Tuesday, July 26, 2016

सूचना सेवा में सुधार पर बासवान समिति ने खड़े किये हाथ

संघ लोकसेवा आयोग परीक्षा से संबंधित सुधारों पर कार्य करने के लिए बी एस बासवान समिति ने भारतीय सूचना सेवा में सुधार के सवाल पर हाथ खड़े कर दिये हैं, इससे इस सेवा में सुधार के लिए किये जा रहे प्रयासों को झटका लगा है।
                 हालांकि समिति ने अभी अंतिम रिपोर्ट सरकार को सौंपी नहीं है लेकिन भारतीय सूचना सेवा में सुधार के लिए छात्रों की ओर से किये जा रहे प्रयासों के जवाब में समिति के अध्यक्ष बी एस बासवान की ओर से जयपुर के छात्र श्याम शर्मा को ईमेल कर कहा गया है भारतीय सूचना सेवा को सिविल सेवाओं में रखना या न रखनासूचना एवं प्रसारण मंत्रालय का काम हैसमिति का नहीं। मुझे लगता है कि वे यथास्थिति बनाये रखना चाहते हैं।
       हरिदेव जोशी पत्रकारिता विश्वविद्यालयजयपुर के छात्र श्याम शर्मा ने प्रधानमंत्री कार्यालय व बासवान समिति को पत्र लिखकर मांग की थी कि भारतीय सूचना सेवा की पेशागत आवश्यकताओं को देखते हुए इसे ग्रुप ’ पेशेवर सेवा के तौर पर चिन्ह्ति किया जाए तथा इसमें प्रवेश के लिए मीडिया व जनसंचार विषयों की विशेषज्ञता अनिवार्य की जाए।
उल्लेखनीय है कि भारतीय सूचना सेवा में शीर्षस्थ पदों पर नियुक्तियों के लिए अब तक विशेषज्ञता अनिवार्य नहीं है और सिविल सेवाओं में निचले रैंकों पर रहने वाले प्रतिभागी अनिच्छा के साथ इस सेवा में पहुंचते हैं जिससे सरकार की कार्यदक्षता तो प्रभावित होती ही हैसाथ हीसंचार कौशल संयुक्त पेशेवर प्रतिभा के साथ भी अन्याय होता है। इस संबंध में मीडिया स्कैनदिल्ली पत्रकार संघ,आईआईएमसी छात्र संघ तथा अन्य तमाम मीडिया संगठनों व छात्र संगठनों ने बासवान समिति को पत्र लिखा है।  
इन संगठनों का मानना है कि यह स्थिति पत्रकारिता के छात्रों के साथ अन्याय जैसी है। देशभर में बड़ी संख्या में पत्रकारिता संस्थानों से सैकड़ों की संख्या में स्नातक होकर पत्रकारिता और जनसंचार के छात्र निकलते हैं और उनके कौशलों की आवश्यकता वाली एक लोकसेवा भी अस्तित्व में है फिर भी उनको अवसर देने के स्थान पर इस सेवा में ऐसे लोगों को मौका दिया जा रहा है जिनके पास पत्रकारिता और जनसंचार की बेसिक जानकारी तक नहीं है। इसलिए सूचना और प्रसारण मंत्रालयकेंद्रीय कार्मिक और प्रशिक्षण विभागसंघ लोकसेवा आयोग और प्रधानमंत्री कार्यालय से मांग की गयी है कि देशभर में पत्रकारिता के छात्रों के हित में भारतीय सूचना सेवा को पूरी तरह विशेषज्ञ सेवा के रूप में ग्रुप ए पेशेवर सेवा के रूप में चिन्हित किया जाए। 

Wednesday, May 25, 2016

आपकी मदद चाहिए..

मेरी कार चोरी हुए दस दिन हो गए..दिल्ली पुलिस ने इसे कैजुअली लिया..हम चाहते हैं कि आगे से ऐसे मामलों को दिल्ली पुलिस कैजुअली ना ले..इसलिए एक याचिका डाली है..जो नीचे दिए गए लिंक पर है..कृपया इस पर क्लिक करें और अपना हस्ताक्षर करके सहयोग करें..ताकि आगे किसी की कार चोरी हो तो पुलिस उसे कैजुअली ना ले..
https://www.change.org/p/home-ministry-of-india-my-car-is-stolen/c/456065495यहां करें क्लिक

