Monday, October 13, 2008

आप नैनो के पक्ष में हैं या खिलाफ …...

उमेश चतुर्वेदी
आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई और आम आदमी की कार कही जाने वाली नैनो में कोई समानता हो सकती है भला ! अमेरिकी राष्ट्रपति जॉर्ज बुश और टाटा संस के चेयरमैन रतन टाटा में भी कोई तुलना कैसे की जा सकती है ? लेकिन नैनो पर राजनीति ने जिस तरह करवट बदली है – ऐसा ही हो रहा है। बुश ने तालिबान के खिलाफ लड़ाई छेड़ते वक्त कहा था कि आतंकवाद के खिलाफ उनका साथ दें। जो साथ देगा, वह आतंकवाद का विरोधी है, जो साथ नहीं देगा- उसे आतंकवाद का मददगार माना जाएगा। नैनो की राजनीति में भी कुछ ऐसा ही हो रहा है।
सिंगूर से उठकर रतन टाटा साणंद पहुंच गए हैं। एक एम (ममता बनर्जी ) ने उन्हें परेशान किया तो दूसरे एम ( नरेंद्र मोदी ) ने उन्हें उबार लिया और एक एस ( सिंगूर ) से उठाकर दूसरे एस ( साणंद) को पहुंचा दिया। ममता से पीछा छुड़ाकर टाटा अब दूसरे मोदी की संगत में गदगद नजर आ रहे हैं। लेकिन संबंधों के बनाव-बिगाड़ के इस दौर में औद्योगीकरण के पक्ष और विपक्ष में चर्चाएं शुरू हो गई हैं। ठीक उसी तरह – जैसे आतंकवाद को लेकर जार्ज बुश ने कहा था। यानी अगर आप नैनो के पक्ष में हैं तो आप औद्योगीकरण और उद्योगों, गरीबी उन्मूलन और रोजगार सृजन के सहयोगी है। अगर ऐसा नहीं है तो इसका मतलब साफ है कि आप उद्योगों और रोजगार की संभावनाओं के खिलाफ हैं। दिलचस्प बात ये है कि इस मसले पर उद्योग संगठनों से लेकर बीजेपी और वामपंथी- सभी एक समान राय रखते हैं। भारतीय लोकतंत्र में उलटबांसियों का खेल समझने के लिए ये उदाहरण भी मौजूं होगा। परमाणु करार के खिलाफ वाम और दक्षिण साथ हैं। अब नैनो को लेकर भी वाम और दक्षिण एक ही मंच पर नजर आ रहे हैं। नरेंद्र मोदी ने नैनो को साणंद पहुंचाकर बाजी मार ली है। जाहिर है वे विजयी भाव से सियासी मैदान पर नजर फिरा रहे हैं। जबकि सिंगूर से नैनो के बाहर होने के बाद पश्चिम बंगाल के वामपंथी दल निराशा के गर्त में गोते लगाते नजर आ रहे हैं। इस पूरे प्रकरण में रतन टाटा समेत उद्योगपतियों की भूमिका किनारे बैठ लहरों का आनंद लेने वाले शख्स की तरह है। टाटा समेत कुछ उद्योग संगठनों को लगता है कि अब पश्चिम बंगाल का भला होने से रहा। कहना ना होगा – उनके बैठाए इस डर ने पश्चिम बंगाल की सत्ताधारी मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के नेताओं को परेशान कर रखा है। मजदूरों के हितैषी दर्शन पर खड़ी मार्क्सवादी पार्टी की अब प्रमुख चिंता ये है कि उसकी छवि कहीं उद्योग विरोधी की न बन जाए। रतन टाटा को मार्क्सवादियों की ये दुविधा और डर पता है – लिहाजा वे इसे भरपूर तरीके से भुना रहे हैं। रतन टाटा देश के एक प्रमुख उद्योगपति हैं। जाहिर है, उद्योग संगठन उनका साथ देंगे ही और वे दे रहे हैं।
नैनो के समर्थन और नैनो विरोध की कसौटी पर किसी को कैसे कसा जा सकता है कि वह उद्योग का विरोधी या है या नहीं। मौजूदा माहौल में ममता बनर्जी कठगरे में खड़ी नजर आ रही हैं। उद्योग जगत उनकी ओर उंगली उठाए खड़ा है। अपनी उग्र राजनीति के लिए ममता वैसे ही राष्ट्रीय स्तर पर सवालों के केंद्र में रही हैं। लेकिन वे इतनी भी नौसिखुआ नहीं हैं कि उन्हें इस आंदोलन के इस हश्र का अंदाजा नहीं होगा। नैनो की सियासत के इस नतीजे का उन्हें अंदाजा हो गया था – तभी वे सोनिया गांधी और पश्चिम बंगाल के राज्यपाल गोपाल कृष्ण गांधी से मिलकर इस मसले के हल में मध्यस्थता करने की अपील की। गांधी ने भूमिका निभाई भी। दुर्गापुर हाइवे जाम करके कोलकाता की सब्जी-दूध सप्लाई लाइन को सफलतापूर्वक बाधित करने वाली ममता बनर्जी का खुद को बचाव वाले इस कदम पर टाटा की नजर थी। जो टाटा हर हाल में सिंगूर न छोड़ने का दावा करते रहे थे , उन्होंने पश्चिम बंगाल को टा-टा करने का मन बना लिया। फिर उद्योग समर्थकों के पलक-पांवड़े बिछाने की होड़ लग गई। उत्तरांचल, पंजाब, हरियाणा, महाराष्ट्र और गुजरात की इस होड़ में गुजरात ने बाजी मारी। अब ममता बनर्जी कठगरे में हैं और चुप हैं।
