Monday, May 4, 2015

वामपंथ को मुख्यधारा में ला पाएंगे येचुरी

उमेश चतुर्वेदी

पहली नजर में युवा और उर्जावान दिखने वाले 62 साल के सीताराम येचुरी भारतीय वामपंथ की प्रमुख धारा के मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी यानी सीपीएम के सर्वोच्च पद पर पहुंच गए हैं। सीपीएम की कमान संभालने वाले वे पांचवी शख्सियत हैं। जिस पद को पी सुंदरैया और ईएमएस नंबूदरीपाद जैसे धाकड़ और गंभीर वामपंथी विचारकों ने संभाला, जिस पर खिलंदड़ा और गैरभाजपा दलों के हरदिल अजीज हरकिशन सिंह सुरजीत काबिज रहे उस पद पर सीताराम येचुरी का उस प्रकाश करात के तत्काल बाद काबिज होना बेहद अहम है। जिनके संगसाथ में ही सीताराम येचुरी की पूरी राजनीति परवान चढ़ी है। सीताराम येचुरी और प्रकाश करात उस जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की उपज हैं, जिसे राजधानी दिल्ल के ठीक बीचोंबीच अपनी अलग राजनीतिक पहचान के चलते एक टापू ही माना जाता है। उदारीकरण की आंधी और कारपोरेटीकरण के गहरे असर के दौर में जब सिर्फ राजधानी दिल्ली ही नहीं, पूरा सामाजिक परिवेश ही ढलने और उसमें आत्मसात होने को ही अपनी जिंदगी का मकसद और कामयाबी समझ रहा हो, उसी परिवेश के बीच जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय में वामपंथी राजनीतिक धारा का मजबूत बने रहना और मौजूदा सामाजिक-राजनीतिक बयार के खिलाफ तनकर खड़े रहना सामान्य बात नहीं है। समाज के लिए असामान्य, लेकिन जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के लिए आसान लगने वाली इस धारा की नींव निश्चित तौर पर प्रकाश करात और सीताराम येचुरी जैसे वामपंथ के प्रहरियों ने ही डाली थी।
भारतीय सामाजिक आधार और ऊंच-नीच के साथ ही जातीय भेदभाव वामपंथ के विस्तार के लिए बेहतर माहौल और आधार मुहैया करा सकता था। इसके बावजूद भारतीय वामपंथ उस मुकाम तक नहीं पहुंच पाया, जिस हद तक वह जा सकता है। वह दिल्ली के बीच जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय से लगायत केरल, त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल तक ही अपना आधार बना पाया। लेकिन वह देशव्यापी अपनी पहुंच और पहचान नहीं बना पाया। निश्चित तौर पर इसके लिए वामपंथ के बीच वैचारिक उहापोह ज्यादा जिम्मेदार रहा है। भारतीय वामपंथ दो कदम आगे और चार कदम पीछे चलने के लिए भी अभिशप्त रहा है। यह अभिशप्तता हाल के दिनों में सीताराम येचुरी और प्रकाश करात के बीच भी नजर आई। 2014 के आम चुनावों के बाद जब मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी 16 लोकसभा सीटों से महज नौ सीटों पर सिमट गई प्रकाश करात की शैली पर सवाल उठने लगे। तब प्रकाश करात ने 36 साल पुराने पार्टी के 1978 के जालंधर कांग्रेस के उस प्रस्ताव को गलत ठहराना शुरू किया, जिसके मुताबिक मार्क्सवादी नेतृत्व ने कांग्रेस विरोध की नीति अख्तियार की थी। दिलचस्प यह है कि तब माहौल ही गैरकांग्रेसवाद का था। 1977 के चुनाव हो चुके थे और केंद्र में पहली बार मोरारजी देसाई की अगुआई में जनता पार्टी की गैरकांग्रेसी सरकार बनी थी। लेकिन तब भी मार्क्सवादी नेतृत्व ने गलती की थी। उसने गैरकांग्रेसवाद की नीति को स्वीकार करने में देर कर दी थी। इसके ठीक पहले तक वे आपातकाल लगाने वाली इंदिरा गांधी की सरकार की वामपंथ के स्वर्ग सोवियत संघ के नाम पर साथ दे रहे थे। जालंधर कांग्रेस का प्रस्ताव देर से आया और जब तक वह ठीक से लागू हो पाता, तब तक जनता परिवार अपने ही अंतर्विरोधों से घिर कर तार-तार हो गया। तब तक देश में एक बार फिर मजबूरी में ही सही कांग्रेसवाद स्थापित हुआ। लेकिन वामपंथ ने उस वक्त तक खुद को सही पटरी पर लाने में कामयाब नहीं हुआ। प्रकाश करात ने जालंधर प्रस्ताव को ही वामपंथ के नुकसान के लिए जिम्मेदार ठहराया। जबकि सीताराम येचुरी अपने दोस्त करात की इस दलील से सहमत नहीं है। उनका मानना है कि जालंधर प्रस्ताव को ठीक से लागू नहीं किया गया। जिसकी परिणति वामपंथ की तकरीबन विदाई के तौर पर नजर आ रही है। हालांकि इस वैचारिक विमर्श में एक विरोधाभास भी है। गैरकांग्रेसवाद के खिलाफ 1995 की चंडीगढ़ कांग्रेस में तत्कालीन मुखर सीपीएम सांसद सैफुद्दीन चौधरी ने दलील दी थी। चूंकि यह जालंधर कांग्रेस के प्रस्ताव का एक तरह से उल्लंघन था, लिहाजा उनके सांप्रदायिकता के खिलाफ गोलबंदी के तर्क को पार्टी ने ना सिर्फ खारिज कर दिया, बल्कि सैफुद्दीन चौधरी को 1996 के आम चुनावों में टिकट तक नहीं दिया। जिसकी परिणति यह हुई कि संसद के गलियारों में मुखर रहने वाले सैफुद्दीन चौधरी गुमनाम हो गए और हाल के दिनों में उन्हें गुमनाम मौत का भी सामना करना पड़ा।
वामपंथ ने 1996 में ही गलती की, जब गैरकांग्रेसवाद और गैर सांप्रदायिकता के नाम पर सीपीएम को केंद्र सरकार की अगुआई मिलनी थी। कॉमरेड ज्योति बसु को प्रधानमंत्री बनाने को लेकर तत्कालीन सीपीएम महासचिव हरकिशन सिंह सुरजीत सहमत भी थे। प्रकाश करात की अगुआई में युवा कॉमरेडों ने वैचारिक आधार को बचाए रखने के नाम पर इस प्रस्ताव को ही ठुकरा दिया गया। जिसे बाद में खुद सीपीएम ने ही भयंकर भूल माना। प
प्रकाश करात ने खुद कांग्रेसवाद को 2004 के लोकसभा चुनावों में स्वीकार किया और कांग्रेसी की अगुआई वाली संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन की सरकार को समर्थन दिया। लेकिन अमेरिका से परमाणु करार के मुद्दे पर बात इतनी बढ़ी और प्रकाश करात का अमेरिका विरोध का विचार इतनी गहराई से परवान चढ़ा कि उन्होंने दिग्गज मार्क्सवादी सोमनाथ चटर्जी की सलाह को भी दरकिनार कर दिया और 8 जुलाई 2008 को मनमोहन सरकार से समर्थन वापस ले लिया। लेकिन उन्हें दगा उस समाजवादी पार्टी ने दिया, जिसके नेता मुलायम सिंह यादव को सांप्रदायिकता विरोधी गोलबंदी में अगुआ की तरह उभारने की कोशिश हरकिशन सिंह सुरजीत ने ना की, बल्कि स्थापित भी किया। लिहाजा 22 जुलाई 2008 को अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा के बाद मनमोहन सरकार बच गई। इसका खामियाजा देश की गरीब जनता को जो भुगतना पड़ा, सो पड़ा ही, वामपंथी राजनीतिक धारा को भी नुकसान उठाना पड़ा। हालांकि चुनावी आंकड़े बताते हैं कि पार्टी को  कांग्रेस की बगलगीर होने का 2004 के चुनावों में फायदा मिला। 2004 के आम चुनावों में उसे 5.7 फीसद वोट और 43 सीटें हासिल हुईं। इसी तरह उसकी सहयोगी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी को 1.4  फीसद वोट और 10 सीटों पर जीत मिली। लेकिन अमेरिका के साथ परमाणु करार के खिलाफ वाम राजनीति ने कांग्रेस का साथ छोड़ा तो उसे अगले यानी 2009 के आम चुनावों में नुकसान उठाना पड़ा। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी का वोट घटकर 5.3 फीसद हो गया और सीटें घटकर सिर्फ 16 रह गईं। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी का वोट तो नहीं घटा, अलबत्ता उसकी सीटें घटकर चार पर सिमट गईं। लेकिन, 2014 का आमचुनाव तो वामदलों के लिए तकरीबन वाटरलू ही साबित हुआ। इस बार मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी को सिर्फ 3.3 फीसद वोट और नौ सीटों पर सिमटना पड़ गया। इसी तरह भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी को 0.8 फीसदी ही वोट हासिल हुए और पार्टी सिर्फ खाता ही खोल सकी। यही वजह रही कि हाल के दिनों में दोनों मित्रों प्रकाश करात और सीताराम येचुरी के बीच वैचारिक खींचतान रही है।

