Friday, July 2, 2010

ढक्कन वाली पीढ़ी और साहित्य का संस्कार


उमेश चतुर्वेदी
बहुत खुशनसीब वे होते हैं, जिनकी जिंदगी की तय खांचे और योजना के मुताबिक चलती है। लेकिन आज की पढ़ी-लिखी पीढ़ी ने अपने बच्चों तक की जिंदगी के लिए खांचे तय कर रखे हैं और इसी खांचे के तहत जिंदगी की गाड़ी आगे बढ़ रही है। मनोवैज्ञानिक और शिक्षाशास्त्री भले ही इस चलन को गलत बताते रहें, थ्री इडियट जैसी फिल्में भी इसकी आलोचना करती रहें, लेकिन उदारीकरण के बाद आई भौतिकवाद की आंधी और उसमें कठिन और कठोर हुई जिंदगी की पथरीली राह पर चलते वक्त आज की जवान होती पीढ़ी के लोग सोचने के लिए मजबूर हो जाते हैं कि काश उनके भी माता-पिता ने उनकी जिंदगी का खांचा तय कर दिया होता ...
बहरहाल अपनी जिंदगी भी ऐसी खुशनसीबी के पड़ावों से नहीं गुजरी। जिस वक्त जिंदगी तय करने का वक्त था, पढ़ाई के उस दौर में रोजाना ट्रेन की घंटों की यात्रा करना मजबूरी थी। घर से कॉलेज की दूरी जो ज्यादा थी। लेकिन इस अनखांचे की जिंदगी ने खुदबखुद एक खांचा दे दिया। तब ट्रेन की लंबी यात्रा काटने के लिए किताबों और पत्रिकाओं का सहारा लेना शुरू किया और देखते ही देखते किताबें और पत्रिकाएं जिंदगी की पथरीली राह पर सहारा तो बन ही गईं, जिंदगी को देखने का नया नजरिया भी देने लगीं। किताबों की दुनिया से लोगों को परिचित कराने में ट्रेनों की बड़ी भूमिका रही है। मशहूर पत्रकार प्रभाष जोशी ने एक बार कहा था कि रेल यात्राओं का एक बड़ा फायदा उनकी जिंदगी में यह रहा है कि इसी दौरान उन्होंने कई अहम किताबें पढ़ लीं। रेल यात्रियों के मनोरंजन में किताबों की जो भूमिका रही है, उसमें एक बड़ा हाथ एएच ह्वीलर बुक कंपनी और सर्वोदय पुस्तक भंडार जैसे स्टॉल का भी रहा है। यह भी सच है कि इन स्टॉल्स से गंभीर साहित्य की तुलना में इब्ने सफी और कुशवाहा कांत के साथ गुलशन नंदा, रानू, सुरेंद्र मोहन पाठक और वेदप्रकाश शर्मा जैसे लुगदी साहित्यकार ज्यादा बिकते रहे हैं। यहां पाठकों की जानकारी के लिए बता देना जरूरी है कि इन साहित्यकारों को लुगदी साहित्यकार क्यों कहा जाता है। दरअसल इनकी रचनाएं जिस कागज पर छपा करती थीं, वह कागज अखबारी कचरे और किताबों के कबाड़ की लुगदी बनाकर दोबारा तैयार किया जाता था। बहरहाल इसी लुगदी साहित्य के बीच ही गोदान, गबन से लेकर चित्रलेखा तक पढ़ने वाले पाठक भी मिल जाते थे। इसके साथ ही पाठकीयता का एक नया संसार लगातार रचा-बनाया जाता था। ट्रेन में बैठने की जगह मिली नहीं कि किताब या पत्रिका झोले से निकाली और अपनी दुनिया में डूब गए।
लेकिन आज हालात बदल गए हैं। तकनीकी क्रांति ने आज की पीढ़ी के हाथ में मोबाइल के तौर पर नन्हा-मुन्ना कंप्यूटर ही दे दिया है। मोबाइल फोन सचमुच में जादू का पिटारा है। बीएसएनएल की मोबाइल फोन सेवा का 2003 में उद्घाटन करते वक्त तब के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने इसे पंडोरा बॉक्स ही कहा था। तो इस जादुई बॉक्स ने संगीत और एफएम का जबर्दस्त सौगात दे दिया है। आज की पीढ़ी इसका हेडफोन साथ लेकर चलती है और गाड़ी या बस में जैसे ही मौका मिला, हेड फोन कान में लगाती है और दीन-दुनिया से बेखबर संगीत की अपनी दुनिया में डूब जाती है। मेरे के मित्र हैं, वे इस पीढ़ी को ढक्कन वाली पीढ़ी कहते हैं। आपने होमियोपैथिक दवाओं की पुरानी शीशियां देखी होंगी। कार्क लगाकर उन्हें बंद किया जाता था। आज के हेडफोन कुछ वैसे ही कान में कार्क की तरह फिट हो जाते हैं, जैसे पहले ढक्कन लगाए जाते थे। जाहिर है कि ढक्कन वाली इस पीढ़ी से रेल और बस यात्राओं के दौरान पढ़े जाने का जो रिवाज रहा है, वह लगातार छीजता जा रहा है। आज की पीढ़ी के हाथ में पत्रिकाएं और किताबें कम ही दिखती हैं। लेकिन नई-नई सुविधाओं वाले गजट उनके हाथ में जरूर हैं।
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव मोहन प्रकाश जैसे नेता कहा करते हैं कि जब वे पढ़ाई करते थे, उस वक्त अगर दिनमान में उनकी चिट्ठी भी छप जाती थी तो वे पूरी यूनिवर्सिटी में गर्व से उसे लेकर अपने बगल में दबाए घूमा करते थे। वैसे भी दिनमान और धर्मयुग पढ़ना उस समय शान की बात मानी जाती थी। लेकिन आज की पीढ़ी के लिए नए गजट ही शान के प्रतीक हैं। जाहिर है कि सोच में आए इस बदलाव का असर भी दिख रहा है। चूंकि पाठकीयता नहीं है, उसका संस्कार नहीं है तो आप देखेंगे कि आज की पीढ़ी के ज्यादातर लोगों को सामान्य ज्ञान की सामान्य सी जानकारी भी नहीं है। इसका दर्शन यूनिवर्सिटी और कॉलेजों में पढ़ाने वाले अध्यापकों-प्रोफेसरों को रोजाना हो रहा है। कई बार तो वे माथा तक पीटने के लिए मजबूर हो जाते हैं। लेकिन क्या मजाल कि ढक्कन वाली पीढ़ी के माथे पर शिकन तक आ जाए। हो सकता है बदले में आपको यह भी सुनने को मिले- इट्स ओके...सब चलता है यार...
तो क्या किताबें मर जाएंगी ...क्या नए गजट की दुनिया उन्हें खा जाएगी...यहां पर याद आता है मशहूर अमेरिकी पत्रकार वाल्टर लिपमैन का कथन। उन्होंने कहा था – दुनिया जैसी भी है, चलती रहेगी। फिर हम भी उम्मीद क्यों न बनाए रखें।