Monday, May 9, 2016

उत्तराखंड में किस करवट बैठेगा राजनीतिक ऊंट



उमेश चतुर्वेदी
दुनियाभर के लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था वाले समाजों में आखिरी उम्मीद की किरण न्यायपालिका कितनी बन पाई है, यह शोध का विषय है। लेकिन कुछ अपवादों को छोड़ दें तो भारतीय लोकतंत्र में न्यायपालिका ही आखिरी उम्मीद की किरण बनकर उभरी है। हाल के दिनों आए जजों की नियुक्ति वाली कोलेजियम को बहाल करने वाले फैसले को छोड़ दें तो अभी-भी सर्वोच्च न्यायपालिका इंसाफ की आखिरी उम्मीद बनी हुई है। उत्तराखंड में हरीश रावत सरकार के बहुमत परीक्षण कराने का आदेश भी कम से कम कांग्रेस पार्टी के लिए आखिरी उम्मीद की ही तरह आया है। इसलिए वह इसे लोकतंत्र की जीत बताते नहीं अघा रही है। अपने समाज में चूंकि न्यायिक फैसलों की आलोचना की परंपरा नहीं है, लिहाजा अगर सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला नहीं भी आता तो यही कांग्रेस दुखी होने के बावजूद भी उस फैसले को लोकतंत्र की हार नहीं बताती। लेकिन यह तय है कि लोकतंत्र की असल जीत या हार इस फैसले से नहीं, बल्कि 10 मई को देहरादून में विधानसभा के पटल पर होगी। अगर हरीश रावत जीत गए तो निश्चित तौर पर कांग्रेस के लिए झूमने का मौका होगा। सत्ता तंत्र में लगातार छीजती जा रही कांग्रेस की उत्तर भारत में एक और सरकार लौट आएगी। लेकिन अगर हार हो गई तो इसमें कोई दो राय नहीं कि देश की सबसे पुरानी पार्टी के लिए वे क्षण बेहद दुखद होंगे।

Sunday, April 10, 2016

अमित शाह की आक्रामक राजनीति और बीजेपी

उमेश चतुर्वेदी
हताशा और निराशा के दौर से जिस पार्टी को दशकों गुजरना पड़ा हो, अगर लंबे संघर्ष के बाद वह जनता की आंखों का दुलारा बन जाए तो उसका उत्साहित होना स्वाभाविक है। भारतीय जनता पार्टी के 37 वें स्थापना दिवस पर अमित शाह की हुंकार को भी इसी नजरिए से देखा जाना चाहिए। पार्टी अध्यक्ष के नाते अमित शाह ने बीजेपी के कार्यकर्ताओं से कहा कि पार्टी को पंचायत से लेकर पार्लियामेंट तक 25 साल तक राज करना है। अमित शाह का यह बयान उनके विरोधियों को बड़बोलापन लग सकता है। विपक्षी दल इस पर सवाल भी उठा सकते हैं। उनका सवाल उठाना जायज भी है। लेकिन अमित शाह कोई अजूबी बात नहीं कर रहे हैं। जिस पार्टी के कार्यकर्ताओं को छोड़ दें, बड़े नेताओं तक को संघर्ष और राजनीतिक उत्पीड़न के लंबे दौर से जूझना पड़ा हो, उस पार्टी के अध्यक्ष की हुंकार ऐसी ही होनी चाहिए। कम से कम भारतीय जनता पार्टी के कार्यकर्ता तो ऐसा ही मानते हैं। कारपोरेट और उदारीकरण के वर्चस्व के दौर में आज टीम अगुआ से अपने लोगों को प्रेरित करने के लिए ऐसे ही बयानों की उम्मीद की जाती है। मोर्चे को फतह करने की तैयारियों में जुटी सेनाओं के जनरल भी अपने सैनिकों का उत्साह बढ़ाने और जीत के लिए प्रेरित करने के लिए ऐसे ही बयान देते रहे हैं। 

Saturday, February 20, 2016

कितना जहरीला है माहौल...

माहौल में कितना जहर भर गया है.. जरा देखिए फेसबुक पर यह पोस्ट..मेरे छात्र रहे हैं नाम है मन्शेष कुमार.. आईआईएमसी जैसी जगह में पढ़ते हैं..तो जाहिर है कि ऊंची छलांग लगाने की भी सोच रहे होंगे..लेकिन उनकी भाषा कैसी है..जरा पढ़िए..मेरे पोस्ट को शेयर करते वक्त,.दुख है कि इन्हें अपनी क्लास में मैं पढ़ा नहीं पाया..वैसे 23 साल पहले मैं उसी क्लास में छात्र था..आखिर भविष्य में ये क्या करेंगे...अंदाज लगाइए...इनका परिचय और इनकी पोस्ट दोनों लगा रहा हूं..देखिए और विचार कीजिए...

