Wednesday, May 19, 2010

संजीदा और हाजिरजवाब राजनेता थे शेखावत


उमेश चतुर्वेदी
वह 2002 के जाड़ों की एक दोपहर थी...दिल्ली में शीतलहर अपने पूरे उफान पर थी। तब उपराष्ट्रपति भवन से इन पंक्तियों के लेखक को भी बुलावा आया था। दरअसल हमारे एक मित्र के पिता की किताब का विमोचन तब के उपराष्ट्रपति भैरो सिंह शेखावत के हाथों होना था। इस कार्यक्रम की अध्यक्षता अब के कांग्रेस सचिव मोहन प्रकाश को करनी थी। मोहन प्रकाश तब जनता दल यू के महासचिव पद से इस्तीफा देकर आराम कर रहे थे। इन पंक्तियों के लेखक के लिए ये दूसरा मौका था, जब बतौर उपराष्ट्रपति भैरो सिंह शेखावत से मिलना संभावित था। इसके पहले उपराष्ट्रपति बनते ही उनसे हैदराबाद हाउस में बतौर पत्रकार मुलाकात हो चुकी थी। लिहाजा थोड़ी असहजता भी थी। लेकिन प्रोटोकॉल की मर्यादा में बंधे शेखावत ने जब हॉल में प्रवेश किया, तब जाकर पता चला कि जनसंघ और भारतीय जनता पार्टी में होते हुए भी दूसरे राजनीतिक दलों में उनकी दोस्ताना पैठ क्यों थी। हॉल में आते ही उन्होंने सारा प्रोटोकॉल दरकिनार कर दिया और मोहन प्रकाश की ओर दौड़े- भाई मोहनदास कहां हो। वहां मौजूद लोगों को विश्वास ही नहीं हुआ कि देश का दूसरे नंबर का नागरिक इतनी उत्फुल्लता से लोगों से मिल सकता है। मोहन प्रकाश से उनकी मुलाकात बरसों बाद हो रही थी। मोहन प्रकाश भी अपने ऐसे स्वागत से भौंचक्क नजर आ रहे थे। महामहिम उपराष्ट्रपति ने उन्हें बाहों में जकड़ रखा था। संभलने के बाद मोहन प्रकाश ने उन्हें प्यारी सी चेतावनी दी- अगर आप नहीं मानेंगे तो मैं आपको भैरो बाबा फिर कहना शुरू कर दूंगा। लेकिन महामहिम पर कोई फर्क नहीं पड़ा। उन्होंने कहा कि इसी में अपनापा दिखता है।
संघ परिवार के नेता और कार्यकर्ताओं से ये उम्मीद की जाती है कि वे मर्यादा में बंधकर संभ्रांत व्यवहार करें। लेकिन भैरो सिंह शेखावत आम लोगों के नेता थे। संभ्रांतता उनके व्यक्तित्व पर हावी न हो जाय, इसका वे खास खयाल करते थे। उसी कार्यक्रम में उन्होंने बतौर मेजबान उन लोगों को मिठाई खुद ले जाकर खिलाने में हिचक नहीं दिखाई, जो उनकी मौजूदगी के संकोच में दबे जा रहे थे। प्रोटोकॉल को दरकिनार करके मेजबानी निभाने में भी उन्होंने कोई कसर नहीं रखी। उनका कहना था कि आम आदमी से प्रोटोकॉल के जरिए नहीं जुड़ा जा सकता। सार्वजनिक जिंदगी को लेकर उनका यह नजरिया ही था कि वे राजस्थान में पूर्ण बहुमत नहीं होने के बावजूद दो-दो बार सरकार सफलता पूर्वक चला सके। सार्वजनिक जीवन में रिश्तों को निभाने के उनके जज्बे को उपराष्ट्रपति के चुनाव में भी नजर आया, तब उन्हें राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के सदस्यों की तुलना में काफी ज्यादा वोट मिले।
राज्यसभा के सभापति के रूप में उन्होंने प्रश्नकाल को बाधित नहीं होने दिया। उनका मानना था कि जनता से जुड़े सवालों को प्रश्नकाल में उठाकर ही उनका समाधान हासिल किया जा सकता है और सरकार की जवाबदेही तय की जा सकती है। कई बार तो मंत्रियों को अपनी खास कार्यशैली से जवाब देने के लिए मजबूर भी कर देते थे। उपराष्ट्रपति बनने के बाद वे पूरी तरह से पूरे देश के हो गए थे, लेकिन राजस्थान की मरूभूमि से अपना लगाव उन्होंने कभी छुपाया भी नहीं। 2002 के मानसून सत्र में राजस्थान में भूख से मौतों का मसला संसद में छाया हुआ था। तब उन्होंने उस दौर के मंत्री को सदन में झाड़ पिलाने में भी देर नहीं लगाई थी। जिसकी अनुगूंज संसद के गलियारे में काफी दिनों तक सुनाई देती रही थी। भले ही ये संयोग हो, लेकिन शीर्ष भारतीय राजनीति के इस दौर में शीर्ष पर बैठे दोनों लोग- राष्ट्रपति अब्दुल कलाम और उपराष्ट्रपति भैरो सिंह शेखावत ने आम लोगों को लेकर अपने सरोकार को हर मुमकिन मौके पर जाहिर करने से नहीं झिझके।
राज्यसभा का कुशल संचालन और जनता से जुड़े सवालों के लिए सरकार को जवाबदेह बनाने का उनका जज्बा उन्हें देश के सर्वोच्च पद पर नहीं पहुंचा सका। दलीय राजनीति की सीमाओं में उनकी दोस्ती कोई सेंध नहीं लगा सकी। जिस समय राष्ट्रपति चुनाव का नतीजा आया, उसके बाद शेखावत कायदे से दो महीने तक उपराष्ट्रपति रह सकते थे। क्योंकि उनका कार्यकाल खत्म होने में इतना वक्त बाकी था। लेकिन नैतिकता के तकाजे ने जोर मारा और उन्होंने इस्तीफा दे दिया। बाद के दिनों में राजस्थान की स्थानीय राजनीति में उनकी सक्रियता पर सवाल भी उठे। लेकिन उनका कहना था कि राजस्थान की जनता के लिए वे जवाबदेह हैं, इसलिए वे सवाल उठाते रहेंगे। इस पर सवाल उनकी पुरानी भारतीय जनता पार्टी ने ही उठाए। लेकिन इसकी उन्होंने परवाह नहीं की। राज्यसभा में एक मौका ऐसा भी आया, जब वे सांसदों के सामने असहाय दिखे और उनकी बात मानने के लिए मजबूर भी हो गए और उसे निभाया भी। शेखावत जी को पान मसाला खाने की आदत थी। एक बार संसद में पान मसाले पर बहस हो रही थी। तब की स्वास्थ्य मंत्री और अब नेता प्रतिपक्ष सुषमा स्वराज ने उनकी इस आदत के खिलाफ प्रस्ताव रखा कि सभापति जी को अपने स्वास्थ्य का ध्यान रखते हुए पान मसाला खाना छोड़ना होगा। बेहद अनौपचारिक तौर पर हुई इस चर्चा में सभी दलों के सांसद शामिल हो गए थे।
अपनी हाजिर जवाबी के लिए भी वे मशहूर रहे। इसका दर्शन राज्यसभा की कार्यवाही के संचालन में दिखता था। वैसे दलीय राजनीति की सीमाएं और बाध्यताओं के चलते जनता से जुड़े मुद्दों और सवालों को लेकर आज चलताऊ रवैया अख्तियार किया जाने लगा है। लेकिन आम आदमी के उपराष्ट्रपति के तौर पर भैरोसिंह शेखावत ने हमेशा ऐसे मुद्दों को लेकर संजीदगी दिखाई। भविष्य में जब-जब दलीय राजनीति के साथ जनता से जुड़े मुद्दों को लेकर चिंताएं जताई जाएंगी, संजीदा और हाजिरजवाब शेखावत याद आते रहेंगे।