Sunday, June 27, 2010

बाजी जीत पाएंगे नीतीश कुमार


उमेश चतुर्वेदी
पिछले यानी 2009 के आम चुनावों के आखिरी दौर के मतदान के ठीक बाद कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी ने जब नीतीश कुमार की प्रशंसा की थी, भारतीय जनता पार्टी से उनके अलगाव का अंदेशा उसी दिन लगाया जाने लगा था। यह बात और है कि जिस फोटो वाले विज्ञापन के नाम पर नीतीश कुमार नाराज होने का स्वांग कर रहे हैं, नरेंद्र मोदी के साथ हंसता हुआ वह फोटो उन्होंने पिछले आम चुनाव में एनडीए की लुधियाना रैली में खिंचवाए थे। उस वक्त यह माना गया था कि नीतीश कुमार के चेहरे पर जो मुस्कान थी, वह असली थी। लेकिन 12 जून को पटना में भारतीय जनता पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के दौरान उनकी इस मुस्कान की असलियत सामने आने लगी है।
गुजरात के पांच करोड़ रूपए की सहायता को वापस करने के नीतीश के फैसले से दो तरह के सवाल उठते हैं। एक सवाल राजनीतिक है, जिसे लेकर इन दिनों जमकर हो-हल्ला मचा है। लेकिन दूसरा सवाल भारतीयता से जुड़ा है। जिस समाजवादी विचारधारामें पल-पोसकर नीतीश कुमार आगे बढ़े हैं, जिस किशन पटनायक की अगुआई में उन्हें समाजवादी राजनीति की दीक्षा मिली है, उन सबकी सोच में भारतीयता ओतप्रोत थी। उनके लिए भारत के हर कोने का नागरिक एक समान था और डॉक्टर लोहिया से लेकर जयप्रकाश नारायण रहे हों या फिर किशन पटनायक, सबका मानना था कि पूरे देश के नागरिक को देश के हर इलाके में आने-जाने और रहने की स्वतंत्रता होनी चाहिए। उनकी इस सोच का मतलब साफ था कि इससे भारतीय गणराज्य का नागरिक सही मायने में पूरे भारत को अपना मान सकेगा और क्षेत्रीयता की धारणा से उपर उठ सकेगा। कोसी में आई बाढ़ के बाद अगर गुजरात ने मदद की थी तो इसलिए नहीं कि दोनों ही राज्यों में एनडीए की सरकारें हैं, बल्कि इसलिए कि गुजरात का नागरिक भी हजारों किलोमीटर दूर अलग भाषा वाले बिहार के नागरिक के दुख को भी अपना समझ रहा था। अगर उसके मन में क्षेत्रीयता की धारणा रही होती तो वह कोसी के बाढ़ पीड़ितों के लिए आगे नहीं आता। यही बात गुजरात के लोगों पर भी लागू होती है। गुजरात में जब 2001 में भयानक सूखा पड़ा या 2002 में भारी भूकंप आया, उसमें पूरे देश ने यह सोचा होता कि वहां एक सांप्रदायिक सरकार काम कर रही है तो शायद ही सहायता मुहैया कराने में आगे रहा होता। दरअसल ऐसी सहायताएं मानवीय त्रासदी से उपजी भावनाओं की वजह से दी जाती हैं। वहां जाति-धर्म या क्षेत्रीयता की समस्याएं नहीं होतीं। अगर ऐसा ही होता तो पाकिस्तान के भूकंप पीड़ितों या बांग्लादेश के बाढ़ पीड़ितों के लिए भी भारतीय नागरिक आगे नहीं आते। नीतीश कुमार ने मुस्कुराते हुए अपने फोटो को छापने के खिलाफ गुजरात को जो जवाब दिया है, वह अतिवादी जवाब है और जिस मुस्लिम वोट की खातिर उन्होंने यह कदम उठाया है, वह भी इसे शायद ही जायज ठहराए। क्योंकि मुस्लिम नागरिक भी मानता है कि यह सहायता सांप्रदायिक नरेंद्र मोदी ने अपने घर से नहीं दी थी, बल्कि गुजरात के उन नागरिकों ने दी थी, जो बिहार के दर्द के साथ खुद को भी जुड़ा महसूस कर रहे थे। अगर ऐसे सवाल उठने लगे तो इसका जवाब देना नीतीश कुमार और उनके जनता दल यू के नेताओं को देना भारी पड़ सकता है।
रही बात राजनीतिक सवाल की, तो यह माना जा रहा है कि नीतीश कुमार ने गुजरात के पैसे को वापस इसलिए वापस भेजा है, ताकि बिहार के करीब बारह फीसदी मतदाताओं को खुश किया जा सके। नीतीश कुमार ने अपने शासन काल में निश्चित तौर पर व्यवस्था में एक हद तक बदलाव लाने की कामयाब कोशिश की है। उसका फायदा जितना उनकी सहयोगी भारतीय जनता पार्टी को मिलना चाहिए था, उतना उसे नहीं मिला। बल्कि नीतीश कुमार अकेले हासिल करने में कामयाब रहे। बीजेपी से गठबंधन की वजह से नीतीश कुमार को पिछले यानी 2005 के विधानसभा चुनाव में खासी कामयाबी मिली। दरअसल कुशासन और एक खास वर्ग के लोगों को शासन-सत्ता में भागीदारी की वजह से बिहार की अधिकांश जनसंख्या नाराज थी। उसने जितना बीजेपी-जेडीयू गठबंधन को साथ नहीं दिया, उससे कहीं ज्यादा लालू के खिलाफ वोट डाला। जिसमें कुशवाहा-कुर्मी के साथ अगड़े वर्ग के वोटरों का भरपूर साथ मिला। यहां ध्यान देने की बात है कि बिहार में मुसलमान करीब बारह फीसदी हैं। ब्राह्मण, भूमिहार, क्षत्रिय और कायस्थ मिलकर करीब चौदह फीसदी हैं। इसी तरह कुर्मी और कुशवाहा मिलकर करीब बारह फीसदी हैं। नीतीश कुमार को लगता है कि जातीय गणित में कुर्मी-कुशवाहा के साथ महादलितों का करीब दस फीसदी वोट के साथ मुस्लिमों का बारह फीसदी वोट मिल जाए तो उन्हें बीजेपी की जरूरत नहीं रहेगी। वैसे भी बटाईदारी पर बनी कमीशन की रिपोर्ट को लागू करने का शिगूफा छोड़ने के बाद वैसे ही अगड़ा वर्ग उनसे नाराज चल रहा है। इसलिए उन्हें लगता है कि कुर्मी-कुशवाहा और महादलितों के साथ मुसलमानों का वोट मिल गया तो समझो अगले कई साल तक कुर्सी पक्की। पढ़ाई-लिखाई से इंजीनियर नीतीश कुमार ने यही गणित लगाकर नरेंद्र मोदी के खिलाफ अभियान छेड़ दिया है। लेकिन वे यह भूल गए हैं कि राजनीति की दुनिया में दो जमा दो का गणित चार नहीं कई बार तीन और एक भी हो जाता है। खुद उनके भी राजनीतिक जीवन में ऐसा 1995 में हो चुका है।