यहीं भारत के किसान आंदोलन की बिडंबना खुलकर सामने आ जाती है। इस देश में किसानों के हकों की बात करना इतना बड़ा गुनाह हो गया है कि आप उद्योग और रोजगार के विरोधी ठहरा दिए जाते हैं। सिंगूर के किसान भी उद्योगों के खिलाफ नहीं हैं। ममता बनर्जी ने किसानों की इसी आवाज को ताकत देने की कामयाब कोशिश की थी। किसानों की लड़ाई में साथ उतरीं महाश्वेता देवी और मेधा पाटकर भी उद्योगों की विरोधी नहीं रहीं। उनका सिर्फ इतना ही कहना था कि जिस जमीन के मालिक सदियों से किसान हैं – उनकी मर्जी के खिलाफ उनकी ही जमीन से बेदखल किया जाना गलत है। महाश्वेता देवी और मेधा पाटकर भी उसी दर्शन में भरोसा करती हैं – जिसमें पश्चिम बंगाल में सरकार चला रही सीपीएम का विश्वास है। इस आंदोलन में वामपंथी कार्यकर्ताओं के कोप का निशाना बन चुकीं मेधा पाटकर और महाश्वेता देवी ने सुझाव भी दिया था कि अगर उद्योगों के लिए जमीन चाहिए ही तो पश्चिम बंगाल में भी काफी बंजर भूमि है, उन्हें ही क्यों न लिया जाए। उस जमीन को लेने से किसानों के रोजी-रोजगार पर भी असर नहीं पड़ेगा और बंजर भूमि को उद्योगों के लिए उद्योगपति और सरकार मिलकर विकसित कर सकते हैं। लेकिन उद्योग और उदारीकरण के पक्ष में उठी लहर ने ये सोचने की ताकत उस वामपंथ से भी छीन ली है – जिसे कम से कम ऐसे मसलों पर सोचने वाला माना जाता रहा है।
महाराष्ट्र और दादरा नगर हवेली में अपनी संस्था वनराई के जरिए क्रांति लाने वाले पूर्व युवा तुर्क मोहन धारिया ने इन पंक्तियों के लेखक से एक बार देश में बेतहाशा तरीके से खुल रहे स्पेशल इकोनॉमिक जोन को लेकर चिंता जताई थी। उनका कहना था कि हमसे करीब ढाई गुना ज्यादा बड़े देश चीन में कुल पचहत्तर सेज हैं, जबकि अपने देश में चार सौ उन्नीस प्रस्ताव या तो मंजूर हो चुके हैं या वहां काम शुरू हो चुका है। इनमें से ज्यादातर सेज हरी-भरी उपजाऊ जमीनों पर ही बने हैं या बन रहे हैं। जिस तरह पिछले कुछ महीनों से खाद्यान्नों की महंगाई का सामना पूरी दुनिया कर रही है, उसमें उपजाऊ जगहों पर सेज विकसित किए जाने की प्रक्रिया पर ही सवाल उठ रहे हैं। इस सिलसिले में एक जबर्दस्त चुटकी पूर्व केंद्रीय मंत्री सुरेश प्रभु ने ली। उनका कहना था कि एक तरफ सरकार बंजर भूमि के विकास के लिए करोड़ों रूपए खर्च कर रही है और दूसरी तरफ उपजाऊ जमीन पर सेज बनाने के प्रस्तावों को मंजूरी दे रही है। अफसोस की बात ये है कि सिंगूर के बहाने किसानों ने जो सवाल उठाए थे, उसके जरिए किसानों के आंदोलन को एक नई दिशा दी जा सकती थी, उनके अधिकारों के बहाने देश में खाद्यान्न संकट को हल करने की दिशा में नई बहस हो सकती थी। जिसके मंथन से निकला वैचारिक मक्खन देश को नई दिशा देता। लेकिन ऐसा नहीं हो सका।