Friday, April 23, 2010

फिर कैसे हो गांवों में इलाज


उमेश चतुर्वेदी
मई की तपती लू और उसके थपेड़े पूर्वी उत्तर प्रदेश के गांवों में बीमारियों का सैलाब लेकर आते हैं। इस साल गरमी के रिकॉर्ड का भी पारा मौसमी आसमान पर तेजी से कुलांचे भर रहा है। ऐसे में इस इलाके में बुखार-दस्त और उल्टी की शिकायतें आनी शुरू हो गई है। लेकिन इस बार गांवों में ऐसे लोगों का इलाज होना मुश्किल है। कई जिलों के जिलाधिकारियों ने रजिस्टर्ड मेडिकल प्रैक्टिसनरों की प्रैक्टिस पर रोक लगा दी है। बलिया के जिला अधिकारी सैंथिल पांडियन ने तो उस बीएएमएस और एमबीबीएस डॉक्टरों को ग्लूकोज चढ़ाने तक पर रोक लगा दी है, जिन्होंने नर्सिंग होम के तहत अपने दवाखाने का रजिस्ट्रेशन नहीं करा रखा है। इसके चलते गांवों के मरीज बेहाल है। इलाके में इतने सरकारी अस्पताल नहीं हैं कि लोगों को आसानी से उनके ही गांवों के आसपास इलाज मुहैया कराया जा सके।
उत्तर प्रदेश में आरएमपी यानी रजिस्टर्ड मेडिकल प्रैक्टिसनरों के रजिस्ट्रेशन पर 1975 से ही रोक लगी हुई है। हालांकि बिहार और मध्य प्रदेश में अभी भी फार्मासिस्टों को बतौर मेडिकल प्रैक्टिसनर काम करने की छूट है और उनका बाकायदा रजिस्ट्रेशन भी हो रहा है। उत्तर प्रदेश में रोक की वजह है रजिस्ट्रेशन में धांधलियां, जिसके चलते मामूली झोलाछाप लोग भी आरएमपी बनकर डॉक्टर बन बैठे और उल्टे-सीधे इलाज और ऑपरेशनों के जरिए मरीजों की जान से खिलवाड़ करने लगे। हालांकि हमें ये नहीं भूलना चाहिए कि आरएमपी की सहूलियत आजादी के बाद लोगों को अपनी रिहायश के पास ही प्रशिक्षित ऐसे चिकित्सकों की सुविधा मुहैया कराना था, जो छोटे-मोटे रोगों का इलाज कर सकें। आजादी के बाद गांवों की कौन कहे, शहरों तक में योग्य और प्रशिक्षित डॉक्टरों का टोटा था। वैसे आजादी के तिरसठ साल बीतने के बाद भी पूरे देश के गांव अब भी जरूरत के मुताबिक डॉक्टरों की पहुंच से दूर हैं। जाहिर है कि ऐसे में गांव वालों के इलाज के लिए सबसे भरोसेमंद और नजदीकी स्रोत झोलाछाप के नाम से मशहूर ये आरएमपी ही हैं। लेकिन अब उत्तर प्रदेश के पूर्वी इलाकों में इन पर रोक लगती जा रही है। लिहाजा गांव वालों का पुरसा हाल जानने वालों की कमी होती जा रही है।
वैसे प्रशासन ने झोलाछाप कहे जाने वाले इन डॉक्टरों की प्रैक्टिस को काबू करने का फैसला इलाज में जिन डॉक्टरों और नर्सिंग होम की कोताही और लापरवाही के चलते लिया है, उन्हें ज्यादातर इन इलाकों में सफेदपोश और पढ़े-लिखे डॉक्टर ही चलाते रहे है। विश्व स्वास्थ्य संगठन खुद मानता है कि बीमारू यानी उत्तर भारत के हिंदी पट्टी वाले इलाके में इन दिनों नर्सिंग होम की बाढ़ आ गई है, जिनका एक मात्र काम है सीजेरियन डिलिवरी। डब्ल्यू एच ओ के मुताबिक इसके चलते उत्तर भारत में बिला वजह ऑपरेशन के जरिए बच्चों की जन्मदर बढ़ गई है। दरअसल कोई अंदरूनी खतरा बताकर ज्यादातर ऑपरेशन के जरिए बच्चे पैदा करा रहे हैं। ऑपरेशन से बच्चा पैदा करने के चलते रोगी को तीन-चार दिनों तक अस्पताल में रखने का मौका मिल जाता है। जबकि सामान्य प्रसव में जच्चा-बच्चा अगली सुबह ही घर जाने लायक हो जाता है। इन ऑपरेशनों के दौरान मौतों का सिलसिला भी बढ़ा है। कहां तक इन पर रोक लगती, इसकी कीमत आरएमपी डॉक्टरों को अपनी रोजी-रोटी के तौर पर चुकानी पड़ रही है। इसके साथ ही सस्ते में सुलभ इलाज पर भी लाले पड़ गए हैं। इसे लेकर इलाके केमिस्ट और ड्रगिस्ट एसोसिएशन भी परेशान हैं। उन्होंने उत्तर प्रदेश सरकार से मांग की है कि जिन लोगों का दवा के कारोबार या किसी डॉक्टर के पास कंपाउंडर के तौर पर दस साल का अनुभव है, उन्हें कम से कम गांवों में इलाज करने की सुविधा दी जाए। हालांकि प्रशासन और सरकार ने इस पर अभी तक कोई ध्यान नहीं दिया है।
जब तक गांवों तक डॉक्टरों की पहुंच सहज-सुलभ नहीं हो जाती, वहां के लोगों के सस्ते-सुलभ इलाज के इन साधनों यानी आरएमपी डॉक्टरों के महत्व को नकारना गलत होगा। साथ ही एक ऐसा मैकेनिज्म बनाया जाना चाहिए, जिससे कोई अनाड़ी हाथ डॉक्टर के भेष में मरीजों के स्वास्थ्य से खिलवाड़ नहीं कर सके। इसके साथ ही इन इलाकों में तेजी से कुकुरमुत्तों की तरह उग आए नर्सिंग होम पर तीखी नजर रखी जानी चाहिए। यहां यह भी ध्यान रखने की बात ये है कि ये नर्सिंग होम उन भ्रष्ट डॉक्टरों के हैं, जो बरसों तक राजनीतिक व्यवस्था के भ्रष्टाचार के चलते एक ही जगह तैनात रहे और अपनी निजी प्रैक्टिस चमकाते रहे।

