Friday, March 29, 2013

मुलायम की सियासी पैंतरेबाजी

उमेश चतुर्वेदी
कभी संघ परिवार की तरफ से मौलाना की उपाधि हासिल कर चुके मुलायम सिंह यादव क्या बदल गए हैं ? उत्तर भारत में कहा जाता है कि जीवन के चौथे पड़ाव में व्यक्ति की वैचारिकता में उदारता आने लगती है तो क्या मुलायम सिंह यादव के वैचारिक प्रभामंडल में भी वही बदलाव नजर आने लगा है...ये सवाल इसलिए इन दिनों पूछे जा रहे हैं...क्योंकि मुलायम सिंह यादव भारतीय जनता पार्टी के उस नेता की शान में सार्वजनिक कशीदे पढ़ने लगे हैं, जिसको 1990 में गिरफ्तार करने के उतावलेपन के हद तक वे जा पहुंचे थे। गुजरात के सोमनाथ से अयोध्या के लिए चली राम रथ यात्रा के सारथी लालकृष्ण आडवाणी के रथ को रोकने के लिए उन दिनों जनता दल के दो नेताओं में होड़ लग गई थी।
यह बात और है कि मुलायम के तमाम उतावलेपन के बावजूद आडवाणी को गिरफ्तार करने का मौका लालू यादव के हाथ ही लग गया था। लेकिन आडवाणी को गिरफ्तार ना कर पाने के बावजूद मुलायम को धर्मनिरपेक्षता का ऐसा अलंबरदार तक माना जाने लगा, जिसके नीचे भारतीय राजनीति की वामधारा को सुकून और उम्मीद दोनों नजर आने लगी थी। यह उम्मीद ही थी कि 1996 आते-आते मुलायम सिंह यादव तब की विपक्षी राजनीति के चाणक्य हरकिशन सिंह सुरजीत को प्रधानमंत्री पद के बेहतरीन दावेदार नजर आने लगे थे। उन्हें प्रधानमंत्री बनाने के लिए सुरजीत ने अभियान भी चलाया। चूंकि जनता दल उन दिनों कांग्रेस विरोधी खेमे में सबसे बड़ा दल था, लिहाजा मुलायम के हाथ सत्ता की बागडोर आते-आते रह गई। लेकिन अयोध्या में परिंदे को पर ना मारने देने के उनके ऐलान और भारतीय जनता पार्टी के कट्टरविरोध के चलते मुलायम धर्मनिरपेक्षता के नाम पर अल्पसंख्यक वोट बैंक की राजनीति करने वाले सबसे बड़े राजनीतिक ध्रुव के तौर पर जो उभरे तो कम से कम उत्तर प्रदेश में उनका सिक्का आज भी बरकरार है। ऐसे मुलायम सिंह यादव अगर आडवाणी के पक्ष में बोलने लगें और उनके हावभाव भारतीय जनता पार्टी को लेकर उदार होता नजर आए तो सवाल उठेंगे ही।
राजनीति की दुनिया में कहा जाता है कि वहां ना तो कोई स्थायी दुश्मन होता है और ना ही स्थायी दोस्त। वैसे भी 1963 में मुलायम सिंह यादव के राजनीतिक मसीहा डॉक्टर राममनोहर लोहिया ने जिस गैर कांग्रेसवाद को वैचारिक आधार दिया था, वह 1991 तक के आम चुनावों की मुख्य धुरी रहा। लेकिन अयोध्या को लेकर की गई आडवाणी की राम रथ यात्रा ने भारतीय राजनीति के वैचारिक आधार को गैरकांग्रेसवाद और कांग्रेसवाद की धुरी से बदल कर रख दिया। धर्मनिरपेक्ष और सांप्रदायिक आधार के वैचारिक ध्रुवों पर बहस हो सकती है। लेकिन तब से लेकर राजनीति इन्हीं दो खेमों में घूमती रही है। यही वजह है कि गैर कांग्रेसवाद के पुरोधा रहे वैचारिक आधार समाजवाद के बड़े सिपाही राष्ट्रीय जनता दल के लालू प्रसाद यादव, लोकजनशक्ति पार्टी के रामविलास पासवान और जनता दल एस के एचडी देवेगौड़ा कांग्रेस की सरकार के साथ खड़े हैं और उनके ही वैचारिक आधार के साथ 1967, 1977 और 1989 में सरकार बनाने और खड़े करने में साथ दे चुके लालकृष्ण आडवाणी आज राजनीति के दूसरे छोर पर खड़े हैं। ना सिर्फ दूसरे छोर पर हैं, बल्कि कम से कम धर्मनिरपेक्ष राजनीति के लिए अस्पृश्य बने हुए हैं।

