम आवाजों का वाल्युम बढ़ गया है। 28 मार्च को दिल्ली के कापसहेड़ा के एक रिजॉर्ट में आम आदमी पार्टी के बीच जो हुआ, वह बदनाम हो चुकी पारंपरिक राजनीति से भी कहीं ज्यादा अभद्र और गंदा रहा। हो सकता है कि योगेंद्र यादव, प्रोफेसर आनंद कुमार और प्रशांत भूषण बदलाव की आकांक्षा वाली  भारतीय राजनीति के अंगने के वैसे फूल ना हों, जिसकी सुगंध दूर-दूर उस अंदाज में फैलती हो, जिस अंदाज में केजरीवाल की सुगंध वायु प्रसारित हो रही है। लेकिन यह भी सच है कि राजनीति के गलियारे में ये आवाजें अपनी साफ-सुथरी पहचान और भीनी सुगंध के चलते दूसरे आंगनों में भी पहचानी जाती रही है। ऐसे में उमर अब्दुल्ला का यह कहना कि आप ने भी दूसरे के समान बनने का फैसला कर लिया है, दरअसल साफ-सुथरी राजनीति की चाहत रखने वाले लोगों की निराशाओं का ही प्रतीक है।

आम आदमी पार्टी के प्रचंड उभार के दौर में भी एक वर्ग ऐसा रहा है, जिसे केजरीवाल की अगुआई वाली राजनीति से कोई उम्मीद नहीं रही। वैसे भी केजरीवाल की पार्टी का समूचा विकासक्रम सिर्फ किसी तरह आगे बढ़ने का इतिहास रहा है। याद कीजिए 2004-05 को, तब सूचना के अधिकार के अहम कार्यकर्ता के तौर पर उनका उभार हुआ था। उस वक्त उनकी प्रमुख सहयोगी अरूणा रॉय थीं। सूचना के अधिकार की मांग को लेकर अरूणा रॉय के साथ तब की बौद्धिक जमात का एक बड़ा हिस्सा था। उसमें हिंदी पत्रकारिता के शलाका पुरूष स्वर्गीय प्रभाष जोशी भी थे। सोशल मीडिया पर तो खबरें भी छायी रहीं कि 2004 में कांग्रेस की अगुआई में संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार बनने के बाद अरूणा रॉय ने अरविंद केजरीवाल की सोनिया गांधी से सिफारिश की थी कि केजरीवाल चूंकि बेहतर काम कर रहे हैं, लिहाजा उनका तबादला नहीं किया जाए। इसीलिए उनका दिल्ली से बाहर तबादला नहीं हुआ। इसके पीछे का सच चाहे जो भी हो, लेकिन तथ्य तो साफ है कि सोनिया गांधी की अगुआई वाली राष्ट्रीय सलाहकार परिषद की महत्वपूर्ण सदस्य रहीं अरूणा राय से केजरीवाल का गहरा रिश्ता रहा। यह बात और है कि अब उनके आंदोलनों में अरूणा रॉय कहीं नजर नहीं आतीं।
हमारी स्मृतियां इतनी क्षीण हैं कि हम निकट अतीत की बातें भी भूल जाते हैं। अरविंद की महत्वाकांक्षा में एक सीढ़ी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भी रहा है। याद कीजिए फरवरी 2010 में हुए रामलीला मैदान में भ्रष्टाचार विरोधी आयोजन को। उस आयोजन में मंच पर राष्ट्र की एकता की प्रतीक भारत माता की वही तसवीर लगी थी, जिसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पूजता रहा है। उस मंच पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक मोहन राव भागवत, मौजूदा राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल, बाबा रामदेव, गोविंदाचार्य और अन्ना हजारे बैठे थे। उस मंच पर पिछली कतार में अरविंद केजरीवाल भी थे। यहीं से केजरीवाल का अन्ना हजारे से गहरा रिश्ता शुरू हुआ और 2011 में पहले जून मे और बाद में अगस्त में अन्ना ने ऐतिहासिक अनशन किया, जिससे भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन को राष्ट्रीय पहचान मिली। राष्ट्रीय पहचान मिलते ही अरविंद अन्ना के सबसे बड़े लेफ्टिनेंट बनकर उभरे। इसी दौरान आप याद कीजिए कि उनका बाबा रामदेव से मोहभंग हो गया। बाबा रामदेव पर लाठी चार्ज के खिलाफ संसद मार्ग पर हुए योगगुरू की अगुआई वाले धरने में केजरीवाल मंच पर थे, लेकिन उन्हें पिछली कतार में बिठाया गया। इसके बाद अरविंद ने अपनी अलग ही राह चुन ली। जब उन्होंने अपनी आम आदमी पार्टी बनाई तो पहले उनका उस अन्ना हजारे से अलगाव हुआ, जिन्हें मीडिया ने केजरीवाल का गुरू घोषित कर दिया था।