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Saturday, January 23, 2016

झारखंड में रघुबर सरकार की नायाब कोशिश

बजट की तैयारियों में जनता से मांगे सुझाव
उमेश चतुर्वेदी
उफान मारती जनाकांक्षाओं के रथ पर सवार होकर सत्ता में आने वाली सरकारों की चुनौतियां कम नहीं होतीं। उन्हें अपने उस आधारवोट बैंक की उम्मीदों पर खरा उतरना होता है, जिनके समर्थन की बदौलत उन्हें सत्ता की ताकत हासिल हुई रहती है। जिस पश्चिमी मॉडल के लोकतंत्र को आज पूरी दुनिया में आदर्श माना जा रहा है, जिसे 66 साल पहले हमने भी स्वीकार किया, उसकी सबसे बड़ी खामी है कि सत्ता में आते ही राजनीतिक दल उसी जनता को भूल जाते हैं, जिनके समर्थन का आधार ही उन्हें सत्ता की सर्वोच्च सीढ़ी तक पहुंचाता रहा है। सत्ता में आने के बाद वायदों को भूल जाना ज्यादातर राजनेताओं और राजनीति की रवायत रही है। ऐसे में अगर झारखंड के मुख्यमंत्री रघुबर दास सूबे के दूसरे बजट की तैयारी के लिए जनता के बीच घूम रहे हैं और लोगों से राय-सलाह ले रहे हैं और उनके वायदे के मुताबिक राज्य का अगला बजट बनाने की तैयारी कर रहे हैं तो उसका स्वागत ही किया जाना चाहिए। हालांकि अभी तक सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के अलावा दूसरे किसी राजनीतिक खेमे से उनके इस कदम की सराहना की खबर सामने नहीं आई है। लेकिन उनके कामकाज पर अभी तक कोई सवाल नहीं उठा है। झारखंड की विपक्षी राजनीति के सबसे अहम किरदार और झारखंड में गुरूजी के नाम से विख्यात झारखंड मुक्ति मोर्चा के प्रमुख शिबू सोरेन ने जमशेदपुर में रघुबर दास सरकार का पहला साल पूरा होने के संदर्भ में पूछे एक सवाल का जवाब देते हुए कहा कि एक साल में कोई भी सरकार बहुत कुछ नहीं कर सकती। किसी राज्य या देश के विकास के लिए एक साल का वक्त कुछ खास नहीं होता। लेकिन रघुबर दास सरकार ने इस दौरान झारखंड के विकास के लिए जो कदम उठाए हैं, वे ठीक हैं और उन्हें मौका दिया जाना चाहिए।
सवाल यह उठता है कि आखिर राज्य के दूसरे बजट के लिए ही रघुबर दास सरकार ने रायशुमारी के लिए जनता के बीच जाने का कदम क्यों उठाया। पहले बजट के लिए उन्होंने ऐसी कवायद क्यों नहीं की। इसका जवाब राज्य सरकार के पास है। झारखंड के मुख्यमंत्री के मीडिया सलाहकार शिल्पकुमार का कहना है कि चूंकि जब झारखंड में भारतीय जनता पार्टी को सरकार बनाने का मौका मिला, तब बजट सत्र की तैयारियां शुरू हो चुकी थीं। कुछ ही महीनों बाद बजट पेश किया जाना था। तब सरकार के पास पहली जिम्मेदारी यह थी कि सबसे पहले सूबे की संवैधानिक व्यवस्था को बनाए रखते हुए बजट पेश किया जाय। उस वक्त राज्य सरकार के पास जनता की राय जानने और फिर बजट तैयार करने का वक्त नहीं था।
