Friday, April 17, 2015

सौ बार जनम लेंगे, सौ बार फना होंगे

उमेश चतुर्वेदी 
संदर्भ : जनता परिवार की एकता
(वेबदुनिया पर पहले प्रकाशित)
जनता परिवार एक हो गया है..उसकी नई एकता को लेकर एक फिल्म का गाना याद आ रहा है..सौ बार जनम लेंगे, सौ बार फ़ना होंगे...चालीस के दशक में जब समाजवादी खेमा कांग्रेस से अलग हुआ था, तब से लेकर अब तक ना जाने कितनी बार जनता पार्टी भिन्न-भिन्न नामों से सामने आता रहा, कभी सिद्धांत के नाम पर तो कभी गैरकांग्रेसवाद के नाम पर जनता परिवार एक होता रहा।
जब-जब अतीत में वह एक हुआ, उसका सबसे बड़ा आधार गैरकांग्रेसवाद रहा। 1963 में डॉक्टर राम मनोहर लोहिया ने पहली बार गैरकांग्रेसवाद का नारा दिया था। जिसे अब हम जनता परिवार कहते हैं, वह तब समाजवादी परिवार था। डॉक्टर लोहिया के उस नारे ने तब के समाजवादी परिवार को बड़ी संजीवनी दी। 1967 के विधानसभा चुनावों में नौ राज्यों में गैरकांग्रेसी सरकारें बनीं। जिनकी अगुआई समाजवादी परिवार को ही मिली। लेकिन समाजवादी परिवार की यह एकता बनी नहीं रहीं और आपसी अहं के टकराव ने आजाद भारत के लोकतंत्र के इस प्रयोग को वक्त से पहले ही मिट्टी में मिला दिया। जैसे ही समाजवादी अलग हुए, उनकी ताकत तीन कौड़ी की रह गई।
 