सबसे बड़ा सवाल ये है कि देश का औद्योगीकरण किस कीमत पर हो, खाद्यान्न की कीमत पर..किसानों के हक की कीमत पर या फिर उद्योगपतियों की इच्छाओं की कीमत पर ...सिंगूर ने यही सवाल उठाने की कोशिश की थी। सिंगूर के किसानों की भी इच्छा रही होगी कि वे नैनो कार में सवारी करें। उनका भी सपना फ्लैट स्क्रीन टीवी और फोर जी तकनीक वाले फोन के उपयोग का रहा है। लेकिन क्या रोटी या भात की कीमत पर ये सपने ..ये इच्छाएं पूरी की जा सकती हैं। क्या पेट में रोटी के बिना इन फोन और कार की कोई वकत है..। सिंगूर ने विस्थापन पर भी सवाल उठाए हैं। विस्थापन के एवज में किसानों को कुछ मिले – इसका समर्थन कम से कम वह नहीं कर सकता , जिसने विस्थापन की पीड़ा झेली होगी। वैसे भी बंजर और रेतीली माटी वाले इलाके से विस्थापन का उतना दर्द नहीं होता – जितना रोटी और रोजी देने वाली जमीन को छोड़ते वक्त होता है। सिंगूर ने इन समस्याओं पर भी ध्यान खींचने की कोशिश की थी। लेकिन दुर्भाग्य ये कि देश नैनो के पक्ष और विपक्ष की राजनीति में ही अपना भविष्य देख रहा है।

2 comments:

  1. दोस्त... ममता बनर्जी ने अब तक कितने रोजगार के अवसरों का सृजन किया है? उद्योगपतियों को गाली देना, बुरा भला कहना सबसे आसान है। सोचिये यदि ये उद्यमी न हों तो क्या दुनिया आज जैसी है उससे बेहतर होगी? यदि नहीं तो अपनी कमियों और कुंठाओं को दूसरों पर क्यों थोपा जाय।

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  2. दुनिया की क्रांतियों का इतिहास कहता है कि परिवर्तन के लिए दो चीजों की आवश्यकता है । एक अकाट्य तर्क और दूसरा उस तर्क के पीछे खड़ी भीड़ । अकेले अकाट्य तर्क किसी काम का नही और अकेले भीड़ भी कुम्भ के मेले की शोभा हो सकती है परिवर्तन की सहयोगी नही ।
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    इस युग के कुछ अकाट्य तर्क इस प्रकार है -
    * मशीनों ने मानवीय श्रम का स्थान ले लिया है ।
    * कम्प्यूटर ने मनवीय मस्तिष्क का काम सम्भाल लिया है ।
    * जीवन यापन के लिए रोजगार अनिवार्य होने की जिद अमानवीय है ।
    * 100% रोजगार सम्भव नही है ।
    * अकेले भारत की 46 करोड़ जनसंख्या रोजगार के लिए तरस रही है ।
    * संगठित क्षेत्र में भारत में रोजगार की संख्या मात्र 2 करोड़ है ।
    * दुनिया के 85% से अधिक संसाधनों पर मात्र 15 % से कम जनसंख्या का अधिपत्य है ।
    * 85 % आबादी मात्र 15 % संसाधनों के सहारे गुजर बसर कर रही है ।
    धरती के प्रत्येक संसाधन पर पैसे की छाप लग चुकी है, प्राचीन काल में आदमी जंगल में किसी तरह जी सकता था पर अब फॉरेस्ट ऑफिसर बैठे हैं ।
    * रोजगार की मांग करना राष्ट्र द्रोह है, जो मांगते हैं अथवा देने का वादा करते हैं उन्हें अफवाह फैलाने के आरोप में सजा दी जानी चाहिए ।
    * रोजगार देने का अर्थ है मशीनें और कम्प्यूटर हटा कर मानवीय क्षमता से काम लेना, गुणवता और मात्रा के मोर्चे पर हम घरेलू बाजार में ही पिछड़ जाएंगे ।
    * पैसा आज गुलामी का हथियार बन गया है । वेतन भोगी को उतना ही मिलता है जिससे वह अगले दिन फिर से काम पर लोट आए ।
    * पुराने समय में गुलामों को बेड़ियाँ बान्ध कर अथवा बाड़ों में कैद रखा जाता था ।
    अब गुलामों को आजाद कर दिया गया है संसाधनों को पैसे की दीवार के पीछे छिपा दिया गया है ।
    * सरकारों और उद्योगपतियों की चिंता केवल अपने गुलामों के वेतन भत्तों तक सीमित है ।
    * जो वेतन भत्तों के दायरों में नही है उनको सरकारें नारे सुनाती है, उद्योग पति जिम्मेदारी से पल्ला झाड़े बैठा है ।
    * जो श्रम करके उत्पादन कर रही हैं उनकी खुराक तेल और बिजली है ।
    * रोटी और कपड़ा जिनकी आवश्यकता है वे उत्पादन में भागीदारी नही कर सकते, जब पैदा ही नही किया तो भोगने का अधिकार कैसे ?