इसे जानने के लिए नीतीश कुमार की मूल पार्टी समता पार्टी के गठन और 1995 के विधानसभा चुनावों में मिली सफलता को भी देखना होगा। 1994 में वीपी सिंह ने राजनीति से सन्यास लेकर लोकसभा में पार्टी के नेता पद से इस्तीफा दे दिया था। इसके बाद जार्ज फर्नांडिस ही जनता दल संसदीय दल के स्वाभाविक उत्तराधिकारी थे। लेकिन आज के जेडीयू अध्यक्ष शरद यादव ने जोड़तोड़ करके खुद को संसदीय दल का नेता घोषित करा लिया था। इससे जार्ज आहत थे। इस बीच बिहार की राजनीति में लालू यादव नीतीश कुमार को अलग-थलग कर रहे थे। तभी जार्ज और नीतीश ने मिलकर जनता दल से अलग समता पार्टी बनाई और 1995 के विधानसभा चुनावों में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी, सीपीएम – माले और ऐसे ही दलों के साथ सीटों का तालमेल करके चुनाव लड़ा। लेकिन चुनाव नतीजों के बाद समता पार्टी के विधायक दहाई का भी आंकड़ा नहीं पार कर पाए। इसके बाद उन्हें लालू जैसे कद्दावर विरोधी को मात देने के लिए सांप्रदायिकता का ही कंधा नजर आया था। इतना ही नहीं, तब समाजवादी जनता पार्टी चला रहे चंद्रशेखर भी समता पार्टी में अपनी पार्टी के विलय को तैयार थे। इसी बीच 1996 का लोकसभा चुनाव आ गया और शिवसेना के बाद भारतीय जनता पार्टी की सहयोगी बनने वाला दूसरा दल समता पार्टी ही बना। जिसका उसे फायदा भी मिला। उसके बाद से नीतीश कुमार और उनकी पार्टी ने पीछे मुड़कर नहीं देखा। उन्हें 2000 में मुख्यमंत्री बनाने का अभियान उनकी पार्टी से कहीं ज्यादा भारतीय जनता पार्टी ने ही चलाया। 2005 के विधानसभा चुनावों में उन्हें बतौर मुख्यमंत्री भारतीय जनता पार्टी के तब के अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी ने ही प्रोजेक्ट किया था। जबकि इस अपनी पार्टी के इस फैसले से बीजेपी नेता शत्रुघ्न सिन्हा नाराज थे। कहना न होगा कि उनकी नाराजगी अब भी बनी हुई है।
जाहिर है कि 1995 का इतिहास और चुनावी सफलता नीतीश के खिलाफ रही है। इतिहास गवाह है कि अगर बीजेपी का उन्हें साथ नहीं मिला होता तो वे आज जहां हैं, वहां नहीं होते। वैसे भी राजनीति का आज पहला उसूल हो गया है सिद्धांतों की तिलांजलि देना। यही वजह है कि आज गठबंधन बनने और बिखरने का दौर बढ़ गया है। लेकिन बिहार के जो हालात हैं और जनता दल यू की भी जो अंदरूनी हालत है, उसमें नीतीश के अतिवादी कदम उन्हें भारी ही पड़ सकते हैं। उनकी पार्टी के एक कद्दावर नेता ने नाम न छापने की शर्त पर इन पंक्तियों के लेखक से कहा था कि अफसरशाही पर पार्टी की कोई लगाम ही नहीं है। इससे अधिकांश नेता नाराज हैं। नाराज तो विधायक भी हैं। इसलिए अगर एक बार उनके खिलाफ विरोधी माहौल शुरू हुआ तो उनकी अपनी ही पार्टी के लोग उनके खिलाफ खड़े होने में देर नहीं लगाएंगे। प्रभुनाथ सिंह, शंभूनाथ श्रीवास्तव, राजीव रंजन सिंह लल्लन और रह-रह कर शिवानंद तिवारी के गुस्से के इजहार को इन्हीं अर्थों में जोड़कर देखा जाना चाहिए। इससे साफ है कि सत्ता की ताकत के चलते जनता दल यू के विधायक और सांसद भले ही चुप हों, लेकिन विरोधी माहौल बनने के बाद वे अपनी खुन्नस निकालने से बाज नहीं आएंगे। ऐसे में नीतीश कुमार के लिए अकेले खड़ा हो पाना आसान नहीं होगा। फिर जिस कांग्रेस के सहारे बिहार में नीतीश कुमार की अगली सरकार की कल्पना की जा रही है, उसका लिटमस टेस्ट अभी होना बाकी है। उसे लगता है कि उसके साथ जनता आ रही है। लेकिन जिस तरह बीजेपी आहत हुई है, अगर वह अपने कार्यकर्ताओं और वोटरों को यह संदेश देने में कामयाब हुई तो बिहार में भी कर्नाटक दोहराया जा सकता है। वहां जनता दल सेक्युलर के साथ बीजेपी का गठबंधन था और वक्त आने पर जब जेडी एस ने सत्ता देने से इनकार कर दिया तो दक्षिण में कमल खिल उठा था। जनता के बीच बीजेपी के पक्ष में सहानुभूति लहर चल पड़ी थी।
राजनीति संभावनाओं और आशंकाओं का खेल है। अगर बीजेपी की यह संभावना और जनता दल यू की ऐसी आशंका सच साबित हो गई तो बाजी पलटते देर नहीं लगेगी।

