Friday, July 8, 2011

ग्लैमर की चाशनी के बीच गुम होते सामाजिक सवाल


उमेश चतुर्वेदी
प्रबंधन के पारंपरिक पाठ्यक्रमों में सिखाया जाता रहा है कि हर धंधे की नैतिकता होती है। प्रबंधन का पारंपरिक तरीका नहीं अब नहीं रहा, 1991 में शुरू हुए उदारीकरण ने धंधा शब्द को भी प्रोफेशन के बतौर स्थापित कर दिया है। लिहाजा प्रोफेशन की मान्यताएं भी बदल गई हैं। उदारीकरण और वैश्वीकरण की शुरूआत के दौर में इसके नफे-नुकसान को लेकर बहसों का जो दौर चल रहा था, उसमें एक सवाल प्रमुखता से उठा था। वह था प्रोफेशन की नैतिकता और सांस्कृतिक गिरावट का। जानकारों को आशंका थी कि उदारीकरण के दौर में पैसा बनाने के लिए नैतिकता और वर्जनाओं की सीमाएं टूटेंगी। जो निश्चित रूप से सामाजिक जीवन के लिए अच्छा नहीं होगा। नीरज ग्रोवर की हत्या के आरोप से छूट गई कन्नड़ अभिनेत्री मारिया सुसईराज को कलर्स चैनल के बहुप्रचारित शो बिग बॉस से ऑफर मिलने और उसके बदले में पांच करोड़ रूपए की भारी-भरकम रकम देने की खबर उदारीकरण के शुरूआती दौर की उन्हीं आशंकाओं को ही सही साबित कर रही है। चेहरे से शालीन दिखने वाले हॉरर फिल्में बनाने के लिए मशहूर राम गोपाल वर्मा भी मारिया के नाम से पैसे कमाने के लिए पीछे रहने वालों में से नहीं रहे। उन्होंने भी मारिया को लेकर फिल्म बनाने की घोषणा कर दी। यह बात और है कि मारिया के छूटने और उसे लेकर फिल्में और टीवी शो बनाने के खिलाफ लोगों के उतरने और इस दौड़ में शिवसेना और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के कूद जाने से कलर्स और रामगोपाल वर्मा की फिलहाल घिग्घी बंद है। कलर्स सफाई देते फिर रहा है कि उसने मारिया को कोई प्रस्ताव नहीं दिया।
लेकिन कलर्स का जो अतीत रहा है और खासतौर पर बिग बॉस बनाते वक्त उसने जो लटके-झटके इस्तेमाल किए, उससे शक की गुंजाइश अब भी बनी हुई है। बिग बॉस में पहले भी उसने राहुल महाजन, मोनिका बेदी, डॉली बिंद्रा, राजा चौधरी, कमाल राशिद खान, वीना मलिक जैसी नकारात्मक छवि वाले लोगों को ही शामिल करके टीआरपी और दाम दोनों कमाए हैं। राहुल महाजन बिग बॉस में इसलिए शामिल नहीं किए गए थे कि वे भारतीय जनता पार्टी के सर्वसुलभ और सर्वस्वीकार्य नेता प्रमोद महाजन के बेटे हैं, नशाखोरी और बीवी के साथ मारपीट के चलते उनकी जो नकारात्मक शोहरत बनी, कलर्स और बिग बॉस की निर्माता कंपनी एंडमोल को उसने आकर्षित किया। मोनिका बेदी फिल्मों में तो कोई कमाल नहीं दिखा पाईं, लेकिन डॉन अब्दुल सलेम की माशूका के तौर पर उन्होंने भारत सरकार के नाक में जरूर दम कर दिया। उनकी यही कुख्याति ही कलर्स को अपने साथ जोड़ने के लिए उत्साहित किया। राजा चौधरी की भी ख्याति आए दिन पत्नी श्वेता तिवारी के साथ मारपीट करना और गली-मुहल्लों के गुंडों की तरह लड़ने-पिटने की रही है। कमाल राशिद खान की गालियां भला कौन भूल सकता है। सी ग्रेड की फिल्में बनाने वाले कमाल राशिद खान की भी नकारात्मक छवि ही रही है। पाकिस्तानी फिल्मों की बी ग्रेड की हीरोइन वीना मलिक न तो पाकिस्तानी सिनेमा की दुनिया में कुछ कर पाईं और न ही हिंदुस्तानी सिनेमा में दस्तक दे पाईं। लेकिन क्रिकेट मैचों की फिक्सिंग में अपने पूर्व प्रेमी पाकिस्तानी क्रिकेट खिलाड़ी मोहम्मद आसिफ के चलते चर्चा में जरूर आ गईं। खबर तो यह भी है कि मैच फिक्सिंग में सटोरियों और आसिफ के साथ रहकर उन्होंने पैसे कमाए और जब खुलासा हुआ तो आसिफ के खिलाफ खड़ी हो गईं। डाली बिंद्रा की गालियों को भला कौन भूल सकता है। अस्मित पटेल के बारे में कम ही लोग जानते हैं कि उनके दादा रजनी पटेल समाजवादी आंदोलन की मशहूर हस्ती थे। लेकिन बिग बॉस के पिछले सीजन में उन्होंने कैमरे के सामने वीना मलिक से साथ जो किया, उससे स्वर्ग में बैठी उनके दादा की आत्मा जरूर