जम्मू-कश्मीर में पीडीपी का साथ हो या फिर नेशनल कांफ्रेंस का सहयोग, लंबी राजनीति के लिए बीजेपी को भारी पड़ना तय है। पीडीपी को घाटी में मिले वोटों के पीछे अलगाववादियों की अपील ने बड़ी भूमिका निभाई है, वहीं नेशनल कांफ्रेंस के प्रमुख नेता फारूख अब्दुल्ला मोदी को वोट देने की बजाय अपना वोट समुद्र में फेंकने की अपील करते रहे हैं। जाहिर है कि दोनों बीजेपी और उसकी नीतियों के धुर विरोधी रुख के साथ सियासी ज़मीन पर खड़े हैं। इसलिए तय है कि दोनों दलों के साथ बीजेपी के रिश्ते असहज ही रहेंगे..अगर पीडीपी के साथ पार्टी जाती है तो उस पर अलगाववादियों को नैतिक शह देने का भी आरोप लगेगा। ऐसे में बेहतर तो यही होगा कि बीजेपी विपक्ष में बैठे और अपनी नीतियों पर कायम रहते हुए राज्य में अपनी पैठ बढ़ाने की कोशिश करे। सरकार में शामिल होने के बाद या खुद सरकार बना कर वह राज्य की विकास नीतियों को सीधे प्रभावित तो कर सकेगी..लेकिन ठीक विपरीत विचारधारा की सवारी कर रहे दलों के साथ उसके लिए सियासी कदमताल आसान नहीं होगी..जिसका खामियाजा पार्टी को भुगतना पड़ सकता है ।
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