
उमेश चतुर्वेदी
अपनी जादू की झप्पी से फिल्मी पर्दे पर लोगों की समस्याएं दूर करने में मुन्नाभाई भले ही सफल रहे हों, लेकिन राजनीति के अखाड़े में उनकी ये झप्पी उन्हीं पर भारी पड़ती नजर आ रही है। उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती को जादू की झप्पी देने की उनकी कोशिश को चुनाव आयोग ने सही नहीं माना और आखिरकार प्रतापगढ़ के जिलाधिकारी और जिला निर्वाचन अधिकारी को उन्हें लिखित में माफी मांगनी पड़ी। चूंकि चुनाव आयोग और अधिकारियों ने इस बयान का संज्ञान लिया, इसलिए कम से कम चुनाव प्रचार में अब संजय दत्त की इस झप्पी पर रोक तो लगती नजर आ रही है।
लेकिन इससे भी कहीं ज्यादा वे एक और खतरनाक बयान देते फिर रहे हैं। लेकिन इसकी तरफ किसी का ध्यान नहीं जा रहा है। संजय दत्त कहते फिर रहे हैं कि जब वे टाडा के तहत जेल में बंद थे तो उन्हें पुलिस वाले मुसलमान का बेटा कहकर पिटाई किया करते थे। संजय कहते फिर रहे हैं कि चूंकि उनकी मां मुसलमान थीं, इसलिए उन्हें पुलिस वाले जेल में उत्पीड़ित करने का कोई मौका नहीं छोड़ते थे। संजय दत्त ये बयान जिस समाजवादी पार्टी के मंचों से देते फिर रहे हैं, सियासी और वोटरों की दुनिया में माना जाता है कि वह मुसलमानों की रहनुमाई करती है। लिहाजा मुन्नाभाई के इस बयान पर जगह-जगह तालियां जमकर बज रही हैं और इस पर कोई सवाल नहीं उठ रहा है। अव्वल तो भारतीय जनता पार्टी को ये सवाल उठाना चाहिए था, हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण की उसकी कोशिशों में एक कोशिश और भी जुट जाती। लेकिन उसे भी संजू बाबा का ये बयान भड़काऊ और सवालिया घेरे वाला नहीं लग रहा है। बहुजन समाज पार्टी और कांग्रेस इस बयान पर इसलिए सवाल नहीं उठा पा रहे हैं, क्योंकि उन्हें लग रहा है कि चुनावी दौर में जो भी मुस्लिम मतदाता उसकी ओर आकर्षित हो रहे हैं, वे कहीं विदक नहीं जायं।
लेकिन इससे इस बयान पर सवाल उठाने की गुंजाइश खत्म नहीं हो जाती। ये सच है कि संजय दत्त की मां नरगिस दत्त भले ही मुसलमान थीं, लेकिन उनका नाम सामने आते ही इस देश के जेहन में मदर इंडिया, श्री चार सौ बीस, आवारा जैसे ढेरों फिल्मों की नायिका की छवि उभरती है। बुर्के में ढंकी और लदी-फदी कोई आम मुसलमान महिला का अक्स नहीं उभरता। शायद ही किसी को याद है कि संजय दत्त को इसके पहले किसी ने किसी मुसलमान के बेटे के तौर पर याद किया हो। सब उन्हें सुनील दत्त के बेटे के ही तौर पर जानते रहे। अगर मुसलमान और हिंदू के खांचे में उन्हें बांटकर देखा जाता रहता तो नाम, राकी और साजन से लेकर खलनायक और मुन्नाभाई एमबीबीएस जैसी फिल्में सफलता का परचम नहीं लहरातीं। जिनके दम पर वे लोकप्रियता के उंचे पायदान पर खड़े हैं और उनकी ये लोकप्रियता ही है कि समाजवादी पार्टी और उसके कर्ता-धर्ता अमर सिंह ने उन्हें प्रचार मैदान में उतार रखा है।
संजय दत्त को सचमुच पुलिस वालों ने कितना उत्पीड़ित किया, इसे उन दिनों के टीवी फुटेज को ही देखकर समझा जा सकता है, जब वे टाडा कोर्ट में अपनी हाजिरी बजाने के लिए जाते थे। अदालत के बाहर सिक्युरिटी चेक के पहले उन्हें देखते ही जिस तरह पुलिस वालों की बांछें खिल उठती थीं, इसे पूरे देश ने देखा है। कुछ पुलिस वाले उत्साह में ये भूल भी जाते थे कि लोकप्रियता के पायदान पर जो शख्स खड़ा है और अदालत में पेशी के लिए आ रहा है. वह आरोपी है। इसी झोंके में वे संजय दत्त से हाथ तक मिला बैठते थे। क्या आपको लगता है कि दाऊद इब्राहीम या बबलू श्रीवास्तव कोर्ट में पेश करने के लिए लाया जाएगा तो लोग उससे हाथ मिला बैठेंगे। अदालतों में रसूखदार और ताकतवर ना जाने कितने तरह के अपराधी रोज आते हैं। लेकिन कितने पुलिस वालों की हिम्मत है कि वे सरेआम कैमरे के सामने उनसे हाथ मिला लें। लेकिन संजय दत्त से पुलिस वाले हाथ मिलाने से नहीं हिचकते थे। जिन्होंने ये फुटेज देखे हैं, उन्हें याद है कि जब संजय दत्त आते थे तो महिला सिपाहियों के चेहरे पर वैसी ही मुस्कुराहट और उत्साह नजर आता था, जैसे किसी लोकप्रिय अभिनेता को नजदीक से देखने के बाद आता है। अब जबकि संजय दत्त ये बयान देते फिर रहे हैं और समाजवादी पार्टी इसे जगह-जगह भुनाने की कोशिश कर रही है, ऐसे में ये सवाल उठना लाजिमी है कि कोर्ट के बाहर संजय दत्त से हाथ मिलाने वाले सारे या अधिकतर सिपाही मुसलमान थे...निश्चित तौर पर इसका जवाब ना में होगा। जब सिपाही कोर्ट में पेश होने जाते वक्त संजय दत्त से हाथ मिला सकते हैं तो क्या वे जेल में उन पर अत्याचार कर सकते हैं। ऐसा नहीं कि संजय दत्त जेल जाने से पहले सुपरहिट फिल्में नहीं दे सके थे। राकी और नाम उनके जेल जाने से पहले की सुपर हिट फिल्में हैं। क्या तब जेल कर्मचारियों को ये पता नहीं होगा कि संजय दत्त हिंदी रजतपट के कामयाब हीरो हैं। साफ है कि इन सब सवालों का जवाब ना में होगा।
अब संजय दत्त समाजवादी पार्टी के नेताओं के समझाने से खुद को मुसलमान का बेटा बताते फिर रहे हैं या फिर अपनी मनमर्जी से...ये तो गहन शोध का विषय है। लेकिन ये भी सच है कि संजय दत्त की असल दुनिया हिंदी सिनेमा का रजतपट ही है। जहां जाति और धर्म की बेड़ियों के खांचे में बांधकर अभिनेताओं के काम पर तालियां नहीं बजाई जातीं। वहां मधुबाला, तब्बू और माधुरी दीक्षित पर सीटियां धर्म और जाति को देखकर नहीं बजतीं। वहां उनका काम और उनका अभिनय देखा जाता है। सियासी मैदान में प्रचार से जाने के पहले काश संजय दत्त इस पर भी ध्यान देते।