सोच में पड़ गई होगी। बिग बॉस में इतनी नकारात्मक छवियों वाले लोगों को शामिल किया जा चुका है कि मारिया सुसईराज को भी कलर्स से ऑफर मिलने पर लोगों को हैरत नहीं हुई। लेकिन यह पहला मौका है, जब फिल्म और टीवी शो के धंधे की नैतिकता पर सवाल उठाया गया। निश्चित तौर पर इसकी शुरूआत फिल्म निर्माता अशोक पंडित ने की। उनके साथ उस नीरज ग्रोवर के दोस्त भी शामिल हुए, जिसकी हत्या करके उसकी लाश को तीन सौ टुकड़ों में करके जलाने और फेंकने और इस दौरान मस्ती से शॉपिंग करने का मारिया सुसईराज पर आरोप हैं। अब मारिया सफाई दे रही है कि लाश को तीन सौ टुकड़ों में नहीं काटा गया था। ऐसी सफाई के जरिए वह जाहिर करे कि वह निर्दोष है, लेकिन यह कहते वक्त भी उसकी नैतिकता आड़े नहीं आती। मानो नीरज ग्रोवर कोई बकरा या मुर्गा था, जिसे तीन सौ या तीन टुकड़े में काटकर खाने वाले शौकीनों को बेचना था।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या मारिया जैसे लोगों को ऐसी शोहरत और पैसे देकर ग्लैमराइज किया जाना चाहिए। क्या इंसानी जान की कीमत कुछ नहीं होती। क्या समाज में अच्छे लोगों की कमी हो गई है कि मारिया या मोनिका बेदी जैसों पर ही भरोसा किया जा सकता है। सवाल तो यह भी है कि क्या टीवी शो और फिल्में बनाने वाले लोगों के घरों में मारिया जैसे चरित्र पैदा होंगे तो वे उन्हें समाज के सामने इसी तरह पेश करेंगे। क्या समाज में नैतिकता के लिए कोई जगह नहीं है। क्या ऐसे ही लोगों के जरिए पैसे कमाए जाएंगे। मारिया, मोनिका या ऐसी ही हस्तियों को अगर महिमामंडित किया जाएगा तो क्या गारंटी है कि कई दूसरे लोगों को ऐसे कदम उठाकर शोहरत हासिल करने की प्रेरणा नहीं मिलेगी।
मारिया को हीरोइन बनाने में हमारी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का भी कम हाथ नहीं है। मारिया की रिहाई की खबर को ग्लैमराइज तरीके से पेश किया गया। खबरों के बारे में आम धारणा है कि उन्हें निरपेक्ष तरीके से पेश किया जाना चाहिए। लेकिन जब कोई लिज हर्ले किसी शेन वार्न के साथ खुलेआम चुंबन लेती है या कोई मोनिका वेदी और मारिया सुसईराज जैसे गंभीर आरोपी जेल से छूटते हैं, कैमरे उनके पीछे भागते कैमरे निरपेक्ष रवैया अख्तियार नहीं कर पाते। ऐसी घटनाओं को वे ग्लैमर की चाशनी में पेश करते हैं। सवाल यह है कि यही कैमरे किसी पप्पू यादव, किसी शहाबुद्दीन या किसी मुख्तार अंसारी को कवर करते वक्त ग्लैमराइज तो नहीं होते। उन्हें राजनीति में तो तमाम बुराइयां नजर आती हैं, उसे लेकर घंटों हायतौबा भी मचाने में पीछे नहीं रहते। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि जब कोई मारिया या मोनिका रिहा होती है तो कैमरों की भाषा क्यों बदल जाती है। इस सवाल का जवाब ढूंढे़ बिना समाज में लगातार आ रही इस गिरावट और नकारात्मक शोहरत वाले लोगों को बढ़ावा देने की प्रवृत्ति पर रोक नहीं लग सकेगी।
मारिया को लेकर नीरज ग्रोवर के मुट्ठीभर दोस्तों ने जैसे ही सवाल उठाए, उनके पीछे समाज का एक तबका तो खड़ा नजर आ ही रहा है। अशोक पंडित और नीरज ग्रोवर के दोस्तों के साथ रजा मुराद और टीवी-फिल्म की दूसरी हस्तियों का उठ खड़ा होना दरअसल समाज के उस गुस्से की ही अभिव्यक्ति है, जो नकारात्मक छवियों वाले लोगों को ग्लैमर की चाशनी में पेश करने को लेकर जमा हो रही थी। संभवत: यह पहला मौका है, जब किसी नकारात्मक छवि के खिलाफ समाज का एक तबका उठ खडा़ हुआ है। अब देखना यह है कि ऐसी हस्तियों से निबटने के लिए इलेक्ट्रॉनिक मीडिया कब कदम उठाता है। लेकिन मारिया पर उठते सवालों से एक चीज तो तय है कि ऐसी नकारात्मक छवियों को ग्लैमर की चाशनी में पकाने की कोशिशों पर लगाम लगाने से पहले लोगों को सोचना पड़ेगा।

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