Tuesday, June 22, 2010

प्रशासनिक उदासीनता और खतरे से खेलने की मजबूरी


उमेश चतुर्वेदी
पूर्वी उत्तर प्रदेश में जेठ की तपती दोपहरी में सूरज देवता के अलावा बलिया के नाव हादसे ने भी लोगों को बेचैन किए रखा। राजनीतिक चर्चाओं के लिए मशहूर पूर्वी उत्तर प्रदेश के चट्टी-चौराहों में इस बार नाव दुर्घटना ही कहीं ज्यादा प्रमुख स्थान बनाए हुए है। बिजली की मार झेल रहे लोगों के पास भले ही दिल्ली-मुंबई की तरह खबरिया चैनलों की दिन-रात की खबरिया बमबारी झेलने की सुविधा भले ही मौजूद नहीं है, लेकिन प्रमुख अखबारों की बाढ़ ने इस इलाके के लोगों को स्थानीय सूचनाओं से लैस जरूर कर दिया है। जिसकी वजह से नौका दुर्घटना को लेकर लोगों का गुस्सा शांत होने का नाम नहीं ले रहा है। ऐसे हादसों के बाद आमतौर पर प्रशासनिक खामियां ही सामने आती हैं। 14 जून को बलिया में गंगा समाधि लेने के लिए मजबूर हुए 62 लोगों की खबर के बाद भी ये खामियां सामने आईं हैं। हादसे के बाद जिलाधिकारी का फौरन घटना स्थल पर पहुंचना और उनके मातहत अधिकारियों का बाद में आना मामूली घटना नहीं है, बल्कि इससे जाहिर होता है कि यूपीएससी और राज्य सिविल सेवाओं के जरिए जो कथित प्रतिभाएं प्रशासन चलाने के लिए आ रही हैं, उनके मानवीय सरोकार क्या हैं।
यह सच है कि पारंपरिकता के खांचे में सदियों से पलते -बढ़ते समाज में लोगों का गंगा से सरोकारी नाता आज भी बना हुआ है। यही वजह है कि तिथि-सुदिन पर पूर्वी उत्तर प्रदेश से लेकर बिहार के गंगा किनारे के लोग अपने बच्चों का मुंडन संस्कार गंगा के ही किनारे करते रहे हैं। इसी दौरान गंगा को माला पहनाने की भी परंपरा है। जिसके तहत लोग लंबी रस्सियों में बनी आम के पल्लव की माला लेकर गंगा की पेटी को नापते हैं। इसीलिए नावें किराए पर ली जाती हैं। कहना न होगा कि समय के साथ इस संस्कार में बढ़ती पैसे की भूमिका को लेकर नाविकों भी मुंडन की तिथियों का बेसब्री से इंतजार करते हैं। इन्हीं दिनों उनकी भारी कमाई होती है। कमाई के चक्कर में वे क्षमता से अधिक अपनी नावों में लोगों को भर लेते हैं। आमतौर पर जुगाड़ बाजी का ये खेल और कमाई का यह सिलसिला सफल रहता है। लेकिन कभी-कभी बाजी पलट जाती है तो 14 जून जैसे हादसे सामने आ जाते हैं। तब प्रशासनिक अमला खामियां दुरूस्त करने में जुट जाता है। लेकिन जैसे-जैसे इन खबरों की स्मृति पर परतें चढ़ती जाती हैं, प्रशासन भी अपने काम में जुट जाता है और नाविक अपनी कमाई में। अगर ऐसा नहीं होता तो साढ़े चार साल पहले हुए हादसे से प्रशासन और मल्लाह कोई सबक सीखते। बलिया के ही इसी नाव हादसे में 46 लोगों की जान गई थी। जिसमें से चार लोगों की लाशें अब तक नहीं मिल पाई है। दो हजार छह में कोसी में पूरी की पूरी नाव ही पलट गई थी, जिसमें तीस लोगों की जलसमाधि बन गई थी। 2006 में हरियाणा के बल्लभगढ़ में काम पर से लौट रहे लोगों की नाव यमुना में पलट गई थी। जिसमें तीस से ज्यादा लोग मारे गए थे। अभी पिछले ही महीने होशंगाबाद के पास नर्मदा में नाव दुर्घटना में भी कई लोग अकाल ही मौत के मुंह में समा गए।
इन सभी हादसों में एक ही चीज सामने आई, वह यह कि नाव की क्षमता से ज्यादा लोगों को नाविकों ने कमाई के लालच में चढ़ा लिया था। यह सच है कि इन हादसों के लिए नावों को चलाने वाले लोग जिम्मेदार हैं। लेकिन इससे प्रशासनिक अमले की जवाबदेही कम नहीं हो जाती। यह देखना प्रशासन का ही काम है कि नाव ठीक हालत में है कि नहीं, वह नदी की धारा को झेल भी सकती है कि नहीं, मल्लाह नाव की क्षमता से अधिक लोगों को तो नहीं बैठा रहा है। लेकिन हैरत की बात यह है कि इन विंदुओं पर प्रशासनिक अमला ध्यान नहीं देता। पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार में तो मुंडन के दिन गंगा के घाटों पर भारी भीड़ होती है, लेकिन प्रशासनिक कुशलता का आलम यह होता है कि पुलिस का एक सिपाही तक घाटों पर नजर नहीं आता। इन इलाकों के लोगों की जिंदगी भगवान और परंपराओं के भरोसे ही रहती है। क्षमता से अधिक सवारी नाव में भरती है तो उसे रोकने के लिए कोई जिम्मेदार मुलाजिम नहीं होता। लाइफ गार्ड की तो बात ही छोड़िए। इन राज्यों और यहां के प्रशासन को गोवा जैसे राज्यों से सबक सीखना चाहिए। गोवा ने अलग से पर्यटन पुलिस बना रखा है, जो समुद्री बीच पर लोगों पर निगाह रखते हैं। वहां लाइफ गार्ड के पूरे इंतजाम हैं। अगर कोई हादसा हो जाय तो पुलिस के जवान सीधे समुद्र में दिखते हैं। लेकिन यूपी और बिहार के नदियों के किनारे जल पुलिस का कोई इंतजाम नहीं हैं। बलिया के हादसे में भी गोताखोर वाराणसी से तीन घंटे बाद ही पहुंच सके। क्योंकि 140 किलोमीटर की गंगा और घाघरा की जल सीमा वाले इस जिले में जल पुलिस का एक सिपाही तक मौजूद नहीं है। लाइफ गार्ड और गोताखोर की तो बात ही अलग है। हालांकि विगत के हर हादसे के बाद नेताओं और प्रशासन ने गोताखोरों और लाइफगार्ड के लिए न जाने कितने वादे किए। लेकिन वे राजनीति वादे ही क्या जो पूरे हो जाएं।
फिर ऐसे में क्या हो...अब गांवों के ही प्रबुद्ध लोगों को आगे आना होगा। उन्हें खुद जांचना-देखना होगा कि जिस नाव में उनके साथ के लोग सवारी कर रहे हैं, उसकी क्षमता ठीक है कि नहीं...सौ-दो सौ रूपए बचाने के लिए अपनी और अपने लोगों की जिंदगी दांव पर नहीं लगाना होगा। इसके साथ ही सरकारों को चाहिए कि नदियों में उतरने वाली नौकाओं के लिए भी कोई नियामक तरीका अख्तियार करें। बिना प्रशासनिक जांच के नांवों के इस्तेमाल पर रोक लगानी होगी। तभी ऐसे हादसों पर लगाम लगाई जा सकेगी।
( यह लेख अमर उजाला में छप चुका है। )