    ऐसा कोई जाँच आयोग बैठाने का साहस कर नही सकता कि मशीनों के मालिकों की और मशीनों और कम्प्यूटर के संचालकों की गिनती हो जाये और शेषा जनसंख्या को ठंडा कर दिया जाये ।
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    दैनिक भास्कर अखबार के तीन राज्यों का सर्वे कहता है कि रोजगार अगले चुनाव का प्रमुख मुद्दा है , इस दायरे में 40 वर्ष तक की आयु लोग मांग कर रहे हैं।
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    देश की संसद में 137 से अधिक सांसदों के द्वारा प्रति हस्ताक्षरित एक याचिका विचाराधीन है जिसके अंतर्गत मांग की गई है कि
    * भारत सरकार अब अपने मंत्रालयों के जरिये प्रति व्यक्ति प्रति माह जितनी राशि खर्च करने का दावा करती है वह राशि खर्च करने के बजाय मतदाताओं के खाते में सीधे ए टी एम कार्डों के जरिये जमा करा दे।
    * यह राशि यू एन डी पी के अनुसार 10000 रूपये प्रति वोटर प्रति माह बनती है ।
    * अगर इस आँकड़े को एक तिहाई भी कर दिया जाये तो 3500 रूपया प्रतिमाह प्रति वोटर बनता है ।
    * इस का आधा भी सरकार टैक्स काट कर वोटरों में बाँटती है तो यह राशि 1750 रूपये प्रति माह प्रति वोटर बनती है ।
    * इलेक्ट्रोनिक युग में यह कार्य अत्यंत आसान है ।
    * श्री राजीव गान्धी ने अपने कार्यकाल में एक बार कहा था कि केन्द्र सरकार जब आपके लिए एक रूपया भेजती है तो आपकी जेब तक मात्र 15 पैसा पहूँचता है ।
    * अभी हाल ही में राहुल गान्धी ने इस तथ्य पर पुष्टीकरण करते हुए कहा कि तब और अब के हालात में बहुत अंतर आया है आप तक यह राशि मात्र 3 से 5 पैसे आ रही है ।
    राजनैतिक आजादी के कारण आज प्रत्येक नागरिक राष्ट्रपति बनने की समान हैसियत रखता है ।
    जो व्यक्ति अपना वोट तो खुद को देता ही हो लाखों अन्य लोगों का वोट भी हासिल कर लेता है वह चुन लिया जाता है ।
    * राजनैतिक समानता का केवल ऐसे वर्ग को लाभ हुआ है जिनकी राजनीति में रूचि हो ।
    * जिन लोगों की राजनीति में कोई रूचि नही उन लोगों के लिए राज तंत्र और लोक तंत्र में कोई खास अंतर नही है ।
    * काम के बदले अनाज देने की प्रथा उस जमाने में भी थी आज भी है ।
    * अनाज देने का आश्वासन दे कर बेगार कराना उस समय भी प्रचलित था आज भी कूपन डकार जाना आम बात है ।
    * उस समय भी गरीब और कमजोर की राज में कोई सुनवाई नही होती थी आज भी नही होती ।
    * जो बदलाव की हवा दिखाई दे रही है थोड़ी बहुत उसका श्रेय राजनीति को नही समाज की अन्य व्यवस्थाओं को दिया जाना युक्ति संगत है ।
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    राष्ट्रीय आय में वोटरों की नकद भागीदारी अगले चुनाव का प्रमुख मुद्दा होना चाहिए ।
    * अब तक इस विचार का विस्तार लगभग 10 लाख लोगों तक हो चुका है ।
    * ये अकाट्य मांग अब अपने पीछे समर्थकों की भीड़ आन्धी की तरह इक्क्ट्ठा कर रही है ।
    * संसद में अब राजनीतिज्ञों का नया ध्रूविकरण हो चुका है ।
    * अधिकांश साधारण सांसद अब इस विचार के साथ हैं । चाहे वे किसी भी पार्टी के क्यों न हो ।
    * समस्त पार्टियों के पदाधिकारिगण इस मुद्दे पर मौन हैं ।
    * मीडिया इस मुद्दे पर कितनी भी आँख मूँद ले, इस बार न सही अगले चुनाव का एक मात्र आधार 'राष्ट्रीय आय मं. वोटरों की नकद भागीदारी' होगा, और कुछ नही ।
    * जो मिडिया खड्डे में पड़े प्रिंस को रातों रात अमिताभ के बराबर पब्लिसिटी दे सकता है उस मीडिया का इस मुद्दे पर आँख बन्द रखना अक्षम्य है भविष्य इसे कभी माफ नही करेगा|

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