Monday, March 29, 2010

ये आग कब रूकेगी


उमेश चतुर्वेदी

गरमी के मौसम ने जैसे ही दस्तक देनी शुरू की है, पूर्वी उत्तर प्रदेश और नजदीकी बिहार के गांवों से आग के तांडव की खबरें आने लगीं हैं। इन इलाकों में प्रकाशित होने वाले अखबारों के जिलों के पृष्ठ रोजाना इस तांडव के चलते बेघर हुए लोगों और मासूमों की मौत की खबरों से भरे पड़े हैं। कोलकाता के स्टीफन कोर्ट में लगी आग और उसमें मारे गए 27 लोगों की खबर ने देशभर के मीडिया की सुर्खियां बटोरी हैं। पश्चिम बंगाल सरकार से लेकर कोलकाता नगर निगम की लानत-मलामत का दौर अब भी देशभर के मीडिया में प्रमुख जगह बनाए हुए है, लेकिन इन इलाकों में रहने वाले लाखों लोगों की जिंदगी की दुश्वारियां सिर्फ जिले के पन्नों में सिमट गई हैं। अकेले बलिया से ही पिछले एक हफ्ते में आग के हादसे की पांच खबरें आईं हैं, जिनमें से कई मासूमों को भी अपनी जिंदगी की कीमत चुकानी पड़ी है।
आगलगी के इन हादसों की असल वजह समझने के लिए हमें इस इलाके के लोगों के जीवन स्तर और उनकी जिंदगी की दुश्वारियों को समझना जरूरी है। पूर्वी उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ -गाजीपुर-बलिया से पूरब, बिहार के मोतीहारी, आरा और छपरा की और जैसे – जैसे हम आगे बढ़ते हैं, छपरा नाम राशि वाले गांवों की पूरी की पूरी सीरीज ही शुरू हो जाती है। आचार्य हजारी प्रसाद द्विवेदी ने - मेरी जन्मभूमि - शीर्षक निबंध में छपरा नाम राशि वाले इन गांवों के नामकरण की चर्चा की है। उनके मुताबिक इन गांवों में ज्यादातर घर फूस और सरकंडे के छप्पर से बने होते हैं। छप्पर ही इनकी पहचान रहा है, इसीलिए इन गांवों के नाम के साथ छपरा यानी दलनछपरा, दूबे छपरा आदि पड़ गया है। नाम चाहे जितना भी सुंदर हो, गर्मियां आते ही इन गांवों की मुश्किलें बढ़ जाती हैं। बरसात आने तक छप्पर वाले इन गांवों की सुबह और शाम अंदेशे में ही गुजरती है। लेकिन बरसात ही इन्हें कहां मुक्त रहने देती है। बारिश आते ही गंगा और घाघरा का पानी अपने तटबंधों को पार कर उफान मारने लगता है और जैसे ही बस्तियों की ओर रूख करता है, उसका पहला शिकार कमजोर नींव वाले ये घर ही होते हैं।
लेकिन गर्मियां इन इलाकों के छप्पर वाले लोगों के लिए कहर बन कर आती हैं। बासंती नवरात्र के खत्म होते ही गेहूं और चने की फसल पकने लगती है। इसके साथ ही पछुआ हवा के तेज झोंके दिनभर चलने शुरू हो जाते हैं। चूंकि फसलें पकी होती हैं, लिहाजा इन्हीं दिनों कटाई का मौसम जोर पकड़ चुका होता है, लिहाजा छप्पर वाले घरों में सिर्फ बच्चे और बूढ़े ही रह जाते हैं। पुरूष और महिलाएं दिन भर खेतों में काम करने के लिए निकल जाते हैं। इसी दौरान कभी चूल्हे में शांत पड़ी चिन्गारी कभी छिटक कर छप्पर पर चली जाती है तो कई बार बच्चों की असावधानी और बचपने के चलते चिन्गारी छप्पर वाले घरों की छत या दीवार छू लेती है। ऐसी घटनाएं गंगा और घाघरा के किनारे छप्परों के समूहों वाले गांवों में रोजाना होती है। इन्हीं में से कई बार ये चिन्गारियां शोलों का रूप धारण कर लेती हैं। इसे तेजी से फैलाने में दिन में चलने वाली पछुआ हवा के तेज झोंके मदद करते हैं। और देखते ही देखते पूरी बस्ती की गृहस्थियां स्वाहा हो जाती हैं। अच्छे – खासे हंसते-खेलते परिवार सड़क पर आ जाते हैं।
कहना ना होगा कि सालों से चली आ रहा बदकिस्मती का कहर इस साल भी जारी है। हजारी प्रसाद द्विवेदी ने मेरी जन्मभूमि निबंध जब लिखा था, तब भारत को आजाद हुए सिर्फ बीस-बाइस साल ही हुए थे। तब तक इन छप्परों में सांस्कृतिक रसगंध महसूस होती थी। तब आगलगी की घटनाओं को बदकिस्मती मान कर किस्मत पर आंसू बहाया जा सकता था। लेकिन आज जमाना बाजार का है। केंद्र से लेकर राज्य सरकारों तक का दावा है कि पूरे देश में विकास हुआ है। लेकिन पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के गंगा, घाघरा, राप्ती और गंडक के किनारे वाले गांवों में विकास की ज्योति जिस तेजी से पहुंचनी चाहिए थी, अब तक नहीं पहुंच पाई है। पचास के दशक में संसद में गाजीपुर के सांसद विश्वनाथ गहमरी ने पूर्वी उत्तर प्रदेश की गरीबी का जो चित्र पेश किया था, उससे कहा जाता है कि नेहरू की आंखों में भी पानी भर आया था। लेकिन आजादी के बासठ साल बाद भी इस इलाके में विकास की वह धारा नहीं पहुंच पाई है, जिसका वह हकदार रहा है। लिहाजा आज भी यहां लोग छप्परों के घर में रहने को मजबूर हैं। बाढ़ में डूबने और गरमी में आग में जलने के लिए अभिशप्त हैं। साल-दर-साल यह विभीषिका दोहराई जाती है। लेकिन सरकारों के कानों पर जूं नहीं रेंग रही। चाहे उत्तर प्रदेश की सरकार हो या फिर बिहार की, फायरब्रिगेड की गाड़ियों का माकूल इंतजाम आज तक नहीं कर पाई है। इसके चलते लोग वे जानें भी सस्ते में चली जाती हैं, जिन्हें महज फायर ब्रिगेड की एक गाड़ी की सहायता से बचाया जा सकता था। बलिया में पिछले हफ्ते दो मासूमों को सिर्फ इसलिए नहीं बचाया जा सका, क्योंकि जिला मुख्यालय में महज कुछ किलोमीटर की दूरी पर होने वाले गांव में भी फायर ब्रिगेड का दस्ता घंटों बाद पहुंच पाया।
अव्वल तो होना यह चाहिए कि लोगों को फूस और सरकंडे के छप्पर वाले मकानों से इन इलाकों के लोगों को मुक्ति दिलाई जाती। अगर ऐसा नहीं हो सकता तो कम से कम गरमियों फायर ब्रिगेड का ऐसा इंतजाम तो किया जाता, ताकि लोगों की गाढ़ी मेहनत के साथ मासूम जिंदगियों के बेवक्त ही मौत के मुंह में जाने से रोका जा सके। लेकिन लाख टके का सवाल ये है कि गांधी, लोहिया और जयप्रकाश के साथ ही कांशीराम के नाम पर आम लोगों की भलाई का दावा करने वाले लोगों के कानों तक इन मासूमों की आह पहुंच पाती है या नहीं।

Wednesday, March 24, 2010

इसी दम पर आगे बढ़ेगा उत्तर प्रदेश



उमेश चतुर्वेदी

उत्तर प्रदेश में एक बार फिर बोर्ड परीक्षाओं का पुराना इतिहास दोहराया जा रहा है। राज्य के खासकर पूर्वी जिलों में प्रशासन के तमाम दावों के बावजूद नकलची छात्रों पर पूरी तरह नकेल नहीं लगाई जा सकी है। नकल माफिया के लिए मशहूर रहे बलिया, गाजीपुर और आजमगढ़ जिलों के अधिकारियों ने नकल रोकने के लिए कोर-कसर नहीं रखी है। इसके बावजूद नकल माफिया की पौ बारह है। राज्य के पश्चिमी जिलों के विद्यार्थियों का इस बार भी बड़ा रेला इन जिलों में महज एक अदद सर्टिफिकेट के लिए इम्तहान की औपचारिकताओं में जुट गया है। जाहिर है इससे नकल माफियाओं के चेहरी मुस्कान चौड़ी हुई है तो वहीं अपने सुनहरे भविष्य का ख्वाब बुनने में जुटे छात्रों की आंखों में सपने पूरी शिद्दत से तैर रहे हैं। ये दोहराना ना होगा कि इसकी वजह नकल ही बना है। सपनों और मुस्कान के कोलायडीस्कोप में स्थानीय लोगों की भी खुशियां शामिल हैं। लेकिन जो शिक्षा की अहमियत जानते हैं, उनके लिए शिक्षा का ये नाटक दर्द का सबब बन गया है।