Tuesday, June 15, 2010

एंडरसन के बहाने अर्जुन पर निशाना


उमेश चतुर्वेदी
2009 के आम चुनावों के ठीक पहले कांग्रेस के कद्दावर नेता अर्जुन सिंह की आत्मकथा आई थी – मोंहि कहां विश्राम। इस किताब को लिखते वक्त तक कांग्रेस में अपनी हैसियत के चलते यह भान नहीं था कि वे कभी राजनीति की दुनिया से आराम भी कर सकते हैं। लेकिन आम चुनावों में पार्टी से टिकट नहीं मिलने के बाद जब उनकी बेटी ने सतना से मैदान में कदम रखा तो उसी दिन तय हो गया था कि उन्हें विश्राम लेना ही पड़ेगा। जिसका सही मायने में उन्हें अनुभव चुनाव बाद यूपीए दो की सरकार के गठन के दौरान ही हुआ। जब उनके प्यारे मानव संसाधन विकास मंत्रालय को नामचीन वकील कपिल सिब्बल को सौंप दिया गया। बात यहीं तक होती तो गनीमत थी। उन्हें मंत्रिमंडल में जगह तक नहीं मिली। वे भले ही कहते रहे हों कि उन्हें विश्राम के मौके नहीं मिलेंगे, लेकिन पार्टी ने उनके आराम का पूरा इंतजाम कर दिया। लेकिन उनका खुद के बारे में जो आकलन था, वह एक बार फिर सही साबित होता नजर आ रहा है। हालांकि इस बार वजह कुछ और है।
भोपाल गैस त्रासदी के पच्चीस साल बाद आए अदालती फैसले से जहां एक्टिविस्ट और पीड़ित गुस्से में हैं, वहीं राजनीतिक गलियारों में भी तूफान आ गया है। इस तूफान को हवा दो पूर्व अधिकारियों के बयानों ने दी है। एक अधिकारी हैं भोपाल के तत्कालीन डीएम मोतीलाल सिंह। मोतीलाल सिंह का आरोप है कि यूनियन कार्बाइड कंपनी के अध्यक्ष वारेन एंडरसन को उन्होंने गिरफ्तार कर लिया था, लेकिन राज्य शासन के आदेश पर उन्हें एंडरसन को भोपाल से दिल्ली जाने वाले विमान में बैठाना पड़ा था। यह आरोप जहां राज्य सरकार पर है, वहीं दूसरे पूर्व अधिकारी सीबीआई के तब के संयुक्त निदेशक भूरेलाल का आरोप है कि वारेन एंडरसन के प्रत्यर्पण के मामले को ढीला छोड़ने के लिए विदेश मंत्रालय ने सीबीआई पर दबाव डाला था। हालांकि भूरेलाल के इस आरोप को तब के सीबीआई के निदेशक के विजय रामाराव ने गलत करार दिया है। लेकिन इन अधिकारियों के बयानों पर भरोसा नहीं करने का कारण नजर नहीं आ रहा। क्योंकि लाशों के ढेर में भोपाल को तब्दील करने वाली कंपनी का प्रमुख भारत से बाहर निकल गया, बाद में अदालत ने उसे भगोड़ा तक करार दिया। वह अमेरिका में अपने घर में आलीशान जिंदगी जी रहा है और इधर उसकी कंपनी की बनाई मिथाइल आइसोसायनायड गैस के शिकार लोग आज भी परेशान हों तो शक बढ़ेगा ही।
जाहिर है कि इस शक के घेरे में मध्यप्रदेश के तब के मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह भी हैं और 415 के अपार बहुमत से सरकार चला रहे राजीव गांधी भी हैं। लेकिन जैसी कि राजनीति की रवायत है और पार्टियों का जो ढांचा है, उसमें सर्वोच्च नेता पर सवाल न उठाने की जैसी परंपरा सी बन गई है। उसमें जाहिर है कि इस गैर जिम्मेदाराना रवैये के लिए कांग्रेस पार्टी अपने सबसे बड़े नेता पर सवाल नहीं उठा सकती। लेकिन उन जनभावनाओं का क्या करें, जो इस फैसले के बहाने एक बार फिर उबाल पर है। वैसे भी दो अधिकारियों के आरोपों ने राज्य में शासन चला रही भारतीय जनता पार्टी को कांग्रेस पर सवाल उठाने का आसान मौका दे दिया है। राज्य में अपनी खोई जमीन को वापस पाने में जुटी कांग्रेस पार्टी की मुश्किलें इस फैसले और इस फैसले के बहाने आए अधिकारियों के बयानों ने बढ़ा दी हैं। जाहिर है कि इससे बाहर निकलने का राजनीतिक रास्ता भी तलाशा जा रहा है और गुरूवार को कांग्रेस के प्रमुख प्रवक्ता जनार्दन द्विवेदी के आए बयान ने इस कोशिश को ही सुर दे दिया है। उन्हें कहना पड़ा है कि कांग्रेस पार्टी को वारेन एंडरसन के बारे में जनता को समुचित जवाब देना चाहिए। जनार्दन द्विवेदी पार्टी के बड़बोले नेता नहीं है। उन्हें एक ऐसे गंभीर राजनेता की तरह देखा जाता है, जो बिना वजह बयानबाजी में भरोसा नहीं करता। ऐसे में उनका बयान मायने रखता है। जाहिर है कि पार्टी इस त्रासदी के बाद की घटनाओं के लिए तब के मुख्यमंत्री और अपने ही कद्दावर नेता पर ही सवाल उठाने जा रही है। जाहिर है कि अर्जुन सिंह के लिए आने वाले दिन भारी होने जा रहे हैं।
दिलचस्प बात यह है कि कांग्रेस की ओर से यह बयान तब आया है, जब मध्य प्रदेश भारतीय जनता पार्टी के नेता और राज्य के संसदीय कार्यमंत्री नरोत्तम मिश्र ने अर्जुन सिंह से मांग की है कि वे इस मामले में चुप्पी तोड़ें और हकीकत से जनता को रूबरू कराएं। राजनीतिक बियाबान में जिंदगी गुजार रहे अर्जुन सिंह के लिए चुप्पी तोड़ पाना आसान भी नहीं होगा। अर्जुन सिंह तब राजीव गांधी के बेहद करीब थे। उनकी करीबी का ही असर था कि उन्हें आतंकग्रस्त राज्य पंजाब में शांति लाने की अहम जिम्मेदारी राजीव गांधी ने दी थी और उन्हें राज्यपाल बनाकर वहां भेजा था। ये अर्जुन सिंह की कोशिशें ही थीं कि राजीव- लोंगोवाल समझौता हो पाया। पंजाब की राजनीति में शांति का शुरूआत विंदु इस समझौते से ही माना जाता है। राजीव गांधी की निकटता ही थी कि उन्हें बाद में कांग्रेस का कार्यकारी अध्यक्ष बनाया गया। इतना ही नहीं, वे राजीव मंत्रिमंडल में संचार जैसे महत्वपूर्ण विभाग के मंत्री भी रहे। सोनिया गांधी को कांग्रेस में सक्रिय करने के लिए अभियान चलाने वाले प्रमुख नेताओं में भी वे रहे हैं। इसके लिए उन्होंने पी वी नरसिंहराव से विद्रोह करके नारायण दत्त तिवारी के साथ अलग तिवारी कांग्रेस ही बना डाली थी। साफ है कि गांधी-नेहरू परिवार के विश्वस्त रहे अर्जुन सिंह के लिए तब की स्थितियों को लेकर जुबान खोलना आसान नहीं होगा।
लेकिन राजनीति की रवायत है कि जनता के सामने खुद को सही साबित करने के लिए सिर खोजे जाते हैं और उस सिर को अपनी कीमत भी चुकानी पड़ती है। कई बार यह सिर किसी खैरख्वाह का भी होता है।
विपक्षी नजरों में तो दोषी कांग्रेस प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी भी हैं। क्योंकि वे यूनियन कार्बाइड कंपनी की सहयोगी केमिकल कंपनी डाउ केमिकल के भारत में प्रवेश के मामले के प्रमुख पैरवीकार हैं। इसे लेकर बीजेपी ने सवाल भी उठाए हैं। ऐसे में यह देखना दिलचस्प होगा कि कांग्रेस इस झंझावात से कैसे निकलती है और किसके माथे इन गैरजिम्मेदारियों का ठीकरा फोड़ती है।