दिल्ली की सत्ता पर प्रचंड पकड़ हासिल करने के बाद केजरीवाल की राजनीति में नजर आ रहा बदलाव सिर्फ प्रचंड आकांक्षाओं का दबाव नहीं है, बल्कि विचारधाराओं का टकराव भी है। अरविंद के आंदोलन को शुरूआती ताकत राष्ट्रवादी खेमे ने ताकत दी। जब अन्ना की अगुआई में आंदोलन बढ़ा, हालांकि उसमें प्रशांत भूषण जैसे समाजवादी सोच वाले एक शख्स का भी आधार मौजूद था। 2010 तक प्रशांत भूषण भी भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के बड़े चेहरे के तौर पर उभर चुके थे। जब आंदोलन बढ़ा तो उनके समधर्मी सोच वाले आनंद कुमार और योगेंद्र यादव की भी पैठ और पहुंच बढ़ी। यानी वैकल्पिक राजनीति का सपना देखने वाले राममनोहर लोहिया और किशन पटनायक की सोच वाला समाजवादी खेमा भी इस राजनीति से जुड़ गया। कांग्रेस तो कहती ही रही है कि केजरीवाल के आंदोलन में एनजीओ के जरिए ह्वाइट कॉलर धंधा करने वालों का सबसे ज्यादा साथ मिला। याद कीजिए, इन्हीं दिनों भारतीय राजनीतिक क्षितिज से वामपंथ की तकरीबन आखिरी विदाई की पटकथा लिखी जा रही थी। पश्चिम बंगाल की जनता ने 2012 के विधानसभा चुनावों में वामपंथ की विदाई करके एक तरह से इस खेमे का भी मनोबल तोड़ दिया। लिहाजा इस खेमे को भी भारतीय राजनीतिक आंगन में अपना वजूद बचाए रखने के लिए एक कोने की तलाश थी और उसे अरविंद के तौर पर एक कोना नजर आया। फिर तो उसने इसमें अपनी बची-खुची ताकत भी झोंक दी। यहां एक तथ्य और भी ध्यान देने की है कि सत्तर के दशक में नक्सलवादी आंदोलन के उभार के बाद से विश्वविद्यालयों और पढ़े-लिखे लोगों के बीच अतिवामपंथ महत्वपूर्ण वैचारिक धुरी रहा है। बौद्धिकता की दुनिया का यह वामपंथ लोहियावादी समाजवाद से अक्सर दूरी बनाकर रहता रहा है। गाहे-बगाहे बौद्धिक खींचतान में भी शामिल रहा है। लेकिन अरविंद केजरीवाल के उभार में वामपंथी रूझान ने भी अपने लिए ठीया तलाश लिया। यानी राष्ट्रवाद के आधार पर विकसित अरविंद की राजनीति में खाद और पानी वैकल्पिक राजनीति की सोच रखने वाले समाजवाद और वामपंथ ने ज्यादा दिया। राजनीति और समाज का अदने से विद्यार्थी को भी पता है कि वैचारिकता के धरातल पर ये तीनों ही विचारधाराएं एक-दूसरे के विपरीत छोर पर खड़ी हैं। जब तक इन वैचारिक धाराओं के आधार पर चलने वाली अरविंद की राजनीति का साध्य सत्ता थी, तब तक तो इनमें एका बना रहा, लेकिन सत्ता आते ही यह वैचारिक आलोड़न सतह पर आ गया। मूल लड़ाई तो समाजवाद बनाम राष्ट्रवाद की हुई, लेकिन इसमें अतिवामपंथी खेमे ने मीडिया और बौद्धिक हस्तक्षेप के जरिए इसे हवा दी। हिंदी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के नामी चेहरों का केजरीवाल और उनकी राजनीति की खुलेआम तरफदारी नेइस वैचारिक संघर्ष की आधारभूमि को मजबूत आधार मुहैया कराया। नतीजा सामने है।
यहां एक बात और ध्यान देने की है। पत्रकारिता में अपनी तीखी आवाज के जरिए युवाओं के चहेते रहे आशुतोष पर भी आप की राजनीति में बड़े सवाल उठ रहे हैं। एक दौर में ये भी राष्ट्रवादी खेमे के चहेते होते थे और उन्हें तो एक राष्ट्रवादी संस्थान की तरफ से हर महीने किसी न किसी कार्यक्रम में बुलाया जाता था। पता नहीं उन्होंने भागवतगीता का कितना गहराई से पाठ किया है, लेकिन एक बार उन्हें गीता पर भी भाषण देने के लिए बुलाया गया था। निश्चित तौर पर तब वे राष्ट्रवादी मंच का अपने भावी राजनीतिक उभार के लिए आधार बनाने की तैयारी कर रहे थे। लेकिन यह बात और है कि वे इसे अब शायद ही स्वीकार करें।
इन जानकारियों को साझा करने का मकसद सिर्फ आम आदमी पार्टी की सियासी नींव से लेकर बड़ी इमारत बनने में ईंट-गारा-सीमेंट की तरह इस्तेमाल की गई विचारधाराओं की तरफ आम लोगों का ध्यान आकर्षित करना है। ताकि आम आदमी पार्टी के मौजूदा हश्र की वैचारिक जमीन को देखा-समझा जा सके।

साफ है कि इन सारी विचारधाराओं का केजरीवाल ने महज अपने राजनीतिक उभार के लिए इस्तेमाल किया है। बेशक इन मनकों को आपस में जोड़ने के पीछे स्वच्छ राजनीति की चाहत और भ्रष्टाचार विरोध का धागा काम करता रहा है। लगता है कि इस माला के जरिए सत्ता हासिल करने का केजरीवाल का मकसद पूरा हो गया है। लिहाजा अब उन्हें इन मनकों की जरूरत नहीं है। अब तक का उनका जो रवैया है, उससे साफ है कि वक्त आने पर वे इस धागे से भी किनारा करने में देर नहीं लगाएंगे। कापसहेड़ा में हुई बैठक, उसमें बाउंसरों की मौजूदगी और बाहर विरोधी खेमे के साथ बदसलूकी ने इसके साफ संकेत दे ही दिए हैं। रही बात वोटरों की, तो सत्ता हासिल करने के बाद उसकी परवाह करता ही कौन करता है?

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