येचुरी के विचार से जाहिर है कि वे कांग्रेसविरोध की राह पर ही आगे बढ़ेंगे, बशर्तें 16 सदस्यीय पोलित ब्यूरो का उन्हें साथ मिला। लेकिन उनके सामने बड़ी चुनौती भी है। अगले साल उस पश्चिम बंगाल और केरल में विधानसभा चुनाव होने हैं, जहां सीपीएम का मजबूत आधार रहा है। अगर येचुरी इन राज्यों में कमाल दिखा पाए और अपने आधार को मजबूत कर पाए तो ठीक, अन्यथा उनके खिलाफ भी सवाल उठेंगे। लेकिन सबसे बड़ी चुनौती उन्हें वामपंथ के पाखंड से उबरना होगा। जो बात तो आम लोगों की करता है, लेकिन जुबान अपनी अंग्रेजी में ही खोलता है। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में वह नेस्केफे का काउंटर बंद करवा देता है, लेकिन उसके कार्यकर्ता जेएनयू के ठीक बगल में स्थित प्रिया सिनेमा कॉप्लेक्स में विदेशी खाना, विदेशी ब्रांड के रंगीन पेय और कपड़े खरीदकर खाने-पीने-पहनने में अपना गौरव समझते हैं। वामपंथ का यह विरोधाभास, जनता से लगातार उसकी दूरी और वक्त को न पहचान पाने की उसकी वैचारिक कमजोरी उसे भारतीय राजनीति में अप्रासंगिकता की हद के करीब पहुंचा चुकी है। येचुरी को इनसे भी पार पाना होगा। 

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