Wednesday, March 4, 2009

गांव पहुंचे सरकार, पर कितना बदला बिहार



उमेश चतुर्वेदी

बेगूसराय जिले के बरबीघी गांव में नीतीश कैबिनेट की बैठक ने देशभर में एक नया संदेश दिया है। हकीकत में ऐसा पहली बार हुआ है कि सरकार सचमुच गांव पहुंची है। अब तक सिर्फ सरकार के गांव पहुंचने का दावा ही किया जाता रहा है। नीतीश सरकार ने अब तक दावा तो नहीं किया है कि गांव में पहुंचकर उनकी सरकार ने गांधी जी के सपनों को साकार करने की दिशा में ठोस कदम उठाया है। लेकिन ये भी सच है कि देर-सवेर ऐसा होना शुरू हो ही जाएगा। नीतीश कुमार ने बीती दस फरवरी को राजधानी पटना से करीब डेढ़ सौ किलोमीटर दूर स्थित बरबीघी में पूरी कैबिनेट को उतार कर एक नई परंपरा की नींव डाल दी है।
पता नहीं मंत्री हलकान हुए या नहीं ..लेकिन नीतीश कुमार के इस कदम से अफसर जरूर हलकान हैं। वे कुछ वैसे ही परेशान हैं, जैसे नायक फिल्म में एक दिन के लिए मुख्यमंत्री बने अनिल कपूर के त्वरित फैसले से अधिकारी परेशान नजर आए थे। परेशान नीतीश कुमार के विरोधी भी नजर आ रहे हैं। लोकसभा चुनावों की दस्तक के बीच नीतीश के इस कदम से सत्ताधारी जनता दल यूनाइटेड के नेताओं और कार्यकर्ताओं में उत्साह नजर आ रहा है। लेकिन ये कहना पूरा सच नहीं होगा। बिहार जनता दल के कई नेता ऐसे भी हैं, जो नीतीश कुमार के शुभचिंतक हैं। दिल और पार्टियां टूटने के लिए मशहूर जनता दल यू के इन नेताओं को नीतीश की अगुआई से कोई शिकवा भी नहीं है। लेकिन उनके गांव-गांव पहुंचने और आम लोगों के सामने ही अफसरों की खिंचाई के नजारों से वे संतुष्ट नहीं हैं।
याद कीजिए उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती का पिछला कार्यकाल। जहां भी जातीं, वहां के अफसरों की मानो शामत ही आ जाती। सड़क निर्माण में धांधली उन्हें नजर आई नहीं कि सार्वजनिक निर्माण विभाग के तमाम इंजीनियर सरेआम सस्पेंड। पिछले कार्यकाल में उन्होंने मंडल स्तर पर कानून-व्यवस्था की समीक्षा बैठकें लेनी शुरू की थीं। समीक्षा बैठक में अफसर की कोताही पाई गई नहीं कि उसे सस्पेंशन का आर्डर तत्काल थमा दिया जाता। अफसरों पर सार्वजनिक तौर पर गिरती इस गाज को लेकर जनता की तालियां तेज होती गईं। लेकिन इससे उत्तर प्रदेश के प्रशासन में कोई साफ-सफाई नजर नहीं आई। कुछ ही वक्त बीतते ना बीतते अफसर भी बहाल हो जाते। मायावती जनता में ये संदेश देना चाहती थीं कि उनके इस कदम से प्रदेश की पूरी व्यवस्था पटरी पर आ जाएगी। लेकिन व्यवस्था कितनी पटरी पर आ पाई है, इसे देखने के लिए उत्तर प्रदेश के सुदूरवर्ती इलाकों का दौरा करना पड़ेगा। इसका मूल्यांकन करने के लिए हमें ये भी ध्यान रखना होगा कि अब मायावती अपने दम पर पूरी बहुमत की सरकार चला रही हैं। जबकि उन्होंने जब ये लोकलुभावन फैसले लिए थे – तब वे भारतीय जनता पार्टी की बैसाखी पर सवारी करके सरकार की कमान संभाले हुए थीं।
लेकिन ये भी सच है कि नीतीश कुमार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री जैसे नहीं हैं। ये भी सच नहीं है कि वे जनता के बीच लोकप्रिय होने के लिए इस टोटके का इस्तेमाल कर रहे हैं। ये तो दबी जबान से उनके विरोधी भी मान रहे हैं। लेकिन असल सवाल ये है कि क्या उनके इस कदम से सचमुच अफसरशाही में गुणात्मक बदलाव आ रहा है। उपरी तौर पर कई लोगों को ये बदलाव बखूबी नजर आ रहा है। कई ऐसे भी लोग हैं – जिन्हें लगता है कि नीतीश की अगुआई में बिहार में नई राजनीतिक संस्कृति का विकास हो रहा है, जिसका प्रशासन पर गुणात्मक असर पड़ रहा है। इसे लेकर फिलहाल जनता भी गदगद नजर आ रही है।