चाहे लाख दावे किए जाएं, लेकिन ये सच है कि जब से परीक्षाओं की शुरूआत हुई है, कमोबेश नकल का चलन तब से ही है। लेकिन उत्तर प्रदेश की बोर्ड परीक्षाओं में नकल का जोर सत्तर के दशक बढ़ा और देखते ही देखते पूर्वी उत्तर प्रदेश में सामाजिक रसूख की वजह तक बन गया। जो जितने लोगों को नकल करा सके या कमजोर छात्रों की कापियां अपने दम पर नकल के सहारे लिखवा सके, उसका सामाजिक रूतबा उतना ही बढ़ने लगा। देखते ही देखते ये रोग राज्य के विश्वविद्यालयों तक में फैल गया। कभी पूरब का ऑक्सफोर्ड कहा जाने वाले इलाहाबाद विश्वविद्यालय भी इस रोग की गिरफ्त में आ गया। हालात इतने बिगड़े कि यहां पीएसी के संगीनों के साये के बीच परीक्षाएं होने लगीं। राज्य में कभी पॉलिटेक्निक शिक्षा के लिए मशहूर रहे इलाहाबाद के ही हंडिया पॉलिटेक्निक और चंदौली पॉलिटेक्निक में संगीनों के साये के बिना परीक्षाएं कराने का साहस प्रिंसिपल नहीं कर पाते थे। राज्यों के विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों के छात्रसंघों में वही छात्रनेता जीत हासिल करने के काबिल माने जाने लगे। किसी – किसी साल तो नकल के लिए पूर्वी जिलों में अराजकता का माहौल तक बन जाता था। और फिर तो यह परंपरा ही बन गई। इस परंपरा पर ब्रेक पहली बार 1991 में तब लगा, जब कल्याण सिंह की अगुआई में भारतीय जनता पार्टी की सरकार बनी। उस सरकार में बीजेपी के पूर्व अध्यक्ष राजनाथ सिंह थे। तब राजनाथ सिंह जब भी किसी कार्यक्रम में जाते और वहां अपने स्वागत में जुटे छात्रों को हिदायत देने से नहीं चूकते थे कि पढ़ाई करो, हम लोग नकल नहीं करने देंगे। पहली बार कायदे से राज्य की सत्ता में आई बीजेपी के सामने शायद तब आदर्श स्थिति लागू करने का मिशन था, लिहाजा उत्तर प्रदेश में बरसों बाद नकल विहीन परीक्षा हुई। इस दौरान पुलिस को भी परीक्षार्थियों पर कार्रवाई करने के अधिकार दे दिए गए थे। नकलची छात्रों को जेल भेजा गया। यहीं सरकार से चूक हो गई। और एक अच्छा प्रयास प्रशासनिक चूकों की बलि चढ़ गया। बाद में 1993 के विधानसभा चुनावों में मुलायम सिंह ने अपने घोषणा पत्र में ही छात्रों को परीक्षाओं के दौरान छूट देने का ऐलान किया। जिसका फायदा उन्हें मिला और सत्ता में आते ही उन्होंने राज्य बोर्ड की परीक्षाओं में खुली छूट दे दी। इससे युवा वर्ग खुश तो हुआ, नकल के आधार पर परीक्षाएं कराने को एक तरह से सामाजिक वैधानिकता भी मिली। इससे एक बार फिर अभिभावकों और छात्रों के चेहरे पर मुस्कान लौट आई। लेकिन इस मुस्कान के साथ ही उत्तर प्रदेश में एक बार फिर ज्ञान आधारित सामाजिक ढांचा बनाने के विचार को तिलांजलि दे दी गई। उसी का असर है कि अब नकल विहीन परीक्षाएं आयोजित कराने के लिए हर साल दावे तो किए जाते हैं, लेकिन वे महज कागजी बन कर रह जाते हैं। इसी का असर हुआ है कि पूर्वी जिलों में नकल माफिया ने पैर फैला लिए हैं। इसके चलते नकल माफियाओं की बन आयी है। ये माफिया पश्चिमी उत्तर प्रदेश और मध्य उत्तर प्रदेश के छात्रों को सर्टिफिकेट दिलाने का सौदा करते हैं। उनके गलत पतों के आधार पर फॉर्म भरे जाते हैं। इसके सहारे पूर्वी जिलों में परीक्षाओं के दिनों में बाकायदा अर्थव्यवस्था तक चलने लगती है। इसी बार इन पंक्तियों के लेखक को सीतापुर के ऐसे छात्र मिले, जिन्होंने बलिया से फॉर्म भरा था। उन्हें प्रवेश पत्र हासिल करने के एवज में नकल माफियाओं को पचास हजार रूपए तक देने पड़े हैं।

कहा जा रहा है कि इक्कीसवीं सदी ज्ञान और सूचना की सदी है। यानी आज के दौर में जिसके पास ज्ञान और सूचनाएं हैं, वही ताकतवर है। मानव विकास सूचकांक में उत्तर प्रदेश से उड़ीसा नीचे है। सूचना के दम पर वहां के युवाओं ने सिलिकॉन वैली से लेकर साइबराबाद और बेंगलुरू में परचम फहरा रखा है। लेकिन उत्तर प्रदेश ऐसी उपस्थिति दर्ज कराने में अब तक नाकाम रहा है। इसके अहम कारणों में एक वजह राज्य में नकल का संस्थागत होना भी है। दरअसल इन इलाकों में नकल सिर्फ प्रशासनिक समस्या नहीं है, बल्कि सामाजिक समस्या भी है। यहां के समाज में नकल करना और कराना नाक नीची होने की वजह नहीं है। अब तक नकल रोकने के जितनी भी कोशिशें हुईं हैं, वह सिर्फ प्रशासनिक ही रही हैं। सामाजिक स्तर पर इस बुराई को मिटाने की कभी कोशिश नहीं की गई। यही वजह है कि प्रशासनिक धमकी और डर के आगे कुछ वक्त तक नकल भले ही रूक जाती है, लेकिन यह चलन नहीं बन पाती। इसके ही चलते नकल माफियाओं की भी बन आती है।

एक बार मशहूर लेखक खुशवंत सिंह ने पूर्वी उत्तर प्रदेश और बिहार के हिंदी भाषी समाज पर व्यंग्य करते हुए लिखा था कि इन इलाकों से सबसे ज्यादा लोगों को कोलकाता, मुंबई और दिल्ली में चौकीदार, चपरासी और रसोइए का ही काम मिल पाता है, क्योंकि शिक्षा से उनका कोई गहरा रिश्ता नहीं होता। दरअसल खुशवंत सिंह इस लेख के जरिए पूर्वी उत्तर प्रदेश के समाज में शिक्षा को लेकर जो दृष्टि है, उस पर व्यंग्य कर रहे थे। कमोबेश यही स्थिति इन इलाकों से पढ़कर निकले ज्यादातर छात्रों की आज भी है। नकल के सहारे परीक्षाएं पास करके जब वे नौकरियों के बाजार में दूसरे इलाकों के छात्रों से प्रतियोगिता करने निकलते हैं तो पिछड़ना उनकी मजबूरी होती है। ऐसा नहीं कि उनमें प्रतिभाएं नहीं हैं। जब भी मौका मिलता है, वे अपनी प्रतिभा को साबित भी कर देते हैं। लेकिन शिक्षा का कमजोर आधार उन्हें पीछे कर देता है।

ऐसे में जरूरी ये है कि इन इलाकों में नकल का निदान सामाजिक बुराई के तौर पर किया जाय। नकल के खिलाफ इस इलाके के समाज को ही जगाना होगा। इसके जरिए सामाजिक नजरिए को भी बदला जाना होगा। अगर ऐसा हुआ तो यकीन मानिए, पूर्वी उत्तर प्रदेश के छात्र और नौजवान भी अपनी प्रतिभा के दम पर जिंदगी के तमाम क्षेत्रों में अपना परचम लहरा सकेंगे। लेकिन लाख टके का सवाल ये है कि सामाजिक बुराई के खिलाफ खड़ा होने की शुरूआत करने के लिए कोई तैयार है भी या नहीं.....।

Sunday, March 21, 2010

शैक्षिक गुणवत्ता सुधार पाएंगे विदेशी विश्वविद्यालय !


