Saturday, December 4, 2010

जीत ने बदल दिए सुर

उमेश चतुर्वेदी
भारतीय समाजवादी आंदोलन और राजनीति की जब भी चर्चा होती है, सहज ही एक पुरानी फिल्म का गीत – इस दिल के टुकड़े हजार हुए, कोई यहां गिरा, कोई वहां गिरा- याद आ जाता है। समाजवादी आंदोलन और पार्टियों की यह नियति में एकजुटता और साथ चलने का स्थायी भाव नहीं रहा है। यही वजह है कि उनमें आपसी विरोधाभास और अलगाव कुछ ज्यादा ही दिखता रहा है। बिहार में प्रचंड बहुमत हासिल कर चुके जनता दल यूनाइटेड चूंकि एक दौर में समाजवादी आंदोलन का प्रमुख अगुआ दल रहा है। लिहाजा समाजवादी आंदोलन के रोग से यह दल भला कैसे अछूता रह सकता है। बिहार विधानसभा चुनाव में उतरने के ठीक पहले जिस तरह पार्टी के मुंगेर से सांसद राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन, कैमूर के सांसद महाबली सिंह और औरंगाबाद के सांसद सुशील कुमार ने नीतीश कुमार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था तो समाजवादी विचारधारा की राजनीति की सीमाएं एक बार फिर याद आ गई थीं।
समाजवादी चिंतन में आपसी खींचतान का हश्र कम से कम हर अगले चुनाव में पराजय और टूटन के तौर पर दिखता रहा है। सुशील कुमार हों या ललन या फिर महाबली सिंह, उन्हें लगता रहा होगा कि अपने विद्रोही कदम के जरिए वे नीतीश कुमार को सबक सिखा सकते हैं। लेकिन इतिहास ने इस बार पलटी खाई है। यह पहला मौका है, जब समाजवादी विचारों के अनुयाइयों के आपसी विचलन से जनता विचलित नहीं हुई और उसने नीतीश कुमार को ही समर्थन देकर उनके एजेंडे को आगे बढ़ाने वाली नीतियों की तसदीक कर दी है। हालांकि राजीव रंजन सिंह उर्फ ललन को अपने विद्रोह पर इतना ज्यादा भरोसा था कि उन्होंने नैतिकता और संसदीय राजनीति के मूल्यों तक की परवाह नहीं की। जनता दल यू के सांसद रहते हुए उन्हें कांग्रेस के बिहार प्रभारी मुकुल वासनिक के साथ मिलकर नीतीश कुमार को हराने की जोड़-जुगत बिठाने से कोई गुरेज नहीं रहा। इतना ही नहीं, कई जगह कांग्रेस के प्रत्य़ाशी तय करने और उनके लिए खुलेआम प्रचार करने से भी वे पीछे नहीं हटे। राजनीति में ऐसे कदम तब उठाए जाते हैं, जब या तो राजनीतिक हाराकिरी करनी होती है या फिर कदम उठाने वाले को नतीजे अपनी तरफ रहने का पूरा अंदाजा होता है। ललन बिहार की राजनीति में कुछ वक्त पहले तक नीतीश कु्मार की दाहिनी बांह माने जाते रहे हैं। कुख्यात चारा घोटाले में लालू यादव को जेल भिजवाने के अभियान में भारतीय जनता पार्टी के झारखंड के नेता सरजू राय और बिहार के उप मुख्यमंत्री सुशील मोदी के साथ ललन का भी महत्वपूर्ण हाथ रहा है। शायद यही वजह है कि कांग्रेस को बिहार विधानसभा चुनाव के नतीजों में खुद के लिए कहीं ज्यादा समर्थन की उम्मीद बढ़ गई थी। कैमूर के सांसद महाबली सिंह पहले लालू यादव के साथ थे। लेकिन वहां उनकी दाल नहीं गली तो वे बहुजन समाज पार्टी में शामिल हो गए थे। इसके बाद उन्हें जनता दल यू में अपना राजनीतिक कैरियर दिखा और पिछले लोकसभा चुनाव में जेडीयू के टिकट पर जीत गए। कैमूर से जीत के बाद उनकी भी उम्मीदें बढ़ गईं। अपने क्षेत्र की चैनपुर विधानसभा सीट से अपने बेटे के लिए टिकट चाहते थे, लेकिन नीतीश ने नहीं दिया तो बेटे को आरजेडी से चुनाव मैदान में उतार दिया। लेकिन नीतीश लहर के सामने उनका बेटा नहीं टिक पाया। कुछ इसी तरह औरंगाबाद के सांसद सुशील कुमार अपने भाई के लिए टिकट चाहते थे। जेडीयू ने उनकी इच्छा पूरी नहीं कि तो उन्होंने भाई को आरजेडी के टिकट पर मैदान में उतार दिया। लेकिन वह भी खेत रहा। इसी तरह टिकटों के बंटवारे को लेकर कभी नीतीश कुमार के खास सहयोगी और दोस्त रहे उपेंद्र कुशवाहा भी नाराज हो गए। सभी नाराज नेताओं को यही लगता था कि उनकी नाराजगी नीतीश को जरूर गुल खिलाएगी। लेकिन बिहार की जनता ने जिस तरह पुराने मुहावरे को बदल दिया है, उससे सबक सिखाने की मंशा रखने वाले इन नेताओं के सुर बदल गए हैं। ललन सिंह ने तो बिना देर किए नीतीश को जीत की बधाई तक दे डाली। महाबली सिंह को अब समाजवादी नैतिकता याद आने लगी है और वे कहते फिर रहे हैं कि उनके बेटे की राजनीति से उनका कुछ लेना-देना नहीं है। कुछ इसी अंदाज में सुशील कुमार भी जनता दल यू और नीतीश कुमार से अपनी निष्ठा जता रहे हैं। इन नेताओं की सोच में आए इस बदलाव के बाद अब एक और कहावत याद आने लगी है- जैसी बहे बयार, पीठ तैसी कीजै। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि हवा के झोंके की ओर पीठ करके चेहरे को बचाया तो जा सकता है, लेकिन क्या नीतीश कुमार नाम की हवा इन चेहरों को माफ करने के मूड में है। इसका जवाब नीतीश का वह बयान ही देता है, जो उन्होंने ललन सिंह की बधाई के बाद मीडिया के सवालों के जवाब में दिया था- ललन सिंह पर फैसला पार्टी आलाकमान लेगा।