तो आखिर क्या वजह है कि जनता दल के कई नेता इसे लेकर परेशान हैं। मुख्यमंत्री अपने जनता दरबार में लोगों से सीधे मुखातिब होते हैं और उनकी समस्याओं को सुनते भी हैं। लगे हाथों उसका समाधान करने का आदेश भी थमा देते हैं। लेकिन सबसे बड़ी बात ये है कि ये सारी कवायद उन्हीं अफसरों को करनी है, जिनके खिलाफ जनता मुख्यमंत्री के दरबार पहुंच रही है। ऐसा इक्के-दुक्के मामलों में ही हो रहा है। लेकिन ये भी सच है कि मुख्यमंत्री के जनता दरबार में पेश ज्यादातर अर्जियां उन्हीं अफसरों के पास भेज दी जाती हैं। अफसर तो ठहरे अफसर..इतनी जल्दी बदल गए तो फिर अफसर कैसा। वे फिर से मामले को लटकाने में ही अपनी पूरी ताकत लगा देते हैं। परेशान शख्स कितनी बार पूर्णिया और रक्सौल से पटना तक जनता दरबार तक की दौ़ड़ लगा सकता है।
समाजवादी आंदोलन और सोच के लिए मशहूर बिहार के लोगों में इन दिनों दो वाक्य जमकर चर्चा में हैं। इनमें से एक कहावत उस देवीलाल की देन है, जिनके लोकदल के साथ नीतीश कुमार ने विधिवत राजनीति की शुरूआत की थी। देवीलाल ने कहा था – लोकराज, लोकलाज से चलता है। दूसरी कहावत है – राज इकबाल से चलता है। दिलचस्प बात ये है कि जनता दल के ज्यादातर कार्यकर्ता ही इन दिनों इन कहावतों को दोहराते फिर रहे हैं। हो सकता है, इसके पीछे कई लोगों की कुंठा भी काम कर रही होगी, जो अपने राज के बावजूद कमाई करने के मौके से महरूम हैं। लेकिन ये भी पूरा सच नहीं है। लोगों का तर्क है कि मुख्यमंत्री का काम बीडीओ और डीएम के स्तर के मामले सुलझाना नहीं है, बल्कि ऐसी व्यवस्था करना है, जिसके तहत अफसरशाही खुद ब खुद ऐसे फैसले ले सके। लोगों का तर्क है कि परेशान जनता पहले बीडीओ को अपनी शिकायत देती है। उसकी सुनवाई नहीं होती तो उसे भरोसा होता है कि डीएम उसकी परेशानी जरूर दूर करेगा। जब वह भी ध्यान नहीं देता तो वह मुख्यमंत्री या मंत्री के दरबार पहुंचती है। उसे अपने नेता पर सबसे ज्यादा भरोसा होता है।
जनता परिवार के नेताओं का असल डर ये है कि यहां मामला सीधे मुख्यमंत्री के दरबार का है। जिस पर कार्रवाई नहीं हुई तो ना सिर्फ नीतीश कुमार, बल्कि पूरी पार्टी की साख पर ही सवाल उठ खड़े होंगे। क्योंकि अफसरशाही वही कर रही है, जिसकी वह आदी रही है। पंद्रह-सोलह साल तक बदहाली और भरोसा खिलाफी के दौर में जीती रही बिहार की जनता को इन दिनों राहत मिली भी है। त्वरित न्यायालयों के जरिए अब तक करीब 28 हजार अपराधियों को निचली अदालतें सजा सुना चुकी हैं। घूसखोरी पर लगाम के लिए नीतीश कुमार पचास हजार रूपए का इनाम तक घोषित कर चुके हैं। इसके बावजूद जनता दल के नेता और कार्यकर्ता प्रसन्न नहीं हैं। हाल ही में राजगीर में संपन्न चिंतन बैठक में कई कार्यकर्ताओं और निशाने पर नीतीश सरकार के ये लोकलुभावन फैसले भी रहे। कुछ राजनीतिक जानकार इसे नेताओं और कार्यकर्ताओं की कमाई पर लगी लगाम के खिलाफ निकली भड़ास बता रहे हैं। लेकिन उनकी भी शिकायतों और सवालों को नकारा नहीं जा सकता। ये सच भी है कि अगर मुख्यमंत्री के दरबार में शिकायत के बाद भी जनता को राहत नहीं मिलेगी तो वहां कहां जाएगी। वह किस पर इकबाल करेगी। ये सच है कि फिलहाल नीतीश कुमार को इन सवालों का जवाब देने की जरूरत नजर नहीं आ रही है। लेकिन अधिकारियों का रवैया ऐसा ही रहेगा तो इसका भी उन्हें जवाब देना पड़ेगा ही। अगर वक्त रहते प्रशासन को कसा नहीं गया तो बरबीघी जैसी जगहों में कैबिनेट की बैठक करने जैसी घटनाओं को जनता देर तक झेल नहीं पाएगी।

2 comments:

  1. सरकारें जनता तक नहीं पहुंचती क्योंकि उनके पास अपने सिवाय समय नहीं होता।

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  2. बदलाव हो रहा है, सरजी। गांव पहुंचे सरकार तो बदलाव की बयार तो बहेगी ही , भले ही देर लगे। जहां तक मेरा अनुभव है तो पूर्णिया जिले में कई मोर्चे पर परिवतर्न दिख रहे हैं। सड़क उसमें सबसे आगे है और बंदूकों से गोलियां निकलनी भी कम हो गई है क्योंकि निकालने वाले उचित जगह पहुंचा दिए गए हैं।

    एक गुजारिश है कृपया वर्ड वेरिफिकेशन हटा दें, ताकि हम जमकर कांमेटिया सकें।

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