उमेश चतुर्वेदी
राजनीति जैसे-जैसे ऊंची मुकाम हासिल करती जाती है, वह संकेतों में बात करने लगती है। सीधी-सपाट बयानबाजी राजनीति में उपयोगी और सहज नहीं मानी जाती। वही राजनेता ज्यादा कामयाब माना जाता है, जो संकेतों में ही अपनी बात कहने में महारत हासिल कर चुका होता है। इन अर्थों में देखा जाय तो केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल भी सफल राजनेता हैं। इसी साल 19 जनवरी को जब वह देश के 44 डीम्ड विश्वविद्यालयों के दर्जे को खत्म किए जाने के फैसले का ऐलान कर रहे थे, तब उनका मकसद साफ था। यह बात और है कि शिक्षा व्यवस्था में निजीकरण के बाद आ रही गिरावट से चिंतित एक तबके को यह फैसला हालात को सकारात्मक बनाता नजर आ रहा था। यही वजह है कि उस वक्त कपिल सिब्बल के फैसले पर सवालों के घेरे में आए डीम्ड विश्वविद्यालयों के कर्ता-धर्ताओं के अलावा किसी ने हो हल्ला नहीं मचाया।
लेकिन उन्होंने उसी दिन एक संकेत जरूर दे दिया था। 15 मार्च को विदेशी विश्वविद्यालयों के लिए देश के दरवाजे खोलने के कैबिनेट के फैसले के बाद साबित हो गया कि दरअसल डीम्ड यूनिवर्सिटी पर सवाल क्यों उठाए गए। उदारीकरण के दौर में आह अमेरिका और वाह अमेरिका करने वाली पीढ़ी के लिए कैबिनेट का यह फैसला एक तरह से घर बैठे स्वर्ग में पहुंचने जैसा लग रहा है। इसी वजह से इस फैसले का भी स्वागत हो रहा है।
भारतीय राजनीति को संकेतों में बात करने के साथ-साथ एक और काम में भी महारत हासिल है। पहले वह समस्याएं खड़ी करती है और फिर उसका समाधान करने लगती है। इस प्रक्रिया में एक दौर ऐसा भी आता है कि उसे तार्किक समाधान नहीं सूझता तो उसके लिए विदेशों की ओर देखने लगती है। यह सब कुछ जनता के नाम पर होता है। विदेशी विश्वविद्यालयों के लिए राह खोलने का भी मसला कुछ ऐसा ही है। पहले आनन-फानन में डीम्ड विश्वविद्यालयों को मंजूरी दी गई। उसके बाद उनकी मान्यता रद्द करने की कोशिश तेज कर दी गई। सवाल ये है कि जब तक अपने विश्वविद्यालयों पर सवाल नहीं उठाया जाएगा तो क्वालिटी के नाम पर विदेशी विश्वविद्यालयों को लाने की वजह कैसे तैयार की जाती। कहना ना होगा कि जिस तरह पहले डीम्ड विश्वविद्यालयों पर सवाल उठाया गया और फिर विदेशी विश्वविद्यालयों को देश में कैंपस खोलने की अनुमति देने वाले विधेयक को मंजूरी दी गई, उस पर संदेह होना स्वाभाविक है। दोनों फैसलों से साफ है कि सरकार को भी भारतीय युवाओं को क्वालिटी वाली उच्च शिक्षा विदेशी विश्वविद्यालयों में ही नजर आ रही है। इसका यह भी मतलब नहीं है कि वे सभी डीम्ड विश्वविद्यालय दूध के धुले ही हैं, जिन पर सवाल उठाया गया है। टंडन समिति ने कहा है कि ये पारिवारिक बिजनेस के तौर पर चलाए जा रहे हैं। लेकिन हकीकत तो यह है कि कुछ विश्वविद्यालय दुकानों की तरह व्यवहार कर रहे हैं। अपनी चमकीली बिल्डिंग और आकर्षक ब्रोशर और चिकनी-चुपड़ी मार्केटिंग के जरिए छात्रों को आकर्षित करते हैं। एक बार जब छात्र उनके यहां प्रवेश ले लेता है तो पता चलता है कि पढ़ाई के नाम पर हकीकत में उससे ठगी हुई है। इसके बाद वह छटपटाने और इस छटपटाहट के लिए भारी फीस चुकाने के लिए मजबूर हो जाता है। यही वजह है कि जब डीम्ड यूनिवर्सिटी पर कपिल सिब्बल ने सवाल उठाए थे तो उसका स्वागत हुआ था। तब ये उम्मीद भी जताई जा रही थी कि उनके यहां पढ़ रहे छात्रों की समस्याओं का ध्यान रखा जाएगा।
विदेशी विश्वविद्यालयों को देश में लाने का स्वागत हो रहा है तो उसके पीछे भी कुछ यही तर्क है। अपने देश में तकरीबन 12 फीसदी युवा ही उच्च शिक्षा हासिल कर पाते हैं। देश के पास इतने विश्वविद्यालय नहीं हैं कि बाकी छात्रों को पढ़ा सकें। विदेशी विश्वविद्यालयों की राह खोलने के पीछे सरकार का तर्क है कि इससे भारतीय छात्रों को आसानी से उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा देश की ही धरती पर मिल सकेगी। लेकिन सवाल यह है कि भारत में विदेशी विश्वविद्यालयों को रेगुलेट करने वाले उसी यूजीसी के ही वही अधिकारी ही होंगे, जिन्होंने गुणवत्तारहित संस्थानों को डीम्ड यूनिवर्सिटी का दर्जा देने में देर नहीं लगाई। ऐसे में क्या गारंटी होगी कि विदेशी विद्यालयों के भारतीय कैंपस के साथ ऐसा नहीं होगा।
आह अमेरिका और वाह अमेरिका की रट लगाने वाली आज की पीढ़ी के बड़े हिस्से का सबसे महत्वपूर्ण सपना विदेश में पढ़ाई और नौकरी हो गई है। इसलिए उसे विदेशी विश्वविद्यालय भी खूब लुभाते हैं। हम अपने बेहतर संस्थानों को तो भूल जाते हैं, लेकिन विदेशी धरती का अदना सा संस्थान भी हमें बेहतर नजर आता है। लेकिन हकीकत यही नहीं है। विदेशी विश्वविद्यालय का मतलब येल यूनिवर्सिटी, कैंब्रिज. ऑक्सफोर्ड और हार्वर्ड ही नहीं होता। वहां भी बी और सी ग्रेड के विश्वविद्यालय हैं। वे अपनी धरती पर ही भारतीय छात्रों को भारतीय डीम्ड विश्वविद्यालयों की तरह ठग रहे हैं। ऑस्ट्रेलिया में हाल के दिनों में हुए भारतीय छात्रों की हत्या और उन पर हमलों के बाद सामने आया कि वहां भी बी और सी ग्रे़ड के ढेरों विश्वविद्यालय हैं और वे छात्रों को ठग रहे हैं। जाहिर है कि विदेशी विश्वविद्यालय विधेयक पास होने के बाद ज्यादातर बी और सीग्रेड के ही विश्वविद्यालय भारत में अपना कैंपस खोलेंगे। इस खबर के आने के तुरंत बाद येल यूनिवर्सिटी के असिस्टेंट सेक्रेटरी फॉर इंटरनेशनल अफेयर्स जॉर्ज जोसेफ ने साफ कर दिया कि उनका विश्वविद्यालय भारत में फिलहाल कोई कैम्पस तैयार करने की किसी योजना पर काम नहीं कर रहा है। उन्होंने साफ कर दिया कि उनका विश्वविद्यालय दूसरे संस्थानों के साथ साझेदारी और गठबंधन पर ध्यान देगा। पिछले साल भारत दौरे पर आए इसी यूनिवसिर्टी के प्रेसिडेंट रिचर्ड सी लेविन ने संकेत दिया था कि उनका विश्वविद्यालय निकट भविष्य में भारत में कैम्पस बनाने पर गौर नहीं कर रहा है। हार्वर्ड और कॉर्नेल यूनिवर्सिटी की ओर से भी इसी तरह की राय देखने में आई थी।