Friday, June 4, 2010

पर्यावरण दिवस पर विशेष--- कब चेतेंगे हम पर्यावरण को लेकर


उमेश चतुर्वेदी
पर्यावरण को लेकर विकसित देशों की चिंताएं कितनी गंभीर है, इसे समझने के लिए उनके रवैये पर भी ध्यान देना होगा। पिछले साल दिसंबर में डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगेन में हुए सम्मेलन में भी उनका टालू रवैया साफ नजर आया। अमेरिका समेत तकरीबन सभी विकसित देश ये तो चाहते थे कि वातावरण में कार्बनिक गैसों का उत्सर्जन कम हो, लेकिन वे अपने देशों में इसे कम करने को तैयार नहीं थे। वे चाहते थे कि विकासशील और अविकसित देश ही कार्बनिक गैसों के उत्सर्जन पर लगाम लगाएं। हकीकत तो यह है कि विकास की दौड़ में अविकसित और विकासशील देश काफी पीछे हैं। लिहाजा उनके यहां औद्योगिक उत्पादन बढ़ाए जाने की ज्यादा जरूरत है। इसके बावजूद उनकी ऊर्जा जरूरतें विकसित देशों में ऊर्जा की खपत से काफी कम हैं। विकसित देश अपने नागरिकों और अपने आर्थिक स्तर को कोई नुकसान पहुंचने देना नहीं चाहते और दुनिया में लगातार बढ़ रही गरमी के लिए विकासशील देशों को ही जिम्मेदार ठहराने की कोशिशों में जुटे हुए हैं। यही वजह है कि वातावरण को रहने लायक बनाने की दिशा में कोपेनहेगेन सम्मेलन का नतीजा सिफर ही रहा।
यह सच है कि 2008 में शुरू हुई आर्थिक मंदी ने विकसित देशों को सबसे ज्यादा परेशान किया। अमेरिकी अर्थव्यवस्था तो लगता था कि ढह ही जाएगी। इसकी वजह से औद्योगिक उत्पादन में गिरावट भी देखी गई। लेकिन अपने विशाल ग्रामीण बाजार और पारंपरिक समाज के चलते भारत में आर्थिक मंदी का उतना प्रकोप नहीं झेलना पड़ा। लेकिन इसका यह भी मतलब नहीं है कि भारत जैसे देश अपना औद्योगिक उत्पादन न बढ़ाएं। विकसित देशों को तेजी से बढ़ रही चीन की अर्थव्यवस्था से भी परेशानी है। वे चीन पर भी लगाम लगाना चाहते हैं। विकास की दौड़ में लगातार विकसित देशों को चुनौती दे रहा चीन भी अपना औद्योगिक उत्पादन कम क्यों करे।
अमेरिकी अंतरिक्ष अनुसंधान संस्थान नासा और भारतीय मौसम विभाग के अपने अध्ययनों में बताया है कि 1901 से लेकर 2008 के बीच बारह साल ऐसे रहे, जिसमें भयानक सूखा पड़ा। इनमें से 1999 के बीच आठ बार भयानक सूखा पड़ा। जबकि 2000 से 2008 के बीच चार बार सूखा पड़ा है। जाहिर है कि औद्योगिकरण के बाद कार्बनिक गैसों का उत्सर्जन बढ़ा है। कहना न होगा कि औद्योगिकरण भी इस सूखे के लिए जिम्मेदार है। दोनों ही संस्थानों के अध्ययन रिपोर्ट के मुताबिक 1901 के बाद दुनिया का औसत तापमान करीब आधा डिग्री सेल्सियस बढ़ गया है। जाहिर है इसमें औद्योगीकरण और आधुनिक जीवन शैली का बड़ा योगदान है। कहना न होगा कि यह जीवन शैली भी विकसित देशों की ही देन है। ऐसे में रास्ता एक ही बचता है कि धरती को रहने योग्य बनाए रखने के लिए हमें पारंपरिक सोच और रहन-सहन की ओर लौटना होगा। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि भौतिकतावादी दुनिया में क्या हम इसके लिए तैयार हैं।

Monday, May 24, 2010

इस बेतुके नाटक की जड़ में भी तो जाइए


उमेश चतुर्वेदी
अस्सी के दशक के आखिरी दिनों में चौधरी देवीलाल जब अपने राजनीतिक कैरियर के उफान पर थे, तब उन्होंने एक नारा दिया था। कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के अलावा तीसरे मोर्चे के तकरीबन सभी दलों का यह बरसों तक सबसे प्यारा और प्रभावशाली नारा था – लोकराज लोकलाज से चलता है। झारखंड में जारी प्रहसन को देखकर आजकल यह नारा एक बार फिर शिद्दत से याद आ रहा है। इसलिए नहीं कि झारखंड में लोकलाज का खयाल सिर्फ शिबू सोरेन ही नहीं कर रहे हैं, बल्कि पार्टी विद डिफरेंस का नारा देने वाली भारतीय जनता पार्टी भी इस प्रहसन में बराबर की भागीदार होकर अपनी भद्द पिटवाने में जुट गई है। यही वजह है कि अब भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता मुरली मनोहर जोशी तक को कहना पड़ रहा है कि झारखंड में बेतुका नाटक चल रहा है।
झारखंड में सत्ता का यह खेल पहली बार नहीं दिखा है। खुद शिबू सोरेन पिछली बार भी कुछ ऐसा ही कारनामा दिखा चुके हैं। जब उन्हें जामताड़ा की अदालत ने दोषी करार दिया था। यह लोकलाज का ही तकाजा था कि उन्हें इस्तीफा दे देना चाहिए था। लेकिन उन्होंने इस्तीफा नहीं दिया। तब भारतीय जनता पार्टी भी उनके इस कदम के विरोध में खड़ी हो गई थी। अब उसी भारतीय जनता पार्टी को शिबू सोरेन बार-बार ठेंगा दिखा रहे हैं, लेकिन वह कुछ कर नहीं पा रही है। इस प्रहसन को देखकर कहा जा सकता है कि राजनीति सत्ता की संभावनाओं का खेल बन कर रह गई है और संभावना के इस खेल में मूल्यों को बार-बार तिलांजलि दी जा रही है। पश्चिमी लोकतांत्रिक अवधारणा में जिस तरह की राजनीति विकसित हुई है, उसमें आमतौर पर राजनीतिक दलों की महत्वाकांक्षा सत्ता प्राप्ति तक सीमित हो गया है। यहां पर जनसंघ के पूर्व अध्यक्ष दीनदयाल उपाध्याय का एक भाषण याद आता है। अपने इस भाषण में उन्होंने जनसंघ के बारे में कहा था – “ भारतीय जनसंघ अलग तरह का दल है। किसी भी प्रकार सत्ता में आने की लालसा वाले लोगों का झुंड नहीं है। ” लेकिन शिबू सोरेन के साथ खड़ी जनसंघ की उत्तराधिकारी भारतीय जनता पार्टी अपने पितृ पुरूष की ही अपेक्षाओं पर खरी उतरती नजर नहीं आ रही है। सत्ता की संभावनाओं की राजनीति में लगातार इस तथ्य की उपेक्षा हो रही है। इसका फायदा न तो पार्टी को मिलता नजर आ रहा है और झारखंड की जनता तो परेशान होने के लिए मजबूर है ही।