Saturday, November 27, 2010

खेल संस्कृति की ओर बढ़ते कदम

उमेश चतुर्वेदी
क्रिकेट सितारों को भगवान की तरह पूजने वाले देश में आमतौर पर दूसरे खेलों के खिलाड़ियों को अपनी पहचान का भी संकट सताता रहा है। लेकिन ग्वांगझू एशियाड में बढ़ती पदकों की संख्या से साफ है कि देश की खेल संस्कृति बदल रही है। ग्वांगझू एशियाड में निश्चित तौर पर चीन अजेय होकर उभरा है। लेकिन भारतीय खिलाड़ियों और पदक तालिका में लगातार बढ़ती उनकी पहुंच से साफ है कि भारतीय खिलाड़ियों का रवैया बदल रहा है। दस स्वर्ण पदकों के साथ ग्वांगझू की पदक तालिका में अब तक भारत 53 पदक जीत चुका है और मुक्केबाजी में तीन के साथ ही पुरूष कबड्डी और महिला कबड्डी में एक-एक पदक मिलना तय हो गया है। क्योंकि ये सभी पांच खिलाड़ी अपनी प्रतियोगिताओं के फाइनल में पहुंच चुके हैं। जाहिर है कि अब तक के प्रदर्शन के मुताबिक भारत को 58 पदक मिलने ही हैं। इस तरह एशियाड में भारत का यह अब तक का सबसे बेहतर प्रदर्शन है। इसके पहले दोहा एशियाड में भारत ने दस स्वर्ण, 17 रजत समेत 53 पदक जीता था। एशियाड में भारत ने सबसे ज्यादा पदक 1982 के दिल्ली एशियाड में जीता था। उस वक्त भारत ने अपनी झोली में 13 स्वर्ण, 19 रजत और 25 कांस्य समेत 57 पदक डाले थे। इस हिसाब से देखें से ग्वांगझू एशियाड में यह भी रिकॉर्ड टूटने जा रहा है, क्योंकि 58 पदक जीतना तय हो गया है। हालांकि यह रिकॉर्ड भारतीय ओलंपिक संघ के दावे और अपेक्षाओं के मुताबिक नहीं है। 629 सदस्यीय दल ग्वांगझू भेजते वक्त भारतीय ओलंपिक संघ ने 80 से 85 पदक जीतने का दावा किया था। लेकिन ऐसा नहीं हो सका।
क्रिकेट के वर्चस्व वाले इस देश में अगर दूसरे खेलों को लेकर सोच सकारात्मक बनी है और एशियाड खेलों में अपने प्रदर्शन से देश का नाम रोशन कर रहे हैं तो इसकी वजह देश के खेल मानस में आ रहा बदलाव है। निश्चित तौर पर इसमें बीजिंग ओलंपिक में सुनहरा प्रदर्शन कर चुके अभिनव बिंद्रा या पदक तालिका में स्थान बना चुके सुशील कुमार, विजेद्र कुमार जैसे लोगों का भी योगदान है। जिन्हें भारत वापसी के बाद लोगों का प्यार मिला। केंद्र और राज्य सरकारों ने उन पर इनामों की बरसात कर दी। कभी हवाई अड्डों पर ढोल-नगाड़ों से स्वागत का मौका विदेशी धरती से जीत के बाद वापसी करते क्रिकेटरों को ही मिलता था। लेकिन अब दूसरे खिलाड़ियों के लिए भारतीय प्रशंसकों का रवैया बदल रहा है। जबकि पहचान के संकट से दूसरे खेलों के खिलाड़ी जूझते रहते थे। महिला मुक्केबाजी में अब तो एमसी मैरीकॉम को सभी लोग जान गए हैं। दुर्भाग्यवश उन्हें ग्वांगझू एशियाड में रजत पदक से ही संतोष करना पड़ा है। लेकिन पांच साल पहले उन्हीं मैरीकॉम ने एक टेलीविजन चैनल के संवाददाता से उल्टे पूछ लिया था कि एमसी मैरीकॉम को जानते हैं आप। मैरीकॉम ने यह सवाल पूछ कर एक तरह से अपनी व्यथा ही जाहिर की थी। लेकिन अब अभिनव बिंद्रा, गगन नारंग, एमसी मैरीकॉम, बिजेंद्र, सुशील किसी परिचय के मोहताज नहीं है। यह बदलाव एक दिन में नहीं आया है। इन खिलाड़ियों ने अपनी मेहनत के बूते अपनी और अपने खेलों की पहचान बनाई है। जिसका असर यह पड़ा है कि अब कारपोरेट सेक्टर का हाथ दूसरे खेलों के खिलाड़ियों की मदद आगे बढ़ने लगा है।
अक्टूबर में हुए कॉमनवेल्थ खेलों की उसके आयोजन में हुए भ्रष्टाचार के लिए काफी आलोचना हुई है। इस भ्रष्टाचार के लिए जिम्मेदार तीन अधिकारियों की गिरफ्तारी हो चुकी है। आयोजन समिति के अध्यक्ष सुरेश कलमाड़ी को कांग्रेस के सचिव पद से हटा दिया गया है। इतनी लानत-मलामत के बावजूद कॉमनवेल्थ खेल आयोजनों ने भी भारत में खेल संस्कृति को बढ़ाने में मदद दी है। कॉमनवेल्थ खेलों में भी भारत का प्रदर्श बेहतर रहा। दिल्ली कॉमनवेल्थ खेलों के पहले भारत ने 2002 के मैनचेस्टर में सबसे बेहतरीन प्रदर्शन किया था। तब उसे 70 पदक मिले थे। लेकिन दिल्ली कॉमनवेल्थ खेलों में 38 स्वर्ण सहित 101 पदक जीतकर खिलाड़ियों ने भारतीय खेल प्रेमियों को निराश नहीं किया। विवादों और आलोचनाओं के साथ ही दिल्ली कॉमनवेल्थ खेलों को अगर याद किया जाएगा तो उसकी एक बड़ी वजह भारत का बेहतरीन प्रदर्शन भी होगा। देश की खेल संस्कृति को बढ़ावा देने में भारत सरकार की खेलनीति का भी कम असर नहीं है। यह खेल नीति ही है कि खेलों को लेकर बजट बढ़ाया गया। हालांकि मौजूदा वित्त वर्ष में खेल मद में 3565 करोड़ ही आवंटित किया गया। जबकि इसके ठीक पहले साल 3706 करोड़ दिए गए थे।
आखिर में : बढ़ती खेल संस्कृति के बावजूद देश के सामने अब भी सबसे बड़ी चुनौती है लालफीताशाही और भाईभतीजावाद। ग्रामीण क्षेत्रों की प्रतिभाओं को उभारने के लिए अब तक कोई मुकम्मल नीति भी नहीं है। ऐसे में बिना किसी ठोस नीति और कार्यक्रम के चीन जैसी अजेय बढ़त हासिल करना कैसे संभव होगा।