इसी तरह के विचार कुछ और विश्वविद्यालयों ने भी जाहिर किए हैं। कैंब्रिज, ऑक्सफोर्ड और इंपीरियल कॉलेज लंदन ने साफ कहा है कि उनके यहां अभी तक भारत में अपने संस्थान खोलने का विचार भी नहीं किया है। हालांकि कनाडा के कुछ विश्वविद्यालयों ने भारत में अपने कैंपस खोलने की योजना में दिलचस्पी जरूर दिखाई है। विदेशी विश्वविद्यालयों की इस घोषणा के बाद जाहिर है कि दुनिया में अपनी गुणवत्ता वाली शिक्षा का डंका बजा चुके विश्वविद्यालयों का भारत आने का फिलहाल इरादा नहीं है। साफ है कि इस विधेयक के पारित होने के बाद भले ही भारतीय छात्रों को उच्च शिक्षा के सामने विदेशी विश्वविद्यालयों का विकल्प भले ही खुल जाए, वैश्विक शैक्षिक स्तर हासिल कर पाना आसान नहीं होगा। लेकिन एक चीज जरूर होगी। अभी मौजूद डीम्ड विश्वविद्यालय और दूसरे तरह के संस्थान विदेशी संस्थानों से गठबंधन जरूर करेंगे। येल यूनिवर्सिटी के
जोसफ का बयान ही इसी परिपाटी के स्थापित होने का संकेत देता है। उनके मुताबिक कई निजी विश्वविद्यालयों को भारतीय बाजार आमदनी का बड़ा स्त्रोत नजर आ रहा है। वे छात्र-छात्राओं को आकर्षित करना चाहते हैं, लिहाजा वे यहां यूनिट स्थापित करने में दिलचस्पी जरूर दिखाएंगे। विदेशी टैग लगना भारत में कमाई और गुणवत्ता की महत्वपूर्ण निशानी माना जाता है। जाहिर है कि ऐसा होने के बाद भारतीय विश्वविद्यालयों के पास पैसा बहुत हो जाएगा। उनकी फीस और महंगी हो जाएगी। और यह सब गुणवत्ता की किसी ठोस गारंटी के बिना होगा। जाहिर है, इसके बाद औसत आमदनी वाले छात्रों की पहुंच से शिक्षा दूर हो जाएगी। इनसे साथ ही पैसा आधारित शिक्षा की एक नई संस्कृति जन्म लेगी। शैक्षिक स्तर पर आज भी कम असमानता नहीं है। विदेशी विश्वविद्यालयों के आने के बाद यह और बढ़ेगा।
यही वजह है कि 2007 में वामपंथी दलों ने इस विधेयक का जोरदार विरोध किया था। तब के मानव संसाधन विकास मंत्री अर्जुन सिंह ने भी इस विधेयक का मसौदा तैयार कराया था। लेकिन वामपंथी समर्थन की सीढ़ी के सहार खड़ी यूपीए सरकार अपने मकसद में कामयाब नहीं हो पाई। इन्हीं कारणों से खुद सरकार को भी आशंका है कि अगर संसद में ये विधेयक पेश किया गया तो बहुजन समाज पार्टी, समाजवादी पार्टी, जनता दल-यू भी विरोध करेंगे। उदारीकरण की समर्थक भारतीय जनता पार्टी ने अभी तक विधेयक के समर्थन का वादा नहीं किया है। साफ है कि सरकार के लिए इस विधेयक को पारित कराना आसान नहीं होगा।
मानव संसाधन विकास मंत्री कपिल सिब्बल को लगता है कि अगर ये विधेयक पारित हो गया तो टेलीकॉम सेक्टर में हो रहे बदलावों से भी बड़ी क्रांति हमारा इंतजार कर रही है। उनकी बात सही हो सकती है। क्रांति तो होगी ही, महंगाई की मार रो रहे निम्न मध्यवर्गीय परिवारों के बच्चों की पहुंच से उच्च शिक्षा दूर होती जाएगी। तब युवा पीढ़ी के बीच सोच और शिक्षा के स्तर पर भारी असमानता होगी। जो निश्चित तौर पर देश के मानसिक स्वास्थ्य के लिए अच्छा नहीं होगा। बेहतर हो कि कपिल सिब्बल और उनका मंत्रालय इस दिशा में भी सोच कर कुछ एहतिहाती कदम उठाने की तैयारी करे। तभी समानता की धरती पर सचमुच कोई शैक्षिक क्रांति हो सकेगी।