झारखंड की राजनीति में पिछली बार भी हुए खेल के बावजूद अगर पार्टियों ने शिबू सोरेन पर भरोसा किया, तो यह उनकी गलती ही मानी जाएगी। पिछली बार की घटनाओं से पार्टियों ने कोई सबक नहीं लिया। इसका ही असर है कि आज झारखंड की राजनीति चौराहे पर खड़ी नजर आ रही है और कोई स्पष्ट –मुकम्मल रास्ता नजर नहीं आ रहा है। जाहिर है कि इस पूरे खेल को कांग्रेस समेत विपक्षी राजनीतिक पार्टियां दिलचस्पी से देख रही हैं। लेकिन वे सत्ता में सीधी भागीदारी से हिचक रही हैं। क्योंकि उन्हें इस बात का डर सता रहा है कि शिबू सोरेन पर भरोसा करने का कारण नजर नहीं आ रहा है। झारखंड की राजनीति में कांग्रेस की ओर से महत्वपूर्ण भूमिका निभा चुके एक केंद्रीय कांग्रेस नेता ने इन पंक्तियों के लेखक से साफ कहा है कि जो शिबू अपने साथियों के लिए भरोसेमंद नहीं हो पा रहे हैं, क्या गारंटी है कि वे उनकी पार्टी के लिए भी भरोसेमंद रहेंगे।
इस पूरे घटनाक्रम में एक तथ्य पर राजनीतिक पंडितों का ध्यान नहीं जा रहा है। भारतीय संविधान इस मसले पर चुप है कि कोई लोकसभा सदस्य राज्य की सरकार में शामिल हो सकता है या नहीं। भारतीय राजनीति में लोकसभा की सदस्यता वाले मुख्यमंत्री का सवाल 1999 में भी उछल चुका है। जब उड़ीसा के मुख्यमंत्री गिरिधर गोमांग ने अटल बिहारी वाजपेयी सरकार के अविश्वास प्रस्ताव के पक्ष में मतदान किया था। तब गोमांग लोकसभा के सदस्य थे और उड़ीसा के मुख्यमंत्री भी थे। इस मतदान में वाजपेयी सरकार की एक मत से हार हो गई थी। इस हार के बाद गोमांग के मतदान पर तब के भारतीय जनता पार्टी ने सवाल उठाया था। इसके बाद तो यह सवाल राजनीतिक और संवैधानिक गलियारे में चर्चा का विषय ही बन गया था। सवाल यह था कि जब कोई व्यक्ति राज्य का मुख्यमंत्री बन जाता है तो उसकी पहली जवाबदेही राज्य विधानसभा के प्रति हो जाती है। लिहाजा उसे संसद में मतदान करने का नैतिक आधार नहीं रह जाता। 27 अप्रैल 2009 को दूसरा मौका था, जब किसी राज्य के मुख्यमंत्री ने संसद की वोटिंग में हिस्सा लिया। लेकिन इस पर सवाल नहीं उठ रहा है। जबकि हकीकत तो यही है कि झारखंड की समस्या की जड़ में यह मतदान ही है। यह सच है कि भारतीय संविधान सदस्यता और सरकार बनाने को लेकर चुप है। इसकी वजह यह है कि पहले वही लोग राज्यों में सरकार बनाते रहे हैं, जो विधानसभा का चुनाव लड़ते रहे है। पहले केंद्र से मुख्यमंत्री राज्यों में नहीं भेजे जाते थे। 1970 के दशक में पहली बार हुआ कि प्रकाश चंद्र सेठी को केंद्र से मध्यप्रदेश का मुख्यमंत्री बनाकर भेजा गया। इसके बाद तो कम से कम कांग्रेस में यह परिपाटी ही बन गई। सही मायने में देखा जाय तो यह भी लोकलाज का उल्लंघन ही था। लेकिन सेठी ने एक काम जरूर किया था कि संसद की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था। 1999 में उड़ीसा में नवीन पटनायक जब मुख्यमंत्री बने, तब वह लोकसभा के सदस्य थे। लेकिन मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने लोकसभा से इस्तीफा दे दिया था। पहले लोग दो-दो, तीन-तीन जगहों से चुनाव लड़ते थे। विधायक रहते लोकसभा या सांसद रहते विधानसभा का चुनाव लड़ते थे और दोनों जगह से जीतने के बाद छह महीने तक दोनों सदस्यता पर काबिज रहते थे। लेकिन चुनाव आयोग की पहल के बाद अब 14 दिनों के भीतर कहीं एक जगह की सदस्यता छोड़नी पड़ती है। अन्यथा पिछली सदस्यता खुद-ब-खुद रद्द हो जाती है।
यह सच है कि राजनीति में संविधान और कानून से इतर मर्यादाओं और राजनीतिक नैतिकता का भी अपना महत्व होता है। लेकिन जब नेताओं का ही ध्यान मर्यादा की ओर नहीं है तो कानूनी और संवैधानिक बाध्यताएं जरूरी हो जाती है। अभी इस समस्या पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। लेकिन कल को कोई विधायक प्रधानमंत्री पद की शपथ ले ले और विधानसभा की सदस्यता न छोड़े और वक्त पड़ने पर अपनी विधानसभा में वोट डालने पहुंच जाए तो लोकतंत्र के लिए कितना बड़ा प्रहसन होगा, इसका अंदाजा आसानी से लगाया जा सकता है। झारखंड की राजनीति के बेतुके नाटक ने एक बार फिर इस सवाल पर विचार करने का मौका दिया है। अगर वक्त रहते इस मसले पर ध्यान नहीं दिया गया तो झारखंड जैसे प्रहसन बार-बार होते रहेंगे। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या राजनीतिक बिरादरी इस तरफ ध्यान देने की कोशिश करती भी है या नहीं।