जनता परिवार को एक होने का दूसरा मौका दिया इंदिरा गांधी की तानाशाही और उससे उपजे जनविक्षोभ ने। आपातकाल के बाद 1977 के पहले जनता परिवार भी एक हुआ। उस दौरान तब जनता परिवार में आज की भारतीय जनता पार्टी का पूर्व रूप जनसंघ भी शामिल था। इस एकता ने इतिहास फिर बनाया। इंदिरा की सर्वशक्ति सत्ता को भी उखाड़ फेंका गया। लेकिन एक बार फिर अहं आड़े आ गया और भारतीय जनता की आकांक्षाओं, नए लोकतांत्रिक मूल्यों के उदय और उसके बाद के बदलाव की आशाओं पर समाजवादी खेमे के अहंकार ने तोड़कर रख दिया।  
सिर्फ ढाई साल में ही यह सपना खत्म हो गया। इसके ठीक आठ साल बाद यानी 1988 में एक बार फिर एकता हुई। लेकिन इस बार भी विश्वनाथ प्रताप सिंह और चंद्रशेखर के अहं के टकराव ने एक बार फिर समाजवादी सपनों को चूर-चूर कर दिया। राज्यों के स्तर पर लालू का मुलायम से, मुलायम का रघु ठाकुर से, इंडियन नेशनल लोकदल आदि का आपस में टकराव रहा। टकराव और वैचारिक विरोधाभास ही था कि लालू से को अलग होना पड़ा।  
बहरहाल जनता परिवार एक बार फिर एक हुआ है और उसकी एकता का आधार इस बार सांप्रदायिकता के नाम पर मोदी की सुनामी बनी है। मोदी की सुनामी ने केंद्र में भाजपा की सत्ता को स्थापित कर दिया। कभी जनता परिवार का गढ़ रहे हरियाणा तक को बीजेपी ने छीन लिया। उत्तर प्रदेश में भी हालत समाजवादी परिवार के लिए कुछ खास अच्छी नहीं है। बिहार में नीतीश के अहं ने उन्हें उस भारतीय जनता पार्टी से अलग कर दिया, जिसके साथ 1996 से लेकर 2010 तक के सभी चुनावों में साथ दिया और लिया। केंद्र की सत्ता का स्वाद लिया और बिहार में दो बार से सत्ता में हैं।
लोकसभा चुनावों के ठीक पहले उन्होंने अकल्लियत का समर्थन हासिल करने के नाम पर बीजेपी से इसलिए नाता तोड़ लिया, क्योंकि उसने नरेंद्र मोदी को अपना प्रधानमंत्री उम्मीदवार घोषित कर दिया था। नीतीश को तब ऐसा लगा कि उनका यह दांव मोदी की हवा निकाल देगा, लेकिन इसका असर उलटा हुआ। जनता दल यू को बिहार में सिर्फ दो लोकसभा सांसदों तक सिमटना पड़ा। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी को भी महज पांच सीटों से ही संतोष करना पड़ा। इसके बाद लगा कि जनता परिवार को एक होना चाहिए और सांप्रदायिकता विरोध के नाम पर एकता का शिगूफा छोड़ा गया। जो अब कामयाब हुआ है। 
लेकिन इस एकता में भी एक पेच है। अखिलेश यादव और रामगोपाल यादव बीच बैठक से ही उठकर चले गए। यानी समाजवादी पार्टी में कहीं न कहीं पेच जरूर है और विरोध है। इस विरोध के चलते लगता नहीं कि एकता का यह प्रयोग भी लंबे समय तक चल पाएगा। इस पार्टी में मुलायम, लालू, नीतीश, एचडी देवेगौड़ा, शरद यादव भले ही हालात के चलते साथ चलने को मजबूर हुए हों। लेकिन यह भी सच है कि इनके अपने अहं भी कम नहीं हैं और वक्त आते ही वे लोहिया की उस सीख को अपनाने में पीछे नहीं रहेंगे। सीख यह कि सुधरो नहीं तो टूट जाओ।
सुधरना समाजवादी परिवार में कम वक्त के लिए होता है और टूटना कुछ ज्यादा होता है। यानी टूट अवश्यंभावी है। अतीत भी इसका गवाह रहा है। यह टूट तब और बढ़ेगी, जब उन्हें एक-दूसरे के साथ से सियासी फायदे होते नजर नहीं आएंगे। क्योंकि लालू यादव के आधार वोट बैंक से न तो देवेगौड़ा को फायदा हो सकता है और न ही इंडियन नेशनल लोकदल को। 
जो लोग यह उम्मीद लगाए बैठे हैं कि बिहार में लालू और नीतीश की एकता से नीतीश को फायदा होगा, वे दरअसल एक समीकरण को भूल रहे हैं। नीतीश और लालू का कैडर एक-दूसरे से बीस साल से ना सिर्फ अलग है, बल्कि एक-दूसरे के जान का दुश्मन भी है। नीतीश के समर्थन में अगड़ा वोट बैंक अतीत में अगर रहा भी है तो इसकी बड़ी वजह लालू का विरोध रही है। क्योंकि लालू अगड़ा वोट बैंक की दुखती रग रहा है। 
इन दिनों नीतीश के साथ महज कुर्मी और दूसरी पिछड़ी जातियों का ही समर्थन है। जबकि लालू के साथ यादव और मुसलमानों का बड़ा धड़ा है। लेकिन एक बात और है कि दोनों के कैडर हर विधानसभा पर टिकट पाने की उम्मीद में बीस साल से राजनीति कर रहे हैं। लेकिन बदले हालात में किसी एक ही के कैडर को टिकट मिलेगा तो दूसरा कैडर नाराज होकर भीतरघात करेगा और इसका खामियाजा बिहार के जनता परिवार को भुगतना पड़ सकता है। रही बात मुलायम के फायदे की तो उन्हें उत्तर प्रदेश में इस विलय से शायद ही कोई फायदा मिले। इसलिए ना सिर्फ मुलायम के साथियों, बल्कि नीतीश के साथियों के बीच भी विलय के खिलाफ खुसुर-पुसुर है। ऐसे में बिहार चुनावों के तत्काल बाद ही अगर फना होने की बात सच हो जाए तो हैरत नहीं होनी चाहिए।

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