जिस ट्रिकल डाउन सिद्धांत के मुताबिक उदारीकरण की अर्थव्यवस्था को हमने स्वीकार किया है, उसमें वोट मांगते वक्त जनाकांक्षा की बात तो खूब की जाती है। लेकिन जब सचमुच जनता के लिए कुछ करने का वक्त आता है, तब जनता के लिए चर्चाओं की बजाय उद्योगपतियों और आर्थिक संगठनों के प्रतिनिधियों से बात करके नीतियां तैयार कर ली जाती हैं और उसके मुताबिक बजट बनाकर योजनाएं शुरू कर दी जाती हैं। और इस तरह जनाकांक्षाएं कहीं पीछे रह जाती हैं। इन संदर्भों में देखें तो संभवत: ये पहला मौका है, जब किसी मुख्यमंत्री ने राज्य के लोगों से राज्य का बजट तैयार करने के लिए ना सिर्फ राय मांगी है, बल्कि राज्य में घूम-घूमकर लोगों की आकांक्षाओं का जानने का प्रयास कर रहा है। मुख्यमंत्री रघुबर दास ने बजट निर्माण के विकेन्द्रीकरण की दिशा में राज्य के सभी पांचों प्रमंडलों (कमिश्नरियों) में खुद जा कर छात्रों, महिलाओं, किसानों, शिक्षाविदों, स्वयंसेवी संस्थाओं, व्यापारियों के प्रतिनिधियों से मिलकर बजट पर चर्चा की शुरूआत की है। रघुबरदास का मानना है कि इससे बजट को जनोन्मुखी बनाने में मदद मिलेगी।
बजट को लेकर एक शिकायत यह रही है कि अफसरों को राज्य और आम लोगों की परेशानियों की जानकारी नहीं होती। वे यह भी नहीं जानते कि जमीनी हकीकत क्या है। लिहाजा बंद कमरों और दफ्तरों के भीतर वे जो बजट तैयार कर देते हैं, उनका जमीनी जरूरतों से कई बार दूर-दूर का वास्ता नहीं होता। रघुबर दास ने शायद इसी वजह से जनोन्मुखी विकास के लिए जनता द्वारा जनता के लिए जनता का बजट का अपने अधिकारियों को संदेश दिया है। वैसे इस बजट निर्माण प्रक्रिया की शुरूआत सितम्बर से ही कर दी गई है। इस सिलसिले में मुख्यमंत्री ने 11 दिसंबर तक राज्य के 5 प्रमंडलों से 2 प्रमंडलों का ना सिर्फ दौरा पूरा कर लिया था, बल्कि इस दौरान समाज के विभिन्न क्षेत्रों के लोगों से मिलकर बजट की जरूरतों पर चर्चा भी पूरी कर ली थी। इस दौरान सरकार की कोशिश यह रही है कि लोग क्या चाहते हैं और उनकी विकास की अवधारणा में स्थानीय जरूरतें क्या हैं, यह जाना और समझा जाय । रघुबर दास ने बजट चर्चा की शुरूआत उत्तरी छोटा नागपुर के धनबाद में 6 दिसम्बर को की और उन्होंने लोगों के साथ दूसरी रायशुमारी दक्षिणी छोटा नागुपर के गुमला में 11 दिसम्बर को की । इसी तरह मुख्यमंत्री ने संताल परगना के दुमका में 19 दिसम्बर को,  पलामू के डालटनगंज में 23 दिसम्बर और कोलहान प्रमंडल के चाईबासा में 24 दिसम्बर को लोगों से मुलाकात की और उनकी राय जानने की कोशिश की। इस दौरान कोशिश रही कि महिला-प्रतिनिधियों, किसानों, प्रख्यात शिक्षविदों, छात्रों के प्रतिनिधि और एनजीओ के प्रतिनिधि को बुलाया जाय। यह भी कोशिश रही कि जो लोग बुलाए जाएं, दरअसल उनकी अपने समुदाय पर गहरी पकड़ तो हो ही, अपने समुदाय की जरूरतों और कमजोरियों के साथ उसकी भावी चुनौतियों को भी समझते हों। सबसे बड़ी बात यह है कि इस दौरान राज्य के प्रमुख विभागों के सचिवों की मौजूदगी अनिवार्य रही। ताकि वे लोगों की समस्याओं को सीधे-सीधे जान सकें। इस बैठक के दौरान इलाके के सांसदों और विधायकों समेत दूसरे जन-प्रतिनिधियों को नहीं बुलाया गया। हालांकि उनसे अलग से राय जरूर मांगी गई है और वह भी लिखित रूप से। ताकि उनकी मांगों और सुझावों को भी बजट में समाहित किया जा सके। इसके साथ ही सांसदों और विधायकों से सरकार ने अपील की है कि वे अपने-अपने इलाकों के महत्वपूर्ण कार्यों की सूची मुहैया करा दें, ताकि बजट में उसे शामिल किया जा सके।