बिहार के आंकड़े भी कुछ कहते हैं

उमेश चतुर्वेदी
भारतीय राजनीति में एक बड़ी बिडंबना देखने को मिलती है। हर कामयाब राजनेता अपनी गलतियों से सीखने के बावजूद अपने पिछले प्रदर्शन को ही अपनी उपलब्धि मान बैठता है। लगातार साथ चलने वाले कथित सलाहकार और चंपू उसके स्पष्ट नजरिए को धुंधला बनाने में कुछ ज्यादा ही योगदान करते हैं। इसका खामियाजा उसे और बड़ी कीमत देकर चुकाना पड़ता है। बिहार के मौजूदा चुनाव के आंकड़ों पर गौर फरमाएं तो कई और दिलचस्प निष्कर्ष भी सामने आते हैं। मौजूदा विधानसभा अभियान में एक तथ्य साफ नजर आ रहा था – नीतीश लहर का उभार। लालू प्रसाद यादव को विपक्षी नेता होने के नाते इसे नकारना ही था। लेकिन उनकी यह नकार जमीनी हकीकतों से दूर थी। दरअसल पिछले यानी 2005 के विधानसभा चुनावों के दौरान उन्हें 31.1 प्रतिशत वोट मिला था। तब रामविलास पासवान की लोकजनशक्ति पार्टी के साथ उनका गठबंधन नहीं था। तब पासवान की पार्टी अकेले चुनाव मैदान में थी। उस वक्त उसे 13.2 प्रतिशत वोट मिला था। जबकि जनता दल-यू और बीजेपी गठबंधन 36.2 प्रतिशत वोटों के साथ कामयाब हुआ था। लालू यादव और रामविलास पासवान को उम्मीद थी कि उनके साथ आने से उनका कुल मिलाकर वोट प्रतिशत 34.3 प्रतिशत हो जाएगा। जो बीजेपी-जेडी-यू गठबंधन के पिछले वोटों की तुलना में महज 2.8 फीसदी ही कम रहेगा। उन्हें यह भी उम्मीद रही होगी कि बटाईदारी कानून के लागू किए जाने की चर्चा से भूमिहार और ठाकुर वोटरों की नाराजगी का उन्हें फायदा मिलेगा। जिससे उनके गठबंधन के साथ कम से कम इन सवर्ण जातियों का समर्थन भी हासिल हो जाएगा। लेकिन लालू यादव यहीं पर एक चूक कर गए। उन्होंने बहुमत मिलने की हालत में खुद के मुख्यमंत्री बनाए जाने का ऐलान कर दिया। लालू यादव ऐसा करते वक्त भूल गए कि उनके पंद्रह साल के राज में उनसे अगर कोई सबसे ज्यादा नाराज रहा है तो वे सवर्ण मतदाता ही रहे हैं। उनका यह आकलन गलत रहा, क्योंकि तमाम बदलावों के बावजूद कम से कम सवर्ण मतदाता अभी-भी लालू को स्वीकार करने के मूड में नहीं है। फिर भारतीय राजनीति में यह देखा गया है कि अनुसूचित जातियों का वोट बैंक वाली पार्टियों के साथ जब भी किसी दूसरी किसी पार्टी का गठबंधन होता है तो यह वोट बैंक दूसरी पार्टी के साथ चला जाता है, लेकिन दूसरी पार्टी के वोटर अनुसूचित जातियों के साथ कम ही आते हैं। यानी रामविलास पासवान के वोटरों ने आरजेडी उम्मीदवारों के लिए वोटिंग में झिझक नहीं दिखाई, लेकिन आरजेडी के समर्थकों के लिए पासवान के उम्मीदवारों को वोट देना रास नहीं आया। नीतीश कुमार के पक्ष में सिर्फ उनका सुशासन ही नहीं रहा। बल्कि समाज के दूसरे वर्गों को भी सत्ता में मिली भागीदारी ने उनकी साख और समर्थन बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। चुनाव नतीजों के विश्लेषण में कुछ तथ्यों की ओर लोगों का ध्यान नहीं जा रहा है। यह सच है कि करीब ढाई दशक बाद 2006 में बिहार में पंचायत चुनाव हुए। जिसमें महिलाओं को पचास प्रतिशत का आरक्षण दिया गया। महिलाओं को विकास और फैसले लेने की प्रक्रिया में पहली बार भागीदारी मिली। कानून-व्यवस्था की हालत सुधरने के बाद उनमें आत्मविश्वास भी जगा। दलितों में महादलित जातियों को घर बनाने की सुविधाएं और जमीन देकर नीतीश कुमार ने नया वोट बैंक भी बनाया। चूहा खाने के लिए अभिशप्त मुसहर जैसी जातियों को पहली बार घर की छत नसीब हुई। देश में पहली ग्राम कचहरी योजना की शुरूआत भी नीतीश कुमार ने ही की। इसका दोहरा फायदा हुआ। छोटे-मोटे झगड़ों के लिए गांव वालों को थाना-कचहरी के चक्कर काटने से मुक्ति मिली और न्यायमित्र के तौर पर हजारों लोगों को रोजगार भी मिला। गांवों के स्कूलों में शिक्षा मित्र के साथ ही हजारों शिक्षकों की नियुक्ति ने भी नीतीश कुमार के लिए नया वोट बैंक बनाने में मदद दी।
मौजूदा चुनाव में फिर भी दूसरी पार्टियों को 26.8 फीसद वोट मिले हैं, जिनमें सीपीआई, सीपीएम, बीएसपी समेत कई पार्टियां शामिल हैं। कांग्रेस भी 8.4 प्रतिशत वोट पाने में कामयाब रही है। यानी नीतीश के खिलाफ 52.8 फीसदी वोटिंग हुई है। इससे साफ है कि अगर पहले की तरह लालू यादव ने कांग्रेस का भी साथ लिया होता और अपनी पुरानी सहयोगी वामपंथी पार्टियों के साथ तालमेल किया होता तो उनके लिए तसवीर इतनी बुरी नहीं होती। सबसे बड़ी बात यह है कि 1990 के बाद यह पहला मौका होगा, जब लालू यादव या उनके परिवार के लिए अहम संवैधानिक स्थिति नहीं होगी। 1990 से 2005 तक उनके या उनके परिवार के पास मुख्यमंत्री या नेता विपक्ष की कुर्सी रही है। लेकिन चुनावी नतीजों ने इस बार उनसे यह अधिकार भी छीन लिया है। कायदे से नेता विपक्ष होने के लिए कुछ विधानसभा सीटों की दस फीसदी सदस्य होने चाहिए। इस हिसाब से बिहार में नेता विपक्ष की संवैधानिक कुर्सी हासिल करने के लिए आरजेडी के पास 25 विधायक होने चाहिए थे। लेकिन इस बार उनके पास महज 22 विधायक ही जीत कर आए हैं।
आखिर में : आंकड़ों की नजर में बिहार चुनाव ने कुछ नई इबारतें भी लिखी हैं। दुनिया में किसी गठबंधन की यह सबसे बड़ी जीत है। बिहार में इसके पहले 1995 में लालू यादव की अगुआई में आरजेडी ने 320 सीटों में 182 सीट जीत हासिल की थी।