फिर आखिर क्या वजह बन पड़ी कि गैर कांग्रेसवाद के जनक लोहिया के जन्मदिन पर अपनी ही सरकार को फटकारने के लिए मुलायम सिंह को अपने किसी पुरोधा साथी के बहाने की जगह आडवाणी का नाम लेना पड़ा। मुलायम को जानने वाले जानते हैं कि वे राजनीति के मंजे हुए खिलाड़ी हैं और उन्होंने अनजाने में आडवाणी का नाम नहीं लिया है। जिंदगी के शुरूआती दौर में पहलवान रहे मुलायम ने जो राजनीति धोबीपाट मारा है, उससे बीजेपी का निकल पाना आसान नजर नहीं आ रहा। भारतीय जनता पार्टी को मुलायम के इस बयान पर प्रतिक्रिया देते नहीं बन पा रहा है। 2014 में जीत हासिल करने की तैयारियों में जुटी भारतीय जनता पार्टी को अपनी नाव के सबसे बड़े खेवनहार नरेंद्र मोदी ही नजर आ रहे हैं। भारतीय जनता पार्टी भी मानती है कि जब तक उत्तर प्रदेश में वह 1996 या 1998 की तरह दमदार मौजूदगी दर्ज नहीं करा पाएगी, दिल्ली के तख्त पर पहुंचने का उसका सपना कमजोर ही रहेगा। इसलिए एक मांग अटल बिहारी वाजयेपी की लखनऊ सीट से नरेंद्र मोदी को उतारने की भी है। अगर ऐसा होता तो संभावना यह है कि मोदी को लेकर बहुसंख्यक वोटरों का ध्रुवीकरण हो। यहीं पर मुलायम के लिए खतरा नजर आ रहा है। उन्हें लगता है कि अगर मोदी यूपी के मैदान में उतरे तो तय है कि उनके खिलाफ अल्पसंख्यक वोटरों का ध्रुवीकरण होगा और इसका फायदा राहुल गांधी की अगुआई की तरफ बढ़ रही कांग्रेस को ही मिलेगा। निश्चित तौर पर इसका नुकसान मुलायम और उनकी समाजवादी पार्टी को होगा। 2014 में चालीस से पचास लोकसभा सांसदों के सहारे मैदान मारने की कोशिश में जुटे मुलायम को खतरा यहीं नजर आता है। राजनीतिक जानकार मान रहे हैं कि आडवाणी अगर प्रधानमंत्री पद की दौड़ में बने रहते हैं तो वैसा जोरदार मत ध्रुवीकरण नहीं होगा, जो मोदी के रहते वक्त तक होने की आशंका है।
दूसरी वजह यह भी है कि कांग्रेस के साथ खड़े होने के बावजूद हर बार मुलायम सिंह और उनकी पार्टी को डर के साये में जीना पड़ा है। राजनीति की दुनिया में माना भी जाता है कि आय से अधिक संपत्ति मामले में सीबीआई की भूमिका ने कांग्रेस को समर्थन देने के लिए मुलायम को मजबूर ज्यादा किया है। अखाड़े में कुश्ती खेलते वक्त पटखनी देने के आदी रहे मुलायम राजनीतिक अखाड़े में इस वजह से मात खाते रहे हैं। बेशक मुलायम सिंह यादव भारतीय जनता पार्टी के धुर विरोधी ध्रुव पर खड़े हों। लेकिन यह तय है कि उन्हें 2002 में उत्तर प्रदेश में सत्तासीन भारतीय जनता पार्टी ने ही कराया था। तब से मुलायम के मन में भारतीय जनता पार्टी को लेकर एक उदार कोना तो बना ही हुआ है। लेकिन इसका यह भी मतलब निकाल लेना कि वे भारतीय जनता पार्टी के साथ जा सकते हैं, गलत फहमी ही होगी। क्योंकि उनका जो भी आधार है, उसमें पिछड़ी जातियों, यादवों और मुसलमान वोटरों का सबसे बड़ी हिस्सेदारी है। गुजरात के अनुभवों को छोड़ दें तो अभी-भी आम अल्पसंख्यक वोटर भारतीय जनता पार्टी को लेकर सहज नहीं हो पाया है। इस लिहाज से देखें तो मुलायम सिंह आडवाणी की बड़ाई करके अपने इस वोट बैंक को ही बचाए रखने की जुगत में भिड़े हैं। लेकिन उनके आडवाणी समर्थन से सबसे ज्यादा निराशा कांग्रेस को हुई है। डीएमके की तरफ से समर्थन खिंच जाने के बाद यूपीए सरकार की उम्मीद मुलायम भी रहे हैं। शायद यही वजह है कि दिग्विजय सिंह मुलायम की इस पैंतरेबाजी को सत्ता के प्रेम से जोड़कर देख रहे हैं।

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