Friday, March 5, 2010

पूर्वांचल वाले अमर भईया


उमेश चतुर्वेदी
पूर्वी उत्तर प्रदेश को अलग करके पूर्वांचल राज्य बनाने की मांग यूं तो काफी पुरानी है। जब पिछले दिनों तेलंगाना राज्य बनाने को लेकर चल रहा आंदोलन तेज हुआ तो उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री मायावती भी पूर्वांचल को अलग बनाने की मांग करने वालों में शामिल हो गईं। दिलचस्प बात ये है कि सिर्फ दो महीने पहले तक उत्तर प्रदेश के बंटवारे का विरोध करने वाले अमर सिंह को भी पूर्वांचल राज्य में ही पूर्वी उत्तर प्रदेश का भविष्य नजर आने लगा है। इस मांग को जोरदार तरीके से उठाने के नाम पर उन्होंने अपने गृह जिले आजमगढ़ में 26 फरवरी को बाकायदा स्वाभिमान रैली का आयोजन भी कर डाला।
हालांकि राजनीतिक जानकारों का मानना है कि अमर सिंह को पूर्वी उत्तर प्रदेश की बदहाली ने उतना प्रभावित नहीं किया है, जितना वे अपनी राजनीतिक जमीन तैयार करने के लिए परेशान हैं। स्वाभिमान रैली का असल मकसद यही था। अमर सिंह को लगता है कि पूर्वी उत्तर प्रदेश में पूर्वांचल राज्य के नाम पर जनसमर्थन जुटाया जा सकता है। इसीलिए वे जोरशोर से पूर्वी उत्तर प्रदेश की हर सभाओं में इस मांग को उठा रहे हैं।
लेकिन जिन्हें पूर्वी उत्तर प्रदेश की मिट्टी की पहचान है, उन्हें पता है कि पूर्वांचल राज्य को लेकर नया आंदोलन यहां खड़ा करना आसान नहीं है। अलग तेलंगाना आंदोलन जब तेज हो रहा था, तब बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमान ने पूर्वी उत्तर प्रदेश को बिहार से जोड़कर नया राज्य बनाने का सुझाव ही दे डाला था। ये सुझाव भले ही लोगों को नया और लीक से अलग नजर आ रहा हो, लेकिन हकीकत ये है कि ऐसी मांग पिछली सदी के आखिरी दिनों में उनके ही पूर्ववर्ती लालू प्रसाद यादव कर चुके हैं। एनटी रामाराव के भारत देशम की तर्ज पर उन्होंने भोजपुरी देशम की मांग रखी थी। लालू यादव ने जिस समय ये मांग रखी थी, उस समय वे अपनी लोकप्रियता के चरम पर थे। राजनीतिक पंडित जनता के रूख को मोड़ने की किसी नेता की ताकत का अंदाजा उसकी लोकप्रियता के जरिए ही आंकते रहे हैं। इस आधार पर भोजपुरी देशम राज्य की मांग अब तक पूरे शवाब पर होती। लेकिन पूर्वांचल का भोजपुरी भाषी समाज भले ही किसी और मसले पर अपने नेता के पीछे चलने लगता हो, लेकिन राज्य और राष्ट्र के मसले पर वह दूसरे इलाके के लोगों की तरह भेड़चाल में शामिल नहीं हो सकता। शायद यही वजह है कि अब तक ना तो अलग पूर्वांचल राज्य की मांग सिरे से परवान चढ़ पाई है, ना ही भोजपुरी देशम का सपना कायदे से खड़ा होता दिख रहा है।
पूर्वांचल के लोगों की इस मानसिकता को वहां के राजनेता भी अच्छी तरह समझते रहे हैं। इसी मिट्टी से निकले चंद्रशेखर खुलेआम मानते रहे कि विकास के दम पर राजनीति नहीं की जा सकती। जिस बलिया की जनता की नुमाइंदगी करते हुए चंद्रशेखर प्रधानमंत्री की कुर्सी तक पहुंचे, वहां आज भी सड़कों के बीच गड्ढा या गड्ढे के बीच सड़क खोजी जा सकती है। लेकिन वहां की जनता को इस बात का मलाल नहीं रहा कि उसका विकास देश के दूसरे वीआईपी नेताओं के चुनाव क्षेत्रों का क्यों नहीं हुआ। बलिया के लोग इसी तथ्य से गर्व भरे संतोष का अनुभव करते रहे हैं कि वे जिस नेता को संसद की दहलीज तक पहुंचाते रहे हैं, उसकी आवाज अंतरराष्ट्रीय मंचों तक सुनी जाती रही है। बदहाली और विकास की किरणों से उत्तर प्रदेश के दूसरे इलाकों से मीलों पीछे स्थित इस इलाके के लोगों की मानसिकता अब तक बदल नहीं पाई है। शायद मायावती भी इस तथ्य को समझ रही हैं, यही वजह है कि उन्होंने पूर्वांचल को अलग करके नया राज्य बनाने के लिए केंद्र सरकार को चिट्ठी लिखने में देर नहीं लगाई।
पूरी दुनिया में अलग राष्ट्र या अलग राज्य बनाने की मांग के पीछे स्थानीय अस्मिताओं की राजनीतिक और जातीय पहचान बचाए रखना सबसे बड़ा कारण माना जा रहा है। विकास और स्थानीय हाथों में राजनीतिक सत्ता को बनाए रखना दूसरा बड़ा कारण है। इन अर्थों में देखा जाय तो पूर्वी उत्तर प्रदेश को काटकर अलग राज्य बनाए जाने की मांग को जनता का व्यापक समर्थन मिलना चाहिए था। एक दौर में पूर्वी उत्तर प्रदेश के कद्दावर नेता और राज्य के पूर्व वित्त मंत्री मधुकर दिघे ने भी इस इलाके को अलग राज्य बनाने की मांग रखी थी। पूर्वी उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी के रसूखदार नेता रहे शतरूद्र प्रकाश और भदोही से भारतीय जनता पार्टी के सांसद रहे वीरेंद्र सिंह मस्त भी अलग पूर्वांचल राज्य बनाने की मांग संसद से लेकर सड़क तक उठा चुके हैं। लेकिन जनता का उन्हें साथ नहीं मिल पाया। यहां की जनता विकास की बजाय इसी बात से गर्वान्वित होती रही कि उसने पंडित जवाहर लाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री, इंदिरा गांधी, राजीव गांधी, विश्वनाथ प्रताप सिंह और चंद्रशेखर जैसे प्रधानमंत्रियों को जन्म दिया।
छोटे राज्यों की मांग के पीछे स्थानीय समुदाय और सियासत के हाथ सत्ता की ताकत हासिल करना भी रहा है। ताकि स्थानीय स्तर पर विकास की नदी की धार बहाई जा सके। इस आधार पर देखें तो छह प्रधानमंत्रियों वाले इस इलाके का नक्शा देश के दूसरे इलाकों से ज्यादा चमकदार होना चाहिए था। लेकिन ऐसा नहीं हो पाया।
सच तो ये है कि विकास की दौड़ में यह राज्य आज भी दूसरे विकसित राज्यों की कौन कहे, पश्चिमी और मध्य प्रदेश की तुलना में ही कोसों पीछे है। राष्ट्रीय नमूना सवेँ के 61वें दौर के सर्वेक्षण के मुताबिक पूर्वांचल के ग्रामीण इलाकों में 56.5 प्रतिशत और शहर में 54.8 प्रतिशत आबादी गरीबी रेखा के नीचे गुजर बसर कर रही है। 1999-2000 में अकेले पूर्वी उत्तर प्रदेश की 35.6 प्रतिशत आबादी गरीबी रेखा से नीचे थी, जबकि पूरे उत्तर प्रदेश में गरीबी का औसत 31 प्रतिशत था। नियोजन विभाग की अध्ययन रिपोर्ट में पाया गया कि प्रदेश के सबसे कम विकसित 14 जिलों में 11 पूर्वी उप्र के हैं और दो बुंदेलखंड के। खुद योजना आयोग की उत्तर प्रदेश विकास रिपोर्ट ही मानती है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश की तुलना में पूर्वी उत्तर प्रदेश में निवेश भी कम हो रहा है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जहां 66.8 प्रतिशत निवेश हुआ है तो पूर्वी उत्तर प्रदेश में महज साढ़े सत्रह फीसदी ही निवेश हुआ। आज बिजली विकास का पैमाना बन गई है। लेकिन खुद राज्य के ही नियोजन विभाग के मुताबिक ग्रामीण विद्युतीकरण के मसले में भी पूर्वी उत्तर प्रदेश सिर्फ बुंदेलखंड इलाके से ही आगे है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के जहां 88.81 प्रतिशत गांवों में बिजली पहुंच गई है, वहीं पूर्वी उत्तर प्रदेश के 76.78 प्रतिशत गांवों को ही बिजली नसीब हो पाई है। नियोजन विभाग ने अपने प्रमुख पैमाने पर राज्य की प्रति व्यक्ति आय का जो आंकड़ा दिया है, उसमें भी उत्तर प्रदेश काफी पीछे है। इसके मुताबिक पश्चिमी उत्तर प्रदेश में प्रति व्यक्ति आय जहां 17083 रुपए है, वहीं पूर्वांचल के लोगों की प्रति व्यक्ति आय 9499 रुपए है। कुल सिंचित भूमि के हिसाब से भी पूर्वी उत्तर प्रदेश बाकी इलाकों से पीछे है। पश्चिमी इलाके में जहां 62 फीसदी भूमि सिंचित है, वहीं पूर्वी उत्तर प्रदेश में ये आंकड़ा महज चालीस फीसद ही है। राज्य नियोजन विभाग की वार्षिक उद्योग सर्वेक्षण रिपोर्ट के अनुसार औद्योगिक विकास में भी पश्चिमी उप्र का पलड़ा अन्य क्षेत्रों से काफी भारी है। राज्य नियोजन विभाग की वार्षिक उद्योग सर्वेक्षण रिपोर्ट के अनुसार वर्ष 2004-05 में जहां पश्चिमी उप्र में पंजीकृत कारखानों की अनुमानित संख्या 7265 थी, वहीं मध्य उप्र में यह 2245, पूर्वी उप्र में 1379 और बुंदेलखंड में महज 159 थी। और तो और साक्षरता के मसले पर भी पश्चिमी उत्तर प्रदेश राज्य के दूसरे इलाकों से पीछे ही है। पूर्वांचल के जहां 55.22 प्रतिशत लोग साक्षर हैं, वहीं पश्चिमी उत्तर प्रदेश के 58.44 प्रतिशत लोग साक्षर है। इस मामले में बुंदेलखंड दूसरे इलाकों से आगे है, जहां के करीब 60.32 प्रतिशत लोग साक्षर हैं। शिक्षा भले ही आज विकास का सबसे बड़ा पैमाना माना जा रहा हो। लेकिन प्रति लाख जनसंख्या पर प्राथमिक विद्यालयों की संख्या के लिहाज से भी पूर्वी उत्तर प्रदेश राज्य के दूसरे क्षेत्रों से पीछे है। सबसे ज्यादा प्राथमिक स्कूल 104 प्रतिलाख बुंदेलखंड में हैं। ऐसा इसलिए संभव हो पाया है, क्योंकि इस इलाके का जनसंख्या घनत्व राज्य के दूसरे इलाकों की तुलना में बेहद कम है। वहीं पश्चिमी उत्तर प्रदेश में प्रति लाख जनसंख्या पर 79 स्कूल हैं तो पूर्वी उत्तर प्रदेश में ये आंकड़ा महज 68 है। यही हालत अस्पतालों और उनमें मौजूद बिस्तरों की भी है।
आंकड़ों का आधार गवाह है कि उत्तर प्रदेश में बुंदेलखंड से पूर्वी उत्तर प्रदेश की थोड़ी बेहतर स्थिति है। लोगों को पता है कि उनके यहां बिजली नहीं आने वाली, सड़कों में गड्ढे ढूंढ़ने की उनकी अनवरत यात्रा जारी रहेगी। इन दुश्वारियों को झेलने के बावजूद अगर यहां अलग राज्य की मांग सिरे से परवान चढ़ती नजर नहीं आ रही तो इसकी एक बड़ी वजह ये है कि यहां के लोग राष्ट्रीयताबोध से बेहद ओतप्रोत हैं।
1962 में गाजीपुर के तत्कालीन सांसद विश्वनाथ गहमरी ने जब इस इलाके की गरीबी की दास्तान सुनाते हुए लोकसभा को बताया था कि यहां के गरीब लोग गोबर से अनाज का दाना निकाल कर खाने को मजबूर हैं, तो नेहरू की ऑंखें भी छलछला उठी थीं। इस घटना को बीते भी पांचवा दशक होने को है। अब लोग बेशक गोबर से दाना निकाल कर नहीं खा रहे, लेकिन यहां की ज्यादातर आबादी की हालत में खास बदलाव नहीं आया है। ऐसे हालात में भी मायावती के सुझाव के बावजूद अलग राज्य की मांग को लेकर कोई खास सुगबुगाहट नजर नहीं आ रही है।
(यह लेख दैनिक जागरण के राष्ट्रीय संस्करण में प्रकाशित हो चुका है।)