Thursday, September 16, 2010

राजनीतिक दलों में सचमुच कब आएगा आंतरिक लोकतंत्र


उमेश चतुर्वेदी

सोनिया गांधी चौथी बार कांग्रेस आई की अध्यक्ष चुन ली गई हैं। कहने को तो जनप्रतिनिधित्व कानूनों के मुताबिक पूरी लोकतांत्रिक प्रक्रिया के तहत उन्हें अध्यक्ष चुना गया है। वैसे तो उनका चुनाव महज औपचारिकता ही था। लिहाजा पार्टी में जश्न का माहौल है। उन्हें बधाईयां देने-दिलाने का दौर तेज है। अंतरराष्ट्रीय मंचों पर हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र होने का दावा करते नहीं थकते। लेकिन पश्चिमी लोकतांत्रिक समाजों की तरह यहां बड़ी पार्टियों के अध्यक्षों के चुनावों के बाद बधाईयों या समालोचनाओं की परंपरा भी नहीं है। लोकतांत्रिक समाज की पहली ही शर्त वैचारिकता और कार्यक्रम आधारित विरोध होता है। लेकिन हमारे राजनीतिक दलों की आपसी दुश्मनी इससे भी कहीं आगे की है। उनके बीच अश्पृश्यता की हद तक विरोधी होने की परंपरा है। उपर से देखने पर यही कारण नजर आता है कि जब किसी दल विशेष का नया नेता चुना जाता है तो उसे बधाई देने या उसकी समालोचना नहीं की जाती। हमारी राजनीतिक संस्कृति इसे सामने वाले दलों का आंतरिक मामला मानकर उस पर टिप्पणियां करने से बचती है। लेकिन क्या देश का शासन संभाल रही महत्वपूर्ण पार्टियों का आंतरिक चुनाव मामूली घरेलू मसला जैसा ही है। जिन अध्यक्षों और कार्यकारिणी के फैसलों पर देश के करोड़ों लोगों के भाग्य का फैसला निर्भर करता हो क्या वह सचमुच मामूली घरेलू मामला हो सकता है, अगर भारतीय राजनीति और उसके पुरोधा ऐसा मानते हैं तो उसका भगवान ही मालिक है। हालांकि बात इतनी सी नहीं है। दरअसल आज हमारे यहां जो राजनीतिक संस्कृति विकसित हो चुकी है, उसमें आम कार्यकर्ता का अपनी योग्यता और नेतृत्व क्षमता के दम पर अपनी पार्टी के सर्वोच्च पद पर पहुंचना संभव ही नहीं रहा। देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस हो या फिर देश का प्रमुख विपक्षी दल भारतीय जनता पार्टी, उनके यहां कार्यकर्ताओं की भूमिका महज दरी बिछाने और पानी पिलाने तक ही सीमित हो गई है। समाजवादी पार्टी और राष्ट्रीय जनता दल जैसी परिवार आधारित पार्टियों की तो बात ही छोड़ देनी चाहिए, जो पारिवारिक लिमिटेड कंपनियों की तरह चलती हैं। यही वजह है कि जब सोनिया गांधी अध्यक्ष बनती हैं तो भारतीय जनता पार्टी प्रतिक्रिया देने से बचती है और जब नितिन गडकरी सारे वरिष्ठों को दरकिनार करके अध्यक्ष पद की कुर्सी पर काबिज किए जाते हैं तो कांग्रेस को यह घटना प्रतिक्रिया के लायक नहीं लगती।
देश की सबसे पुरानी पार्टी कांग्रेस का पूरा विकास चूंकि राष्ट्रीय स्वाधीनता आंदोलन के साथ हुआ है, इसलिए उससे लोकतांत्रिक परंपराओं की उम्मीद कुछ ज्यादा ही की जाती है। आजादी का सपना और आजादी के बाद के लोकतांत्रिक समाज के निर्माण की रूप रेखा कांग्रेस की अगुआई में ही देश ने देखा था। लेकिन दुर्भाग्य देखिए कि आजादी के बाद उसी कांग्रेस में चुने हुए पहले अध्यक्ष सीताराम केसरी थे। जिन्हें पहले तो कांग्रेस ने मजबूरी में कार्यवाहक अध्यक्ष बनाया और बाद में बाकायदा वे अध्यक्ष चुने गए। कांग्रेस के शुभचिंतकों की नजर में केसरी ने हो सकता है कांग्रेस का खास भला न किया हो, देवेगौड़ा के मुताबिक वे प्रधानमंत्री बनने की हड़बड़ी में भी थे। सबसे बड़ी पार्टी का अध्यक्ष बनते ही उनके मन में ऐसी अभीप्सा जागना संभव भी था। लेकिन उनकी सबसे बड़ी खासियत थी कि वे चुने हुए अध्यक्ष थे। लेकिन 1998 में कोलकाता के कांग्रेस अधिवेशन में उस अर्जुन सिंह की पहल पर उन्हें अध्यक्ष पद से हटा दिया गया, जो खुद पीवी नरसिंह राव के चलते कांग्रेस से बाहर हो चुके थे और उन्हें केसरी ने ही कांग्रेस में प्रवेश कराया था। रामशरण जोशी की किताब 'अर्जुन सिंह : एक सहयात्री इतिहास का' में अर्जुन सिंह की इन कोशिशों का विस्तार से वर्णन किया गया है। सोनिया गांधी तब से कांग्रेस से अध्यक्ष हैं। हां उनके पहले औपचारिक चुनाव में उत्तर प्रदेश के कांग्रेस नेता जितेंद्र प्रसाद और दूसरे चुनाव में राजेश पायलट ने जरूर ताल ठोंका था। लेकिन वे खेत रहे थे।
