Monday, August 29, 2011

कहवां से आवेला सिन्होरवा-सिन्होरवा

भोजपुरी और मैथिली इलाके में शादी के वक्त सिंदूर रखने के लिए जो सिंदूरदान आता है...वह जब तक पति जिंदा रहता है...तब तक रहता है। उसे अहिवात यानी सुहाग का प्रतीक माना जाता है। इसीलिए इस सिंदूरदान यानी सिन्होरा को महिलाएं अपनी जिंदगी की तरह प्यार करती है। यह सिन्होरा हर जगह नहीं बनता...कभी बलिया का हनुमानगंज इलाका पूरे देश में अपने सिन्होरा निर्माण के लिए प्रसिद्ध था। लेकिन सरकारी उपेक्षा और उदारीकरण ने इस उद्योग की कमर तोड़ दी है। पेश है बलिया से सुधीर तिवारी की रिपोर्ट
'कहवां से आवेला सिन्होरवा-सिन्होरवा भरल सेनुर हो, ए ललना कहंवा से आवेला पियरिया-पियरिया लागल झालर हो'। यह मंगल गीत जब सुहागिन औरतें गाती हैं तो उन्हे शायद यह नहीं पता होता कि सुहाग का प्रतीक 'सिन्होरा' सेन्दुरौटा कहां और कैसे बनता है। जिला मुख्यालय से करीब पांच किमी दूर सिकंदरपुर मार्ग पर स्थित हनुमानगंज में 'सिन्होरा' बनाने का लघु उद्योग है। यहां किसी जमाने में मुम्बई तक के व्यापारी आते थे लेकिन अब बदलते जमाने की मार इस धंधे पर भी पड़ गयी है।
शासन स्तर से इस धंधे में जुड़े लोगों को कोई सहायता नहीं मिलती है। इस व्यवसाय में जुड़े लोगों को सबसे अधिक दिक्कत कच्चे माल की होती है। यहां पर सिन्होरा, मौर एवं दूल्हे के सिर पर सजने वाली पगड़ी का निर्माण किया जाता है।

निर्माण में आम की लकड़ी का होता प्रयोग
सिन्होरा निर्माण में प्रमुख कच्चा माल आम की लकड़ी का प्रयोग किया जाता है जिसे वेदों में देव वृक्ष की संज्ञा दी गई है। 9 से 10 फीट व्यास के डेढ़ फीट लम्बे आम की लकड़ी के बोटा-गुटके को पहले धूप में सुखाया जाता है। उसके बाद कुल्हाड़ी से उसके छिलके उतार कर खराद मशीन से सिन्होरा का स्वरूप दिया जाता है। पुन: छाया में सुखाने के बाद सफाई कर के चापड़ से तैयार रंग से रंग कर बिक्री हेतु तैयार किया जाता है। मुख्य रूप से औजार रूखानी, कुल्हाड़ी तथा बिजली की मोटर या डीजल इंजन का सहारा लिया जाता है। इसके लिए तकनीकी रूप से ट्रेन्ड कारीगर बिहार के जनपद कटिहार, मोतीहारी व बेगूसराय आदि से आते हैं जो पूरे वर्ष रहकर काम करते हैं। एक कारीगर एक दिन में 40 से 50 सिन्होरा का निर्माण कर देता है जिसे मजदूरी के रूप में 3 से 4 रुपये प्रति पीस के हिसाब से भुगतान किया जाता है। सिन्होरा पूर्ण रूप से तैयार होने के बाद उसकी कुल लागत 75 से 80 रु. पड़ती है जिसे बाहर से आये व्यापारी लगभग 100-150 रु. प्रति पीस की दर से खरीदते हैं।
प्रमुख समस्या लकड़ी की
सिन्होरा निर्माण से जुडे़ व्यापारियों का कहना है कि इसके निर्माण हेतु कच्चा माल आम की लकड़ी की सबसे बड़ी समस्या है। वन विभाग एवं पुलिस की सख्ती से आम की लकड़ी प्राप्त कर पाना आसान नहीं है। इसके लिए जगह-जगह पर भेंट देनी पड़ती है तब जाकर बड़ी मुश्किल से काम योग्य आम की लकड़ी प्राप्त हो पाती है। फुटकर विक्रेता सिन्होरा को सुहाग का प्रतीक बताकर एक सिन्होरा का मूल्य 251 रु. से लेकर 1000 रु. तक में बेंच देते हैं। जनपद के सिन्होरा उद्योग से गाजीपुर, वाराणसी, इलाहाबाद, चंदौली, गोरखपुर, बस्ती, आजमगढ़, मऊ, जौनपुर, आरा, छपरा, बक्सर, सिवान आदि जनपदों में बलिया का नाम रोशन है लेकिन विडम्बना है कि इसके विकास के प्रति उद्योग विभाग कोई आर्थिक मदद एवं सहयोग नहीं करता।
सिन्होरी इंगुरवटी का बढ़ा क्रेज
सौभाग्यवती महिलाओं के सुहाग के प्रतीक सिन्होरा के महत्व को निकट भविष्य में भी कमतर तो नहीं आंका जा सकता लेकिन हाईटेक जमाने के साथ इसके प्रयोग में भी अन्तर आया है। पहले बड़ा और भारी सिन्होरा सौभाग्यशाली समझा जाता था। वहीं अब सिन्होरी व इंगुरवटी का प्रचलन बढ़ रहा है। छोटा होने के कारण इसे अटैची आदि में रखकर कहीं भी ले जाया जा सकता है।
कोई योजना नहीं: महाप्रबंधक
जिला उद्योग महाप्रबंधक शिवलाल ने कहा कि शासन से सिन्होरा उद्योग के लिए किसी तरह की योजना आने पर इससे जुड़े लोगों की मदद की जायेगी। अभी तक कोई योजना नहीं है। उन्होंने बताया कि पूरी स्थिति से शासन को अवगत करा दिया गया है।

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