Sunday, May 23, 2010

पोर्न रहा मंदी के लिए जिम्मेदार


उमेश चतुर्वेदी .
थाईलैंड और फिलीपींस को छोड़ दें तो सेक्स को लेकर एशियाई समाज आज भी पूरी तरह से पारंपरिक बना हुआ है। भारत जैसे देशों में महानगरीय खुलापन को छोड़ दें तो अब भी सार्वजनिक तौर पर सेक्स को वैसी खुली छूट नहीं मिली हुई है, जैसी अमेरिका और यूरोप के देशों में है। इस्लामिक देशों के साथ ही अपने देश के शुद्धतावादी अब भी सेक्स को बेहद गोपनीय और नितांत निजी मानते रहे हैं। सेक्स को लेकर अमेरिकी खुलेपन और एशिया की निजीपन की अवधारणा के अपने फायदे भी हैं तो नुकसान भी कम नहीं है। भारत और इस्लामिक देश खुलेपन की इस अवधारणा के चलते नितांत निजी इस प्रक्रिया को नैतिक तौर पर गलत मानते रहे हैं, जाहिर है इस आधार पर वे इसे सामाजिक तौर पर नुकसानदेह भी मानते हैं। लेकिन अब अमेरिका में भी खुलेपन वाली सेक्स संस्कृति को भी नुकसानदेह माना जाने लगा है। लेकिन फर्क इतना है कि वहां इस नुकसान का आकलन आर्थिक तौर पर माना जा रहा है।
एशियाई समाज के लिए टैबू रहे सेक्स को लेकर खुलेपन वाली संस्कृति के देश में इसे आर्थिक तौर पर हानिकारक माना जाने लगे तो हैरत होगी ही। सितंबर 2008 में लेहमैन ब्रदर्स के दिवालिया घोषित होने के बाद अमेरिकी अर्थव्यवस्था में आई भयानक मंदी और उससे परेशान दुनिया ने मंदी के कारणों की तलाश शुरू की। इसी तलाश में जुटे अमेरिका के प्रमुख आर्थिक जांच आयोग सिक्यूरिटी एंड एक्सचेंज कमीशन अपनी जांच नतीजे में पाया है कि देश की तमाम एजेंसियों के अधिकारी और कर्मचारी अपना ज्यादातर वक्त पोर्न वेबसाइटें देखने में बिताते हैं। सबसे बड़ी बात ये कि अमेरिका की आर्थिक गतिविधियों की निगरानी करने वाले खुद सिक्युरिटी और एक्सचेंज कमीशन के बड़े अधिकारी तक भी अपने दफ्तर का ज्यादातर वक्त पोर्न साइटें देखने में गुजारते हैं। कमीशन का कहना है कि इस वजह से ज्यादातर अधिकारियों की आर्थिक गतिविधियों पर निगाह नहीं रही और गैरकानूनी ढंग से काम होते रहे और अमेरिकी अर्थव्यवस्था को ढहते देर नहीं लगी। जिसका खामियाजा पूरी दुनिया को अब तक भुगतना पड़ रहा है।
अपने देश से अक्सर खबरें आती हैं कि किसी दफ्तर विशेष में कोई खास वेबसाइट या ब्लॉग को ब्लॉक कर दिया गया। हाल के दिनों में मीडिया से जुड़ी कई ब्लॉग और वेबसाइटों पर कई मीडिया हाउसों ने पाबंदी लगा दी। अर्थव्यवस्था के उफान के दिनों मे अपने देश की तमाम बड़ी कंपनियों ने नौकरी देने-दिलाने वाली वेबसाइटें पर भी पाबंदी लगा दी थीं। ताकि इनका इस्तेमाल करते हुए लोग किसी दूसरी कंपनी में न चलें जायं। चूंकि भारत में अब भी सेक्स एक टैबू है, इसलिए आज भी तकरीबन सभी दफ्तरों में पोर्न साइटें पूरी तरह प्रतिबंधित हैं। फिर सामाजिक तौर पर भी इसे स्वीकृति नहीं मिली है। लिहाजा अगर कहीं खुदा न खास्ता कोई पोर्न वेब साइट खुलती भी है तो लोग खुलेतौर पर अपने दफ्तरों में खोलने से भी हिचकते हैं। लेकिन खुलेपन की सांस्कृतिक आंधी का उदाहरण रहा अमेरिका अब खुद इस खुलेपन के जरिए आए नुकसान को पहली पर मानने और उससे निबटने के लिए तैयार हुआ है। यही वजह है कि ओबामा प्रशासन जल्द ही पूरे अमेरिका के दफ्तरों में हर तरह की पोर्न साइटों पर प्रतिबंधित लगाने का आदेश सुनाने जा रहा है।
दुनिया के दूसरे इलाकों में सेक्स और पोर्न का व्यवसाय भले ही दबे-ढंके चल रहा हो, लेकिन यूरोपीय और अमेरिकी देशों में पोर्न बड़ा व्यवसाय बन गया है। इसे समझने के लिए कंप्यूटर उद्योग के ग्राहकों की लिस्ट ही देखनी समीचीन होगी। कम्प्यूटर तकनीक खरीदने वाले पांच खरीददारों में एक खरीदार सेक्स उद्योग भी है। सेक्स उद्योग ने व्यापार में पहले खर्चीली ‘टी 3 ‘ फोन लाइन खरीदी, ताकि हाई रिजोल्युशन वाली इमेजों के प्रसारण में कोई रुकावट नहीं आए। अमेरिका में सेक्स उद्योग कितना फैला हुआ है, इसे जानने के लिए वहां के सेक्स और पोर्न उद्योग के सालाना टर्न ओवर पर निगाह डालनी होगी। खुद अमेरिकी सरकार, मशहूर पोर्न मैगजीन हसलर के मालिक लैरी फ्लिंट और टीवी पर प्रसारित होने वाले मशहूर पोर्न कार्यक्रम गर्ल्स गॉन वाइल्ड के प्रोड्यूसर जो फ्रांसिस के मुताबिक अमेरिका में पोर्न उद्योग का सालाना कारोबार 13 अरब डॉलर का है। जबकि बिजनेस और आर्थिक मामलों की दुनियाभर में मशहूर पत्रिका फॉर्च्युन के मुताबिक अकेले अमेरिका में ही पोर्न का कारोबार 14 अरब डॉलर का है। इसमें इंटरनेट का योगदान कितना है, इसे समझने के लिए 1998 के एक आंकड़ें पर ध्यान दिया जाना जरूरी है। इसके मुताबिक 1998 में अमेरिका में सिर्फ ऑनलाइन एक बिलियन डॉलर की पोर्न सामग्री की खरीद-बिक्री हुई। उस साल के मुताबिक इंटरनेट के जरिए होने वाली कुल बिक्री का यह 69 फीसदी हिस्सा था। इन बारह सालों में इंटरनेट ने तकनीकी तौर पर काफी प्रगति कर ली है। समाज में खुलापन भी बढ़ा है। जाहिर है, पोर्न सामग्री की बिक्री के आंकड़े और बढ़ ही गए होंगे। इतना ही नहीं, अमेरिकी समाज के जरिए मोटे मुनाफा कमाने वाले इस धंधे में छोटे-मोटे खिलाड़ी नहीं हैं, बल्कि पोर्न का यह धंधा बाकायदा कारपोरेट अंदाज में चलाया जा रहा है। जिसमें सबसे ज्यादा हिस्सेदारी बड़े कारपोरेट घरानों की है। जेनेट एम लारोइ ने अपने लेख ”दि पोर्न रिंग एराउण्ड दि कारपोरेट ह्नाइट कॉलर्स: गेटिंग फिल्थी रिच” में साफ बताया है कि एटी एंड टी, एमसीआई,टाइम वारनर, कॉमकास्ट, इको स्टार कम्युनिकेशन, जनरल मोटर का डायरेक्ट टीवी, हिल्टन, मारीओत्त, शेरेटॉन, रेडीसन, वीसा, मास्टर कार्ड, अमेरिकन एक्सप्रेस जैसी कई कंपनियां पोर्न उद्योग से भारी कमाई कर रही हैं। पोर्न की बिक्री में आई इस बढ़त और बड़े खिलाड़ियों की मौजूदगी से अंदाज लगाना आसान है कि पोर्न साइटों ने अमेरिकी समाज और अर्थव्यवस्था को किस कदर जकड़ लिया है। इसमें समाज का एक बड़ा हिस्सा जुड़ा हुआ है। जाहिर है कि उनकी रोजी-रोटी भी जुड़ी हुई है।
अमेरिका और यूरोप के लिए पोर्न भले ही कुछ वैसा ही व्यापार है, जैसा कि बाकी कारोबार हैं, लेकिन दुनियाभर के मनोवैज्ञानिक कम से कम इस बात से सहमत है कि पोर्न एक बुरी लत है। जिसका इस्तेमाल करने वालों की सामान्य मानवीय संवेदनाएं मर जाती हैं। जाहिर है कि इस लत की से अक्सर भारतीय शुद्धतावादी चेताते रहे हैं। उनका कहना रहा है कि इससे समाज का काफी नुकसान होगा। लेकिन अमेरिकी तर्ज पर अपने यहां के कथित विकासवादी धारा शुद्धतावाद की इस चेतावनी को नजरंदाज करती रही है। उन्हें विकास की राह में शुद्धतावाद की ये धारा रूकावट नजर आती रही है। यह मानने वाले आर्थिक विकास को ही सबकुछ मानते रहे हैं। उनका दर्शन खाओ-पियो पर केंद्रित रहा है। लेकिन जब इस के जरिए दुनिया में सर्वशक्तिमान और प्रेरणादायी मानी जाने वाली अमेरिकी अर्थव्यवस्था धाराशायी हो गई तो अब खाओ-पियो वाला दर्शन भी पोर्न को समाज के लिए हानिकारक मानने लगा है। यही वजह है कि अब अमेरिका तक को अपने यहां पोर्न साइटों पर लगाम लगाने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है। यानी अमेरिका ने भी मान लिया है कि दफ्तर सिर्फ काम यानी कर्तव्य वाली जगह है, काम यानी सेक्स वाली नहीं। इससे शुद्धतावादी भारतीय विचारधारा को ही बल मिला है।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये है कि 56 बिलियन डॉलर वाला दुनिया का पोर्न कारोबार अमेरिकी फैसले को बिना कुछ किए आंख मूंदकर स्वीकार कर लेगा। अगर ऐसा हो गया तो अमेरिका के 14 अरब डॉलर वाले पोर्न उद्योग का क्या होगा, जिसके साथ हजारों लोगों की रोजी जुड़ी हुई है। जाहिर है अमेरिकी प्रशासन को इस उद्योग से जुड़े लोगों की चिंताओं का भी खयाल रखना होगा। अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए देखना ये है कि वह लत में डूब चुके अपने नागरिकों पर लगाम लगा पाती है या नहीं।

सुबह सवेरे में