भारतीय राजनीति में परिवारवाद और वंशवाद का आरोप लगाने वाले बहुत हैं। लेकिन सोनिया गांधी के अध्यक्ष बनने के बाद यह सवाल गौड़ हो जाता है। हां, रस्मी तौर पर रविशंकर प्रसाद ने इस चुनाव पर सवाल जरूर उठाया। कांग्रेस से भीतर इस पर सवाल उठने की गुंजाइश तो आज की राजनीतिक संस्कृति ने छोड़ी ही नहीं है। राजनीतिक कार्यकर्ता तो सिर्फ कृतकृत्य भयऊं गोसाईं की तर्ज पर ताली बजाने और आनंदित होने में ही गर्व का अनुभव करता है। लेकिन इससे यह सवाल गौड़ नहीं हो जाता कि कांग्रेस को अपना अध्यक्ष गांधी-नेहरू परिवार से बाहर क्यों नहीं मिलता। क्यों नहीं उसे अब कोई पुरूषोत्तम दास टंडन, पट्टाभि सीतारमैया, के कामराज जैसा आम कार्यकर्ता अध्यक्ष बनने और पार्टी की कमान संभालने योग्य नहीं लगता।
दरअसल आज गांधी और नेहरू परिवार कांग्रेस की ताकत और कमजोरी दोनों ही बन गया है। हाल के वर्षों में जब-जब कांग्रेस की कमान गांधी-नेहरू परिवार से बाहर गई है, कांग्रेस में बिखराव आया है। वह कमजोर भी हुई है। इसका फायदा गांधी-नेहरू परिवार के उत्तराधिकारियों को भी अपना राजनीतिक रसूख बनाने में मिलता है। राहुल गांधी जगह-जगह कहते फिरते हैं कि उनके नाम के आगे गांधी लगे होने के चलते उन्हें काफी फायदा मिला है। अपनी जनता का लगाव देखिए कि उसे भी गांधी-नेहरू परिवार ही ज्यादा अच्छा लगता है। लिहाजा जब कांग्रेस की कमान इस परिवार के हाथ में रहती है तो वह उस कांग्रेस के हाथ का साथ देने के लिए अपनी उंगलियों से इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों की ओर बढ़ा देती है, लेकिन जैसे ही कांग्रेस की अगुआई इस परिवार से बाहर जाती है, जनता की उंगलियां भी जैसे कांग्रेस के हाथ से दूर जाने लगती है। उसे देश के तारनहार के तौर पर सिर्फ गांधी-नेहरू परिवार ही नजर आता है। सोनिया गांधी को इसका श्रेय जरूर जाता है कि उन्होंने शिथिल हो चुकी कांग्रेस की रगों में नई जान फूंकी और उसे दोबारा सत्ता की सीढ़ी तक पहुंचाया।
आज की राजनीति का सबसे बड़ा साध्य सत्ता हो गई है। राजनीतिक ताकत का आकलन सत्ता तक पहुंच से ही लगाया जाता है। यही वजह है कि आज नैतिक ताकत की सत्ता कमजोर हुई है। फिर सत्ता तक आम कार्यकर्ता की पहुंच भी लगातार कम हुई है। लिहाजा आम लोगों के लिए असल में सोचने वाली ताकतों की सत्ता तक पहुंच लगातार कम हुई है। इसका असर है कि आज आम आदमी हाशिए पर है। मजे की बात यह है कि हाशिए के लोगों की जब भी आवाज उठाई जाती है, उसका मकसद दूरंदेशी राजनीतिक विकास नहीं होता, बल्कि फौरी राजनीतिक फायदा उठाना होता है। सोनिया गांधी का अध्यक्ष बनना कांग्रेस के लिए फौरी फायदे का सौदा भले ही हो, लेकिन यह तय है कि यह उसी राजनीतिक संस्कृति को ही पुष्ट कर रहा है, जिसमें आम आदमी की भारतीय गणतंत्र में असल भागीदारी कम होती जाएगी। कांग्रेस का दावा है कि राहुल गांधी आजकल कांग्रेस में आंतरिक लोकतंत्र बहाली की कोशिशों में जुटे हैं। कांग्रेस में यह लोकतंत्र बहाली तभी सफल मानी जाएगी, जब पार्टी के शीर्ष पद पर कोई आम कार्यकर्ता अपनी राजनीतिक क्षमता के दम पर पहुंच पाएगा। निश्चित तौर पर यह दूसरे दलों के लिए नजीर साबित होगा।