Saturday, February 13, 2010

अब नहीं जलती लालटेन

उमेश चतुर्वेदी
हम जैसे – जैसे एक उम्र की सीमा को पार करने लगते हैं, अपने पुराने दिन, घर-परिवार की बातें और स्कूल की शरारतें याद आने लगती हैं। भले ही किसी की उम्र ज्यादा क्यों न हो गई हो, उसकी मौत उसके साथ बिताए दिनों की बेसाख्ता याद दिलाने लगती है। अपने मिडिल स्कूल के एक गुरूजी की मौत के बाद मुझे जितनी उनकी याद आई, उसके साथ ही उनकी छड़ी की सोहबत में गुजारे स्कूली दिन भी स्मृतियों में ताजा हो गए। यही वजह रही कि इस बार गांव जाने के बाद मैं अपने मिडिल स्कूल जा पहुंचा। स्कूल की बिल्डिंग वैसी ही खड़ी है, जैसी शायद पिछली सदी के चालीस के दशक में खड़ी थी। लेकिन चालीस के दशक से ही चलती रही एक परंपरा ने यहां भी अपना दम तोड़ दिया है।
दरअसल तब आठवीं का इम्तहान भी बोर्ड के तहत देना होता था। हमारे स्कूल की चूंकि पढ़ाई की दुनिया में बरसों पुरानी साख थी, लिहाजा इस साख को बचाए रखने के लिए हमारे गुरूजी लोग जाड़े का दिन आते ही स्कूल में ही छात्रों के बिस्तर लगवा देते। इसके लिए धान की पुआल दो कमरों में डालकर उस पर दरी बिछा दी जाती। ये इंतजाम स्कूल की तरफ से ही होता था। फिर उस पर अपने घरों से ओढ़ना-बिछौना लाकर आठवीं के छात्र डाल देते। सिरहाने उनकी पूरी किताबें और नोटबुक होती। तब स्कूल में बिजली नहीं थी, लिहाजा सबको अपने लिए लालटेन भी लानी होती थी। दीपावली बाद से लेकर मार्च – अप्रैल में इम्तहान होने तक सभी छात्र को सिर्फ दिन में एक बार घर जाने की अनुमति होती थी। यह मौका शाम की छुट्टियों के बाद ही आता। घर जाकर सभी लोग खाना खाते, कपड़े बदलते और रात के खाने के साथ ही देसी फास्टफूड की पोटली लेकर आते थे। दिन में कक्षाओं में पढ़ाई होती और रात में गुरूजी लोग के निर्देशन में लालटेन की रोशनी में पढ़ाई होती। छात्रों का रिजल्ट खराब न हो, इसके लिए गुरूजी लोग खास ध्यान देते। छात्रों को गुरूकुल की भांति हर दिन चार बजे भोर में जगाया जाता। गुरूजी लोग भी जागते और पढ़ाई कराते। इतनी मेहनत के बाद भी गुरू लोग अपने ही खर्च से स्कूल में खाना बनाते। इसके लिए अलग से कोई फीस नहीं ली जाती थी। हां, परीक्षा पास होने के बाद हर छात्र गुरू दक्षिणा के तौर पर पांच या दस रूपए देता था। अगर मानें तो तीन-चार महीने की पढ़ाई का यही गुरूओं का मेहनताना होता।
स्कूल में पहुंचते ही मुझे अपने जमाने के वे दिन याद आने लगे। मैंने पूछताछ शुरू की तो पता चला कि यह परंपरा टूटे कई साल हो गए। वैसे तो अब खाते-पीते परिवारों के बच्चे यहां पढ़ने ही नहीं आते। उनके लिए अब कस्बे में ही अंग्रेजी नाम वाले कई स्कूल खुल गए हैं। जहां वे मोटी फीस देकर पढ़ते हैं। ये बात और है कि इन स्कूलों के चलाने वाले लोग हमारे स्कूल की लालटेन की रोशनी से ही निकले हुए हैं। कहते हैं, व्यक्ति अपने शुरूआती जीवन में सीखता है, उसे बाद के दिनों में भी अख्तियार किए रखता है। लेकिन तकरीबन इस नि:स्वार्थ परंपरा को हम अपनी जिंदगी में उतार नहीं पाए हैं। बाजार के दबाव ने हमारी शिक्षा व्यवस्था को भी पूरी तरह निगल लिया है। जहां अब गुरू न तो छात्रों को अपने परिवार का अंग समझता है ना ही छात्रों के मन में उसके लिए श्रद्धा ही बची है। ऐसे में शिक्षा भी व्यवसाय बन गई है। जहां लोग अपनी हैसियत के मुताबिक कीमत देकर उसे हासिल कर रहे हैं। जो बड़ी कीमत देकर ऊंची तालीम हासिल नहीं कर पाता है, उसे बाजार में खुद के पिछड़ने का मलाल रह जाता है। लेकिन आज से करीब दो दशक पहले तक स्थिति ऐसी नहीं थी। कस्बे के जमींदार, थानेदार से लेकर चौकीदार तक का बेटा एक साथ पढ़ते थे। सबकी लालटेनें एक साथ जलती थीं और इनकी सम्मिलित रोशनी समाज में मौजूद अंधियारे को मिटाने की कोशिश करती थीं। ऐसा नहीं कि तब सारे गुरू दूध के धुले ही थे। समाज में कभी-भी सबकुछ दूध का धुला ही नहीं होता। लेकिन उसकी फिजाओं में इसकी तासीर कम या ज्यादा जरूर होती है। कहना ना होगा कि तब के दिनों में शिक्षा कम से कम दुकानदारी के तासीर से मुक्त थी, जहां अध्यापक हर छात्र को पढ़ाना और उसे काबिल आदमी बनाना अपना कर्तव्य समझता था। शायद यही वजह है कि लालटेन से जो रोशनी निकलती थी, वह शिक्षा के साथ एक रिश्ते का भी प्रसार करती थी। आज स्कूल भी वही है। अध्यापकों को पहले से कई गुना ज्यादा पगार मिलती है। वहां बिजली भी आ गई है। उसकी रोशनी की चमक भी कहीं ज्यादा है। लेकिन अफसोस रिश्तों की वह डोर बाकी नहीं बची है, जो लालटेन वाले दिनों की खास पहचान हुआ करती थी।
जनसत्ता के कॉलम दुनिया मेरे आगे में प्रकाशित

सुबह सवेरे में