उमेश चतुर्वेदी
भारतीय राजनीति में एक बड़ी बिडंबना देखने को मिलती है। हर कामयाब राजनेता अपनी गलतियों से सीखने के बावजूद अपने पिछले प्रदर्शन को ही अपनी उपलब्धि मान बैठता है। लगातार साथ चलने वाले कथित सलाहकार और चंपू उसके स्पष्ट नजरिए को धुंधला बनाने में कुछ ज्यादा ही योगदान करते हैं। इसका खामियाजा उसे और बड़ी कीमत देकर चुकाना पड़ता है। बिहार के मौजूदा चुनाव के आंकड़ों पर गौर फरमाएं तो कई और दिलचस्प निष्कर्ष भी सामने आते हैं। मौजूदा विधानसभा अभियान में एक तथ्य साफ नजर आ रहा था – नीतीश लहर का उभार। लालू प्रसाद यादव को विपक्षी नेता होने के नाते इसे नकारना ही था। लेकिन उनकी यह नकार जमीनी हकीकतों से दूर थी। दरअसल पिछले यानी 2005 के विधानसभा चुनावों के दौरान उन्हें 31.1 प्रतिशत वोट मिला था। तब रामविलास पासवान की लोकजनशक्ति पार्टी के साथ उनका गठबंधन नहीं था। तब पासवान की पार्टी अकेले चुनाव मैदान में थी। उस वक्त उसे 13.2 प्रतिशत वोट मिला था। जबकि जनता दल-यू और बीजेपी गठबंधन 36.2 प्रतिशत वोटों के साथ कामयाब हुआ था। लालू यादव और रामविलास पासवान को उम्मीद थी कि उनके साथ आने से उनका कुल मिलाकर वोट प्रतिशत 34.3 प्रतिशत हो जाएगा। जो बीजेपी-जेडी-यू गठबंधन के पिछले वोटों की तुलना में महज 2.8 फीसदी ही कम रहेगा। उन्हें यह भी उम्मीद रही होगी कि बटाईदारी कानून के लागू किए जाने की चर्चा से भूमिहार और ठाकुर वोटरों की नाराजगी का उन्हें फायदा मिलेगा। जिससे उनके गठबंधन के साथ कम से कम इन सवर्ण जातियों का समर्थन भी हासिल हो जाएगा। लेकिन लालू यादव यहीं पर एक चूक कर गए। उन्होंने बहुमत मिलने की हालत में खुद के मुख्यमंत्री बनाए जाने का ऐलान कर दिया। लालू यादव ऐसा करते वक्त भूल गए कि उनके पंद्रह साल के राज में उनसे अगर कोई सबसे ज्यादा नाराज रहा है तो वे सवर्ण मतदाता ही रहे हैं। उनका यह आकलन गलत रहा, क्योंकि तमाम बदलावों के बावजूद कम से कम सवर्ण मतदाता अभी-भी लालू को स्वीकार करने के मूड में नहीं है। फिर भारतीय राजनीति में यह देखा गया है कि अनुसूचित जातियों का वोट बैंक वाली पार्टियों के साथ जब भी किसी दूसरी किसी पार्टी का गठबंधन होता है तो यह वोट बैंक दूसरी पार्टी के साथ चला जाता है, लेकिन दूसरी पार्टी के वोटर अनुसूचित जातियों के साथ कम ही आते हैं। यानी रामविलास पासवान के वोटरों ने आरजेडी उम्मीदवारों के लिए वोटिंग में झिझक नहीं दिखाई, लेकिन आरजेडी के समर्थकों के लिए पासवान के उम्मीदवारों को वोट देना रास नहीं आया। नीतीश कुमार के पक्ष में सिर्फ उनका सुशासन ही नहीं रहा। बल्कि समाज के दूसरे वर्गों को भी सत्ता में मिली भागीदारी ने उनकी साख और समर्थन बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। चुनाव नतीजों के विश्लेषण में कुछ तथ्यों की ओर लोगों का ध्यान नहीं जा रहा है। यह सच है कि करीब ढाई दशक बाद 2006 में बिहार में पंचायत चुनाव हुए। जिसमें महिलाओं को पचास प्रतिशत का आरक्षण दिया गया। महिलाओं को विकास और फैसले लेने की प्रक्रिया में पहली बार भागीदारी मिली। कानून-व्यवस्था की हालत सुधरने के बाद उनमें आत्मविश्वास भी जगा। दलितों में महादलित जातियों को घर बनाने की सुविधाएं और जमीन देकर नीतीश कुमार ने नया वोट बैंक भी बनाया। चूहा खाने के लिए अभिशप्त मुसहर जैसी जातियों को पहली बार घर की छत नसीब हुई। देश में पहली ग्राम कचहरी योजना की शुरूआत भी नीतीश कुमार ने ही की। इसका दोहरा फायदा हुआ। छोटे-मोटे झगड़ों के लिए गांव वालों को थाना-कचहरी के चक्कर काटने से मुक्ति मिली और न्यायमित्र के तौर पर हजारों लोगों को रोजगार भी मिला। गांवों के स्कूलों में शिक्षा मित्र के साथ ही हजारों शिक्षकों की नियुक्ति ने भी नीतीश कुमार के लिए नया वोट बैंक बनाने में मदद दी।
मौजूदा चुनाव में फिर भी दूसरी पार्टियों को 26.8 फीसद वोट मिले हैं, जिनमें सीपीआई, सीपीएम, बीएसपी समेत कई पार्टियां शामिल हैं। कांग्रेस भी 8.4 प्रतिशत वोट पाने में कामयाब रही है। यानी नीतीश के खिलाफ 52.8 फीसदी वोटिंग हुई है। इससे साफ है कि अगर पहले की तरह लालू यादव ने कांग्रेस का भी साथ लिया होता और अपनी पुरानी सहयोगी वामपंथी पार्टियों के साथ तालमेल किया होता तो उनके लिए तसवीर इतनी बुरी नहीं होती। सबसे बड़ी बात यह है कि 1990 के बाद यह पहला मौका होगा, जब लालू यादव या उनके परिवार के लिए अहम संवैधानिक स्थिति नहीं होगी। 1990 से 2005 तक उनके या उनके परिवार के पास मुख्यमंत्री या नेता विपक्ष की कुर्सी रही है। लेकिन चुनावी नतीजों ने इस बार उनसे यह अधिकार भी छीन लिया है। कायदे से नेता विपक्ष होने के लिए कुछ विधानसभा सीटों की दस फीसदी सदस्य होने चाहिए। इस हिसाब से बिहार में नेता विपक्ष की संवैधानिक कुर्सी हासिल करने के लिए आरजेडी के पास 25 विधायक होने चाहिए थे। लेकिन इस बार उनके पास महज 22 विधायक ही जीत कर आए हैं।
आखिर में : आंकड़ों की नजर में बिहार चुनाव ने कुछ नई इबारतें भी लिखी हैं। दुनिया में किसी गठबंधन की यह सबसे बड़ी जीत है। बिहार में इसके पहले 1995 में लालू यादव की अगुआई में आरजेडी ने 320 सीटों में 182 सीट जीत हासिल की थी।
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