Sunday, August 1, 2010

साहित्यिकों से दो बातें

उमेश चतुर्वेदी
(रूसी विचारक प्रिंस क्रोपाटकिन से क्षमा सहित, जिनकी एक किताब का शीर्षक ही है –नवयुवकों से दो बातें )
महान कथाकार प्रेमचंद की कल जयंती बीत गई। मेरे जेहन में उनका जयशंकर प्रसाद के साथ खिंचवाई एक तसवीर ताजा हो गई है। इस तसवीर में कामायनी के रचयिता महाकवि प्रसाद धीर-गंभीर मुद्रा में खड़े हैं। लेकिन उनके साथ खड़े उपन्यास सम्राट की भंगिमा बिलकुल अलग है। उपन्यास सम्राट के फटे जूते से पैरों की अनामिका उंगली किंचित झांकती सी नजर आ रही है। प्रसाद जी की गंभीरता से ठीक उलट प्रेमचंद के स्मित होठ इससे बेपरवाह नजर आ रहे हैं। इस तसवीर के याद आने की अपनी वजह भी है। प्रेमचंद की यह भावमुद्रा दरअसल उनकी मनोदशा का प्रतीक भी है। प्रेमचंद आज भी नए-पुराने लेखकों से कहीं ज्यादा लोकप्रिय हैं। हिंदीभाषी इलाके में अगर लोकप्रियता के मामले में उनसे तुलसीदास ही भारी पड़ सकते हैं। उनकी भी जयंती आने ही वाली है। दोनों की भावभूमि भले ही अलग हो, लेकिन दोनों कम से कम एक मामले में समान हैं। जनता के बीच उनकी स्वीकार्यता और पहचान दूसरे लेखकों और कवियों से कोसों आगे है। दोनों की रचनाएं आज जिंदगी के कठिन मोड़ों पर नई राह दिखाने के लिए बतौर उदाहरण के तौर पर भी पेश की जातीं हैं। लोक और अपने समय के साथ जुड़े होने के चलते आम जीवन में उनकी पैठ का इससे बड़ा कोई उदाहरण नहीं हो सकता। दैनंदिन जिंदगी में ऐसे अक्सर अनचाहे मौके आ जाते हैं, जब राह कठिन लगने लगती है। कई बार तो राह सूझती भी नहीं। निराशा के गहरे गर्त में डूबते ऐसे पलों में तुलसी और प्रेमचंद की रचनाएं राह दिखाती नजर आती हैं।
किसी साहित्यिक और उसके साहित्य की लोकप्रियता का इससे बेहतरीन उदाहरण क्या होगा। लेकिन दुर्भाग्य देखिए कि आज कम से कम हिंदी साहित्य की दुनिया में लोकप्रियता शब्द उपेक्षा का पात्र है। आज अगर कोई लोकप्रिय है तो उसका मतलब यही लगा लिया जाता है कि वह बाजारू है। आज बाजार के बिना एक कदम आगे बढ़ना मुश्किल है, लेकिन बाजार के साथ अगर आप कदमताल मिलाने लगते हैं तो आप बाजारू बन जाते हैं। हालांकि बाजारूपन कहीं ज्यादा सतही भाव लिए हुए है। लेकिन यह कहां की बात हो गई कि आप लोकप्रिय हो गए तो बाजारू हो गए। लेकिन हिंदी का साहित्यिक समाज आज इसी विरोधाभास को लेकर जी रहा है। इन्हीं विरोधाभासों के ही चलते गुलशन नंदा, रानू , वेदप्रकाश शर्मा, सुरेंद्र मोहन पाठक, जैसे लुगदी साहित्यकार बाजारू हैं। यह बात दीगर है कि उनकी कई लुगदी रचनाएं रेलवे स्टेशनों की किताबों की दुकानों की श्रृंखला एच ह्वीलर के जरिए सामान्य पाठकों की पहली पसंद रहीं हैं। उन पर लोकप्रिय फिल्में और टेलीविजन सीरियल तक बन चुके हैं। लोगों ने उन्हें पसंद भी किया, लेकिन ये रचनाएं क्लासिक का दर्जा नहीं पा सकीं। खैर यह अलग बहस का विषय है। एक बार फिर लौटते हैं प्रसाद और प्रेमचंद की तसवीर पर। यह तसवीर दो लोगों की मनोदशा के साथ ही हिंदी की हकीकत को भी बयां करती हैं। प्रेमचंद अगर लोकप्रिय हैं तो इसकी एक बड़ी वजह जनता से उनका जुड़ाव भी है। वे हमेशा लोगों से जुड़े रहे। हाल ही में सोजे वतन की जब्ती को लेकर उनका संस्मरण पढ़ने का मौका मिला। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा की पत्रिका पुस्तक वार्ता के एक अंक में छपे इस संस्मरण में उन्होंने सोजे वतन की जब्ती और इसे नौकरी की दुश्वारियों की चर्चा की है। इस चर्चा का लब्बोलुआब यह है कि उन दिनों में भी उन्होंने जनता से अपने जुड़ाव को नहीं तोड़ा था।
हिंदी में इन दिनों प्रगतिशील और जनवादी होने का दावा करने वाले लोगों की अच्छी-खासी संख्या रचनारत है। लेकिन सही मायने में आमलोगों से उनका जुड़ाव कम ही है। यही वजह है कि उनके बगल वाला भी नहीं जानता कि वे कितने बड़े और महत्वपूर्ण लेखक और रचनाकार हैं। बड़े-बड़े लेखकों की मौत के बाद प्रकाशित होने वाले रिपोर्ताजों में अक्सर इस बात का जिक्र होता है कि उन्हें तो बगल वाले ही नहीं जानते। इस बहाने हिंदी वालों की लानत-मलामत भी खूब की जाती है कि हाय देखो, हिंदीभाषी लोग कितने कुसंस्कारी हैं। लेकिन हम यह भूल जाते हैं कि हमारे साहित्यिक सही मायने में उस गली की समस्या के निदान से भी दूर भागते हैं, जिसमें वे रहते हैं। अगर निदान के लिए वे जुड़ना भी चाहते हैं तो उनका लहजा विशिष्टता का भाव लिए होता है। ऐसे में जनता भला कैसे उनसे जुड़ सकती है और जुड़ेगी नहीं तो उनके लेखन से वाकिफ कैसे होगी। मराठी के ग्रंथाली आंदोलन की खूब चर्चा की जाती है। ग्रंथाली के जरिए मराठी लेखकों ने अपने साहित्य को जनता के बीच ले जाने का उपक्रम शुरू किया था। उनके लिए राहत की बात यह है कि जिन दिनों यह आंदोलन शुरू हुआ, संयोग से बाजारवाद और उदारीकरण नहीं था। लिहाजा वे बाजारू होने के आरोप से बचे रह सके। ग्रंथाली का एक मकसद आम लोगों की समस्याओं से रूबरू भी होना था। मराठी का लेखक अपने पाठकों के दैनंदिन जीवन की समस्याओं से भी रूबरू होता है। उसके साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा रहता है। यही वजह है कि वहां का पाठक अपने साहित्यिकों को सीधे जानता है।
ऐसा नहीं कि हिंदी में ऐसा नहीं हो सकता। नई पीढ़ी में ऐसे साहित्यिक आ रहे हैं जो दैनंदिन जीवन की समस्याओं से रूबरू होने और लोगों के साथ कंधा से कंधा मिलाकर खड़े होने से नहीं झिझकते। लेकिन जरूरत इस बात की है कि इस चलन को आम बनाया जाय। तभी जनता हमारे साहित्यिकों से ना सिर्फ जुड़ पाएगी, बल्कि उनकी रचनाओं से भी खुद को जुड़ा महसूस कर पाएगी।

Friday, July 2, 2010

ढक्कन वाली पीढ़ी और साहित्य का संस्कार


उमेश चतुर्वेदी
बहुत खुशनसीब वे होते हैं, जिनकी जिंदगी की तय खांचे और योजना के मुताबिक चलती है। लेकिन आज की पढ़ी-लिखी पीढ़ी ने अपने बच्चों तक की जिंदगी के लिए खांचे तय कर रखे हैं और इसी खांचे के तहत जिंदगी की गाड़ी आगे बढ़ रही है। मनोवैज्ञानिक और शिक्षाशास्त्री भले ही इस चलन को गलत बताते रहें, थ्री इडियट जैसी फिल्में भी इसकी आलोचना करती रहें, लेकिन उदारीकरण के बाद आई भौतिकवाद की आंधी और उसमें कठिन और कठोर हुई जिंदगी की पथरीली राह पर चलते वक्त आज की जवान होती पीढ़ी के लोग सोचने के लिए मजबूर हो जाते हैं कि काश उनके भी माता-पिता ने उनकी जिंदगी का खांचा तय कर दिया होता ...
बहरहाल अपनी जिंदगी भी ऐसी खुशनसीबी के पड़ावों से नहीं गुजरी। जिस वक्त जिंदगी तय करने का वक्त था, पढ़ाई के उस दौर में रोजाना ट्रेन की घंटों की यात्रा करना मजबूरी थी। घर से कॉलेज की दूरी जो ज्यादा थी। लेकिन इस अनखांचे की जिंदगी ने खुदबखुद एक खांचा दे दिया। तब ट्रेन की लंबी यात्रा काटने के लिए किताबों और पत्रिकाओं का सहारा लेना शुरू किया और देखते ही देखते किताबें और पत्रिकाएं जिंदगी की पथरीली राह पर सहारा तो बन ही गईं, जिंदगी को देखने का नया नजरिया भी देने लगीं। किताबों की दुनिया से लोगों को परिचित कराने में ट्रेनों की बड़ी भूमिका रही है। मशहूर पत्रकार प्रभाष जोशी ने एक बार कहा था कि रेल यात्राओं का एक बड़ा फायदा उनकी जिंदगी में यह रहा है कि इसी दौरान उन्होंने कई अहम किताबें पढ़ लीं। रेल यात्रियों के मनोरंजन में किताबों की जो भूमिका रही है, उसमें एक बड़ा हाथ एएच ह्वीलर बुक कंपनी और सर्वोदय पुस्तक भंडार जैसे स्टॉल का भी रहा है। यह भी सच है कि इन स्टॉल्स से गंभीर साहित्य की तुलना में इब्ने सफी और कुशवाहा कांत के साथ गुलशन नंदा, रानू, सुरेंद्र मोहन पाठक और वेदप्रकाश शर्मा जैसे लुगदी साहित्यकार ज्यादा बिकते रहे हैं। यहां पाठकों की जानकारी के लिए बता देना जरूरी है कि इन साहित्यकारों को लुगदी साहित्यकार क्यों कहा जाता है। दरअसल इनकी रचनाएं जिस कागज पर छपा करती थीं, वह कागज अखबारी कचरे और किताबों के कबाड़ की लुगदी बनाकर दोबारा तैयार किया जाता था। बहरहाल इसी लुगदी साहित्य के बीच ही गोदान, गबन से लेकर चित्रलेखा तक पढ़ने वाले पाठक भी मिल जाते थे। इसके साथ ही पाठकीयता का एक नया संसार लगातार रचा-बनाया जाता था। ट्रेन में बैठने की जगह मिली नहीं कि किताब या पत्रिका झोले से निकाली और अपनी दुनिया में डूब गए।
लेकिन आज हालात बदल गए हैं। तकनीकी क्रांति ने आज की पीढ़ी के हाथ में मोबाइल के तौर पर नन्हा-मुन्ना कंप्यूटर ही दे दिया है। मोबाइल फोन सचमुच में जादू का पिटारा है। बीएसएनएल की मोबाइल फोन सेवा का 2003 में उद्घाटन करते वक्त तब के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने इसे पंडोरा बॉक्स ही कहा था। तो इस जादुई बॉक्स ने संगीत और एफएम का जबर्दस्त सौगात दे दिया है। आज की पीढ़ी इसका हेडफोन साथ लेकर चलती है और गाड़ी या बस में जैसे ही मौका मिला, हेड फोन कान में लगाती है और दीन-दुनिया से बेखबर संगीत की अपनी दुनिया में डूब जाती है। मेरे के मित्र हैं, वे इस पीढ़ी को ढक्कन वाली पीढ़ी कहते हैं। आपने होमियोपैथिक दवाओं की पुरानी शीशियां देखी होंगी। कार्क लगाकर उन्हें बंद किया जाता था। आज के हेडफोन कुछ वैसे ही कान में कार्क की तरह फिट हो जाते हैं, जैसे पहले ढक्कन लगाए जाते थे। जाहिर है कि ढक्कन वाली इस पीढ़ी से रेल और बस यात्राओं के दौरान पढ़े जाने का जो रिवाज रहा है, वह लगातार छीजता जा रहा है। आज की पीढ़ी के हाथ में पत्रिकाएं और किताबें कम ही दिखती हैं। लेकिन नई-नई सुविधाओं वाले गजट उनके हाथ में जरूर हैं।
बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार, कांग्रेस के राष्ट्रीय सचिव मोहन प्रकाश जैसे नेता कहा करते हैं कि जब वे पढ़ाई करते थे, उस वक्त अगर दिनमान में उनकी चिट्ठी भी छप जाती थी तो वे पूरी यूनिवर्सिटी में गर्व से उसे लेकर अपने बगल में दबाए घूमा करते थे। वैसे भी दिनमान और धर्मयुग पढ़ना उस समय शान की बात मानी जाती थी। लेकिन आज की पीढ़ी के लिए नए गजट ही शान के प्रतीक हैं। जाहिर है कि सोच में आए इस बदलाव का असर भी दिख रहा है। चूंकि पाठकीयता नहीं है, उसका संस्कार नहीं है तो आप देखेंगे कि आज की पीढ़ी के ज्यादातर लोगों को सामान्य ज्ञान की सामान्य सी जानकारी भी नहीं है। इसका दर्शन यूनिवर्सिटी और कॉलेजों में पढ़ाने वाले अध्यापकों-प्रोफेसरों को रोजाना हो रहा है। कई बार तो वे माथा तक पीटने के लिए मजबूर हो जाते हैं। लेकिन क्या मजाल कि ढक्कन वाली पीढ़ी के माथे पर शिकन तक आ जाए। हो सकता है बदले में आपको यह भी सुनने को मिले- इट्स ओके...सब चलता है यार...
तो क्या किताबें मर जाएंगी ...क्या नए गजट की दुनिया उन्हें खा जाएगी...यहां पर याद आता है मशहूर अमेरिकी पत्रकार वाल्टर लिपमैन का कथन। उन्होंने कहा था – दुनिया जैसी भी है, चलती रहेगी। फिर हम भी उम्मीद क्यों न बनाए रखें।

सुबह सवेरे में